कुछ महत्वपुर्ण आर्थिक,कृषिक एवम विकास से संबंधित लेख..!=02

सूचना प्रौद्योगिकी (संशोधन) अधिनियम, 2008, सायबर अपराध के खिलाफ सरकार की सामयिक पहल
विशेष लेख

सायबर अपराध के बढते मामलों से निपटने के लिए मौजूदा कानून को अपर्याप्त मानते हुए सरकार ने सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2008 में व्यापक संशोधन कर यह दर्शा दिया है कि वह भविष्य के सायबर अपराधों के प्रति पूरी तरह जागरूक है । 27 अक्तूबर, 2009 को इन संशोधनों को सरकार ने अधिसूचित भी कर दिया है, जिससे त्वरित आधार पर इनका उपयोग शुरू किया जा सके । इस एक्ट को संशोधित करते हुए सरकार ने ना केवल देश में घटे विभिन्न तरह के अपराधों का आकलन किया बल्कि दुनिया भर में मौजूद आईटी या सायबर अपराध नीति का भी अध्ययन किया । इस लंबी मशक्कत का उद्देश्य यह तय करना था कि कंप्यूटर या सायबर अपराध से जुड़ा कोई भी पहलू छूटने ना पाए ।

मूल रूप से वर्ष 2000 में लाया गया सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2008 उस समय ई-कामर्स, इलेक्ट्रानिक रुप में पैसे के लेन-देन, ई-प्रशासन के साथ ही कंप्यूटर से जुड़े अपराधों को ध्यान में रखकर लाया गया था । उस समय हुए अपराधों व घटनाओं को ध्यान में रखकर तैयार किए गए इस आईटी एक्ट की धाराएं अगले कुछ सालों में ही कंप्यूटर व इंटरनेट के बढते प्रयोग और उससे जुड़े अपराधों की संख्या व विविधता के आधार पर कम पड़ने लगीं । जिसके बाद सरकार ने मौजूदा इंटरनेट अपराधों व उसके लिए विश्व स्तर पर उपलब्ध कानूनों की तर्ज पर इस एक्ट में संशोधन कर इसे समकालीन व शक्तिमान बनाने का निर्णय किया । जिसके बाद इसके मौजूदा प्रावधानों को और अधिक सख्त करने के साथ ही उसके स्वरूप को भी व्यापक किया गया, ताकि कंप्यूटर अपराध से जुड़ा हर पहलू इसमें शामिल हो सके ।

आईटी एक्ट के संशोधन में कुल 52 धाराएं हैं । जिसमें हर पक्ष को शामिल किया गया है । इस संशोधन के दौरान यह भी ध्यान रखा गया कि यह यूनिसिट्रल या यूनाइटेड नेशन कमीशन ऑन इंटरनेशनल ट्रेड लॉ के अनुरूप भी हो । यूनिसिट्रल विश्व स्तरीय कानून है । एक्ट में संचार उपकरण की व्याख्या को भी शामिल किया गया । कंप्यूटर या इंटरनेट नेटवर्क पर इस उपकरण के बिना कार्य करना मुमकिन नहीं है । इसको ध्यान में रखकर संचार उपकरण को कानूनी परिधि में शामिल किया गया जिससे इसे उल्लेखित कर उसके अनुरूप भी कानूनी प्रक्रियाएं शुरू की जा सकें । इसी तरह इंटरमिडरी व सेवा प्रदाता को भी एक्ट में उल्लेखित किया गया । इसके तहत सभी सेवा प्रदाता, वेब होस्टिंग सेवा लेने वाले, सर्च इंजन, ऑन लाइन नीलामी साइट व सायबर कैफे को भी शामिल किया गया है जिससे कोई भी सेवा प्रदाता कानूनी परिधि से बाहर ना रहे । इलेक्ट्रानिक हस्ताक्षर के बढते अपराधों व धोखाधड़ी को देखते हुए संशोधित एक्ट में 3ए सेक्शन को बाकायदा उल्लेखित किया गया है । एक्ट में डाटा सुरक्षा व उसकी निजता को सुनिश्चित करने के लिए डाटा सिक्यूरिटी एंड प्राइवेसी को नामित कर एक नया सेक्शन 43ए लाया गया है जो डाटा लीकेज होने पर पीड़ित को मुआवजे का अधिकार देता है । इस सेक्शन के तहत केन्द्र सरकार को यह विशेष अधिकार दिया गया है कि वह चाहे तो विभिन्न संवेदनशील डाटा के मामलों में सुरक्षा को लेकर विशेष नियम या प्रावधान घोषित कर सकती है ।

गोपनीयता भंग करके सूचना जारी करने को लेकर सेक्शन 72ए भी एक्ट में शामिल किया गया है । ब्रीच ऑफ कांफीडेंसलिटी – डिस्कलॉजर ऑफ इंफोरमेशन के नाम से नामित यह सेक्शन 43 ए सेक्शन का ही अगला कदम है । जहां 43 ए सेक्शन में आंकड़े प्रकट करने वाली कंपनी के खिलाफ सामाजिक उत्तरदायित्व निर्धारित किया गया है वहीं सेक्शन 72ए में गोपनीयता भंग करने पर दण्ड का उल्लेख किया गया है । इस अपराध के लिए तीन साल तक की कैद तक का प्रावधान किया गया है । यह संज्ञेय अपराध की श्रेणी में रखा गया है लेकिन इसके लिए जमानत का प्रावधान रखा गया है । डाटा सुरक्षा के लिए एक्ट में इंक्रिप्सन को लेकर सेक्शन 84ए का भी उल्लेख किया गया है । इसके तहत सरकार को यह अधिकार होगा कि वह इंक्रिप्सन के तरीके या रास्ते की व्याख्या कर सकती है । संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय का मानना है कि इससे डाटा की सुरक्षा को लेकर सरकार के हाथ और मजबूत होंगे ।

एक्ट संशोधन में एकल व्यक्ति आधारित सायबर एपलेट ट्रिब्यूनल को बहु सदस्यीय बनाने की भी व्यवस्था की गयी है । क्योंकि यह एक तकनीकी ट्रिब्यूनल होगा इसलिए इसमें एक तकनीकी सदस्य रखने का भी उल्लेख किया गया है । साइबर नग्नता को लेकर एक्ट में सरकार ने सख्त कदम उठाया है । सेक्शन 67 ए में इलेक्ट्रोनिक रूप में नग्नता के लिए दंड का उल्लेख किया गया है । पहली बार सरकार ने बाल नग्नता को लेकर एक नया सेक्शन 67बी का उल्लेख एक्ट में किया है । इसका उद्देश्य इलेक्ट्रोनिक रूप में बच्चों के बीच नग्नता के प्रचार-प्रसार को रोकना व इलेक्ट्रोनिक रुप में बच्चों के यौन शोषण में लगे लोगों को सजा दिलाना है । नग्नता को लेकर उल्लिखित दोनों ही सेक्शन में पहली बार पकड़े गए व्यक्ति को पांच साल की सजा का प्रावधान है जबकि दूसरी बार या अगली बार यह सजा सात साल तक की हो सकती है । संशोधित एक्ट में प्रोटेक्टेड सिस्टम को लेकर भी व्याख्या की गयी है । आईटी एक्ट के सेक्शन 70 का संशोधन करते हुए सक्षम सरकार को यह अधिकार दिया गया है कि वह किसी भी कंप्यूटर संसाधन को प्रोटेक्टड या सुरक्षित सिस्टम घोषित कर सकती है । इस तरह के किसी भी सुरक्षित सिस्टम को हैक करने वाले के खिलाफ दस वर्ष की सजा का प्रावधान भी किया गया है । इस सेक्शन को और मजबूती देने के लिए दो नए सेक्शन 70ए व 70बी भी बनाए गए हैं । 70ए में साइबर सुरक्षा के लिए इंडियन कंप्यूटर इमरजेंसी रिस्पांस टीम या सीईआरटी-आईएन का उल्लेख किया गया है ।

साइट हैक होने या फिर किसी साइट से देश की एकता, अखण्डता पर पड़ने वाले संभावित दुष्प्रभावों को रोकने के लिए यह संगठन तत्काल प्रभाव से ऐसी साइट को बंद करने या फिर साइट को हैक करने वाले के खिलाफ तकनीकी जांच शुरू करेगा । इस एक्ट के साथ ही सायबर अपराधों में जाने-अनजाने हिस्सा बनने वाले सायबर कैफों को पूरी तरह कानूनी दायरे में लाने के लिए सेक्शन 79 का उल्लेख किया गया है । इसके साथ ही 79ए सेक्शन भी एक्ट में शामिल किया गया है । यह सरकार को अधिकार देता है कि वह इलेक्ट्रोनिक साक्ष्यों के मूल्यांकन के लिए एक परीक्षक नियुक्त कर सके । यह परीक्षक ऐसे मामलों में अदालत को इलेक्ट्रोनिक तकनीकियों को समझाएगा या फिर अदालत का सहयोग करेगा । संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री सचिन पायलट के अनुसार इस एक्ट में उन सभी बिन्दुओं को शामिल किया गया है जो सायबर अपराध हैं या फिर उन्हें प्रभावित करते हैं। इस एक्ट के संशोधन से पहले मंत्रालय के अधिकारियों ने लंबे समय तक विभिन्न देशों के अधिनियमों का अध्ययन करने के साथ ही जमीनी स्तर पर भी सायबर अपराधों का अध्ययन किया । श्री पायलट ने कहा कि इस एक्ट के संशोधित रूप से अब पुलिस को भी ऐसे मामलों की जांच में खासी सहायता मिलेगी । पहले कंप्यूटर या सायबर से संबंधित कई तरह के अपराध के लिए आईपीसी या सीआरपीसी में व्याख्या नहीं थी, जिससे पुलिस या जांच एजेंसी उलझन में रहती थीं । संशोधित एक्ट में सभी बिन्दुओं को शामिल किया गया है, ताकि जांच प्रक्रिया में तेजी लाई जा सके ।

* संतोष, *स्वतंत्र पत्रकार

वि.जोशीशंकरसंजय

૦૨.
बदलाव की लहर : स्वतंत्र बिजली निर्माताओं के लिए नवीन एवं अक्षय ऊर्जा मंत्रालय की ओर से प्रोत्साहन
दुनियाभर में पवन का इस्तेमाल ऊर्जा के लिए सदियों से किया जा रहा है । भारत में भी, लाखों घरों और आजीविका संबंधी गतिविधियों के लिए वायु से बिजली पैदा करने की असीम क्षमता है । पवन ऊर्जा तेजी से बढता अक्षय ऊर्जा स्रोत है जो कुल संस्थापित अक्षय ऊर्जा उत्पादन क्षमता के 70 प्रतिशत से अधिक है । अब तक करीब 11,000 मेगावाट की संचयी क्षमता स्थापित की जा चुकी है तथा 11वीं पंचवर्षीय योजना के लिए 14,000 मेगावाट में से अक्षय ऊर्जा के लिए 10,500 मेगावाट का लक्ष्य निर्धारित किया गया है ।

प्रोत्साहन

मंत्रालय व्यावसायिक पवन बिजली परियोजनाओं को अनेक वित्तीय प्रोत्साहनों के जरिए 1993-94 से बढावा दे रहा है जिनमें त्वरित मूल्यह्रास शामिल है । पवन बिजली क्षेत्र के विकास के लिये मूल्य मुख्य प्रेरकबल और वास्तविक प्रोत्साहन 80 प्रतिशत त्वरित मूल्यह्रास का प्रावधान किया गया है तथा कई अन्य क्षेत्रों के लिए छूट या प्रोत्साहन भी उपलब्ध है । इस प्रावधान से लाभ कमाने वाली बड़ी कंपनियां, छोटे निवेशक और विमोहित उपयोक्ता क्षेत्र में भागीदारी करने में समर्थ हुए हैं। तथापि, स्वतंत्र बिजली निर्माता और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश त्वरित मुल्यह्रास प्रावधान का फायदा उठाने में समर्थ नहीं थे । निवेशक आधार बढाने के लिए नवीन एवं अक्षय ऊर्जा मंत्रालय ने 62,00 लाख रूपए प्रति मेगावाट के विषयाधीन पवन बिजली परियोजनाओं से ग्रिड में 50 पैसे प्रति यूनिट बिजली के निर्माण आधारित प्रोत्साहन के लिए स्कीम की घोषणा की है ।

इस स्कीम का उद्देश्य पवन ऊर्जा क्षेत्र में निवेश आकर्षित करना और ग्रिड इंटरएक्टिव अक्षय ऊर्जा की मात्रा बढाना है ।

पवन बिजली परियोजनाओं के लिए उत्पादन आधारित प्रोत्साहन नीति ढांचा

• परस्पर विशिष्ट ढंग में त्वरित मूल्यह्रास सहित मौजूदा वित्तीय प्रोत्साहन के समानान्तर उत्पादन आधारित प्रोत्साहन लागू करना ।
• कंपनियां त्वरित मूल्यह्रास या उत्पादन आधारित प्रोत्साहन में से एक ही ले सकती हैं दोनों नहीं ।
• उत्पादन आधारित प्रोत्साहन स्कीम 11वीं योजना की बाकी अवधि के दौरान 4000 मेगावाट की अधिकतम सीमा क्षमता के लिए लागू होगी ।
• उत्पादन आधारित प्रोत्साहन के समानान्तर त्वरित मूल्यह्रास का प्रावधान 11वीं योजना अवधि तक या प्रत्यक्ष कर संहिता शुरू होने तक (जो भी पहले हो) जारी रहेगा ।

स्कीम की मुख्य विशेषताएं

• प्रोत्साहन @ रूपये 62 लाख प्रतिमेगावाट की सीमा के साथ रूपये 0.50 प्रति इकाई ।
• अवधि-4 वर्ष से कम नहीं और 10 वर्ष से अधिक नहीं ।
• मंत्रालय की ओर से उत्पादन आधारित प्रोत्साहन स्कीम की अधिसूचना के बाद पवन टरबाइन 31.03.1012 को या उससे पहले चालू ।
• अधिसूचना के बाद सभी पवन टरबाइनपरियोजनाएं पंजीकृत की जानी हैं ।
• प्रोत्साहन राज्य विद्युत विनियामक आयोग से अनुमोदित शुल्क के अतिरिक्त होता है।
• ग्रिड के लिए बिजली की उपलब्धता बढाने के लिए प्रोत्साहन दिया जाता है तथा एसईआरसी के जरिए शुल्क निर्धारित करते समय इस पर विचार नहीं किया जाएगा ।
स्कीम के कार्यान्वयन के लिए भारतीय अक्षय ऊर्जा विकास एजेंसी

भारतीय अक्षय ऊर्जा विकास एजेंसी उत्पादन आधारित प्रोत्साहन स्कीम को कायान्वित करेगी । प्रशुल्क वितरण के उद्देश्य से बिजली उत्पादन के डाटा संग्रह के लिए विभिन्न राज्य जनोपयोगी सुविधाओं में अपनाई जाने वाली मौजूदा प्रणाली को उत्पादन आधारित प्रोत्साहन के वितरण के आधार पर अतिरिक्त सुरक्षा उपायों के साथ पालन किया जाएगा । भारतीय अक्षय ऊर्जा विकास एजेंसी उत्पादन आधारित प्रोत्साहन के साथ-साथ त्वरित मूल्यह्रास के लिए उपयोगी सभी पवन टरबाइनों का व्यापक डाटाबेस बनाएगी । सभी पवन टरबाइनों की पंजीकरण प्रक्रिया पूरी की जाएगी जो उक्त प्रोत्साहन के लिए दावा करने हेतु अनिवार्य जरूरत होगी । उत्पादन आधारित प्रोत्साहन और त्वरित मूल्यह्रास दोनों तरह की परियाजनाओं के लिए पंजीकरण जरूरी है जो परियोजना वार किया जाएगा । प्रत्येक मशीन के लिए विशिष्ट पहचान संख्या होगी ।

स्कीम के लिए कौन योग्य है ?

• ऐसे उत्पादक जो त्वरित मूल्यह्रास का लाभ नहीं लेते हैं ।
• एसईआरसी प्रशुल्क पर ग्रिड के लिए बिजली की बिक्री के लिए स्थापित पवन बिजली परियोजनाओं से जुड़ी ग्रिड ।
• विमोहित पवन बिजली परियोजनाएं ।
कौन योग्य नहीं है ?

• तीसरे पक्ष को बिजली बेचने वाली परियोजनाएं
उत्पादन आधारित प्रोत्साहन के लिए दावा छमाही आधार (अप्रैल-सितंबर और अक्तूबर-मार्च) पर जारी किया जा सकता है । आयकर विवरणी दाखिल करने के बाद पहला दावा अगस्त-सितम्बर, 2010 तक जारी होने की संभावना है ।

11वीं योजना के अंतिम वर्ष के दौरान स्कीम का मूल्यांकन किया जाएगा । अगर स्कीम को उम्मीद से अधिक समर्थन मिला तो इसकी सीमा बढाने पर विचार किया जाएगा ।

11वीं योजना की बाकी अवधि के दौरान उत्पादन आधारित प्रोत्साहन के जरिए 4000 मेगावाट की क्षमता प्राप्त होने का अंदाजा है, इसलिए यह उम्मीद है कि उत्पादन आधारित प्रोत्साहन स्कीम देश में पवन बिजली विकास को नई बुलंदी तक ले जाएगी ।

केन्द्रीय नवीन एवं अक्षय ऊर्जा मंत्री डा0 फारूख अब्दुल्ला ने ठीक ही अवलोकन किया है कि भारत में क्षमता, तकनीकी सहायता सुविधाएं, नीति ढांचा तथा विनियामक माहौल, निर्माण आधार में तेजी तथा निवेशकों के भरोसे संबंधी दशाएं विशेष रूप से पवन ऊर्जा क्षेत्र में, अक्षय ऊर्जा में त्वरित वृध्दि के अनुकूल हैं । डा0 अब्दुल्ला को यह उम्मीद भी है कि भारत की सामान्य वायु प्रणाली के लिए उपयुक्त बेहतरीन और प्रभावी पवन टरबाइनों की उपलब्धता और बिजली के लिए बुनियादी ढांचे में वृध्दि से देश की पवन ऊर्जा क्षमता वर्तमान अनुमान के अनुसार 45000 मेगावाट से अधिक हो जाएगी ।

अपनी ऊर्जा सुरक्षा बढाने तथा अपने पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ देश की बढती ऊर्जा मांग को पूरा करने में मदद के लिए बिजली पैदा करने के वास्ते इस प्रचुर घरेलू संसाधन से फायदा उठाने का यह उपयुक्त समय है ।

૦૩.
शहरी सार्वजनिक परिवहन सुधारने के लिए केन्द्र सरकार पहुंची हाई-स्पीड कॉरीडोर में
केन्द्र सरकार ने देश के शहरों में वाहनों के बढते रेलमपेल और उनकी वजह से रास्तों पर उत्पन्न होते नए संकटों को देखते हुए शहरी परिवहन को सुदृढ करने की दिशा में तेजी से कदम बढाने शुरू कर दिए हैं । सरकार की चिंता और चिंतन को इस बात से समझा जा सकता है कि अब तक शहरी परिवहन को लेकर उदासीनता बरतने वाली केन्द्र सरकार इसे सुधारने के लिए हाई-स्पीड कॉरीडोर में दाखिल हो गई है । सरकार अपनी जेएनएनयूआरएम योजना (जवाहर लाल नेहरू शहरी नवीकरण योजना) से ना केवल सड़कों पर साइकिल लेन बनाने के लिए राज्य सरकारों को मदद दे रही है बल्कि विशेषीकृत या डेडीकेटेट बस कॉरीडोर बनाने के लिए मदद देने के साथ ही मेट्रो के संजाल को भी बढाने में जुटी हुई है । केन्द्र सरकार ने यह समझ लिया है कि शहरी परिवहन को सुधारना है तो सबसे पहले शहरों की सार्वजनिक परिवहन प्रणाली को इस तरह विकसित करना होगा कि लोग अपने वाहन की जगह सार्वजनिक परिवहन प्रणाली को प्राथमिकता दें । सरकार की यह कोशिश दिल्ली में उन रूटों पर सफल होती भी दिखती है जहां मेट्रो की पहुंच है । एक अनुमान के मुताबिक ऐसे रूट पर करीब 30 से 40 प्रतिशत लोगों ने अपने वाहनों से दैनिक यात्रा करने की जगह मेट्रो को प्राथमिकता देनी शुरू कर दी है ।

केन्द्र सरकार जानती है कि आम आदमी या फिर दैनिक यात्रा करने वाले सभी यात्रियों के लिए प्रतिदिन मेट्रो की सवारी करना आसान नहीं है । यही वजह है कि जेएनएनयूआरएम योजना का संचालन कर रहे केन्द्रीय शहरी विकास मंत्रालय ने सभी शहरों को भी कहा है कि वे सार्वजनिक परिवहन सुधारने के लिए सिर्फ मेट्रो को ही विकल्प ना मानें । शहरों को चाहिए कि पहले से चल रही बस सेवा को सुव्यवस्थित करें । उनकी चाल तेज करने और यात्रा समय को सुनिश्चित करने के लिए ऐसे विशेषीकृत या डेडीकेटेड कॉरीडोर बनाएं जिसमें सिर्फ बस चले । अन्य वाहनों को उसमें और बस द्वारा अन्य लेन में प्रवेश किए जाने पर पाबंदी हो । ऐसे विशेषीकृत कॉरीडोर बनाने के लिए केन्द्र सरकार ने अपनी पऊलैगशिप योजना जवाहर लाल नेहरू शहरी नवीनीकरण योजना (जेएनएनयूआरएम) के अंतर्गत शहरों को आर्थिक मदद देने की भी पहल की है । इस तरह का एक कॉरीडोर इंदौर व एक कॉरीडोर पुणे में इसकी उपयोगिता को सिध्द कर रहा है । दोनों ही जगह ऐसे विशेषीकृत बस कॉरीडोर वाले रूट पर यात्रा-समय में बीस से तीस मिनट की कमी आई है । केन्द्रीय शहरी विकास मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक इस समय दस शहरों पुणे, पिंपरी चिंचवाड़, इंदौर, भोपाल, अहमदाबाद, राजकोट, सूरत, जयपुर, विजयवाड़ा और विजाग में ऐसे कॉरीडोर को मंजूरी दी गई है । इन कॉरीडोर पर 4770.86 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे, जबकि इन दस रूट पर कॉरीडोर की कुल लम्बाई 422.35 किलोमीटर होगी । मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार पुणे में कुल 101.77 किलोमीटर,पिंपरी चिंचवाड़ 42.22 किलोमीटर, इंदौर में 11.45 किलोमीटर, भोपाल में 21.71 किलोमीटर, अहमदाबाद में 88.50 किलोमीटर, राजकोट में 29.00 किलोमीटर, सूरत में 29.90 किलोमीटर, जयपुर में 39.45 किलोमीटर, विजयवाड़ा में 15.50 किलोमीटर, विजाग में 42.80 किलोमीटर के डेडीकेटेट बस कॉरीडोर पर क्रमश: 1051, 738.16, 98.45, 237.76, 981.35, 110,469, 479.55, 152.64, 452.93 करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं । मंत्रालय के अधिकारियों के मुताबिक विशेषीकृत बस कॉरीडोर के अलावा विभिन्न शहरों को लो पऊलोर, सेमि लो पऊलोर व लो पऊलोर एसी बसें भी दी जा रही है, जिससे आम आदमी को सुविधाजनक यात्रा का अहसास हो और वे अपने वाहनों को छोड़कर सार्वजनिक परिवहन को प्राथमिकता दें । इन बसों में आने वाले स्टैंड की पूर्व सूचना देने के लिए उद्धोषणा यंत्र भी लगे होंगे । साथ ही सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए बसों में कैमरे लगाए जाने की भी योजना है । मंत्रालय सूत्रों के मुताबिक विभिन्न शहरों को 15260 बस उपलब्ध कराई जा रही हैं । इनमें से हैदराबाद को 1000, तिरुपति को 50, विजयवाड़ा को 240, विशाखापट्टनम को 250, इटानगर को 25, गुवाहाटी को 200, बोधगया को 25, पटना को 100, रायपुर को 100,दिल्ली को 1500, दिल्ली मेट्रो को 100, पणजी को 50, अहमदाबाद को 730, फरीदाबाद-इलाहाबाद को 150-150, शिमला-जम्मू-कश्मीर-अगरतला को 75-75, धनबाद को 100, जमशेदपुर को 50, रांची को 100, बंगलुरू को 1000, मैसूर को 150, कोची को 200, त्रिवेंद्रम को 150, भोपाल को 225, इंदौर को 175, जबलपुर को 75, उज्जैन को 50, महानगर रोडवेज-वेस्ट को 1000, नवी मुम्बई को 150, मीराभांयदर-कल्याणडोंबली-पुड्डुचेरी को 50-50, नागपुर-लखनऊ को 300-300, नांदेड को 30, पीएमपीएमएल पुणे को 500, पीएमपीएमएल पीसीबएमसी को 150, भोपाल को 225, इंदौर को 175, जबलपुर को 75, उज्जैन को 50, महाराष्ट्र महानगर रोडवेज-वेस्ट को 1000, नवी मुम्बई को 150 नासिक को 100, इंफाल को 25, शिलांग को 120, आईजवल व कोहिमा-पुरी-गंगटोक को 25-25, भुवनेश्वर को 100, अमृतसर को 150, लुधियाना-आगरा को 200, अजमेर को 35, जयपुर को 400, चैन्नई को 1000, कोयम्बटूर-मदुरई को 300-300, कानपुर को 304, मथुरा-देहरादून-नैनीताल को 60-60, मेरठ को 150, वाराणसी को 146, चंडीगढ काे 100, हरिद्वार को 25, आसनसोल को 100 और कोलकाता को 1200 बस दी जाएंगी ।

मंत्रालय के अधिकारियों के अनुसार डेडीकेटेड बस कॉरीडोर, लो पऊलोर बसों के साथ ही शहरी परिवहन को सुधारने के लिए मेट्रो की लाइनों का भी विस्तार किया जा रहा है । दिल्ली की लाइनों के अलावा चैन्नई में मेट्रो विस्तार के लिए 14,600 करोड़ रुपये कैबिनेट ने मंजूर किए हैं । इसके अलावा केन्द्र सरकार ने बंगलुरू मेट्रो के लिए 9.3 किलोमीटर रूट के विस्तार को भी मंजूरी दी है । इनके अलावा देश में पहली निजी मेट्रो चलाने के लिए रिलायंस कंपनी आगे आई है और उसके नेतृत्व में एक समूह को मुम्बई के बर्सोवा-घाटकोपर लाइन के लिए 471 करोड़ रुपये और चारकोप-मनखुर्द लाइन के लिए 1532 करोड़ रुपये की अंतर राशि के लिए सरकारी सहायता ( वाइबलिटी गैप फंडिंग) या केन्द्र सरकार द्वारा इतनी राशि वहन की भी सैध्दांतिक मंजूरी दी है । केन्द्र सरकार ने यह भी कहा है कि अगर अन्य निजी कंपनियां भी मेट्रो परिचालन में रुचि रखती हों तो उन्हें आगे आना चाहिए, जिससे सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था दुरुस्त करने में उनकी मदद सरकार को हासिल हो सके । सरकार ने ऐसी कंपनियों की कुल लागत का एक हिस्सा वाइबलिटी गैप फंडिंग के तौर पर उपलब्ध कराने का भी आश्वासन दिया है । शहरी परिवहन को दुरुस्त करने और सार्वजनिक परिवहन को गति देने के लिए इन उपायों को करने के साथ ही केन्द्रीय शहरी विकास मंत्रालय ने हाल ही में दिल्ली, गोवाहाटी आईआईटी के साथ ही दो अन्य संस्थानों में यातायात विषय पर उत्कृष्टता केन्द्र(सेंटर आफ एक्सिलेंसी) स्थापित किए हैं । ये चारों केन्द्र तय समय सीमा में सरकार को सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को सुदृढ करके शहरी परिवहन को दुरस्त करने के लिए अपनी विशेषीकृत राय देगी । केन्द्रीय शहरी विकास मंत्री जयपाल रेड्डी और शहरी विकास सचिव एम. रामचंद्रन के मुताबिक केन्द्र सरकार शहरी परिवहन व्यवस्था के सुधार के लिए प्रतिबध्द है। इन उपायों के साथ ही परिवहन व्यवस्था को मजबूत करने के लिए आने वाले समय में कम्प्यूटर आधारित परिवहन व्यवस्था ( इंटेलिजेंट ट्रांसपोर्ट सिस्टम ) भी लागू किया जाएगा । मंत्रालय शहरी परिवहन सुधारने के अन्य आयामों को भी देख रहा है ।

૦૪.
मुंबई शेयर बाजार का संवेदी सूचकांक ने 25वें वर्ष में प्रवेश किया

भारत में शेयर बाजार का मापक मुंबई शेयर बाजार(बीएसई) का संवेदी सूचकांक ने रजत जयंती वर्ष में प्रवेश किया है । इसकी स्थापना 2 जनवरी, 1986 को उस समय की काफी सक्रिय 30 शेयरों के साथ हुई थी, 1979 आधार वर्ष था । आजकल संवेदी सूचकांक के 30 शेयर बीएसई के कुल पूंजीकरण का लगभग 15वां हिस्सा है ।

बीएसई में 4700 से अधिक कंपनियां सूचीबध्द हैं जो इसे दुनिया का सबसे बड़ा शेयर बाजार बनाती हैं । हालांकि सभी शेयरों में सक्रिय कारोबार नहीं होता । उनसे भी  थोड़े से शेयरों से ही बाजार और अर्थव्यवस्था के रूख के बारे में पता चलता है ।

संवेदी सूचकांक की स्थापना के समय मुंबई शेयर बाजार ने कहा था, न्न बाजार के सामान्य रूख को प्रदर्शित करने के लिए इक्विटी मूल्यों के सूचकांक की कमी काफी समय से निवेशकों और समाचार पत्रों द्वारा महसूस की जा रही थी, क्योंकि वे अपना सूचकांक तैयार नहीं कर पाते थे । न्न

संवेदी सूचकांक (सेंसेक्स) क्या है ?

सेंसेक्स मूल्य आधारित सूचकांक है और इसकी गणना विमुक्त प्रवाह पूंजीकरण प्रक्रिया के आधार पर होती है । यह प्रक्रिया एक कंपनी के जारी कुल शेयरों के बाजार -पूंजीकरण की पूर्व की प्रक्रिया से अलग है । इसमें कंपनी की  केवल उन शेयरों का उपयोग किया जाता है जो कारोबार के लिए पूरी तरह उपलब्ध है । इस विमुक्त प्रवाह प्रक्रिया में प्रोमोटर, सरकार और सांस्थानिक निवेशकों के शेयर शामिल नहीं है । यह प्रक्रिया , बाजार के रूख की सही तस्वीर पेश करने के लिए 1 सितंबर 2003 को लागू की गयी थी ।

सेंसेक्स की गणना में 30 कंपनियों के विमुक्त प्रवाह पूंजीकरण को सूचकांक विभाजक से विभाजित कर दिया जाता है । यह विभाजक ही सेंसेक्स के मूल आधार वर्ष से संबध्द होता है । यह सूचकांक को तुलनात्मक बनाता है तथा कारपोरेट गतिविधियों  से अथवा शेयर बदलने इत्यादि से सूचकांक में होने वाले फेरबदल के लिए परिवर्तन बिंदु भी है ।

सेंसेक्स ने 1986 से एक लंबी यात्रा तय की है और वह फिलहाल 35 गुणा बढ गया है । कारोबार के पहले दिन 1 अप्रैल 1986 को सेंसेक्स 549.43 अंक पर बंद हुआ था । यह अपने रजत जयंती वर्ष में 17467 अंक पर खुला ।

सेंसेक्स का स्वरूप

सूचकांक का स्वरूप भी कई बार बदल गया है शुरू की 30 मूल कंपनियों में से 11 ही अभी इसका हिस्सा बनी हुई है ।

1986 में संसेक्स में एसीसी, बाम्बे डाइंग, बल्लारपुर इंडस्ट्रीज, सीएट टायर्स, सेंचुरी स्पीनिंग, फूड स्पेशलिटीज़ (अब नेस्ले), ग्रेट इस्टर्न शिपिंग, जीएसएफसी, ग्लैक्सो, ग्वालियर रेयॉन (अब ग्रासिम), हिन्दुस्तान एल्युमिनियम (अब हिंडाल्को), हिन्दुस्तान लीवर (अब हिन्दुस्तान यूनीलीव), हिन्दुस्तान मोटर्स, इंडियन होटल्स, इंडियन रेयॉन , आईटीसी, किर्लोस्कर कुम्मिन्स, लार्सन एंड टूब्रो, महिंद्रा एंड महिंद्रा, मुकंद, पीस इलेक्ट्रानिक्स (अब फिलीप्स), प्रीमियर ऑटोमोबाइल, रिलांयस इंडस्ट्रीज, सीमेंस, टेल्को (अब टाटा मोटर्स), टाटा पावर, टाटा स्टील, वोल्टाज और जेनिथ कंपनियां शामिल थीं।

फिलहाल इसमें एसीसी, भेल, भारती एयरटेल, डीएलएफ, ग्रासिम, एचडीएफसी, एचडीएफसी बैंक, हीरो होंडा, हिंडाल्को, हिन्दुस्तान यूनीलीवर, आईसीआईसीआई बैंक, इंफोसिस, जयप्रकाश एसोसिएट्स, लार्सन एंड टूब्रो, महिंद्रा एवं महिंद्रा, मारूति उद्योग, एनटीपीसी, ओएनजीसी, रिलायंस कम्युनिकेशन, रिलायंस इंडस्ट्रीज, रिलायंस इफ्रास्ट्रक्चर, भारतीय स्टेट बैंक, स्टरलाइट इंडस्ट्रीज, सनफार्मा, टीसीएस, टाटा मोटर्स,टाटा पावर, टाटा स्टील और विप्रो कंपनियां शामिल हैं ।

भारतीय निगमित क्षेत्र ने जो नया आयाम प्राप्त किया है उससे उसकी परिवर्तित स्थिति का स्पष्ट संकेत मिलता है । भारत की तीन बड़ी आईटी-आईटीईएस कंपनिओं टीसीएस, इंफोसिस और विप्रो की उपस्थिति से सूचना प्रौद्योगिकी जगत में उसकी  पहले से पहुंच रेखांकित होता है । विनिवेश नीति के माध्यम से सार्वजनिक क्षेत्र की पांच कंपनियों के प्रवेश ने छिपी संपदा को सबके  सामने रख दिया है । तीन रिलायंस कंपनियों की उपस्थिति से निगमों के विभाजन का झलक मिलता है, वहीं भारती एयरटेल, जयप्रकाश एसोसियेट्स और स्टेरलाइट की पहुंच से नई निगमित हस्तियों का आगमन हुआ है और हाल के पिछले वर्षों की नामी कंपनियों जैसे बाम्बे डायिंग, सेंचुरी, हिन्दुस्तान मोटर्स, प्रीमियर आटोमोबाइल्स और ग्रेट इस्टर्न शिपिंग आदि को संवेदी सूचकांक से हटना पड़ा है ।

अतीत और वर्तमान की सेंसेक्स कंपनियों पर सरसरी तौर पर निगाह डालने से भारतीय अर्थव्यवस्था के सूर्योदय और सूर्यास्त क्षेत्रों का स्पष्ट चित्र देखने को मिलता है। नई संरचना से भी मुंबई मुख्यालय वाली कंपनियों की भारी उपस्थिति में ह्रास आया जो 1996 में 75 प्रतिशत से अधिक दर्ज किया गया था।

हाल के वर्षों में सेंसेक्स

सेंसेक्स को चार अंकों को पार करने में दो वर्षों से अधिक लगे । 25 जुलाई 1990 को पहली बार सेंसेक्स 1001 अंकों पर बंद हुआ । 1991 में भारत के तत्कालीन वित्त मंत्री डा0 मनमोहन सिंह ने आर्थिक उदारीकरण के उपायों की जो घोषणा की थी, उससे आर्थिक गतिशीलता आने लगी थी । 1992-93 में भारतीय बाजार के लिए उपयोगी बजट से आयात-निर्यात की आशाएं बढी ज़िससे मार्च 1992 तक सेंसेक्स में 4000 अंकों का उछाल आया । परिवर्तन का यह दौर हर्षद मेहता घोटाला प्रकरण से पहले आया था । वर्ष 2000 में सूचना प्रौद्योगिकी की अभूतपूर्व प्रगति के साथ-साथ सेंसेक्स 6000 अंक को पार कर गया । वर्ष 2006 के आसपास विदेशी निवेशक भी सक्रिय हो गए जिसके परिणामस्वरूप 8 सितम्बर, 2005 को सेंसेक्स 8000 अंक को पार कर गया । 7 फरवरी 2006 बाम्बे सेंसेक्स का स्वर्णिम दिन रहा और इसने 10,000 का आंकड़ा पार कर गया । सेंसेक्स फिर दुगुना हो गया और 29 अक्तूबर, 2007 को 20,000 का आंकड़ा भी पार कर गया । यह 8 जनवरी, 2008 को 21,078 की ऊंचाई तक पहुंच गया ।

इसी बीच वैश्विक मंदी की प्रक्रिया शुरू हुई और विदेशी निवेशकों ने अपने निवेश ( शेयर) को बेचना शुरू कर दिया ।

सूचकांकों का महत्त्व

प्राय: यह कहा जाता है कि शेयर बाजार देश के आर्थिक स्वास्थ्य को ठीक रखने और उसकी प्रगति बनाये रखने में प्रमुख भूमिका निभाता है । यह डोव जोन्स के 1884 के निर्माण से शुरू होता है । अब दुनिया में कई शेयर बाजार सूचकांक हैं । इनमें से उल्लेखनीय हैं – एस एंड पी ग्लोबल, डोव जोन्स, एफटीएसई, हांगसेंग एंड निक्केइ। निवेशकों में इनकी अत्यधिक लोकप्रियता के बावजूद इनकी अनेक अवसरों पर बहुत अधिक आलोचना भी हुई है । गड़बड़ घोटाले, निगमित भ्रष्टाचारों, कृत्रिम रूप से शेयरों के अत्यधिक मूल्य दिखाने, शोध फर्मों केर् कत्तव्य और हितों में टकराव आदि अनेक उदाहरण मिलते हैं । इससे बाजार में अस्थिरता पैदा होती है , सूचंकांकों की छवि खराब होती है, क्योंकि तब यह सूचीबध्द कंपनी के सही स्वास्थ्य का परिचायक नहीं रह जाता।

इसके बावजूद शेयर बाजार और उनके सूचकांकों का अभी बहुत महत्व बना हुआ है । शेयर बाजार अर्थव्यवस्था को जरूरी तरलता उपलब्ध कराते हैं । भारत के दो प्रमुख बाजार बीएसई सेंसेक्स एवं निपऊटी ने भारतीय पूंजी बाजार को विश्व मानचित्र पर उत्कृष्ट स्थान दिलाने में बहुत योगदान किया है । विदेशी संस्थागत निवेशकों की बढती उपस्थिति हमारे बाजार को वैश्विक बाजार से जोड़ने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है ।

-मनीष देसाई

૦૫.
लवायु परिवर्तन पर भारत की कार्यनीतियां
जलवायु परिवर्तन पर भारत अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के साथ मिलकर रचनात्मक कार्यों में संलग्न रहने के साथ-साथ घरेलू स्तर पर भी इस दिशा में एक मज़बूत एजेन्डे पर काम कर रहा है। भारत इस बात को मानता है कि जलवायु परिवर्तन की समस्या से निपटने के लिए रणनीतियों का निर्माण सतत् विकास के लिए बनाई गई रणनीतियों के आधार पर होना चाहिए। यह बात जलवायु परिवर्तन संबंधी चिंताओं से निपटने के लिए बनाये गये बड़े कार्यक्रमों में दिखाई देती है। जलवायु परिवर्तन पर मौजूदा सरकार का व्यय जीडीपी के 2.6 प्रतिशत को पार कर गया है। कृषि, जल संसाधन, स्वास्थ्य एवं स्वच्छता, वन तथा तटीय क्षेत्रों में बुनियादी ढांचा इत्यादि चिंता के विशेष क्षेत्र है।

यूएनएफसीसीसी के तहत अपनी अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबध्दताओं के भाग के रूप में भारत आवधिक राष्ट्रीय सूचना तंत्र (एनएटीसीओएम) तैयार कर रहा है जो भारत में उत्सर्जित होने वाली ग्रीनहाऊस गैंसों की जानकारी प्रदान करता है और इनकी संवेदनशीलता तथा प्रभाव का मूल्यांकन करता है। इसके साथ ही यह जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए सामाजिक, आर्थिक तथा तकनीकी उपायों की उचित सिफारिशें तैयार करता है। पहला एनएटीसीओएम वर्ष 2004 में प्रस्तुत किया गया था। सरकार एनएटीसीओएम-2 तैयार करने में लगी हुई है और इसे वर्ष 2011 में यूएफसीसीसी को पेश किया जाएगा। एनएटीसीओएम-2 भारत में अनुसंधान तथा वैज्ञानिक कार्यों के सघन नेटवर्क पर आधारित है और इसमें विभिन्न संस्थानों के विशेषज्ञों तथा सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाओं की सहायता ली गई है।

भारत सरकार द्वारा गठित एक विशेषज्ञ समिति ने मानवीय जलवायु परिवर्तन के भारत पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन (2008) किया था। इस समिति ने अपनी रिपोर्ट तैयार की और एक एजेन्डा बनाया जिसे भारत में मंत्रालयों को मानवीय जलवायु परिवर्तन के भारत पर पड़ने वाले प्रभावों से निपटने के लिए लागू करने की आवश्यकता थी।

भारत ने जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में लाभ को देखते हुए सतत् विकास के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्ययोजना (एनएपीसीसी) तैयार की। सौर ऊर्जा, ऊर्जा कुशलता बढ़ाने, सतत् कृषि, स्थायी आवास, जल, हिमालयी पारिस्थितिकी, देश के वन क्षेत्र में वृध्दि करने और जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्ययोजना के मुख्य बिन्दुओं की रणनीतिक जानकारी देने से संबंधित आठ राष्ट्रीय मिशन चल रहे हैं। इसके अलावा ऊर्जा उत्पादन, परिवहन, नवीकरण, आपदा प्रबंधन तथा क्षमता विकास से संबंधित क्षेत्रों पर ध्यान देने के लिए अनेक कदम उठाये गये हैं जो मंत्रालयों की विकास योजनाओं के साथ एकीकृत हैं। जलवायु परिवर्तन पर प्रधानमंत्री की परिषद् जून 2007 में गठित की गई थी। यह परिषद् राष्ट्रीय मिशनों की निगरानी करती है और भारत में जलवायु परिवर्तन से संबंधित कार्य-योजनाओं को लागू करने और उनके बीच समन्वय स्थापित करने का कार्य करती है।

भारत की पंचवर्षीय योजनाओं में सतत विकास के लिए एक स्थायी रणनीति शामिल है, जिसके परिणामस्वरूप हम ऐसे सतत् विकास को प्राप्त करने में सफल रहे हैं जिसमें कार्बन उत्सर्जन बहुत कम होता है। 11वीं पंचवर्षीय योजना में वर्ष 2016-17 तक ऊर्जा कुशलता को बढ़ाकर 20 प्रतिशत करने का लक्ष्य रखा गया है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए विद्युत मंत्रालय ने ऊर्जा कुशलता ब्यूरो के ज़रिए ऊर्जा कुशलता में वृध्दि करने के लिए राष्ट्रीय मिशन आरंभ किया है। योजना आयोग ने अनुमान लगाया है कि वर्ष 1990 से 2005 के दौरान भारत द्वारा किये जा रहे उत्सर्जन में 17.6 प्रतिशत की कमी आई है और वर्ष 2005 से वर्ष 2020 के दौरान उत्सर्जन में 20-25 प्रतिशत की कमी करना संभव है। इसके लिए आवश्यक वित्ताीय प्रावधानों तथा तकनीकी संसाधनों के साथ उत्सर्जन को कम करने के लिए विशेषीकृत क्षेत्रों में आवश्यक कार्रवाइयाें की जरूरत है। इसमें ऐसे सतत् विकास के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए, जिसमें कम कार्बन उत्सर्जन होता हो, आंतरिक तथा अंतर्राष्ट्रीय सहायता भी शामिल है। (पसूका फीचर)

** कल्पना पाल्खीवाला
૦૬.
सौर भारत के निर्माण की ओर
”हमारी परिकल्पना है कि भारत के आर्थिक विकास में ऊर्जा का अधिक उपयोग न हो। अगले कुछ वर्षों में, हमें जीवाश्म ईंधन पर आधारित आर्थिक गतिविधि को धीरे-धीरे गैर-जीवाश्म ईंधन पर आधारित विकास की ओर ले जाना होगा और गैर-नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों पर निर्भरता से नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों की ओर ले जाना होगा। इस रणनीति में, सूर्य की भूमिका सबसे महत्त्वपूर्ण् है और ऐसा होना भी चाहिए, क्योंकि वह वस्तुत: सभी ऊर्जा स्रोतों का मौलिक स्रोत है। हम अपने वैज्ञानिक, तकनीकी और प्रबंधकीय प्रतिभाओं और पर्याप्त वित्तीय संसाधन को एक साथ जुटाकर हमारी अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने और हमारे देश के लोगों के जीवन में बदलाव लाने के लिए ऊर्जा के प्रचुर स्रोत के रूप में सौर ऊर्जा का विकास करेंगे। इस प्रयास में हमारी सफलता भारत का चेहरा ही बदल देगी। यह दुनिया भर के लोगों की नियति को भी बदलने में भारत की सहायता करेगा। ”

– प्रधानमंत्री डॉ0 मनमोहन सिंह (30 जून, 2008 को जलवायु परिवर्तन पर भारत की रणनीति को प्रस्तुत करते हुए)

जैसा कि जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना में भी कहा गया है, भारत एक ऊष्णकटिबंधीय (गर्म) देश है, जहां सूर्य का प्रकाश प्रतिदिन अधिक समय तक और ज्यादा तीव्रता के साथ उपलब्ध रहता है। अत: सौर ऊर्जा की भावी ऊर्जा स्रोत के रूप में व्यापक संभावनायें हैं। इसमें ऊर्जा के विकेन्द्रीकृत वितरण का अतिरिक्त लाभ भी है, जिससे जमीनी स्तर पर लोगों को सशक्त बनाया जा सके।

इसी परिकल्पना पर आधारित, राष्ट्रीय सौर मिशन को सोलर इंडिया के ब्राँड नाम के तहत शुरू किया जा रहा है। इस निर्णय की घोषणा करते हुए केन्द्रीय नवीन और नवीकरणीय (अक्षय) ऊर्जा मंत्री डॉ0 फारूख अब्दुल्ला ने कहा था- यह यूपीए सरकार की एक ऐतिहासिक और युगान्तरकारी पहल है और मुझे गर्व है कि इसके क्रियान्वयन की देखरेख का काम मुझे सौंपा गया है। सोलर मिशन पंडित नेहरू की आधुनिक भारत की परिकल्पना के अनुसार ही है, जिसने आज भारत को एक अग्रणी परमाणु और अंतरिक्ष शक्ति बनाया है।

सौर ऊर्जा भारत के लिए महत्त्वपूर्ण और प्रासांगिक क्यों है ?

लागत- कोयला जैसे बिजली के अन्य स्रोतों की तुलना में पूर्ण लागत के मामले में फिलहाल सौर ऊर्जा की लागत अधिक है। सौर मिशन का उद्देश्य क्षमता में तीव्रगति से विस्तार और प्रौद्योगिकीय नवाचार से लागत में कमी लाकर उसे ग्रिड के स्तर पर लाना है। मिशन को आशा है कि 2022 तक ग्रिड समानता हासिल हो जाएगी और कोयला आधारित ताप बिजली से 2030 तक समान स्तर पर लाया जा सकेगा। परन्तु इसमें यह बात स्वीकार की गई है कि लागत में यह कमी वैश्विक निवेश और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के स्तर पर निर्भर करेगी। लागत के बारे में जो अनुमान लगाये गए हैं वे अलग-अलग हैं। हर बार क्षमता को दोगुना बढाए जाने पर 22 प्रतिशत से लेकर वैश्विक निवेश को मौजूदा स्तर से 16 गुना बढाने पर केवल 60 प्रतिशत की कमी होने का अनुमान लगाया गया है। मिशन इस बात को स्वीकार करता है कि ग्रिड से परे भी सौर ऊर्जा के उपयोग हैं। ग्रामीण ऊर्जा की आवश्यकताओं को पूरा करने वाले ये उपयोग काफी किफायती हैं और उनके तेजी से विस्तार किए जाने की आवश्यकता है।

स्कैलेबिलिटी (व्यापकता)

भारत में सौर ऊर्जा की प्रचुर संभावनायें हैं। प्रतिवर्ष करीब 5000 ट्रिलियन (1 ट्रिलियन# 10 खरब) के.डब्ल्यूएच (किलोवाट प्रति घंटा) ऊर्जा पड़ती भारत के भू-क्षेत्र में हैं और अधिकांश भागों में 4-7 कि.वाट घंटे प्रति वर्ग कि.मी. प्रतिदिन क्षमता की सूर्यकिरणें भारत की धरती को छूती हैं। अतएव सौर विकिरण को ताप और विद्युत यानी सौर तापीय और सौर फोटो- वोल्टिक, दोनों में परिवर्तित करने की प्रौद्योगिकी को भारत में बड़े पैमाने पर सौर ऊर्जा को नियंत्रित करने में स्तेमाल किया जा सकता है। सौर शक्ति वितरित आधार पर विद्युत पैदा करने की क्षमता प्रदान करती है और क्षमता को तेजी से बढाने में मदद करती है। ग्रिड से परे विकेन्द्रीकृत और कम तापमान पर सौर ऊर्जा का उपयोग, ग्रामीण विद्युतीकरण के नजरिये से लाभदायक हो सकता है। विद्युत की अन्य आवश्यकताओं और ग्रामीण तथा शहरी दोनों क्षेत्रों में गर्म और ठंडा करने के काम में यह लाभदायक होगा। इसकी व्यापकता अथवा फैलाव (स्कैलेबिलिटी) पर जो दबाव है, वह स्थान की उपलब्धता को लेकर है, क्योंकि सभी मौजूदा उपयोगों में सौर शक्ति के दोहन में ज्यादा स्थान की जरूरत होती है। इसके अतिरिक्त, प्रभावी भंडारण के बगैर, सौर शक्ति में काफी विचलन की संभावना रहती है। भारत में यह बात, विशेषकर वर्षा त्रऽतु में अधिक सही साबित होती है।

पर्यावरणीय प्रभाव

ºाौर ऊर्जा पर्यावरण के अनुकूल और पर्या-हितैषी है, क्योंकि विद्युत अथवा ताप के उत्पादन में इससे कोई उत्सर्जन नहीं होता।

स्रोत की सुरक्षा

ऊर्जा सुरक्षा के दृष्टिकोण से सौर सभी स्रोतों में सबसे सुरक्षित स्रोत है। यह प्रचुरता में उपलब्ध है। सैध्दांतिक दृष्टि से, कुल आपतित सौर ऊर्जा को छोटा सा अंश भी (यदि प्रभावी ढंग से उसे कब्जे में किया जा सके) समूचे देश की ऊर्जा की आवश्यकताओं को पूरा कर सकता है। यह भी स्पष्ट है कि देश की गरीब और ऊर्जा से वंचित आबादी की भारी संख्या को देखते हुए ऊर्जा के अपेक्षाकृत प्रचुर संसाधनों का देश हित में यथासंभव दोहन किया जाना चाहिए। यद्यपि, आज की स्थित में, कोयला आधारित विद्युत उत्पादन, बिजली का सबसे सस्ता स्रोत है, भविष्य का परिदृश्य बताता है कि यह स्थिति बदल सकती है। बिजली की भारी कमी के कारण, देश के अन्दर बिजली की दर सामान्यत: सात रुपए प्रति यूनिट तक पहुंच चुकी है और पीक आवर्स (सर्वाधिक मांग के घंटों में) तो यह 8.50 रुपए प्रति यूनिट तक पहुंच जाती है। यह स्थिति भी बदल सकती है, क्योंकि, ऊर्जा की मांग में वृध्दि के कारण देश अब आयातित कोयले की ओर बढ रहा है। बिजली की कीमत, अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कोयले की उपलब्धता और आयात संबंधी संरचना के विकास की लागत पर भी निर्भर करेगी। यह भी स्पष्ट है कि पर्यावरणीय क्षरण की लागत कोयले के खनन को भी प्रभावित करती है और ऐसा होना भी चाहिए, इस कच्चे माल के मूल्य में वृध्दि होगी। ऊर्जा के अभाव के कारण देश में डीजल आधारित विद्युत का उपयोग बढ रहा है, जो कि महंगी- कीमत 15 रुपए प्रति यूनिट तक, भी है और प्रदूषणकारी भी। इस परिस्थिति में, सौर ऊर्जा का उपयोग आवश्यक भी है और व्यवहारिक रूप से संभव भी। देश की चिरकाल से चली आ रही ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए सौर ऊर्जा का उपयोग बेहद जरूरी है।

उद्देश्य और लक्ष्य

राष्ट्रीय सौर मिशन का उद्देश्य देशभर में इसे यथाशीघ्र प्रसारित करने की नीति और स्थितियों का निर्माण कर भारत को विश्व में सौर ऊर्जा के क्षेत्र में विश्व में शीर्ष स्थान पर बिठाना है। मिशन तीन चरणों का दृष्टिकोण अपनाएगा। 11वीं योजना की शेष अवधि और 12वीं योजना के पहले वर्ष (2012-13) को मिलाकर पहला चरण होगा, 12वीं योजना के शेष चार वर्ष (2013-17) दूसरा चरण, और 13वीं योजना (2017-22) तीसरा चरण होगा। प्रत्येक योजना के अंत में और 12वीं तथा 13वीं योजना के मध्य में प्रगति का मूल्यांकन होगा, आगे के चरणों के लिए क्षमता और मूल्यों की समीक्षा की जाएगी, जो कि घरेलू और वैश्विक, दोनों ही की, प्रौद्योगिक प्रवृत्तियों और उभरती लागत पर आधारित होगी। लक्ष्य यह रहेगा कि यदि आशा के अनुरूप लागत में कमी नहीं आती, या फिर आशा से अधिक तेजी आती है तो, सरकार को सब्सिडी (राज सहायता) की विवशता से बचाया जाए।

मिशन का तात्कालिक लक्ष्य, देश में, केन्द्रीकृत और विकेन्द्रीकृत दोनों ही स्तर पर, सौर प्रौद्योगिकी के विस्तार के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करना है। पहले चरण (2013 तक) में सौर ताप में लो हैंगिंग विकल्प को हासिल करने पर जोर देना है, वाणिज्यिक ऊर्जा से वंचित लोगों तक पहुंचाने के लिए ऑफ ग्रिड प्रणाली को बढावा देना और ग्रिड-आधारित प्रणाली की क्षमता में यथासंभव योगदान देना है। दूसरे चरण में, पिछले वर्षों के अनुभव का लाभ उठाते हुए क्षमता का विस्तार इस प्रकार करने का प्रयास किया जाएगा कि सौर ऊर्जा की पैठ प्रतिस्पर्धा दरों पर देशभर में हो सके।

हम सौर भारत के लक्ष्य को कैसे प्राप्त कर सकते हैं?

• 2022 तक 20,000 मेगावाट सौ ऊर्जा के उत्पादन के लिए अनुकूल नीतिगत ढांचा तैयार करना

• 2013 तक यानी अगले तीन वर्षों में, ग्रिड से जुड़े सौर ऊर्जा उत्पादन को 1000 मेगावाट तक बढाना, जिन संस्थाओं को शुल्क के मामले में सरकार की ओर से रियायतें दी जाती हैं, उनके लिए नवीकरणीय ऊर्जा के क्रय को आवश्यक बनाकर 2017 तक 3000 मेगावाट की अतिरिक्त क्षमता बढाना। यह क्षमता दोगुनी की जा सकती है।

• आशा के अनुकूलन अन्तर्राष्ट्रीय वित्तीय निवेश और तकनीकी हस्तांतरण के बल पर यह क्षमता 2017 तक 10,000 मेगावाट से भी अधिक बढार्ऌ जा सकती है। वर्ष 2022 तक 20,000 मेगावाट या उससे अधिक महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य, पहले दो चरणों से प्राप्त अनुभवों पर निर्भर करेगा। उनके सफल होने पर ग्रिड-प्रतिस्पधा सौर ऊर्जा की संभावना बढ सक़ती है। अन्तर्राष्ट्रीय निवेश और प्रौद्योगिकी की उपलब्धता के आधार पर इस संक्रमण (बदलाव) को उपयुक्त रूप से बढाया भी जा सकता है।

• ऑफ ग्रिड उपयोगों के लिए कार्यक्रमों को प्रोत्साहित करना- 2017 तक 1000 मेगावाट और 2022 तक 2000 मेगावाट का उत्पादन।

• 2017 तक डेढ करोड़ वर्ग मीटर और 2022 तक दो करोड़ वर्गमीटर सौर तापीय संग्राहक क्षेत्र की स्थापना करना।

• 2022 तक ग्रामीण क्षेत्रों में दो करोड़ सौर प्रकाशीय प्रणालियां लगाना।

सनातन काल से हमारे देश में सूर्य की पूजा उत्तम स्वास्थ्य के स्रोत के रूप में होती रही है। राष्ट्र को ऊर्जावान बनाने के लिए एक बार फिर हम सूर्य में अपनी आस्था व्यक्त करते हैं।

(प्रधानमंत्री डॉ0 मनमोहन सिंह द्वारा 11 जनवरी को सौर ऊर्जा कानक्लेव के उद्धाटन के संदर्भ में)

स्रोत- जवाहरलाल नेहरू सौर मिशन दस्तावेज़

૦૭.
पंचायत युवा क्रीड़ा और खेल अभियान (पीवाईकेकेए) खेलों को युवा विकास का अभिन्न अंग बनाना

बच्चों, किशोरों और युवाओं के बहुमुखी विकास के लिये खेलों और शारीरिक शिक्षा पर विशेष जोर देने के इरादे से खेल और युवा मामलों के मंत्रालय ने पंचायत युवा क्रीड़ा और खेल अभियान नाम से एक अभिनव योजना शुरू की है। इस योजना का मुख्य उद्देश्य किशोरों और युवाओं को हर स्तर पर खेलों और शारीरिक अभ्यास की गतिविधियों से जोड़ना है। नौ मई 2008 को शुरू हुई इस योजना के उद्देश्यों में निचले स्तर पर खेल गतिविधियों के आयोजन से खेलों को व्यापक आधार प्रदान करना, राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर खेलों में उत्कृष्टता को बढावा देना और ग्रामीण क्षेत्रों में खेलों के विकास पर जोर देकर खेलों को लोकव्यापी स्वरूप प्रदान करना शामिल है। इन लक्ष्यों की पूर्ति के लिये पंचायत स्तर पर खेलों का बुनियादी ढांचा तैयार करना और विकास खंड एवं जिला स्तर पर खेलों की वार्षिक प्रतियोगिताएं आयोजित करना इस योजना के अहम हिस्से हैं।

इन उद्देश्यों की पैरवी मानव संसाधन विकास की संसद की स्थायी समिति ने अपनी 34वीं रिपोर्ट में भी की है, जिसमें कहा गया है कि सरकार को चरणबध्द रूप से खेलों के विकास की योजना बनानी चाहिए ताकि एक निश्चित समय में आवश्यक बुनियादी ढांचा तैयार किया जा सके। दसवीं पंचवर्षीय योजना तैयार करने के लिये बड़े खेलों और युवा मामलों के कार्यकारी समूह ने भी इस पहलू पर रोशनी डाली थी अपनी रिपोर्ट में कार्यकारी समूह ने महसूस किया कि देश भर में फौरन खेलों को बुनियादी ढांचों का संजाल खड़ा करने की जरूरत है। यह भी सुनिश्चित करना जरूरी है कि ये सुविधायें सभी इच्छुक लोगों को आसानी से सुलभ हों ताकि अधिकाधिक लोग खेलों में भाग ले सकें। ऐसा होने पर ही प्रतिभाओं का आधार व्यापक आकार लेगा।

मार्ग चित्र

पीवाईकेकेए योजना देश की सभी ग्राम एवं ब्लॉक पंचायतों और उसकी समकक्ष इकाइयों में लागू होगी। देश में कुल 607 जिले हैं, 6373 ब्लाक पंचायतें और 2,50,000 ग्राम पंचायतें हैं। छोटी-छोटी पंचायतें होने की स्थिति में 2-3 पंचायतों को मिलाकर एक संकुल (क्लस्टर) बनाया जाएगा। संकुल की सम्मिलित जनसंख्या 4600 के राष्ट्रीय औसत के आसपास होनी चाहिये। वर्ष 2008-09 से शुरू होकर यह योजना 10 वर्ष के लिये होगी और ग्यारहवीं तथा बारहवीं योजना में इस पर चरणबध्द रूप से अमल किया जाएगा। प्रतिवर्ष 10 प्रतिशत गांवों में ये कार्यक्रम शुरू किये जाएंगे। प्रयास रहेगा कि 2016-17 तक सभी गांव अथवा ब्लाक पंचायतों में पीवाईकेकेए योजना लागू हो सके। ग्राम अथवा ब्लाक पंचायत स्तर पर इन कार्यक्रमों का क्रियान्वयन नेहरू युवक केन्द्र के खेलयुवा क्लब, राज्य के खेलयुवा क्लब, युवाखेल गतिविधियों से जुड़े अन्य गैर सरकारी संगठनों, स्व-सहायता समूहोंपंचायती राज संस्थाओं के माध्यम से किया जाएगा।

ग्रामब्लाक पंचायतों के खेलों का बुनियादी ढांचा तैयार करने के लिये वित्तीय सहायता दी जाएगी। खेल सामग्री उपकरण और अन्य आवश्यक साजो-सामान के लिये भी वित्तीय सहायता दी जाएगी। ये सहायता पांच वर्षों की अवधि के लिये दी जाएगी। इसके साथ  ही परिचालन संबंधी व्यय, जिसमें खेलों से जुड़े  क्रीड़ा श्री (स्वयंसेवी कार्यकर्ताओं) का मानदेय भी शामिल है, भी पांच वर्षों की अवधि के लिए दिया जाएगा। प्रत्येक ब्लाक और जिले को वार्षिक प्रतियोगिताओं में पहला तीन स्थान पाने वाले पंचायत को दिये जाने वाले पुरस्कार की 100 प्रतिशत राशि भी केन्द्रीय अनुदान से ही दी जाएगी। इसी प्रकार, जिला स्तरीय प्रतेयोगिताओं में प्रथम तीन ब्लाक पंचायतों का पुरस्कार भी शत-प्रतिशत केन्द्रीय अनुदान से दिये जाएंगे।

वित्तीय और भौतिक प्रगति

पीवाईकेकेए योजना के तहत पहले वर्ष (2008-09) प्रतिस्पर्धा अनुदान के रूप में राज्योंकेन्द्रशासित प्रदेशों को 92 करोड़ रुपये जारी किये गए थे, जबकि दूसरे वर्ष (2009-10 दिसम्बर 09 तक) 106.56 करोड़ रुपये जारी किये गए हैं। योजना के पहले दो वर्षों (2008-09 और 2009-10 में दिसम्बर 09 तक) में 24,115 ग्राम पंचायतों और 654 ब्लाक पंचायतों को शामिल किया गया।

अपेक्षित परिणाम

·       निचले स्तर पर खेलों का आधार व्यापक आकार लेगा।

·       ग्रामीण क्षेत्रों के युवा स्वास्थ्य के प्रति सचेत होंगे और सकारात्मक एवं उत्पादक नजरिया अपनायेंगे।

·       खेल गतिविधियों में ग्रामीण और शहरी युवाओं के बीच खाई संकरी हो सकेगी।

·       ग्रामीण क्षेत्रों में खेलों के विकास पर बल देने से खेलों का लोकव्यापीकरण होगा।

·       स्वदेशी खेलोंमार्शल आर्ट का विकास होगा।

·       ग्रामीण युवाओं में एकता की भावना पैदा होने की संभावना है।

·       प्रत्येक ग्रामजनपद पंचायत में शारीरिक रूप से चुस्त दुरुस्त लोगों की फौज तैयार हो सकेगी।

·       ग्रामीण युवाओं में नेतृत्व,सहनशीलता, टीम भावना, समावेशन आदि गुणों का विकास होगा।

·       योजना पर उचित ढंग से अमल होने पर देश के गांवों में 5-10 वर्षों में ही बदलाव दिलाई देने लगेगा।

૦૮.
आरजीजीवीआई के तहत ग्रामीण परिवारों को बिजली की आपूर्ति

ग्रामीण विद्युतीकरण को ग्रामीण क्षेत्रों के विकास के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण कार्यक्रम समझा जाता है। अब यह एक सर्वस्वीकृत तथ्य है कि बिजली मानव की मूलभूत आवश्यकताओं में एक है और हर परिवार को बिजली मिलनी चाहिए। ग्रामीण भारत में बिजली की आपूर्ति व्यापक आर्थिक एवं मानवीय विकास के लिए बहुत जरूरी है। वर्ष 2001 की जनगणना के मुताबिक देश में करीब एक लाख 20 हजार गांवों में बिजली नहीं पहुंच पायी है और करीब सात करोड़ 80 लाख परिवार बिजली की सुविधा से वंचित हैं।

राष्ट्रीय विद्युत नीति में सभी ग्रामीण क्षेत्रों को चौबीसों घंटे गुणवत्तापूर्ण बिजली की आपूर्ति का लक्ष्य रखा गया है। ग्रामीण विद्युतीकरण की परिभाषा को इस सोच के साथ कठोर बना दिया गया है कि किसी भी गांव को विद्युतीकृत गांव घोषित करने से पहले वहां पर्याप्त विद्युत अवसंरचना की उपलब्धता सुनिश्चित हो।  नई परिभाषा के मुताबिक किसी भी गांव को तभी विद्युतीकृत घोषित किया जाएगा जब वहां रिहायशी और दलित बस्ती दोनों क्षेत्रों में वितरण ट्रांसफार्मर और लाईंस की उपलब्धता, स्कूलों, पंचायत कार्यालयों और सामुदायिक केंद्रों में बिजली की सुविधा,  और गांव के कम से 10 फीसदी परिवारों में बिजली की आपूर्ति जैसी मूलभूत व्यवस्था हो जाए।

राज्यों द्वारा ग्रामीण विद्युतीकरण की धीमी गति को देखते हुए सरकार ने एक लाख गैरविद्युतीकृत गांवों में बिजली पहुंचाने और 2 करोड़ 34 लाख ग्रामीण  बीपीएल परिवारों को मुपऊत बिजली कनेक्शन प्रदान करने के उद्देश्य से मार्च 2005 में एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम के रूप में राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना (आरजीजीवीआई) शुरू की थी।  सरकार  इस परियोजना लागत की 90 फीसदी राशि सब्सिडी के तौर पर प्रदान करती है और  उसने अबतक 33000 करोड़ रूपये की सब्सिडी मंजूर की है जिसमें से 17900 करोड़ रूपये पहले ही जारी किए जा चुके हैं।

इस योजना में ग्रामीण विद्युत वितरण मेरूदंड (आरईडीबी), ग्रामीण विद्युतीकरण अवसंरचना सृजन (वीईआई), विकेंद्रीकृत वितरण सृजन (डीडीजी), बीपीएल ग्रामीण परिवार विद्युत आपूर्ति एवं विद्युतीकरण जैसी महत्वूपर्ण बातें शामिल हैं।

हालांकि ग्रिड कनेक्टिविटी के जरिए गांवों के विद्युतीकरण पर विशेष बल दिया जाता है लेकिन जहां यह व्यवस्था ज्यादा मंहगी जान पड़ती है वहां राज्य सरकार नवीन एवं नवीकरणीय स्रोतों पर आधारित डीडीजी कार्यक्रम भी चला सकती है।

असम, बिहार, झारखंड, ओड़िसा, राजस्थान, उत्तरप्रदेश और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में गैरविद्युतीकृत गांवों की संख्या बहुत अधिक है इसलिए इन राज्यों में ग्रामीण विद्युतीकरण पर ज्यादा बल दिया गया है। पूर्वोत्तर के विशेष श्रेणी के राज्यों तथा हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर एवं उत्तराखंड और अंतर्राष्ट्रीय सीमा से सटे एवं नक्सल प्रभावित जिलों में भी ग्रामीण विद्युतीकरण पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। यह योजना 100 से अधिक जनसंख्या वाली बस्तियों में चलायी जा रही है।

ऊर्जा मंत्रालय ने 118499 गांवों को विद्युतीकृत बनाने एवं 2 करोड़ 46 लाख बीपीएल परिवारों को मुपऊत बिजली कनेक्शन प्रदान करने के वास्ते 540 जिलों के लिए 567 परियोजनाएं मंजूर की है। इसके अलावा पहले से ही विद्युतीकृत 3 लाख 54 हजार गांवों में बिजली आपूर्ति एवं तत्संबंधी अवसंरचना की और व्यवस्था की जा रही है

01 जनवरी, 2010 तक 67607 गांव विद्युतीकृत किए गए हैं और 97599 गांवों में बिजली आपूर्ति एवं तत्संबंधी अवसंरचना की और व्यवस्था की गयी है तथा बीपीएल परिवारों को 83 लाख 88 हजार मुपऊत बिजली कनेक्शन दिए गए हैं। मार्च 2012 तक एक लाख गांवों में बिजली पहुंचाने तथा 175 लाख बीपीएल परिवारों को मुपऊत बिजली कनेक्शन देने का लक्ष्य रखा गया है।

ग्रामीण विद्युतीकरण निगम इस योजना के क्रियान्वयन के लिए नोडल एजेंसी है। इस परियोजना के तीव्र क्रियान्वयन के लिए पावरग्रिड, एनटीपीसी, एनएचपीसी, और डीवीसी जैसे बिजली क्षेत्र के सार्वजनिक उपक्रमों की सेवाएं राज्यों के विद्युत संगठनों को उपलब्ध करायी गयी हैं।

परियोजनाओं के प्रभावी एवं गुणवत्तापूर्ण क्रियान्वयन के लिए मंत्रालय ने त्रिस्तरीय निगरानी प्रणाली और महत्वपूर्ण चरण निगरानी व्यवस्था अपनाई है। राज्यों को इस योजना के तहत विद्युतीकृत गांवों में कम से कम छह से आठ घंटों तक बिजली की आपूर्ति करने को कहा गया है। आरजीजीवीआई विद्युतीकृत गांवों में प्रभावी वितरण प्रबंधन के लिए फ्रैंचाइजी की स्थापना अनिवार्य बना दी गयी है। इससे ग्रामीण युवकों के लिए रोजगार के सुअवसर पैदा हो रहे हैं। अबतक एक लाख दो हजार गांवों में फ्रैंचाइजी स्थापित की गयी है।

इस योजना के तहत मंत्रालय ने राज्यों के विद्युत संगठनों के सी और डी श्रेणी के कर्मचारियों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम भी शुरू किए हैं। ग्यारहवीं योजना के दौरान 75000 ऐसे कर्मचारियों एवं 40000 फ्रैचाइजियों को प्रशिक्षण देने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।

मंत्रालय द्वारा http://rggvy.gov.in नामक एक वेबसाईट भी शुरू की गयी है  जिसपर आरजीजी परियोजनाओं, विद्युतीकृत गांवों आदि की व्यापक जानकारियां मौजूद हैं। टिप्पणियों और शिकायतों के लिए एक जनमंच भी शुरू किया गया है। इस वेबसाईट पर मिलने वाली टिप्पणियों का संबंधित जिले की परियोजना क्रियान्वयन एजेंसी तुरंत जवाब देती है।

૧૦
डिसैलिनेशन अथवा विलवणीकरण

भू-विज्ञान मंत्रालय ने समुद्र जल के खारेपन को दूर कर उसे पीनेयोग्य बनाने की एक अग्रगामी यानी महत्त्वपूर्ण योजना शुरू की है। समुद्रीपानी का खारापन दूर करने की इस प्रक्रिया को डिसैलिनेशन अथवा विलवणीकरण कहा जाता है। लवणविहीन यह पानी मीठा पानी कहलाता है जो मानव-उपयोग के और सिंचाई के काम आता है। सागर में उतरने वाले अनेक जहाजों और पनडुब्बियों में मुख्यत: यही पानी इस्तेमाल होता है। खारापन दूर करने के बारे में आज जो रुचि दिखाई दे रही है, उसका मुख्य उद्देश्य इसकी प्रक्रिया की कम खर्चीली (किफायती) पध्दति की खोज है ताकि सीमित मात्रा में ताजा पेयजल पाने वाले क्षेत्र के लोगों को पीने योग्य पानी मुहैया कराया जा सके। व्यापक स्तर पर खारापन दूर करने के काम में बिजली का बहुत खर्च  होता है। इसके साथ ही विशिष्ट और महंगे बुनियादी ढांचे की भी आवश्यकता है। इस सब कारणों से नदियों और भूमिगत जल की शुध्दिकरण प्रणाली की तुलना में यह प्रणाली महंगी साबित होती है। धरती विज्ञान मंत्रालय ने अपने राष्ट्रीय सागर प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईओटी) के माध्यम से विलवणीकरण (खारापन दूर करना) का तकनीकी और आर्थिक रूप से व्यावहारिक समाधान खोजने का काफी प्रयास किया है।  निम्न तापमान तापीय विलवणीकरण (एलटीटीडी) एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें दो जलीय निकायों के बीच तापमान के उतार-चढाव से पहले गर्म पानी को कम दाब पर वाष्पीकृत और फिर निकली भाप को ठंडे पानी से द्रवीकृत किया जाता है ताकि मीठा पानी प्राप्त किया जा सके। गहरे सागर में अलग-अलग स्तर पर (गहराई) में अलग-अलग तापमान होता है, अत: दो अलग-अलग तापमान वाले जलीय निकायों की स्थिति वहां सहज रूप से विद्यमान रहती है। तट पर स्थित ताप विद्युत संयंत्र से द्रवीकरण के फलस्वरूप भारी मात्रा में निकलने वाला पानी पास के सागर में समाकर एक वैकल्पिक परिदृश्य उपस्थित करता है। एलटीटीडी प्रक्रिया की सरलता के कारण उत्पादित जल की गुणवत्ता को नियंत्रित करने में मदद मिलती है। इससे या तो अच्छी गुणवत्ता वाला पेयजल अथवा स्थित की मांग के अनुसार वाष्पित (बॉयलर) के लायक पानी प्राप्त हो सकता है।

निम्न तापमान तापीय विलवणीकरण (एलटीटीडी)

एलटीटीडी संयंत्र के लिए जो प्रमुख घटक चाहिए होते हैं, वे हैं- वाष्पीकरण चैम्बर, द्रवीकारक, गर्म और ठंडा पानी निकालने के लिए पंप और पाइपलाइन तथा संयंत्र को निम्न वातावरण दबाव पर बनाए रखने के लिए वैक्यूम पंप। इस प्रक्रिया का एक सबसे बड़ा लाभ यह है कि इसे दो जलीय निकायों के बीच 8-10 डिग्री सैलसियस के तापमान के उतार-चढाव की दर (ग्रेडियन्ट) पर भी इस्तेमाल किया जा सकता है। विश्व के अनेक स्थानों, विशेषकर पश्चिम एशिया में बहुत तेजी से प्रवाहित पानी से आसवन वाली प्रणाली का उपयोग होता है, परन्तु कोई भी स्थापित संयंत्र 8 डिग्री सेलसियस जैसे कम तापमान पर काम नहीं करता। भारत में तमिलनाडु के उत्तरी चेन्नई ताप विद्युत संयंत्र में यही प्रणाली अपनाई गई है।

पारम्परिक विलवणीकरण प्रक्रिया

पानी का खारापन दूर करने की जो आम तौर पर प्रचलित प्रक्रिया है, वह है रिवर्स आस्मोसिस अर्थात विपरीत विसारण। झिल्ली से छन कर विपरीत दिशा में पानी प्रवाहित करने की यह सबसे लोकप्रिय विधा है। उच्च दाब पर पानी को एक रंध्रवान झिल्ली से प्रवाहित किया जाता है। जब पानी उच्च दाब वाले क्षेत्र से 0.5-1.5 एनएम के आकार के रंध्रों से होकर गुजरता हुआ निम्न दाब वाले क्षेत्र में जाता है तो अधुलित ठोस पदार्थ अपशिष्ट के रूप में  पीछे  छूट जाते हैं। पिछले 20 वर्षों में इस प्रक्रिया की खामियों को दूर कर उसे पर्याप्त रूप से सुधारा गया है। परन्तु, बिजली की ज्यादा खपत और सांद्र नमकीन घोल का निपटान, इस प्रक्रिया की दो सबसे बड़ी खामियां हैं। बहुस्तरीय पऊलैश विलवणीकरण (एमएसएफ) झटके से तेज बहाव के जरिए खारापन दूर करने की प्रक्रिया है जो एलटीटीडी प्रक्रिया के समान ही,  परन्तु उच्चतर तापमान अंतर पर  काम करती है। पानी को तेज गति से कई चरणों में झटके से प्रवाहित किया जाता है। अधिकांश एमएसएफ संयंत्र 60-80 डिग्री सेलसियस  तापमान के बीच इनलेट फीडवाटर (अन्तर्मार्ग से पानी की पूर्ति) का इस्तेमाल करते हैं। बहु-प्रभावी विलवणीकरण (मल्टी इफेक्ट डिसैलिनेशन (एमईडी) में, बिजली घरों में भाप से निकलने वाली ऊर्जा का उपयोग  किया जाता है। प्राथमिक स्रोत के रूप में भाप का उपयोग भारतीय संदर्भ में इस प्रक्रिया को खर्चीला बना देता है।

निम्नतापमान तापीय विलवणीकरण

राष्ट्रीय सागर प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईओटी-नियोटे) ने 2004 में एलटीटीडी अनुप्रयोगों के साथ काम करना शुरू किया और अनेक प्रकार के संयंत्रों की स्थापना की। ये हैं– प्रयोगशाला स्तर का 5 एम3 दिन क्षमता का मॉडल (2004), लक्षद्वीप के कवरत्ती द्वीप पर भूमि स्थित 100 एम-3 दिन का मॉडल (2005) और चेन्नई समुद्र तट से परे बजरे (नौका) पर निर्मित 1000 एम 3 दिन क्षमता (2007) वाले मार्गदर्शी प्रायोगिग संयंत्र।

लक्षद्वीप द्वीपसमूह पर एलटीटीडी

नियोट ने एक लाख लीटर प्रतिदिन पेयजल उत्पादन करने वाला भूमि आधारित प्रदर्शन संयंत्र मई 2005 में स्थापित किया था। द्वीप के पास सागर तल की गहराई ऐसी थी कि तट से केवल 600 मीटर की दूरी पर ही गहराई 350 मीटर तक पहुंच गई थी। तापमान में 15 प्रतिशत के ग्रेडियंट का इस्तेमाल किया गया। 630 मिलीमीटर व्यास वाले 600 मीटर लम्बे उच्च घनत्व वाले पालीथीन (एचडीपीई) पाइपों का इस्तेमाल 350 मीटर की गहराई से ठंडा पानी निकालने के लिए किया गया। तभी से ये संयंत्र निर्बाध रूप से काम कर रहा है और तीन वर्षों से 10 हजार की स्थानीय आबादी की जरूरतों को पूरा कर रहा है। उत्पादित मीठे जल में समुद्री खारापन (लवणीयता) 35000 पीपीएम (पार्ट पर मिलियन) से घटकर  280 पीपीएम रह गया था। मीठे जल में स्वीकार्य लवणीयता सीमा 2000 पीपीएम तक है। संयंत्र द्वारा मीठे जल की आपूर्ति के बाद से उपभोक्ताओं में जलजनित बीमारियों के मामलों में उल्लेखनीय गिरावट आई है। नियोट इसी प्रकार के संयंत्र लक्षद्वीप के तीन अन्य द्वीपों, अगाती, मिनिकॉय और अंद्रोथ पर लगाने की तैयारी में है।

बजरे (नौका) पर निर्मित एलटीटीडी संयंत्र

जमीन पर बने एलटीटीडी संयंत्र के लिए नियोट ने चेन्नई के समुद्र तट से करीब 40 किलोमीटर दूर एक बजरे पर 1000 एम3 दिन  (10 लाख लीटर प्रतिदिन) की क्षमता वाला विलवणीकरण संयंत्र खड़ा किया है। उससे उत्पादित जल का उपयोग तटवर्ती भूभाग के लोग कर सकेंगे। सतह पर जल के 180 डिग्री सेलसियस के तापमान और 550 मीटर की गहराई पर जल के 28 डिग्री सेल्सियस के तापमान के ग्रेडियन्ट का उपयोग किया गया। संयंत्र ने अप्रैल 2007 में काम करना शुरू कर दिया था और कुछ हपऊतों तक समुद्री प्रयोग किये जाते रहे। बाद में संयंत्र को विखंडित कर दिया गया।

बिजली घरों में एलटीटीडी का अनुप्रयोग

एलटीटीडी के इन संयंत्रों से देखा जा सकता है कि मीठे पानी के उत्पादन के लिए तापमान में अंतर और शून्य  का स्तर पर्याप्त होना चाहिए। तापीय बिजली घर अपने कंडेंसरों (द्रवीकरण यंत्रों) से गर्म पानी छोड़ते हैं। इस प्रक्रिया में अत्यधिक ऊर्जा के हस्तांतरण की जरूरत होती है और इसमें कूलिंग टावर्स अथवा खुली ताप विसर्जक नलिकाएं भी आम तौर पर शामिल होती हैं। इससे पहले कि कंडेंसर पानी को वापस करे, उसे स्वीकार्य तापमान पर वापस आसपास के वातावरण में छोड़ दिया जाता है। फलस्वरूप ताप बिजलीघरों से होने वाले जल प्रदूषण आज तक गंभीर समस्या  बनी हुई है। कंडेंसर द्वारा अस्वीकृत पानी के ताप के उपयोग का कोई बेहतर और कार्यक्षम रास्ता निकल सके तो कूलिंग टावर्स पर कम भार पड़ेगा, जिससे तापीय प्रदूषण भी कम होगा। एलटीटीडी की एक विशेषता यह है कि गर्म पानी से मीठा पानी बनाते समय यह गर्म पानी के ताप को ठंडे पानी को हस्तांतरित कर देता है। अत: इस पहलू को ताप बिजलीघरों में इस्तेमाल किया जा सकता है, जिससे कंडेंसर द्वारा अस्वीकृत पानी को ठंडा करने और मीठे पानी के उत्पादन का दोहरा लाभ उठाया जा सकता है। करीब 8-10 डिग्री सेल्सियस का मामूली ग्रेडियंट, जोकि आम तौर पर अधिकांश बिजलीघरों में पाया जाता है, इस सिध्दान्त को अमल में लाने के लिए पर्याप्त होगा।

आगे की योजना

लक्ष्यद्वीप में पेयज:-  एलटीटीडी की यह प्रौद्योगिकी पिछले चार वर्षों में स्थापित हो चुकी है। धरती विज्ञान मंत्रालय का लक्ष्य दिसम्बर, 2010 तक लक्षद्वीप के दस प्रमुख आबाद द्वीपों में एक लाख लीटर प्रतिदिन की क्षमता वाले ऐसे संयंत्र स्थापित करने का है।

समुद्री तट पर ताप बिजलीघरों में मीठा पानी

एनसीटीपीएस में महज 8 से 10 डिग्री सिल्सियस ग्रेडियंट वाले एलटीटीडी संयंत्र की सफलता ने इसके उपयोग का एक और रास्ता सुझाया है। चूंकि अधिकाश बिजलीघर 8 से 10 डिग्री सेल्सियस पर कंडेंसर अस्वीकृत पानी सतही तापमान पर समुद्री जल में छोड़ते हैं, उपलब्ध तापमान अंतर में कोई भी वृध्दि अथवा बिजली घरों से अतिरिक्त वाष्प का प्रावधान एलटीटीडी की कार्यक्षमता को बढा देगा, जिसका नतीजा यह होगा कि अधिक मीठा पानी उत्पादित होगा। यदि डिजाइन तैयार करते समय ही इस बात पर  अमल किया जाए तो बिजली की खपत में भी कुछ कमी लाई जा सकती है। देशभर में नए-नए बिजलीघर लगाए जा रहे हैं। इनमें से अनेक तटीय क्षेत्रों में  हैं। अत: यदि एलटीटीडी प्रौद्योगिकी का उपयोग इन बिजली घरों में  किया जाए तो बॉयलरों  को बढिया किस्म का मीठा पानी प्रदान करने में यह उपयोगी सिध्द हो सकती है, साथ ही तापीय प्रदूषण में भी कमी आ सकेगी। (पसूका)

૧૧.
र्षा जल संचयन और भू-जल संभरण के जरिए पेयजल सुरक्षा

जल अधिकार और पारंपरिक जल संचयन का भारत में लंबा इतिहास रहा है। पारंपरिक जल संचयन प्रणाली की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि लोगों को खुद इनका निर्माण करने और प्रबंधन करने का अधिकार है। देशभर में इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि ऐतिहासिक काल में जल-तंत्रों के प्रबंधन , यहां तक यदि वे सरकार की मदद से बने हों तो भी,  एवं उनके जल के वितरण की पूरी अंतिम जिम्मेदारी स्थानीय लोगों पर डाल दी जाती थी।

पारंपरिक जल संचयन भी स्थानों पर आज की जरूरतों के लिए पर्याप्त नहीं है।  कई क्षेत्रों में जल संचयन तंत्र बुरी तरह नष्ट हो गए हैं। ऐसे में परंपरागत के साथ बड़े एवं आधुनिक जल अवसंरचनाओं की संतुलित व्यवस्था जरूरी है। लेकिन पहली प्राथमिकता उस परंपरागत जल प्रबंधन प्रणाली को दी जानी चाहिए जिसकी स्थानीय लोगों की अच्छी समझ है और जिसका वे अपने श्रम और धन से प्रबंधन कर सकते हैं।

भारत में भू-जल संसाधन विकास सरकार के साथ-साथ किसानों एवं उद्योगों द्वारा भी व्यक्तिगत रूप से किया जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में पीने के लिए भू-जल ही सबसे बड़ा स्रोत है लेकिन उसके सतत दोहन एवं विभिन्न मौसमों में भू-जल स्तर में उतार-चढाव का भूजल स्रोतों की क्षमता प्रभावित होती है और पानी की गुणवत्ता भी बिगड़ती जा रही है।

परिवारों को व्यक्तिगत रूप से पेयजल उपलब्ध कराने के लिए छत के उपर वर्षा जल संचयन के अलावा भारी बारिश के दौरान भूतल पर बाढ पानी के संग्रहण एवं भंडारण को, सूखा के दौरान पेयजल सुरक्षा से संबंधित मौजूदा योजनाओं के पूरक के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है। छत पर संग्रहित जल को बंद पड़ चके कुंओं, खराब चापाकलों, संभरण पिट्स , शैपऊट आदि के माघ्यम से भूजल स्तर बढाने में उपयोग किया जा सकता है। वर्षा जल संचयन प्रणाली को अपनाने को बढावा देने के लिए पंचायती राज संस्थाओं , गैर सरकारी संगठनों और सामुदायिक संगठनों का क्षमता विकास करना बहुत ही महत्वपूर्ण है।

एक दृष्टांत

मध्यप्रदेश में दतिया जिले के दतिया प्रखंड में 641 की जनसंख्या वाला हमीरपुर गांव बुंदेलखंड क्षेत्र में पड़ता है जहां अनियमित बारिश की वजह से पानी की भारी कमी है और काफी समय से सूखे की स्थिति बनी हुई है। बुंदेलखंड में जहां दो दशक पहले करीब 100 दिन बारिश होती थी अब वहीं महज 40 दिन ही बारिश होती है। गांव में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति बहुसंख्यक हैं।

स्थानीय पहल

स्वजलधारा कार्यक्रम के तहत हमीरपुर में जलापूर्ति योजना शुरू करने के लिए ग्राम जल एवं स्वच्छता समिति (वीडब्ल्यूएससी) गठित की गयी और सामुदायिक योगदान के तहत 40 हजार रूपये भी एकत्रित किए गए लेकिन आवश्यक अनुमोदन नहीं मिले। इस समिति को पेयजल समिति के नाम से भी जाना जाता है।

यह एहसास किया गया कि जबतक गांव में संगठित जलापूर्ति व्यवस्था नहीं हो जाती है तबतक आर्थिक प्रगति हासिल कर पाना संभव नहीं है क्योंकि ज्यादातर समय तो दूरदराज से पानी लाने में बीत जाता है।

नयी अवधारणा

ग्रामीणों ने कई बैठकों के बाद अपनी पहल करने का फैसला किया और गांव में भू-जल स्तर में सुधार एवं निकट भविष्य में जलापूर्ति योजना को सफलतापूर्वक लागू करने के लिए समेकित जल संसाधन प्रबंधन अपनाया। भूजल स्तर को ऊपर उठाने एवं वर्षा जल संचयन के लिए सभी घरों में वर्षाजल संचयन ढांचा बनाने तथा उपयोग में नहीं आ रहे कुंओं को गहरा करने एवं बांधों के निर्माण की योजना बनाई गई।

उन्होंने गांव से बाहर एक ऐसे स्थान की पहचान की जहां से घर एवं सड़कें बनाने के लिए मिट्टी खोदी जा सकती है और चापाकलों तथा भूजल स्रोतों के संभरण के लिए एक बड़े तालाब का निर्माण हो।

जनस्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग ने गांव में बड़े-बड़े पत्थरों से बांध एवं अन्य गांवों में नाला पर बांध बनाए जिससे चापाकलों में पानी आने लगा। वीडब्ल्यूएससी ने सभी 75 घरों, स्कूलों और आंगनवाड़ी केंद्रों पर जलसंचयन ढांचे के निर्माण का भी काम शुरू किया। एक स्थानीय गैर सरकारी संगठन परहित ने हर परिवार को 500-500 रूपये प्रदान किए और शेष 1000-1200 रूपये हितधारकों ने अपनी तरफ से लगाए।

हमीरपुर गांव के लिए सभी परिवारों को सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने के  प्रयास के साथ यह यात्रा प्रारंभ हुई और समेकित जल संसाधन प्रबंधन एवं बड़े पैमाने पर वर्षाजल संचयन ढाचों के निर्माण के साथ ही लोगों को पर्याप्त पेयजल मुहैया हो सका। यह एक अभिनव प्रयोग था जिसका सुखद परिणाम सामने आया।

वित्तीय वर्ष 1987-88 में राष्ट्रीय पेयजल मिशन शुरू होने के साथ ही वर्षा जल संचयन उन क्षेत्रों में शामिल हो गया जिनपर पेयजल आपूर्ति विभाग विशेष ध्यान देता है। बाद में इस मिशन का नाम बदलकर राजीव गांधी पेयजल मिशन कर दिया गया।

विभाग ने  न्न वैज्ञानिक स्रोत खोज, जल संरक्षण एवं भूजल स्रोतों का संभरण न्न नामक उपमिशन शुरू किया जिसके तहत वर्षाजल संचयन पर विशेष बल दिया गया और सभी राज्यों को विशेष कोष उपलब्ध कराया गया। इस कोष के लिए केंद्र 75 प्रतिशत धनराशि सहायता प्रदान करता है जबकि शेष 25 प्रतिशत धनराशि राज्य अपने संसाधन से जुटाते हैं। ग्रामीण जलापूर्ति कार्यक्रम के तहत न्न वर्षा जल संचयन न्न तथा न्न संपोषणीयता के लिए प्रौद्यागिकी एवं जल गुणवत्ता न्न पर एक एक पुस्तिकाएं प्रकाशित की गयी और उन्हें राज्यों में वितरित की गयीं।

पेयजल आपूर्ति संपोषणीयता योजना के तहत ग्रामीण पेयजल स्रोतों की संपोषणीयता सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न जल संचयन प्रौद्योगिकियों पर मई, 2007 एवं जून, 2009 में राष्ट्रीय कार्यशालाएं आयोजित की गयीं।

राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम के तहत आवंटन की 20 प्रतिशत धनराशि जलस्रोतों की संपोषणीयता के लिए चिह्नित की गयी हैं। राज्यों को पेयजल स्रोतों के संभरण एवं वर्षा जल संचयन के वास्ते जलसंभरण ढांचाओं के निर्माण के लिए केंद्र सरकार से शत-प्रतिशत अनुदान दिया जाएगा।

भारत निर्माण

ग्रामीण पेयजल आपूर्ति भारत निर्माण के छह अवयवों में एक है। 04 अप्रैल, 2005 को भारत निर्माण कार्यक्रम के प्रारंभ होने पर राज्यों ने रिपोर्ट दी कि देश की 16.61 लाख ग्रामीण बस्तियों में से पेयजल कार्यक्रम से अछूते 55,067 बस्तियों, गंभीर जल संकट झेल रही 3.31 लाख बस्तियों और जल गुणवत्ता प्रभावित 2.17 लाख बस्तियों में गुणवत्तापूर्ण पेयजल की आपूर्ति सुनिश्चित करना था। पेयजल कार्यक्रम से अछूते 55067 बस्तियों में भारत निर्माण अवधि के दौरान गुणवत्तापूर्ण पेयजल उपलब्धता सुनिश्चित कराना था, लेकिन अप्रैल, 2009 तक 54,440 बस्तियों में ऐसा कराया जा सका। शेष बस्तियों में यह काम 2011 तक पूरा किया जाना है।

गंभीर जलसंकट झेल रही 3,31,604 बस्तियों के लक्ष्य में कुछ राज्यों द्वारा वृध्दि की गयी और कुछ अपने लक्ष्य पूरे भी नहीं कर पाए। इन बस्तियों में पानी का संकट शुरू होने की वजह जलस्रोंतों का सूखना, भूजल स्तर का घटना, जलढांचों का बहुत पुराना पड़ जाना और जनसंख्या वृध्दि आदि हैं। इसलिए इन बस्तियों की संख्या घटती बढती रहती हैं। राज्य अपनी वार्षिक कार्ययोजना में इन बस्तियों की इस समस्या का समाधान ढूंढेगी।

गुणवत्ता प्रभावित 2,16,968 बस्तियों में से 50,168 बस्तियों में क्रियान्वित परियोजनाओं के द्वारा पेयजल की आपूर्ति हो रही है। इस प्रकार की शेष बस्तियों को भारत निर्माण तथा नवचिह्नित गुणवत्ता प्रभावित बस्तियों में मौजूदा परियोजनाओं और शुरू की जाने वाली परियोजनाओं के तहत पेयजल उपलब्ध कराये जाने का प्रस्ताव है। जल की गुणवत्ता से संबंधित परियोजनाएं वर्ष 2009 में पूरी नहीं हो पाएंगी। इन लक्ष्यों को  ग्यारहवीं योजना भारत निर्माण के दूसरे चरण में यानि 2011 तक हासिल किये जाने की उम्मीद है।

मिजोरम, राजस्थान और अन्य राज्यों की भांति सभी राज्यों को ग्रामीण क्षेत्रों में हर घरों पर और खासकर पंचायत एवं स्कूल भवनों  की छतों पर वर्षाजल संचयन ढांचों की व्यवस्था करनी चाहिए। इस संबंध में तमिलनाडु सरकार के नियम की तर्ज पर इन ढांचों का निर्माण अनिवार्य बना दिया जाना चाहिए। पूर्वोत्तर राज्यों और अन्य पहाड़ी राज्यों, सूखे एवं अर्ध्द-सूखे क्षेत्रों और तटीय इलाकों में वर्षाजल संचयन को पहला  विकल्प समझा जाना चाहिए।

राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना, समेकित जलसंभर विकास कार्यक्रम, पिछड़ा क्षेत्र अनुदान कार्यक्रम, बारहवीं वित्त आयोग अनुदान तथा अन्य कार्यक्रमों के साथ इस कार्यक्रम का समन्वय वर्षा जल संचयन को बढावा देने और पेयजल स्रोतों की संपोषणीयता के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है।

૧૨.
अपने निवेश को बचाने के लिए वित्तीय साक्षर बनें

उपभोक्ता मामलों में आजकल उपभोक्ता कल्याण के सभी पहलू शामिल हैं और इसे हाल में अंतरराष्ट्रीय पहचान भी मिली है । उपभोक्ता सामाजिक-आर्थिक- राजनीतिक प्रणाली का अभिन्न हिस्सा समझा जाता है, जहां क्रेता और विक्रेता के बीच के किसी भी विनिमय एवं लेन-देन का तीसरे पक्ष यानि समाज पर गहरा असर पड़ता है। व्यापक उत्पादन एवं बिक्री में सन्निहित फायदे की मंशा कई विनिर्माताओं एवं डीलरों को उपभोक्ताओं का शोषण करने का अवसर प्रदान करती है । बाजारों का वैश्वीकरण हो रहा है । उपभोक्ताओं पर उत्पादों के ढेरों विकल्प लादे जा रहे हैं, ऐसे में, कौन-सा उत्पाद खरीदा जाए — इस संबंध में निर्णय लेना कठिन होता जा रहा है । इंटरनेट, डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड और एटीएम जैसी नई प्रौद्योगिकियां एक तरफ उपभोक्ता का जीवन आसान बना रही हैं तो दूसरी तरफ वे सुरक्षा और संरक्षण संबंधी चुनौतियां भी खड़ी कर रही हैं । उपभोक्ता के रूप में हमें सही सामान का चुनाव करना है । खरीददारी के दौरान ठगे जाने और मेहनत की गाढी क़माई अदा कर घटिया उत्पाद या सेवा मिलने का डर व जोखिम भी बना रहता है । अतएव, उपभोक्ता की संतुष्टि और सुरक्षा की आवश्यकता को पहचान दी गयी । फिलिप कोटलर ने कहा है कि उपभोक्तावाद विक्रेता से संबंध के दौरान क्रेता के अधिकारों और शक्तियों को मजबूती प्रदान करने का एक सामाजिक आंदोलन है । हर उपभोक्ता आजकल अपनी मुद्रा का मूल्य और ऐसा उत्पाद व सेवा चाहता है जो उसकी तर्कसंगत उम्मीदों पर खरी उतरें। इन्हीं उम्मीदों को उपभोक्ता अधिकार कहा जाता है ।

उपभोक्ताओं का शोषण

खराब सामान, सेवाओं में त्रुटियां, घटिया और नकली ब्रांड, भ्रामक विज्ञापन जैसी समस्याएं आम हो गयी हैं तथा भोले-भाले उपभोक्ता इनके शिकार हो जाते हैं । ज्यादातर उपभोक्ता, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में, अशिक्षित होते हैं और उनमें जागरूकता एवं ज्ञान की कमी होती है । उपभोक्ताओं को सामानों और सेवाओं की खरीददारी के दौरान कई जोखिम उठाने पड़ते हैं ।

इसके अलावा, वित्तीय जोखिम भी हैं । उपभोक्ताओं को व्यय की गई राशि का मूल्य नहीं मिल पाता या उनसे ज्यादा पैसे ऐंठ लिये जाते हैं, जिससे वे शोषण के शिकार हो जाते हैं । बीमा पॉलिसी के दावे के निबटान में अनावश्यक देरी, अधिक बिल आने, त्रऽण के दोगुना होने, बिल आने में देरी, पेंशन में देरी, गलत बिलों में सुधार न होना,  भ्रामक विज्ञापन, ऑफर में आनाकानी, पऊलैट का मालिकाना हक दिये जाने में देरी, चेक को गलत तरीके से अमान्य करना, बैंक में जमा किये गये चेक का गायब होना, फर्जी हस्ताक्षर वाले चेक, आदि जैसे इसके ढेरों उदाहरण हैं ।

ऐसे भी उदाहरण सामने आते हैं जब कंपनियां आकर्षक ब्याज दर या कुछ समय में धन दोगुना करने की स्कीम का भ्रामक विज्ञापन देती हैं । जब वे अच्छी खासी धनराशि एकत्र कर लेती हैं तो अपनी दुकान बंद कर फरार हो जाती हैं । कई बार लोगों को जमीन खरीदने के बाद पता चलता है कि जो जमीन उन्होंने खरीदी है वह या तो पहले से बिकी हुई है या साथ ही किसी और को भी बेची गयी है । एक ही पऊलैट एक ही साथ दो-दो लोगों को आबंटित कर दिया जाता है और असली हकदार को लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ती है । इसी तरह, शेयर के लिए आवेदन करने वाले कई बार ऐसी स्थिति में फंस जाते हैं जहां न तो उन्हें शेयर आवंटित होते हैं और न ही रिफंड मिलता है । इनमें से अधिकांश मामलों में उपभोक्ताओं को अपने निवेश या अपनी मेहनत की गाढी बचत के एक बड़े हिस्से से हाथ धोना पड़ता है । उपभोक्ताओं को एटीएम की गड़बड़ी के कारण भी नुकसान उठाना पड़ता है । उपभोक्ता मंत्रालय का इस वर्ष का ध्येय उपभोक्ताओं को वित्तीय साक्षर बनाना है ताकि वे बाजार से गुमराह न हों ।

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986

देश में प्रगतिशील कानून लागू करने के मामले में भारत किसी भी देश से पीछे नहीं रहा हह। हमारे देश के इतिहास में 24 दिसम्बर, 1986 को उपभोक्ता आंदोलन का श्री गणेश हुआ । भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति ने इसी दिन उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 को स्वीकृति दी थी । इस अधिनियम के फलस्वरूप उपभोक्ता अधिकारों के क्षेत्र में ऐसी क्रांति आई, जिसकी मिसाल इतिहास में शायद कहीं नहीं मिलती । यह अधिनियम उन सभी उत्पादों और सेवाओं पर लागू होता है, जो निजी, सार्वजनिक या सहकारी–किसी भी क्षेत्र से संबंधित हों । केवल केन्द्र सरकार द्वारा विशेष रूप से छूट प्राप्त वस्तुओं या सेवाओं पर यह अधिनियम लागू नहीं होता ।

इस अधिनियम में अंतर्राष्ट्रीय रूप से स्वीकृत सभी उपभोक्ता कानून निहित हैं । इस अधिनियम के अनुसार, केन्द्रीय, राज्य और जिला स्तरों पर उपभोक्ता संरक्षण परिषदें कायम की गई हैं । उपभोक्ता अदालत नाम से ऐसी न्यायिक संस्थायें स्थापित की गई हैं, जहां उपभोक्ता की शिकायतों की सुनवाई आसानी से हो जाती है ।

उपभोक्ता मार्ग-निर्देश एवं शिक्षा

जागरूक उपभोक्ता किसी भी समाज की एक सम्पत्ति है । कोई भी उपभोक्ता जब बीमा पालिसी लेता है तो उसे छपी हुई जानकारी को सावधानीपूर्वक पढ लेना चाहिए, पालिसी के विवरणों को इकट्ठा कर लेना चाहिए, भरोसेमंद एजेंट से बीमा लेना चाहिए और उससे यह भी पता करना चाहिए कि उक्त पालिसी में बीमा कवर कितना है और दावे को दर्ज करने की प्रक्रिया क्या है।

बैंक त्रऽण के लिए आवेदन करते समय उपभोक्ता को लिखित जानकारी सावधानीपूर्वक पढ लेनी चाहिए, लागू त्रऽण शर्तों की पुष्टि कर लेनी चाहिए, पुनर्भुगतान और समय सीमा  के बारे में भी जानकारी हासिल कर लेनी चाहिए तथा अन्य त्रऽण विकल्पों से उसकी तुलना भी कर लेनी चाहिए, चिह्नित प्रभारों की जांच कर लेनी चाहिए, ब्याज की दर और जुर्माने आदि के बारे में दी गई जानकारी के साथ-साथ शर्तोेंं तथा अन्य विवरणों को पूरी तरह पढने अौर बिल को ठीक से परखने के बाद ही  क्रेडिट कार्ड सेवा का ग्राहक बनना चाहिए । बैंकिंग और बीमा से सम्बध्द समस्याओं के समाधान के लिए बैंक लोकपाल सबसे उपयुक्त, स्वतंत्र और निष्पक्ष माध्यम है ।

किसी भी व्यक्ति को ऐसे विज्ञापनों के बहकावे में नहीं आना चाहिए जो उपभोक्ताओं के सूचना अधिकारों का उल्लंघन करते हैं और उन्हें वित्तीय हानि और मानसिक दुख पहुंचा सकते हैं । इसलिए रकम को दुगुना करें जैसे प्रलोभनों वाले विज्ञापनों से हमेशा सावधान रहें ।

इसलिए मुक्त बाजार की ताकतों और उपभोक्ता संरक्षण के बीच संतुलन बनाना चाहिए । कोई भी उपभोक्ता आंदोलन तभी सफल हो सकता है, जब उपभोक्ता संतुष्ट हों । उपभोक्ता तभी संतुष्ट होते हैं जब वे अपने उत्पादों और सेवाओं का मूल्य प्राप्त करते हैं । इस प्रकार सरकार, न्यायपालिका, व्यापारियों और उपभोक्ताओं के बीच सहक्रिया और सहयोग का होना आवश्यक है ।

###

# एसोसियेट प्रोफेसर एवं कन्वीनर कन्ज्यूमर क्लब, वाणिज्य विभाग, कमला नेहरू कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय ।

##अस्वीकरण – इस विशेष लेख में व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं और आवश्यक नहीं कि ये विचार पत्र सूचना कार्यालय के भी हो ।

૧૩.
स्वच्छ कोयला प्रौद्योगिकी

कोयला एक जीवाश्म ईंधन है जो मुख्य रूप से कार्बनों तथा हाइड्रोकार्बनों से बना है। बिज़ली उद्योग में इसका बड़ी मात्रा में उपयोग किया जाता है। इसे जलाकर वाष्प बनाई जाती है जो टर्बाइनों को घुमाकर बिज़ली तैयार करती है। जब इसको जलाया जाता है तो इससे उत्सर्जन होता है जो प्रदूषण और वैश्विक तापन को बढ़ाता है। भारत सहित कई देशों में बिज़ली का उत्पादन मुख्य रूप से कोयले पर निर्भर ह,ै इसलिए सरकार स्वच्छ कोयला प्रौद्योगिकी पर जोर दे रही है। इस प्रौद्योगिकी के माध्यम से  कोयले को स्वच्छ बनाकर और उसके उत्सर्जन को नियंत्रित करके पर्यावरण पर पड़ने वाले कुप्रभावों को कम  किया जा सकता है।

स्वच्छ कोयला प्रौद्यांगिकी में कोयले की धुलाई, कोल बेड मीथेन#कोल माइन मीथेन निष्कर्षण, भूमिगत कोयले को गैस उपचारित करना एवं कोयले का द्रवीकरण करना आदि शामिल है।

कोयला प्रक्षालन

पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के दिशा: निर्देंशों के अनुसार 34 प्रतिशत से अधिक राख वाले कोयले का उपयोग उन थर्मल पावर स्टेशनों में मना किया गया है जो लदान केन्द्रों से दूर तथा अत्यधिक प्रदूषित क्षेत्रों में हैं। ऐसे में प्रक्षालित कोयले का इस्तेमाल करना महत्वपूर्ण हो गया है। इससे ऐसे पावर स्टेशनों के  संचालन से संबंधित  खर्च में भी कमी आती है। धुले कोयले की आपूर्ति 10वीं पंचवर्षीय योजना के आरंभ में 170 लाख टन थी जो इस योजना के अंत में बढ़कर 550 लाख टन हो गई। 11वीं पंचवर्षीय योजना के अंत तक  इसके 2500 लाख टन होने की संभावना है।

थर्मल पावर स्टेशनों के लिए कोयला धुलाई केंद्रों की मौजूदा क्षमता 1080 लाख टन है जिसे इस अवधि में बढ़ाकर 2500 लाख टन करने की कोशिश की जा रही है। इसमें से अधिकतर निजी क्षेत्र से संबंधित हैं। इसके अलावा कोल इंडिया लिमिटेड कंपनी ने भी अपनी खदानों से धुले कोयले की आपूर्ति करने का फैसला किया है। इसके लिए वह 20 कोयला धुलाई केंद्रों का निर्माण करेगी जिनकी क्षमता 1110 लाख टन  होगी। 11वीं पंचवर्षीय योजना के अंत तक इन केंद्रों के शुरू होने की संभावना है।

सीबीएम तथा सीएमएम

जो मीथेन गैस कोयले की अनर्छुई परतों से निकाली जाती है उसे कोल बेड मीथेन (सीबीएम) कहते हैं और जो चालू खदानों से निकाली जाती है उसे कोल माइन मीथेन (सीएमएम) कहते हैं। कोल बेड मीथेन#कोल माइन मीथेन के विकास को भारत सरकार ने 1997 में एक नीति के ज़रिए बढ़ावा दिया था। इस नीति के अनुसार कोयला मंत्रालय तथा पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय दोनों मिलकर कार्य कर रहे हैं।  सरकार ने वैश्विक बोली के तीन दौरों के ज़रिए कोल बेड मीथेन के लिए 26 ब्लॉकों की बोली लगाई थी। इनका कुल क्षेत्र 13,600 वर्ग किलोमीटर है और इसमें 1374 अरब घनमीटर गैस भंडार होने की संभावना है। वर्ष 2007 में रानीगंज कोयला क्षेत्र के एक ब्लॉक में वाणिज्यिक उत्पादन आरंभ कर दिया गया था और दो केंद्रों में भी उत्पादन जल्द ही आरंभ हो जाएगा। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के तहत हाइड्रोकार्बन महानिदेशक (डीजीएच) कोल बेड मिथेन संबंधी गतिविधियों के लिए विनियामक की भूमिका निभाता है। डीजीएच ने सीबीएम-4 के तहत 10 नये ब्लॉकों की पेशकश की है।

भारत कोकिंग कोल लि0 में भूमिगत बोरहोल के ज़रिए यूएनडीपी#ग्लोबल एन्वायरमेंटल फेसिलिटी के साथ मिलकर भारत  कोकिंग कोल लिमिटेड में भूमिगत बोरहालों के माध्यम सीएमएम की एक  प्रदर्शनात्मक परियोजना को लागू किया गया है। इस परियोजना में कोल बेड मीथेन को एक ऊर्ध्वाधर बोर के ज़रिए प्राप्त किया गया है जहां 500 कि.वा.. बिजली पैदा होती है और उसे बीसीसीएल को आपूर्ति की जाती है।

हाल ही में संयुक्त राज्य पर्यावरण संरक्षण अभिकरण के सहयोग से सीएमपीडीआईएल, रांची में सीबीएमसीएमएम निपटारा केन्द्र स्थापित किया गया है जो भारत में कोल बेड मीथेनकोल माइन मीथेन  के विकास के लिए आवश्यक जानकारियां उपलब्ध कराएगा ।

भूमिगत कोयला गैसीकरण(यूसीजी)

भूमिगत कोयला गैसीकरण अप्रयुक्त कोयले को दहनशील गैस में बदलने की प्रक्रिया है । यह गैस उद्योगों, विद्युत उत्पादन तथा हाइड्रोजन सिंथेटिक प्राकृतिक गैस एवं डीजल ईंधन के निर्माण में इस्तेमाल की जा सकती है । भूमिगत गैसीकरण में उन कोयला भंडारों का दोहन करने की क्षमता है जिनका निष्कर्षण आर्थिक दृष्टि से मंहगा है या जो गहराई प्रतिकूल भूगर्भीय स्थिति सुरक्षा की दृष्टि से निष्कर्षण के लायक नहीं है ।

भूमिगत कोयला गैसीकरण की महत्ता तथा योजना आयोग की समेकित ऊर्जा  समिति एवं कोयला क्षेत्र में सुधार के लिए रोडमेप पर टीएल शंकर समिति की सिफारिशों को ध्यान में रखते हुए सरकार ने कोयला गैसीकरण अधिसूचना जारी की है जिसमें खनन नीति के तहत भू एवं भूमिगत गैसीकरण को भी शामिल किया गया है ।

कोल इंडिया लिमिटेड ने अपनी साझीदार कंपनियों के साथ मिलकर सीसीएल कमांड एरिया में रामगढ काेलफील्ड के कैथा ब्लाक तथा पश्चिमी कोल फील्ड लिमिटेड कमांड एरिया में पेंच कोलफील्ड के थेसगोड़ा ब्लाक में यूसीजी के विकास के लिये दो स्थल चिन्हित किए हैं । साझीदार कंपनियों के चयन के संबंध में शीघ्र ही आशय पत्र जारी किए जाएंगे ।

इसके अतिरिक्त 5 लिंग्नाइट और 2 कोयला खंड भी यूसीजी के विकास के वास्ते भावी उद्यमियों को दिये जाने के लिए चिन्हित किए गए हैं ।

कोयला के लिए एस एंड टी कार्यक्रम के तहत सरकार ने राजस्थान के लिए एक यूसीजी परियोजना मंजूर की है जिसका क्रियान्वयन एनएलसी करेगा । एनएलसी ने इस परियोजना के लिए अभी सलाहकार अंतिम रूप से तय नहीं किए हैं।

कोयला द्रवीकरण

ऊर्जा सुरक्षा के दृष्टिकोण से देश में कोयला द्रवीकरण को बढावा देने के लिए नीतिगत निर्णय लिया गया है । गजट अधिसूचना जारी की गई है जिसमें कैप्टिव कोयलालिग्नाइट ब्लाकों के उन उद्यमियों को  कोयला द्रवीकरण के बारे में जानकारी दी गई है जिन्हें इसे आबंटित किया जाना है । कोयला मंत्रालय के अंतर- मंत्रालीय समूह की सिफारिशों के आधार पर कोयला मंत्रालय ने तलचर कोल फील्ड के दो कोयला ब्लाकों क्रमश: मैसर्स स्ट्रैटेजिक इनर्जी टेक्नोलोजी सिस्टम लिमिटेड (एसईटीएल) तथा मैसर्स जिंदल स्टील एंड पावर लिमिटेड (जेएसपीएल) को आवंटित किए हैं । मैसर्स एसईटीएल को उत्तरी अर्खा

पाल श्रीरामपुर खंड तथा मैसर्स जेएसपीएल को रामचांदी खंड आवंटित किए गए हैं । हर परियोजना की प्रस्तावित उत्पादन क्षमता 80000 बैरल तेल प्रतिदिन है । प्रस्तावित तेल उत्पादन सात वषों में शुरू हो जाएगा ।

૧૪.
कॉयर उद्योग में मील का एक पत्थर-सीसीआरआई

कॉयर में अनुसंधान की नींव 1955 में अलेप्पी में कॉयर प्रौद्योगिकीविद् की नियुक्ति के साथ रखी गई थी, और केन्द्रीय कॉयर अनुसंधान संस्थान(सीसीआरआई) की स्थापना 1959 में हुई । आज संस्थान में, उच्च स्तरीय अनुसंधान के लिये अनेक उन्नत मशीनें, उपकरण और सुविधायें उपलब्ध हैं । अपनी स्थापना के बाद से ही इस संस्थान द्वारा किए गए कॉयर क्षेत्र में अनुसंधान की सराहना अनेक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों द्वारा की जाती रही है । इस संस्थान को कॉयर पिच के परीक्षण के लिये आस्ट्रेलियन क्वेरन्टाइन इंस्पेक्शन सर्विस (एक्यूआईएस) जैसी अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियों की मान्यता प्राप्त है और अमेरिकन सोसाइटी ऑफ टेस्टिंग मटीरियल्स एएसटीएम की परीक्षण प्रयोगशालाओं की ऑनलाइन निर्देशिका में सूचीबध्द है ।

कॉयर, केरल विशेषकर राज्य के तटीय इलाके, की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहा है । इस क्षेत्र के लोगों का सामाजिक जीवन, कॉयर इकाइयों में निर्मित उत्पादों के ताने-बाने से बड़ी गहराई से जुड़ा हुआ है । हाल के दिनों में इस उद्योग की मौजूदगी का अहसास, देश के अन्य नारियल उत्पादक राज्यों में भी देखा जा रहा है । तमिलनाडु इस मामले में काफी तरक्की कर चुका है और हकीकत तो यह है कि अलेप्पी में स्थापित अनेक निर्यातोन्मुखी उत्पादन इकाइयां तमिलनाडु से ही कच्चा माल मंगाती हैं । मशीनीकरण के क्षेत्र में भी तमिलनाडु तेजी से आगे बढ रहा है और अनेक उद्यमी इस उद्योग में प्रवेश कर रहे हैं । इसी प्रकार, इस उद्योग का प्रसार आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, ओड़िशा और गुजरात जैसे कुछ गैर पारम्परिक राज्यों में भी हो रहा है, जो काफी उत्साहजनक है ।

जैसा कि हम सब जानते हैं, विश्व अर्थव्यवस्था आर्थिक मंदी से जूझ रही है और धीरे-धीरे इसके चंगुल से छुटकारा पाने में लगी है । संकट के इस दौर में एक ऐसा उद्योग जिसके कारोबार और कामकाज पर मंदी का कोई प्रभाव नहीं पड़ा, वह कॉयर ही था । वैश्विक आर्थिक मंदी का कोई प्रभाव कॉयर के निर्यात पर नहीं पड़ा, और इसने अपनी संजीवनी शक्ति का परिचय विश्व अर्थव्यवस्था में आए झंझावात में मजबूती से दिया । वर्ष 2009-10 के दौरान, कॉयर और कायर से बने उत्पादों का निर्यात 700 करोड़ रूपये के लक्ष्य के पार निकल जाने की पूरी संभावना है । देश में अब तक का यह सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है । वर्ष के दौरान दिसम्बर 2009 तक कॉयर और कॉयर उत्पादों का कुल निर्यात 1,79,667 मीट्रिक टन रहा । करीब 5 अरब 53 करोड़ रूपये के मूल्य के इस निर्यात की तुलना पिछले वर्ष के प्रदर्शन से की जाए तो पता चलता है कि परिमाण में 30.38 प्रतिशत और मूल्यों के अनुसार 19.44 प्रतिशत की वृध्दि दर्ज हुई।

आधुनिक प्रविधि

कॉयर उद्योग में सीसीआरआई के हस्तक्षेप ने इसे देश का एक आधुनिक और प्रगतिशील उद्योग बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है । एक वक्त ऐसा भी था कि मशीनीकरण और आधुनिकीकरण को इस उद्योग में शंका की दृष्टि से देखा जाता था । क्योंकि लोगों को भय था कि इससे रोजगार के अवसरों में कमी आएगी । अब इस बात में कोई संदेह नहीं रहा है कि आधुनिक प्रविधि इस उद्योग के लिये एक वरदान साबित हुई है और इसका सारा श्रेय कॉयर बोर्ड और उसकी अनुसंधान शाखा को जाता है । उत्पादन और प्रसंस्करण के भोंडे तरीकों की समाप्ति और आधुनिक उपकरणों के उपयोग की शुरूआत के बाद कारखानों में अधिकाधिक इकाइयां लगाई जा रही हैं और मशीनों का उपयोग बढ रहा है । इससे उत्पादन में वृध्दि हुई है, उत्पादों की गुणवत्ता में सुधार हुआ है तथा उद्यमी और श्रमिक दोनों की आय में इजाफा हुआ है ।

रोजगार के अवसर

नई पीढी ज़ो कम वेतन, उत्पादन और प्रसंस्करण के भोंडे तरीकों के कारण कॉयर उद्योग में काम करने से संकोच करती थी, अब इस क्षेत्र में काम करने के लिये आगे आ रही है । यह अब इस क्षेत्र में अवसरों की वृध्दि के कारण संभव हुआ है । इससे पूर्व इस उद्योग में मौसमी आधारपर रोजगार मिला करता था, जो मानसून और व्यापार की मांग पर निर्भर होता था । कारखानों के आने के बाद कामगारों को नियमित रोजगार मिल रहा है और उनके जीवन स्तर में लगातार सुधार आ रहा है ।

प्रमुख योगदान

केन्द्रीय कॉयर अनुसंधान संस्थान के कुछ योगदानों ने उद्योग के इतिहास में (कायरेट) महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की हैं । संस्थान द्वारा विकसित कायरेट ने प्रसंस्करण अवधि में पर्याप्त कटौती कर श्वेत रेशे की उत्पादन प्रक्रिया में क्रांति पैदा कर दी है । इस प्रक्रिया से उद्योग में काम करने वाले श्रमिकों का काम भी आसान हो गया है । यह एक पर्या-हितैषी शून्य उत्सर्जक प्रक्रिया है । सीसीआरआई का अन्य योगदान पिथप्लस का विकास है, जिसने कॉयर पिथ के स्तर को घातक पदार्थ से उपर उठाकर उसे पैसा बनाने वाली वस्तु के रूप में बदल दिया है । इसका उपयोग खाल के रूप में शत-प्रतिशत सफल रहा है । अनेक फसलों और बागवानी में इसे खाद के रूप में प्रयोग किया जा रहा है । सीसीआरआई का हालिया आविष्कार मोबाइल फाइबर एक्सट्रैक्शन मशीन है जो केरल में कायर रेशे की कमी को दूर करने में ऐतिहासिक भूमिका अदा कर रहा है । कॉयर उद्योग के अलावा, यह मशीन फालतू समझकर फेंक दिये जाने वाले नारियल के भूसे को बेचने से किसानों को अतिरिक्त आमदनी दिलाने में भी मदद कर रही है । इस मशीन से बने रेशे का कॉयरेट के पर्याहितैषी प्रक्रिया से और भी बेहतर उपचार किया जा सकता है । इसके साथ ही सीसीआईआर द्वारा हाल ही में तैयार किए गए कंडीशनर से कताई के लिये उत्तम किस्म के नारियल रेशे तैयार किये जा सकते हैं ।

वह दिन दूर नहीं जब नारिशल रेशे को अन्य प्राकृतिक रेशों के साथ ब्लैंड (मिश्रित) कर हलके लगेज कांफ्रेंस बैग्स, शापिंग बैग्स, पर्दे  आदि जैसे अनेक प्रकार के मूल्य संवर्धित उत्पादों के विकास के नए अवसर पैदा होंगे । सीसीआरआई अनुसंधान के इस क्षेत्र में पहले ही महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल कर चुका है । इन उत्पादों को प्राकृतिक रंगों से रंगे जाने से पर्यावरण की अनुकूलता के मुताबिक उनके मूल्यों में और भी संवर्धन हो सकेगा ।

ऐसा प्रतीत होता है कि वे दो कारक जो उद्योग के लिये काफी लाभकारी और मददगार साबित होने जा रहे हैं, वे हैं वैश्वीकरण और पर्यावरण के बारे में बढ रही चिंतायें और पर्यावरण के अनुकूल वस्तुओं के प्रति बढ रही जागरूकता के साथ-साथ इंटरसेट की सुविधा के कारण इन उत्पादों की तत्काल सुलभता भी बढ रही है । कॉयर उद्योग अभी पूरे तौर पर इन अवसरों का दोहन नहीं कर रहा है, परन्तु प्रयास जारी है । अपने उत्पादों की पर्या-हितैषी प्रकृति के कारण कॉयर उद्योग कार्बन ट्रेडिंग के नए परिदृश्य में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता है ।

——————————————————

૧૫.
भारत में यूकेलिप्टस वृक्षों के बाग तैयार करना

यूकेलिप्टस ने विश्वभर के विकास से जुड़े शोधकर्ताओं और पर्यावरणविदों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है । अपने प्राकृतिक क्षेत्रों से परे यूकेलिप्टस की जहां एक ओर इस बात के लिये सराहना की जाती है कि गरीबों की आर्थिक दशा सुधारने में उसकी प्रभावी भूमिका होती है, वहीं उसकी इस बात के लिये आलोचना की जाती है कि वह पानी का भारी शोषक है । इसी गुणअवगुण के कारण इसके भविष्य और प्रभाव के बारे में विवाद बना हुआ है । यह लकड़ी का तेजी से बढने वाला स्रोत है । इसका तेल सफाई के काम आता है और यह एक प्राकृतिक कीटनाशक के रूप में भी काम करता है । कभी-कभी इसका उपयोग कीचड़दलदल को सुखाने के लिये भी किया जाता है ताकि मलेरिया के खतरे को कम किया जा सके ।

यूकेलिप्टस का अर्थ होता है पूर्णत: आच्छादित अथवा पूरा ढका हुआ । इसकी ऊंचाई 100 मीटर तक पाई जाती है और यह सबसे ऊंचा पेड़ है जिसमें फूल आते हैं । यूकेलिप्टस की कोई सात सौ प्रजातियां होती हैं, जिनमें से अधिकांश आस्ट्रेलिया में पाई जाती हैं । आस्ट्रेलिया के पड़ौसी देश न्यूगिनी और इंडोनेशिया के अलावा उसके सुदूर उत्तर में फिलीपीन्स द्वीप समूह में भी कुछ गिनी-चुनी हुई प्रजातियां पाई जाती हैं । यूकेलिप्टस की विभिन्न प्रजातियां अमेरिका, इंगलैंड, अफ्रीका और भूमध्यसागरीय कछार, मध्यपूर्व, चीन और भारतीय उपमहाद्वीप सहित उष्ण कटिबंधीय तथा उपोष्ण क्षेत्रों में उगायी जाती हैं । वन विभाग द्वारा यूकेलिप्टस के बाग पहली बार 1887 में तुमकुर (कर्नाटक) जिले के मालाबावी में लगाये गए थे ।

यूकेलिप्टस के वृक्षों को विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है । माउन्टेन ऐश, विक्टोरियन ऐश, स्वैम्प्स गम, तस्मानियन ओक और स्ट्रिंगी गम जैसे अनेक नामों से यह वृक्ष लोकप्रिय है । इनमें से अधिकांश पेड़ों को गोंद पैदा करने वाले पेड़ के रूप में जाना जाता है , क्योंकि उसकी छाल को काटने पर उसमें से गाढे दूध जैसा चिपचिपा रसीला द्रव निकलता है । यह एक सदाबहार वृक्ष है , जिसका तना सिलेटी रंग का और सीधा होता है तथा खुरदुरे आधार को छोड़कर पूरी डाल चिकनी होती है ।

प्राकृतिक वास

रैगलन्स यूकेलिप्टस आम तौर पर शीतल, अधिकतर पर्वतीय क्षेत्रों में एक हजार मीटर की ऊंचाई के अति वर्षा वाले इलाकों में पाया जाता है । इसके वृक्ष बड़ी तेजी से बढते हैं, और 50 वर्षों में ही 65 मीटर की ऊंचाई प्राप्त कर लेते हैं । इनकी औसत आयु 400 वर्ष होती है । गिरे हुए पेड़ों के लट्ठे वनभूमि पर अनेक प्रकार के जीवों को सहारा देते रहते हैं । असामान्य तौर से यूकेलिप्टस के बीज गर्मी पाकर उसके लकड़ी जैसे कैप्सूल (गोंद की डली) से फूटकर निकलते हैं । अंकुरण की सफलता के लिये काफी प्रकाश की आवश्यकता होती है, जो कि पूरे परिपक्व वृक्ष की छाया के कारण नीचे जमीन तक प्राय: नहीं पहुंच पाता । प्रतिस्पर्धा और प्राकृतिक रूप से छंटाई के कारण अंतत: परिपक्व वृक्षों का घनत्व प्रतिहेक्टेयर तीस से चालीस पेड़ों का ही रह जाता है ।

उपयोग

यूकेलिप्टस का उपयोग अनेक कार्यों में होता है । निर्माण कार्यों में इमारती लकड़ी के अलावा फर्नीचर, प्लाईवुड, कागज और लुगदी, औषधि, तेल और जलाऊ ईंधन के रूप में यूकेलिप्टस का उपयोग होता है । इससे त्वचा के लिये उपयोगी मलहम बनाया जाता है । दर्द दूर करने और घाव भरने की क्षमता इसके तेल में पाई जाती है । फटे हुए हाथों, रूसी , पैरों में सूजन,  ग्रंथियों की वृध्दि , छाती , हाथों , पीठ तथा पांवों में दाग के अलावा जोड़ों और मांसपेशियों के दर्द में ये राहत प्रदान करता है ।

रैगलन्स और अन्य प्रजातियों के यूकेलिप्टस के पेड़ इमारती लकड़ी के लिये बड़े उपयोगी माने जाते हैं और इसीलिये बड़ी मात्रा में उनके और वन-बाग लगाए जाते हैं । प्रारंभिक तौर पर उसका उपयोग लट्ठे और लकड़ी के चिप्पड़ तैयार करने में होता है। इसे अखबारी कागज (न्यूजप्रिंट) का महत्वपूर्ण स्रोत माना जाता है । इसकी लकड़ी के चिप्पड़ का निर्यात अधिकतर जापान को होता है । यह मझौले वजन वाली इमारती लकड़ी 680 किलोग्राम मी³   (मीटर की घात 3) होती है और इसकी बनावट खुरदरी तथा रेशेदार होती है । इसकी लकड़ी पर काम करना आसान होता है । इसके तंतु लंबे और सीधे होते हैं और उनसे काटी लकड़ी में गांठे नहीं होतीं ।

भारत में यूकेलिप्टस की उत्पादकता

यूकेलिप्टस बागान की उत्पादकता उसके स्थान, मिट्टी और जलवायु तथा उत्पादक सामग्री के इस्तेमाल पर निर्भर करती है । औसत उत्पादकता 6-7 घनमीटर प्रति हेक्टेयर प्रतिवर्ष होती है । कम उत्पादकता का प्रमुख कारण उसके पत्तों पर लगने वाले कीड़े से पैदा होने वाला रोग है । इसके अलावा संकरण का सूत्र भंजन, दो वृक्षों के बीच समुचित स्थान का अभाव, पौधशालाओं में अपनायी जाने वाली पुरानी तकनीक, अच्छे बीजों की कमी, प्रजातियों और उद्गम स्थल का बेमेल होना तथा उत्पादन की उचित पध्दतियों को नहीं अपनाया जाना शामिल है । यूकेलिप्टस के बागान (जंगलों) की उत्पादकता और अंत में उसकी उपयोगिता में वृध्दि के लिये उत्कृष्ट जीन वाली प्रजातियों की पहचान कर ली गई है । आधुनिक वैज्ञानिक तकनीक के प्रयोग से यूकेलिप्टस की उत्पादकता में वृध्दि में उल्लेखनीय सफलता मिली है ।

पौधशाला तकनीक

आमतौर पर पौधशालाओं के गमलों में तैयार किए गए पौधों को बागों में लगाकर यूकेलिप्टस की खेती होती है । बीज को आमतौर पर बालू में मिलाकर पौधशाला की क्यारियों में बोया जाता है । बीजों पर बालू की हल्की पर्त बिछायी जाती है । उत्तर-भारत में सितम्बर -अक्तूबर तथा फरवरी-मार्च के महीने पौधशालाओं में बीज बोने के लिये उपयुक्त होते हैं । अंकुरण एक सप्ताह में शुरू हो जाता है और 2-3 हपऊतों में पूरा हो जाता है । बीजपत्र से ऊपर जब कोपलों का दूसरा जोड़ा निकल आता है, पौधों को वहां से निकालकर बागों में लगाने के लिये वे तैयार हो चुके होते हैं । पौधों को निकालकर पालीथीन की थैलियों में रोपा जाता है । वानस्पतिक विस्तार के लिये अनेक प्रकार की पध्दतियों यथा पौध लगाना , हवा में छिड़काव, कलम लगाना, तनों को काट कर लगाना और टिश्यू कल्चर का उपयोग किया जाता है । पास-पास लगाए गए पौधों के अलावा प्राय: सभी पौधे सकुशल जीवित बच जाते हैं । भारत में पौध रोपण का समय मानसून पर निर्भर करता है । परन्तु दो पौधों के बीच में कम फासला होना प्रतिहेक्टेयर उत्पादकता को प्रभावित करता है ।

घूर्णन आयु

पंजाब, हरियाणा, गुजरात और उत्तर प्रदेश के सरकारी वन विभाग आठ वर्षों के अंतर पर घूर्णन पध्दति से यूकेलिप्टस के पौधे लगाने का काम करते हैं । साधारण पौधशाला अथवा समय-समय पर काटकर लगाये जाने वाले पौधों से यूकेलिप्टस के बागान तैयार किये जाते हैं । किसानों ने घूर्णन का चक्र अब घटाकर 4 से 6 वर्ष कर दिया है ।

क्षेत्रीय विशेषज्ञ परामर्श की सिफारिशें

क्षेत्रीय विशेषज्ञ परामर्श की मुख्य सिफारिशें हैं – सरकारी नीतियों में वन एवं बागान प्रबंधन में सहभागिता के दृष्टिकोण के लिये प्रावधान करना और मनुष्य द्वारा वन विकास की नीतियों का लक्ष्य तय करना । ये लक्ष्य इमारती लकड़ी, जलाऊ ईंधन, रेशे, चारा कागज आदि की बढती मांग को पूरा करने हेतु तय किए गए हैं ताकि प्राकृतिक वनों पर पड़ रहे भारी दबाव को कम किया जा सके और वनों को बचाया जा सके । इसके साथ ही यह भी जरूरी है कि पर्यावरण पहलू को देखते हुए सामुदायिक विकास में योगदान दिया जा सके और जिन बिगड़े वनों की पारिस्थितिकी को लघु अवधि में दुरुस्त नहीं किया जा सकता हो, उनकी पुरानी स्थिति को बहाल किया जाए और उनकी रौनक वापस लाई जाए ।

अन्य परामर्शों में राष्ट्रीय भूमि उपयोग और वन नीतियों की समीक्षा और उनको अद्यतन बनाना शामिल है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि ये नीतियां सामाजिक रूप से उचित, आर्थिक रूप से समान्य तथा पर्यावरण की दृष्टि से ठोस हों । साथ ही, स्थानीय समुदायों, उपयोग कर्ता समूहों, मानव निर्मित वनों के प्रबंधन से जुड़े विभिन्न प्रकार के निजी उद्यमों को अधिक स्वतंत्रता के साथ-साथ पर्याप्त उत्तरदायित्व भी सौंपा जा सके ताकि वे बागों के प्रबंधन में उचित भूमिका निभायें । वनोपज के उत्पादकों को सहकारिताओं को स्थापित और सुदृढ बनाने के लिये प्रोत्साहित करना, कम पानी वाले इलाकों में यूकेलिप्टस की पैदावार बढाने के लिए विशेष देखभाल करना, मिट्टी पानी का एकीकृत प्रबंधन, प्रचालन और समायोजन करना, मिट्टी की सतह पर पोषक तत्वों का प्रबंधन करना और मौजूदा बागान में पौधों के बीच फासले बढाना, वर्षा पर निर्भर वनों में मिले-जुले पौधों के बाग लगाना आदि के बारे में भी परामर्श दिया गया है ।

विशेषज्ञों की यह सलाह भी है कि यूकेलिप्टस की लकड़ी काटने के बाद उसकी छाल और फूल पत्तियों के कचरे को बागों में ही पड़ा रहने देना चाहिए क्योंकि पेड़ के इन भागों में पौष्टिक तत्वों की बहुलता होती है । एक फसल से दूसरी फसल लेने के बीच की अवधि में मिट्टी के पोषक तत्वों के संतुलन और पुनर्चक्रण क्षमता पर निरंतर निगरानी रखी जानी चाहिए । प्राकृतिक रूप से स्वस्थ वनों के स्थान पर यूकेलिप्टस के वन लगाने का प्रयास नहीं किया जाना चाहिए । यदि जैव विविधता के संरक्षण को प्राथमिकता देना है तो अवश्य यूकेलिप्टस के बाग, प्राकृतिक संरक्षण क्षेत्रों के लिये बफर क्षेत्र का काम कर सकते हैं । यह भी सुझाव दिया गया है कि जहां पर संभव हो यूकेलिप्टस को स्थानीय वनस्पति के साथ पच्चीकारी की तरह लाया जाना चाहिए । वृक्ष प्रजनन कार्यक्रम को सुदृढ बनाया जाना चाहिये । इसमें निजी क्षेत्र के कार्यक्रम को भी शामिल किया जाना चाहिए ।

इसके अतिरिक्त विशेषज्ञों की सलाह है कि कतिपय अनुसंधान और विकास गतिविधियों का काम भी हाथ में लिया जाना चाहिए । इसमें विभिन्न प्रजातियों का उन स्थलों से मिलान जहां उनको लगाया जाना है, भूमि उपयोग के विविध रूपों के तौर पर वृक्षों की अन्य प्रजातियों के साथ -साथ अथवा उनके विकल्प के रूप में यूकेलिप्टस के उत्पादन पर अध्ययन, खराब मिट्टी और अच्छी मिट्टी में पोषक तत्वों के चक्रण पर अध्ययन, आनुवांशिक रूप से संशोधित बीजों और वानस्पतिक रूप से तैयार पौध रोपण सामग्री के उत्पादन और आपूर्ति के लिये वृक्ष प्रजनन कार्यक्रम, यूकेलिप्टस की उपज और पैदावार में वृध्दि से संबंधित आंकड़ों का संकलन, और अत्यधिक जैव कचरे के उत्पादन अथवा उसको हटाए जाने से पर्यावरण पर पड़ने वाले संभावित विपरीत प्रभाव पर निगरानी के लिये अधिकतम भंडारण का निर्धारण शामिल है । मानवनिर्मित वनों के प्रबंधन और स्थापन में यूकेलिप्टस की वानिकी से जुड़े सामाजिक और संस्थागत मुद्दों पर अधिक अध्ययन की सलाह भी दी गई है । इसमें वन नीतियों, कानून, भूमि , काश्तकारी, उत्पादकों (किसान, सरकारी एजेंसियों और निजी कंपनियों) की भूमिका शामिल है । उन वनों पर विशेष रूप से जोर दिया गया है जो तेजी से बढने वाले वृक्षों की प्रजाति से जुड़े हैं । यूकेलिप्टस की वानिकी के आर्थिक प्रभाव, लागत और लाभ, उत्पादों का विविधीकरण (यथा शहद, तात्विक तेल आदि) प्रसंस्करण और विपणन व्यवस्था के बारे में अध्ययन और शोध की सिफारिश की गई है ।

यूकेलिप्टस वानिकी के सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय प्रभावों को मापने के लिये निगरानी और मूल्यांकन प्रणालियों के विकास के साथ-साथ उसकी प्रजातियों पर अनुसंधान के नतीजों के संग्रहण, मूल्यांकन, विश्लेषण और अन्य प्रासंगिक सूचनाओं की जानकारी देने की सलाह भी दी गई है ।

यूकेलिप्टस बनाम अन्य उष्ण कटिबंधीय प्रजाति वृक्ष के संबंध में उगाये गए प्रति जैवपिंड हेतु पानी का उपयोग

कुल जैव पिंड अथवा उगायी गई सामग्री की पैदावार

लीटरकि.ग्रा.

पौधा

प्रतिकुल जैवपिंड हेतु पानी का उपयोग (लीटरकि.ग्रा.)

पैदावार संकेतक

प्रति उगाए गए जैवपिंड हेतु पानी का उपयोग (लीटरकि.ग्रा.)

पोंगोमिया (टी)

2600

0.5

1300

कानिफर्स (टी)

1538

0.65

1000

डेलबर्जिया (टी)

1483

0.60

890

एकेसिया (टी)

1323

0.65

860

साइजीयम (टी)

1017

0.60

610

अल्बीज़िया (टी)

967

0.60

580

यूकेलिप्टस (टी)

785

0.65

510

स्रोत- डेविडसन (1989)
૧૬.
सीमा पर बेहतर चौकसी हेतु बाड़ और तीव्र प्रकाश की व्यवस्था

पड़ोसी देशों के साथ भारत की सीमायें काफी छिद्रिल यानी भेद्य (पोरस) हैं। सीमा के दोनों और भौगोलिक, प्रजातीय और सांस्कृतिक समानताओं के साथ-साथ भारतीय क्षेत्र में बेहतर आर्थिक अवसरों के कारण निहित स्वार्थी लोगों के लिये अवैध रूप से सीमा पार कर इस ओर आना हमेशा से आकर्षण का विषय रहा है। इन्हीं कारणों के चलते घुसपैठ, तस्करी और सीमाओं के उल्लंघन की घटनाएं, जब तब सुनने में आती रहती हैं। इन असामाजिक तत्वों से सीमा की सुरक्षा के लिये सरकार ने बहुकोणीय रास्ता अपनाया है। बाड़ लगाना और तेज रोशनी करना सीमा पर चौकसी बनाए रखने की व्यवस्था के प्रमुख घटक हैं। पाकिस्तान और बंगलादेश की सीमाओं से घुसपैठ, तस्करी और अन्य राष्ट्र विरोधी गतिविधियों को रोकने के लिये सरकार ने इन दोनों सीमाओं पर बाड़ लगाने और तीव्र प्रकाश पऊलड लाइटिंग का प्रबंध करने का काम हाथ में लिया है।

भारत-बांग्लादेश सीमा पर चौकसी

बांग्लादेश के साथ भारत की सीमा 4097 कि.मी. लम्बी है। यह सीमा पश्चिम बंगाल (2216.7 कि.मी.), असम (263 कि.मी.), मेघालय (443 कि.मी.), त्रिपुरा (856 कि.मी.) और मिज़ोरम (318 कि.मी.) के साथ लगी हुई है। यह पूरी सीमा, मैदानी इलाकों, नदी-नालों, पहाड़ियों और जंगलों से होकर गुजरती है और बीच में कोई बड़ी प्राकृतिक बाधा नहीं है। पूरा इलाका घनी आबादी वाला है और सीमा के अन्तिम छोर तक खेती होती है।

बाड़ लगाना

बांग्लादेश से भारत में अवैध रूप से प्रवेश करना सबसे बड़ी समस्या है। सीमा से अवैध रूप से प्रवेश, घुसपैठ, और राष्ट्रविरोधी गतिविधियों को रोकने के लिये सरकार ने दो चरणों में सीमा पर सड़कों के निर्माण और बाड़ लगाने के काम को मंजूरी दी है। भारत-बांग्लादेश की सीमा पर बाड़ लगाने की जो मंजूरी दी गई है, उसकी लम्बाई 3436.56 किलोमीटर है, जिसमें से 2712.81 कि.मी. में बाड़ लगाई जा चुकी है। शेष बची 725 किलोमीटर की सीमा पर बाड़ लगाने का काम जारी है। इस सीमा पर नदियों, निचले इलाकों, सीमा रेखा से 150 गज की दूरी तक आबादी बसी होने और भूमि अधिग्रहण के लम्बित मुकदमों के कारण कुछ क्षेत्रों में बाड़ लगाने में समस्याओं का सामना करना पड़ा है। इससे परियोजना के पूरे होने में देरी हुई है। यूं तो परियोजना के पूर्ण होने की अंतिम तिथि मार्च 2010 निर्धारित है, परन्तु जमीनी समस्याओं के कारण इसमें कुछ समय और लग सकता है।

सीमा पर बाड़ लगाने के अलावा 3330.32 कि.मी. लम्बी सीमावर्ती सड़कों का निर्माण भी किया जा चुकी है जबकि स्वीकृत लम्बाई 4326.24 कि.मी. की है।

पहले चरण के अन्तर्गत पश्चिम बंगाल, असम और मेघालय की सीमा पर बाड़ लगाने का जो काम किया गया था, उसका काफी बड़ा हिस्सा जलवायु जनित विपरीत परिस्थितियों के कारण नष्ट हो चुका है। सरकार ने, पहले चरण में निर्मित कार्य के स्थान पर समूचे 861 कि.मी. में, नए सिरे से बाड़ लगाने के लिये तीसरे चरण के तहत 884 करोड़ रुपये की मंजूरी दी है। यह कार्य केन्द्रीय लोक निर्माण विभाग, राष्ट्रीय भवन निर्माण निगम और राष्ट्रीय परियोजना निर्माण निगम को सौंपा गया है। अब तक 494 कि.मी. की लम्बाई में बाड़ दोबारा लगाई जा चुकी है। पूरी परियोजना मार्च 2010 तक पूरी हो जाने की आशा है।

तीव्र प्रकाश

सरकार ने बांग्लादेश की सीमा से लगे 2840 कि.मी. लम्बे क्षेत्र में तीव्र प्रकाश (पूर-प्रकाशतेज रोशनी) की व्यवस्था करने का निर्णय लिया है। पश्चिम बंगाल, मेघालय, असम, मिज़ोरम और त्रिपुरा से लगी सीमा पर कुल 1327 करोड़ रुपये की लागत से तीव्र प्रकाश (पऊलड लाइटिंग) की व्यवस्था की जाएगी। इसमें से मार्गदर्शी परियोजना के रूप में पश्चिम बंगाल में 277 कि.मी. की लम्बाई में तीव्र प्रकाश का प्रबंध पूरा हो गया है। जनवरी 2010 में 50 कि.मी. की लम्बाई वाले इलाके में खम्बे गाड़े जा चुके थे और 30 कि.मी. में केबल (तार) डाले जा चुके थे। यह कार्य केन्द्रीय लोक निर्माण विभाग, इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट इंडिया लिमिटेड और राष्ट्रीय परियोजना निर्माण निगम को सौंपा गया है। कार्य 2011-12 तक पूर्ण हो जाने की संभावना है।

भारत-पाकिस्तान सीमा पर बाड़ और तीव्र प्रकाश

भारत और पाकिस्तान की जमीनी सरहद की लम्बाई 3323 कि.मी. है। इसमें जम्मू-कश्मीर राज्य की नियंत्रण रेखा भी शामिल है। यह सीमारेखा गुजरात, राजस्थान, पंजाब और जम्मू-कश्मीर राज्यों से होकर गुजरती है। भारत-पाकिस्तान सीमा का क्षेत्र विविधताओं से भरा है जिसकी भौगोलिक विशेषतायें स्पष्टतया भिन्न हैं। इस सीमा से आतंकवादियों द्वारा घुसपैठ और हथियारों तथा प्रतिबंधित वस्तुओं की तस्करी के प्रयास होते रहते हैं। ज्यादातर प्रयास नियंत्रण रेखा से होते हैं। भारत-पाक सीमा के चिन्हित 2043.63 कि.मी. लम्बाई वाले क्षेत्र में से 1915.72 कि.मी. लम्बे भाग पर तीव्र प्रकाश का कार्य पूरा हो गया है। कुल 2009.52 कि.मी. की लम्बाई वाली सीमा पर तीव्र प्रकाश की व्यवस्था की जानी है। समूचे पंजाब क्षेत्र में 462.45 कि.मी लम्बाई में बाड़ और तीव्र प्रकाश की व्यवस्था की जानी है, जिसमें  से 460.72 कि.मी. में काम पूरा हो गया है। केवल कुछ दरियाई इलाकों में ही काम नहीं हो पाया है। राजस्थान क्षेत्र में भी 1048.27 कि.मी. में बाड़ लगाई जा चुकी है, जबकि 1022.80 कि.मी. तीव्र प्रकाश का काम पूरा कर लिया गया है। केवल कुछ रेतीले और परिवर्तनशील इलाके में काम पूरा नहीं हो सका है। जम्मू क्षेत्र में, 186 कि.मी. लम्बे भाग पर बाड़ लगाने का कार्य पूरा हो चुका है। इसके अलावा 176.40 कि.मी. लम्बे सरहद पर तेज रोशनी की व्यवस्था की जा चुकी है। गुजरात क्षेत्र में सरकार ने बाड़ लगाने, तीव्र प्रकाश और सीमासंपर्क सड़कों तथा सीमा सुरक्षा बल के लिये चौकियों के  निर्माण हेतु एक व्यापक प्रस्ताव का अनुमोदन कर दिया है। इस क्षेत्र में स्वीकृत 340 कि.मी. के विभिन्न कार्यों में से 219 कि.मी. में बाड़ लगाई जा चुकी है, 202 कि.मी. में तीव्र प्रकाश की व्यवस्था की जा चुकी है और 241 कि.मी. सीमावर्ती सड़कों का निर्माण हो चुका है।

संशोधित लागत

सरकार ने बाड़ लगाने और तीव्र प्रकाश परियोजना को पूरा करने की समय सीमा बढा दी है और लागत राशि को संशोधित कर 1201 करोड़ रुपये कर दिया है। पहले कुल 380 करोड़ रुपये की स्वीकृति दी गई थी। परियोजना को मार्च 2012 तक पूरा करने का लक्ष्य है।

जम्मू की अन्तर्राष्ट्रीय सीमा पर लगाई गई 38.01 कि.मी. लम्बी बाड़ और पंजाब क्षेत्र की सीमा पर 23.38 कि.मी. की लम्बाई में की गई तीव्र प्रकाश की व्यवस्था को वहां से हटाने का फैसला किया गया है ताकि इन सरहदी  क्षेत्रों में रह रहे लोग बिना किसी समस्या के अपनी जमीन पर खेती कर सकें। वर्तमान में, जमीन के समतलीकरण, अवरोध खड़े करने और कंटीले तार लगाने का काम प्रगति पर है।

आशा है कि पाकिस्तान और बांग्लादेश की सीमाओं पर बाड़ लगाने और तीव्र प्रकाश की व्यवस्था पूरी हो जाने पर सीमा पर प्रभावी ढंग से चौकसी रखी जा सकेगी। इससे सीमा पार से अवैध रूप से आने-जाने,घुसपैठ और अन्य अपराधों को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकेगा।

###

#निदेशक (मी.एवं सं.) पत्र सूचना कार्यालय, नई दिल्ली

૧૭.
पंचायतों का सशक्तीकरण

पंचायती राज संस्थायें भारत में लोकतंत्र की मेरूदंड है। निर्वाचित स्थानीय निकायों के लिए विकेन्द्रीकृत, सहभागीय और समग्र नियोजन प्रक्रिया को बढावा देने और उन्हें सार्थक रूप प्रदान करने के लिए पंचायती राज मंत्रालय ने अनेक कदम उठाए हैं।

पिछड़ा क्षेत्र अनुदान कोष (बीआरजीएफ)

इस योजना के तहत अनुदान प्राप्त करने की अनिवार्य शर्त विकेन्द्रीकृत, सहभागीय और समग्र नियोजन प्रक्रिया को बढावा देना है। यह विकास के अन्तर को पाटता है और पंचायती राज संस्थाओं (पीआरआई) और उसके पदाधिकारियों की क्षमताओं का विकास करता है। हाल ही में  हुए एक अध्ययन से पता चला है कि स्थानीय आवश्यकताओं को पूरा करने में बीआरजीएफ अत्यधिक उपयोगी साबित हुआ है और पीआरआई’ज तथा राज्यों ने योजना तैयार करने एवं उन पर अमल करने का अच्छा अनुभव प्राप्त कर लिया है। बीआरजीएफ के वर्ष 2009-10 के कुल 4670 करोड़ रुपए के योजना परिव्यय में से 31 दिसबर, 2009 तक 3240 करोड़ रुपए जारी किये जा चुके हैं।

ई-गवर्नेंस परियोजना

एनईजीपी के अन्तर्गत ईपीआरआई की पहचान मिशन पध्दति की परियोजनाओं के ही एक अंग के रूप में की गई है। इसके तहत विकेन्द्रीकृत डाटाबेस एवं नियोजन, पीआरआई बजट निर्माण एवं लेखाकर्म, केन्द्रीय और राज्य क्षेत्र की योजनाओं का क्रियान्वयन एवं निगरानी, नागरिक-केन्द्रित विशिष्ट  सेवायें, पंचायतों और व्यक्तियों को अनन्य कोड (पहचान संख्या), निर्वाचित प्रतिधिनियों और सरकारी पदाधिकारियों को ऑन लाइन स्वयं पठन माध्यम जैसे आईटी से जुड़ी सेवाओं की सम्पूर्ण रेंज प्रदान करने का प्रस्ताव है। ईपीआरआई में आधुनिकता और कार्य कुशलता के प्रतीक के रूप में पीआरआई में क्रान्तिकारी परिवर्तन लाने और व्यापक आईसीटी (सूचना संचार प्रविधि) संस्कृति को प्रेरित करने की क्षमता है।

ईपीआरआई में सभी 2.36 लाख पंचायतों को तीन वर्ष के लिए  4500 करोड़ रुपए के अनन्तिम लागत से कम्प्यूटरिंग सुविधाएं मय कनेक्टिविटी (सम्पर्क सुविधाओं सहित) के प्रदान करने की योजना है। चूंकि पंचायतें, केन्द्र  राज्यों के कार्यक्रमों की  योजना तैयार करने तथा उनके  क्रियान्वयन की बुनियादी इकाइयां होती हैं, ईपीआरआई, एक प्रकार से, एमएमपी की छत्रछाया के रूप में काम करेगा। अत: सरकार, ईएनईजीपी के अन्तर्गत ईपीआरआई को उच्च प्राथमिकता देगी।  देश के प्राय: सभी राज्यों (27 राज्यों) की सूचना और सेवा आवश्यकताओं का आकलन, व्यापार प्रक्रिया अभियांत्रिकी और विस्तृत बजट रिपोर्ट पहले ही तैयार की जा चुकी हैं और परियोजना पर अब काम शुरू होने को ही है।

महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण

राष्ट्रपति ने 4 जून, 2009 को संसद में अपने अभिभाषण में कहा था कि वर्ग, जाति और लिंग के आधार पर अनेक प्रकार की वर्जनाओं से पीड़ित महिलाओं को पंचायतों में 50 प्रतिशत आरक्षण के फैसले से अधिक महिलाओं को सार्वजनिक क्षेत्र में प्रवेश का अवसर प्राप्त होगा।  तद्नुसार मंत्रिमंडल ने 27 अगस्त, 2009 को संविधान की धारा 243 घ को संशोधित करने के प्रस्ताव का अनुमोदन कर दिया ताकि पंचायत के तीनों स्तर की सीटों और अध्यक्षों के 50 प्रतिशत पद महिलाओं के लिए आरक्षित किये जा सकें। पंचायती राज मंत्री ने 26 नवम्बर, 2009 को लोकसभा में संविधान (एक सौ दसवां) सशोधन विधेयक, 2009 पेश किया।

वर्तमान में, लगभग 28.18 लाख  निर्वाचित पंचायत प्रतिनिधियों में से 36.87 प्रतिशत महिलायें हैं। प्रस्तावित संविधान संशोधन के बाद निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों की संख्या 14 लाख से भी अधिक हो जाने की आशा है।

पंचायती राज संस्थाओं को कार्यों, वित्त और पदाधिकारियों का हस्तान्तरण

पंचायतें जमीनी स्तर की लोकतांत्रिक संस्थायें हैं और कार्यों, वित्त तथा पदाधिकारियों के प्रभावी हस्तांतरण से उन्हें और अधिक सशक्त बनाए जाने की आवश्यकता है। इससे पंचायतों द्वारा समग्र योजना बनाई जा सकेगी और संसाधनों को एक साथ जुटाकर तमाम योजनाओं को एक ही बिन्दु से क्रियान्वित किया जा सकेगा।

ग्राम सभा का वर्ष

पंचायती राज के  50 वर्ष पूरे होने पर 2 अक्तूबर, 2009 को समारोह का आयोजन किया गया। स्वशासन में ग्राम सभाओं और ग्राम पंचायतों में पारदर्शिता और उत्तरदायित्व के महत्व को देखते हुए 2 अक्तूबर, 2009 से 2 अक्तूबर, 2010 तक की अवधि को ग्राम सभा वर्ष के रूप में मनाया जाएगा। ग्राम सभाओं की कार्य प्रणाली में प्रभाविकता सुनिश्चित करने के सभी संभव प्रयासों के अतिरिक्त, निम्नलिखित कदम उठाए जा रहे हैं–पंचायतों, विशेषत: ग्राम सभाओं के सशक्तीकरण के लिए आवश्यक नीतिगत, वैधानिक और कार्यक्रम परिवर्तन, पंचायतों में अधिक कार्य कुशलता, पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने हेतु सुव्यवस्थित प्रणालियों और प्रक्रियाओं को और ग्राम सभाओं तथा पंचायतों की विशिष्ट गतिविधियों को आकार देना और ग्राम सभाओं तथा पंचायतों की विशिष्ट गतिविधियों के बारे में जन-जागृति फैलाना।

न्याय पंचायत विधेयक, 2010

वर्तमान न्याय प्रणाली, व्ययसाध्य, लम्बी चलने वाली  प्रक्रियाओं से लदी हुई, तकनीकी और मुश्किल से समझ में आने वाली है, जिससे निर्धन लोग अपनी शिकायतों के निवारण के लिए कानूनी प्रक्रिया का सहारा नहीं ले पाते। इस प्रकार की दिक्कतों को दूर करने के लिए मंत्रालय ने न्याय पंचायत विधेयक लाने का प्रस्ताव किया है। प्रस्तावित न्याय पंचायतें न्याय की अधिक जनोन्मुखी और सहभागीय प्रणाली सुनिश्चित करेंगी, जिनमें मध्यस्थता, मेल-मिलाप और समझौते की अधिक गुंजाइश होगी। भौगोलिक और मनोवैज्ञानिक रूप से लोगों के अधिक नजदीक होने के कारण न्याय पंचायतें एक आदर्श मंच संस्थायें साबित होंगी, जिससे दोनों पक्षों और गवाहों के समय की बचत होनी, परेशानियां कम होंगी और खर्च भी कम होगा। इससे न्यायपालिका पर काम का बोझ भी कम होगा।

पंचायत महिलाशक्ति अभियान

यह निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों (ईडब्ल्यूआर) के आत्मविश्वास और क्षमता को बढाने की योजना है ताकि वे उन संस्थागत, समाज संबंधी और राजनीतिक दबावों से ऊपर उठकर काम कर सकें, जो उन्हें ग्रामीण स्थानीय स्वशासन में सक्रियता से भाग लेने में रोकते हैं।  बाइस राज्यों में कोर (मुख्य) समितियां गठित की जा चुकी हैं और राज्य स्तरीय सम्मेलन हो चुके हैं। योजना के तहत 9 राज्य समर्थन केन्द्रों की स्थापना की जा चुकी है। ये राज्य हैं– आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, सिक्किम, केरल, पश्चिम बंगाल और अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह। योजना के तहत 11 राज्यों में प्रशिक्षण के महत्त्व के बारे में जागरूकता लाने के कार्यक्रम हो चुके हैं। ये राज्य हैं– आंध्र प्रदेश, अरूणाचल प्रदेश, छत्तीसगढ, ग़ोवा, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, मणिपुर, केरल, असम, सिक्किम और अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह।

संभागीय स्तर के 47 सम्मेलन 11 राज्यों (छत्तीसगढ, ग़ोवा, हरियाणा, आंध्र प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, सिक्किम, मणिपुर, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल और अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह) में आयोजित किए गए हैं। गोवा और सिक्किम में निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों और निर्वाचित युवा प्रतिनिधियों (ईडब्ल्यूआर्स ईवाईआर्स) के राज्य स्तरीय संघ गठित किये जा चुके हैं।

ग्रामीण व्यापार केन्द्र (आरबीएच) योजना

भारत में तेजी से हो रहे आर्थिक विकास को ग्रामीण क्षेत्रों में पंचायती राज संस्थाओं के माध्यम से पहुंचाने के लिए 2007 में आरबीएच योजना शुरू की गई थी।  आरबीएच, देश के ग्रामीण क्षेत्रों के लिए विकास का एक ऐसा सहभागीय  प्रादर्श है जो  फोर पी अर्थात पब्लिक प्राईवेट पंचायत पार्टनरशिप (सरकार, निजी क्षेत्र, पंचायत भागीदारी) के आधार पर निर्मित है। आरबीएच की इस पहल का उद्देश्य आजीविका के साधनों में वृध्दि के अलावा ग्रामीण गैर-कृषि आमदनी बढाक़र और ग्रामीण रोजगार को बढावा देकर ग्रामीण समृध्दि का संवर्धन करना है।

राज्य सरकारों के परामर्श से आरबीएच के अमल पर विशेष रूप से ध्यान केन्द्रित करने के लिए 35 जिलों का चयन किया गया है। संभावित आरबीएच की पहचान और उनके विकास के लिए पंचायतों की मदद के वास्ते गेटवे एजेन्सी के रूप में काम करने हेतु प्रतिष्ठित संगठनों की सेवाओं को सूचीबध्द किया गया है। आरबीएच की स्थापना के लिए 49 परियोजनाओं को वित्तीय सहायता दी जा चुकी है। भविष्य में उनका स्तर और ऊंचा उठाने के लिए आरबीएच का मूल्यांकन भी किया जा रहा है। (पसूका)

###

—————————————————————-

सुधीर तिवारी

૧૯.
महात्मा गांधी नरेगा : ग्रामीण निर्धनों के आर्थिक उत्थान की दिशा में एक कदम

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के आदर्शों को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम (नरेगा) का नाम परिवर्तित कर महात्मा गांधी नरेगा कर दिया गया है। यह अधिनियम ग्रामीण क्षेत्रों मेंे चालू वित्ता वर्ष के दौरान ग्रामीण परिवारों के काम करने के इच्छुक व्यक्तियों को कम से कम 100 दिन का अकुशल ढंग का रोज़गार मुहैया कराने की गारंटी प्रदान करता है। इस कार्यक्रम से 10 करोड़ 82 लाख से भी अधिक लोगों को लाभ पहुंचा है।

महात्मा गांधी नरेगा (एमजीएनआरईजीए) का आरंभ 2 फरवरी, 2006 को आंध्र प्रदेश के अनंतपुर जिलें से हुआ। इस दिन कुल मिलाकर 200 जिलों में इसे लागू किया गया। अब सरकार के मुख्य कार्यक्रम के तौर पर इसका विस्तार देश के सभी 616 ज़िलों में कर दिया गया है। मंत्रालय ने चालू वर्ष के दौरान 39,100 करोड़ रुपये खर्च करने का प्रस्ताव किया है जिसमें से दिसम्बर, 2009 तक 18,950 करोड़ रुपये खर्च कर लिये गये हैं और 160 करोड़ श्रमिक दिनों का रोज़गार सृजित कर दिया गया है। महात्मा गांधी नरेगा में वित्ताीय संस्थानों को भी शामिल किया गया है। रोज़गार प्राप्त करने वाले परिवारों को डाकघर या बैंक में अपना खाता खोलना पड़ता है। मंत्रालय ने सभी राज्यों को सलाह दी है कि वे खाते के ज़रिये ही रकम का भुगतान सुनिश्चित करें। अब तक 8 करोड़ 80 लाख खाते खोले गये हैं। इस कार्यक्रम का मुख्य लाभ समाज के कमज़ोर वर्गों तक पहुंचा है। इसके अंतर्गत 30 प्रतिशत अनुसूचित जाति, 21 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति तथा 50 प्रतिशत महिलाओं को लाभ पहुंचा है।

उपलब्धियां :-

जब से यह कार्यक्रम आरंभ किया गया तब से अब तक 640. 80 करोड़ श्रमिक दिनों का कार्य सृजित हुआ है।

वर्ष

कार्य व्यक्तिदिवस (करोड़ में)

रोज़गार मुहैया कराये गये परिवारों की संख्या (करोड़ में)

2006-07

90.50

2.10

2007-08

143.59

3.39

2008-09

214.56

4.50

2009-10 (13 जनवरी, 2010 तक)

192.35

4.16

कुल

640.80

14.15

सामाजिक समावेश :- अ.ज.#अ.ज.जा तथा महिलाएं-

वर्ष

अ.ज.

अ.ज.जा.

महिलाएं

2006-07

25 %

36 %

41 %

2007-08

27 %

29 %

43 %

2008-09

29.31 %

25.41 %

47.88 %

2009-10 (13 जनवरी, 2010 तक)

30.08 %

21.7 %

49.98 %

ग़रीबी पर प्रभाव :-

रोज़गार के अवसरों तथा मज़दूरी की दरों ने ग्रामीण क्षेत्रों में ग़रीबी कम करने में महत्तवपूर्ण भूमिका निभाई है। महात्मा गांधी नरेगा के क्रियान्वयन के बाद अनेक राज्यों में कृषि श्रमिकों की न्यूनतम मज़दूरी में बढ़ोत्तारी हुई है।

आय तथा क्रयशक्ति पर प्रभाव :-

ग्रामीण क्षेत्रों में मज़दूरी दरों तथा कार्य दिवसों में वृध्दि के कारण ग्रामीण परिवारों की आय में बढ़ोत्तारी हुई है। आय में वृध्दि के कारण ग्रामीण परिवारों की अनाज और आवश्यक वस्तुएं खरीदने तथा शिक्षा एवं स्वास्थ्य देखभाल प्राप्त करने की क्षमता में भी वृध्दि हुई है।

प्राकृतिक संसाधनों पर प्रभाव :-

सूखे तथा निर्जन क्षेत्राें में जलस्तर में बढ़ोत्तारी होने के कारण जल संरक्षण तथा सूखे से निपटने से संबंधित कार्यों को महात्मा गांधी नरेगा के तहत आरंभ किया गया है। दिसम्बर, 2009 तक इसके अंतर्गत 33.74 लाख कार्य किये गये हैं।

वित्ताीय समावेश :-

महात्मा गांधी नरेगा के श्रमिकों के लिए बैंकों तथा डाकघरों में आठ करोड़ से अधिक बचत खाते खोले गये हैं।

बीमा :-

जनश्री बीमा योजना तथा राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना को महात्मा गांधी नरेगा में भी शामिल कर लिया गया है।

नई पहलें :-

महात्मा गांधी नरेगा को मज़बूती देने के लिए ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज मंत्रालय ने अनेक नई पहलें आरंभ की हैं। ये पहलें विभिन्न हितधारकों से विचार-विमर्श करने के बाद ही आरंभ की गई हैं।

मज़दूरी के तौर पर 100 रु0 :-

वर्ष 2009-10 के बजट के दौरान वित्तामंत्री के भाषण में 100 रु0 मज़दूरी के तौर पर देने की घोषणा के बाद इसे लागू करने के लिए सरकार ने निम्नलिखित नीतियां अपनाने का निर्णय किया है :-

·        नरेगा के खंड 6(1) के तहत संशोधित मज़दूरी दर अधिकतम 100 रु0 तक होगी। जिन राज्यों में मज़दूरी की दर 100 रु0 से अधिक है वहां यह अतिरिक्त राशि राज्य सरकार को स्वयं अपनी ओर से देनी होगी।

·        01.01.2009 को अधिसूचित मज़दूरी दर सभी राज्यों के लिए एक समान होगी।

·        मज़दूरी की नई दरें 01.04.2009 से या जिस दिन से भुगतान किया जाए, जो भी बाद में हो, से लागू होंगी।

·        महात्मा गांधी नरेगा मज़दूरी के लिए अलग से एक सूचकांक तैयार किया जाएगा।

श्रमिकों के लिए बैंक#डाकघर खातों के ज़रिए मज़दूरी का भुगतान :-

महात्मा गांधी नरेगा के तहत श्रमिकों के लिए बैंक अथवा डाकघर खातों के ज़रिए मज़दूरी भुगतान अनिवार्य कर दिया गया है। अब तक आठ करोड़ से भी अधिक खाते खोल दिये गये है।

जिला स्तर पर लोकपाल :-

जिलास्तर पर लोकपाल के लिए राज्यों को दिशा-निर्देश जारी कर दिये गये हैं। लोकपाल की नियुक्ति चयन समिति की सिफारिशों के आधार पर राज्य सरकार द्वारा की जाएगी। लोकपाल समाज का प्रख्यात एवं जाना-माना ऐसा व्यक्ति होगा जो लोक प्रशासन, विधिक क्षेत्र, समाज कार्य तथा प्रबंधन के क्षेत्र में अनुभव रखता हो। यह लोकपाल महात्मा गांधी नरेगा श्रमिकों की शिकायतों या अन्य किसी मसले पर उठाई गई शिकायतों पर विचार करेगा और कानून के दायरे में उनका निपटान करेगा।

सामाजिक ऑडिट :-

ग्राम पंचायतों को निर्देश दिया गया है कि वे प्रत्येक छह महीने में एक बार सामाजिक ऑडिट करें। राष्ट्रपति द्वारा अपने भाषण में व्यक्त विचारों के अनुसार मंत्रालय ने जून 2009 से सितम्बर, 2009 तक एक अभियान की तरह सामाजिक ऑडिट करने के लिए सभी राज्यों को अधिसूचना जारी कर दी है।

दिसम्बर, 2009 के अंत तक देशभर में किये गये सामाजिक ऑडिटों की स्थिति :-

कुल जिले

जिन जिलों का ऑडिट हो गया है

ऑडिट जिलों का प्रतिशत

ग्राम पंचायतों की कुल संख्या

शामिल पंचायतों की संख्या

शामिल ग्राम पंचायतों का प्रतिशत

सामाजिक ऑडिटों की संख्या

619

568

92

2,49,366

1,88,211

76

2,18,624

राष्ट्रीय स्तर पर निगरानी (एनएलएम) :-

राष्ट्रीय स्तर पर निगरानी के लिए विभिन्न राज्यों में 32 एनएलएम लगाये गये है। ये मंत्रालय द्वारा चलाये जा रहे सामाजिक ऑडिट अभियान पर विशेष निगरानी रखने के लिए लगाये गये है।

ऑनलाइन निगरानी :-

सामाजिक आडिट की निगरानी वेबसाइट के माध्यम से भी रखी जा रही है। इसके लिए महत्तवपूर्ण सूचनाओं की जानकारी जैसे जॉब कार्ड, मज़दूरी भुगतान, कितने दिन रोजगार मुहैया कराया गया तथा मौजूदा जारी कार्य की सूचना आदि भी वेबसाइट के माध्यम से उपलब्ध कराई जाती है।

ख्याति प्राप्त नागरिकों के द्वारा निगरानी :-

ख्याति प्राप्त नागरिकों द्वारा स्वतंत्र रूप से निगरानी रखने के लिए राज्यों को दिशा-निर्देश जारी कर दिये गये हैं। योजना कीे प्रगति के बारे में रिपोर्ट देने के लिए 100 प्रख्यात नागरि निगरानीकर्ताओं का एक समूह तैयार किया जाएगा।

राज्य तथा जिलास्तर पर सतर्कता एवं निगरानी समितियां :-

महात्मा गांधी नरेगा सहित अन्य कार्यक्रमों के क्रियान्वयन की प्रभावी निगरानी के लिए सभी राज्यों# संघ शासित क्षेत्रों में राज्यस्तर और जिलास्तर पर सतर्कता एवं निगरानी समितियों का पुनर्गठन किया गया है।

शिकायतों के लिए राष्ट्रीय हैल्पलाईन :-

अधिनियम के तहत प्रदत्ता हकों तथा अधिकारों की रक्षा के लिए मंत्रालय ने शिकायत दर्ज कराने तथा जानकारी हासिल करने के लिए एक राष्ट्रीय हैल्पलाईन आरंभ की है जिसका नं0 1800110707 है। यह सी.टी. सक्षम है और इसे राज्य एवं जिलास्तर पर हैल्पलाईन से जोड़ा गया है।

भारतीय अनन्य पहचान विकास प्राधिकरण के साथ भागीदारी :-

महात्मा गांधी नरेगा भारतीय अनन्य पहचान विकास प्राधिकरण के साथ भागीदारी करेगा। अनन्य पहचान होने पर यह फर्जी जॉब कार्ड तथा झूठे लाभार्थियों को तो समाप्त करेगा ही साथ ही यह खाता खोलने की प्रक्रिया को सुविधाजनक बनायेगा तथा लाभार्थियों की आवाजाही पर निगाह रखेगा और एक बेहतर निगरानी भी व्यवस्था सुनिश्चित करेगा।

कार्यक्षेत्र को व्यापक बनाना :-

·        राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम-2005 की अनुसूची के पैरा-1 के उप-पैरा (iv) में 22 जुलाई, 2009 को संशोधन किया गया है। इसमें अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति या बीपीएल परिवारों से संबंधित भूमिधारकों की, या भूमि-सुधारों से लाभान्वित परिवारों की, या भारत सरकार इंदिरा आवास योजना के लाभार्थियों या कृषि ऋण माफी तथा ऋण राहत योजना-2008 में परिभाषित छोटे या सीमांत किसानों से संबंधित भूमि पर बाग़वानी, भूमि विकास सुविधाएं तथा सिंचाई सुविधाएं मुहैया कराने के लिए प्रावधान किया गया है।

·        इस अधिनियम के तहत कार्यों को मंजूरी प्रदान करने से पहले ग्राम पंचायतों को निर्देश दिये गये हैं कि वे अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति या बीपीएल परिवारों से संबंधित भूमि पर कार्य के लिए प्राथमिकता सुनिश्चित करें। छोटे एवं सीमांत किसानों के पास कुल भूमि का 80 प्रतिशत भाग मौजूद है, किंतु वे सभी कृषि भूमि के लगभग 40 प्रतिशत में ही खेती करते हैं। छोटे  और सीमांत किसानों की भूमि सभी कृषि क्षेत्र के 40 प्रतिशत भाग को निजी कार्यों की अनुमति के दायरे में शामिल किया गया है। 1420 लाख हेक्टेयर उपजाऊ भूमि में से 570 लाख हेक्टेयर भूमि को महात्मा गांधी नरेगा में शामिल किया जाएगा।

·        राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम-2005 की अनुसूची-1 के पैरा-1(जी) के तहत महात्मा गांधी नरेगा के अधीन कार्यों का विस्तार ग्राम पंचायत तथा ब्लॉक स्तर पर भारत निर्माण राजीव गांधी सेवा केंद्र (बीएनआरजीएसके) के निर्माण तक कर दिया गया है।

नक्सल प्रभावित राज्यों में महात्मा गांधी नरेगा के तहत कार्य :-

केंद्र सरकार ने नक्सल प्रभावी राज्यों, आंध्रप्रदेश, बिहार, छत्ताीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा और उत्तार प्रदेश, में महात्मा गांधी नरेगा के कार्यों को प्रभावी ढ़ंग से लागू करने के लिए 27 अक्तूबर, 2009 को दिशा-निर्देश जारी किये हैं। राज्यों को निर्देश दिये गये है कि वे ग्रामीण लोगों में, जॉब कार्ड जारी करने, पर्याप्त  संख्या में कार्यों को लागू करने और समय पर मज़दूरी के भुगतान के बारे में जागरूकता अभियान में तेज़ी लायें।

श्रमिकों को समय पर मज़दूरी भुगतान सुनिश्चित करने के लिए राजस्थान में सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया की सहायता से व्यापार पत्राचार को स्वीकार किया गया है।

समावेश :-

महात्मा गांधी नरेगा को विभिन्न योजनाओें तथा विशेष कार्यक्रमों में समाहित करने के लिए ग्रामीण विकास मंत्रालय ने विस्तृत दिशा-निर्देश तैयार किये हैं। 23 राज्यों के 115 जिलों में समावेश के लिए उन्हें शीर्ष जिले के तौर पर अपनाया गया है और मंत्रालय ने स्वतंत्र संगठनों का गठन किया है। राष्ट्रीय ग्रामीण विकास संस्थान (एनआईआरडी) इन समाहित परियोजनाओं की निगरानी कर रहा है।

महात्मा गांधी नरेगा के तहत आरंभ की नई पहलों को ग्रामीण ग़रीबों की आकांक्षाओं को पूरा करने के अतिरिक्त पारदर्शिता एवं जिम्मेदारी सुनिश्चित करने के लिए अभी काफी लंबा रास्ता तय करना है ताकि सरकार के मुख्य कार्यक्रमों के लाभ देशभर के लाखों ग़रीबों तक पहुंच सकें और नीतियों के निर्माण की प्रक्रिया में यह ग़रीबी को समाप्त करने में एक प्रभावी हथियार और उपकरण बन सके। (पसूका फीचर)

——————————————-

૨૦.
मरुभूमि राष्ट्रीय उद्यान – विविध वन्यजीवन

राजस्थान के जैसलमेर जिले के थार मरुस्थल में अवस्थित मरुभूमि राष्ट्रीय उद्यान न केवल राज्य का सबसे बड़ा उद्यान है बल्कि पूरे भारत में इसके बराबर का कोई राष्ट्रीय मरूउद्यान नहीं है । उद्यान का कुल क्षेत्र 3162 वर्ग किलोमीटर है । उद्यान का काफी बड़ा भाग लुप्त हो चुके नमक की झीलों की तलहटी और कंटीली झाड़ियों से परिपूर्ण है । इसके साथ ही रेत के टीलों की भी बहुतायत है । उद्यान का 20 प्रतिशत भाग रेत के टीलों से सजा हुआ है । उद्यान का प्रमुख क्षेत्र खड़ी चट्टानों, नमक की छोटी-छोटी झीलों की तलहटियों, पक्के रेतीले टीलों और बंजर भूमि से अटा पड़ा है ।

थार की भंगुर पर्यावरणीय प्रणाली में अनेक प्रकार की अनूठी वनस्पतियों और पशुओं की प्रजातियों के साथ-साथ वन्यजीवों को पनाह मिली हुई है । मरुस्थलीय पर्यावरण प्रणाली का यह सर्वथा उपयुक्त उदाहरण है । इन कठिन परिस्थितियों में अनेक प्रकार के जीवों को फलते फूलते देखना अपने आप में एक सुखद आश्चर्य है । उद्यान की अद्भुत वनस्पतियों और पशुओं को देखने का सबसे उत्तम स्थान सुदाश्री वन चौकी है । भरतपुर पक्षी अभयारण्य के निकट स्थित होने के कारण यहां भी अनेक प्रकार के प्रवासी पक्षी आते रहते हैं । उद्यान में तीन प्रमुख झीलें हैं – राजबाग झील, मलिक तलाव झील और पदम तलाव । ये तीनों झीलें, इस राष्ट्रीय उद्यान  के निवासियों के प्रमुख जल स्रोत हैं ।

भंगुर पर्यावरणीय प्रणाली के बावजूद यहां अनेक प्रकार के पक्षी पाये जाते हैं । लुप्तप्राय ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (सोन चिरैया) इस उद्यान में अच्छी खासी संख्या में मौजूद हैं । यह क्षेत्र मरुस्थल के प्रवासी एवं स्थानीय पक्षियों का सुरक्षित आश्रयस्थल बना हुआ है । यहां उकाब, बाज़, चील , लंबे पांव और चोंच वाले अनेक प्रकार के शिकारी पक्षियों के अलावा गिध्दों का दीदार आसानी से हो जाता है । विविध रंगरूप, पंखों और पंजों की बनावट वाले चील, उकाब, बाज़ और गिध्द यहां पर्याप्त मात्रा में पाए जाते हैं । शाही मरु तीतर छोटे-छोटे तलाबों और झीलों के आसपास देखे जा सकते हैं । बटेर, मधुमक्खी- भक्षी, लवा (भरत पक्षी) और इस तरह की अनेक प्रजातियां यहां सर्वत्र देखी जा सकती हैं । जबकि लंबी गर्दन वाले सारस और बगुले जाड़ों में ही दिखाई देते हैं । नीली दुम वाले और हरे मधुभक्षी पक्षियों के अलावा अनेक प्रकार के सामान्य और दुर्लभ तीतर-बटेर पक्षीप्रेमियों के आकर्षण का केन्द्र बने हुए हैं । इस उद्यान में शीतकाल में अनेक प्रवासी पक्षी भी अपना बसेरा बनाते नज़र आते हैं ।

उद्यान की वनस्पतियों और पेड़-पौधों की प्रजातियों में धोक, रोंज, सलाई और ताड़ के वृक्ष प्रमुख हैं। वनस्पतियां बिखरी और छितरी हुई हैं । आक की झाड़ियों और सेवान घास से भरे छोटे-छोटे भूखंड भी यत्र-तत्र दिखाई देते हैं ।

मरुभूमि राष्ट्रीय उद्यान में पशुओं और पौधों के जीवाश्मों के ढेर लगे हैं । कहते हैं कि ये जीवाश्म 18 करोड़ वर्ष पुराने हैं । डायनासोर के 60 लाख वर्ष पुराने जीवाश्म भी इस क्षेत्र में पाए जाते हैं ।

मरुभूमि राष्ट्रीय उद्यान (डेज़र्ट नेशनल पार्क) के वन्यजीवों में ब्लैक बक (काला हिरण), चिंकारा, रेगिस्तानी लोमड़ी, बंगाल लोमड़ी, भारतीय भेड़िया, रेगिस्तानी बिल्ली, खरगोश आदि प्रमुख हैं । सांप भी यहां खूब पाए जाते हैं । अनेक प्रकार की छिपकलियां, गिरगिट , रूसेल वाइपर, करैत जैसे जहरीले सांपों की अन्य कई प्रजातियां भी यहां पाई जाती हैं ।

राजस्थान सरकार ने जैसलमेर जिले के इस उद्यान का 4 अगस्त, 1980 को जारी अपनी अधिसूचना क्रमांक एफ-3(1)(73) संशो. के जरिये इसे मरुभूमि राष्ट्रीय उद्यान अर्थात डेजर्ट नेशनल पार्क के रूप में अधिसूचित किया था । इससे पूर्व यह मरुभूमि वन्यजीव अभ्यारण्य के रूप में जाना जाता था । अपने पर्यावरणीय और वानस्पतिक, महत्व के कारण ही इसे राष्ट्रीय उद्यान का दर्जा प्रदान किया गया है ताकि उद्यान में रहने वाले वन्यजीवों और इस राष्ट्रीय उद्यान के पर्यावरण का संरक्षण , प्रचार और विकास  भलीभांति किया जा सके ।

૨૧.
बजट में कृषि 2010-11

समेकित विकास को बढ़ावा देने, ग्रामीण आमदनी में वृध्दि करने तथा खाद्य सुरक्षा को बनाये रखने के सरकार के संकल्प में कृषि क्षेत्र को मुख्य विषय बताते हुए वित्ता मंत्री श्री प्रणव मुखर्जी ने केन्द्रीय बजट 2010-11 में इस क्षेत्र के लिए केन्द्रीय योजना परिव्यय में लगभग 21.6 प्रतिशत की वृध्दि का प्रस्ताव किया है। कई वर्षों में इस क्षेत्र के लिए योजना आवंटन में यह सबसे बड़ा कदम है।

यह बजट उस चार सूत्री योजना को दर्शाता है जिससे कृषि उपज बढ़े तथा आपूर्ति क्षेत्र का दबाव का कम हो जिसने हाल के महीनों में खाद्य पदार्थों की कीमतों को आसमान पर पहुँचा दिया है। इसके अंतर्गत उन फायदों को और ठोस बनाना है जिन्हें पहले प्राप्त किया जा चुका है और उसके अलावा, हरित क्रांति के दायरे को भी बढ़ाने का प्रस्ताव है। बजट में कई वित्ताीय प्रोत्साहनों का प्रस्ताव किया गया है जिससे कृषि के संपोषण एवं खाद्य सामग्रियों के व्यापार में सुधार लाकर किसानों को मिलने वाले कीमतों और उपभोक्ताओं के द्वारा अदा की गई कीमतों के बड़े अंतर को कम करना है। कृषि उत्पादन को बढ़ाने के लिए इस क्षेत्र में आगे भी और तकनीकों के समावेश पर जोर दिया गया है। बजट में वर्ष 2010-11 के लिए कृषि एवं इससे संबंधित क्षेत्रों के लिए केन्द्रीय योजना परिव्यय के रूप में 12308 करोड़ रुपये तय किये गये हैं। यह वर्ष 2009-10 के संशोधित अनुमानित खर्च (आर ई) से 2185 करोड़ रुपये अधिाक है जो वर्ष 2010 में 10,123 करोड़ रुपये था अर्थात यह 21.58 फीसदी ज्यादा है। अतिरिक्त आवंटन का मुख्य भाग कृषि एवं सहकारी विभाग को दिया गया है। शेष भाग कृषि एवं सहकारी विभाग और पशुपालन, दुग्ध उत्पादन एवं मत्स्य पालन विभाग के द्वारा बांट लिया गया है।

कृषि एवं सहकारी विभाग का परिव्यय वर्ष 2009-10 (आर ई) के 7,018 करोड़ रुपये से बढ़ाकर वर्ष 2010-11 में 8,280 करोड़ रुपये कर दिया गया है। यह 1,262 करोड़ रुपये की बढ़ोतरी को दर्शाता है। इसी प्रकार, कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग को वर्ष 2010-11 में 2300 करोड़ रुपये का आवंटन हुआ है जो वर्ष 2009-10 (आर ई) के 1760 करोड़ रुपये के मुकाबले ज्यादा है, यानि 540 करोड़ रुपये की वृध्दि हुई है। पशुपालन, दुग्ध उत्पादन एवं मत्स्य पालन विभाग को वर्ष 2010-11 में 1300 करोड़ रुपये का आवंटन हुआ है जो वर्ष 2009-10 (आर ई) के 930 करोड़ रुपये के मुकाबले ज्यादा है, यानि 370 करोड़ रुपये की वृध्दि हुई है।

कृषि उत्पादन को बढ़ाने के लिए बजट में चार मूल तत्वों को योजनाबध्द किया गया है जैसे – कृषि उत्पादन में वृध्दि, कृषि उत्पादों की बर्बादी में कमी, किसानों को ऋण सहायता और खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र पर जोर देना।

पहले तत्व के अंतर्गत, देश के पूर्वी क्षेत्र में हरित क्रांति को बढ़ाते हुए कृषि उत्पादन में वृध्दि लाने का प्रस्ताव है क्योंकि पूर्वी क्षेत्र क़ो अभी तक हरित क्रांति से उतना फायदा नहीं हुआ है जितना कि कुछ पूर्वी-पश्चिमी और कुछ दक्षिणी राज्यों को हुआ है। इस उद्देश्य के लिए चिह्नित राज्य हैं बिहार, झारखण्ड, छत्ताीसगढ़, पूर्वी उत्तार प्रदेश, पश्चिम बंगाल और ओडीसा। इस प्रयास में ग्राम सभा एवं खेतिहर परिवारों को जोड़ कर इस दद्देश्य को हासिल करने का प्रस्ताव है। इस उद्देश्य के लिए 400 करोड़ रुपये अलग कर दिए गए हैं।

एक कदम आगे बढ़कर, बजट में भारतीय गणतंत्र का 60वां वर्ष मनाए जाने की योजना है जिसके लिए 60,000 दलहन एवं तिलहन गांव जो मुख्य रूप से वृष्टि छाया क्षेत्रों के हैं, उन्हें जोड़ना है। जिससे सम्मिलित कोशिश के जरिये दलहन एवं तिलहन की घरेलू आपूर्ति को बढ़ाया जा सके। राष्ट्रीय कृषि विकास योजना कार्यक्रम के एक भाग के रूप में तिलहन ग्राम पहल के अंतर्गत वर्षा जल संरक्षण, जल संभर प्रबंधन और मृदा स्वास्थ्य सुधार संबंधित कार्यक्रम आरंभ करने की योजना बनाई गई है। इन योजनाओं के लिए वर्ष 2010-11 में 300 करोड़ रुपये का परिव्यय तय किया गया है।

हरित क्रांति वाले क्षेत्रों में हासिल की गई उपलब्धियों को बनाए रखने के लिए, बजट में कृषि संरक्षण का प्रस्ताव है जिसमें मृदा स्वास्थ्य, जल संरक्षण एवं जैव विविधता परिरक्षण पर समान रूप से ध्यान देना है। इस जलवायु अनुरूप कृषि उपाय को शुरू करने के लिए 200 करोड़ रुपये की राशि का आवंटन किया गया है।

चार सूत्री योजना के दूसरे तत्व के भाग में बजट में मौजूदा खाद्य आपूर्ति श्रृंखला के संचालन के साथ ही भंडारों में बर्बादी को कम करने का प्रस्ताव है। प्रधानमंत्री, श्री मनमोहन सिंह के शब्दों में ”हमें बृहत प्रतिस्पर्धा की आवश्यकता है और इसलिए फुटकर व्यापार क्षेत्र को खोलने के लिए ठोस अवलोकन करने की आवश्यकता है।” वित्ता मंत्री ने कहा कि यह खेत की कीमत, थोक कीमतों एवं फुटकर कीमतों के बीच के अंतर को कम करने में काफी सहायक होगा।

उन्होंने ध्यान दिलाया कि भारतीय खाद्य निगम की भंडारण क्षमता की भारी कमी के कारण सार्वजनिक वितरण प्रणाली एवं अतिरिक्त भंडारण हेतु लिए गए अनाज की बर्बादी होती है। वित्ता मंत्री ने कहा कि भंडारण क्षमता की इस कमी को निजी क्षेत्र की सहभागिता से पूरा किया जा रहा है जिसमें एफ सी आई, निजी पार्टियों से, पांच वर्ष की गारंटी के आधार पर किराये पर गोदाम ले रहा है। अब इस अवधि को बढ़ाकर 7 वर्ष किया जा रहा है।इस योजना का तीसरा तत्व कृषि क्षेत्र को बेहतर संस्थागत ऋण सुविधा मुहैया कराने से संबंधित है। इसके लिए बजट में वर्ष 2009-10 के 3,25,000 करोड़ रुपये के मुकाबले वर्ष 2010-11 के लिए पूर्ण ऋण प्रवाह के लक्ष्य को बढ़ाकर 3,75,000 करोड़ रुपये किया गया है। क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक (आर आर बी) जो ग्रामीण लोगों की ऋण संबंधी जरूरतों को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं उन्हें पूंजी सहायता दी गयी है जिससे वे अपना कार्य पूरी क्षमतापूर्वक कर सकेंगे। इन बैंकों को आखिरी बार वर्ष 2006-07 में पूंजी दी गई थी।

ऐसे किसान जो हाल के सूखे के कारण समय पर ऋण का भुगतान नहीं कर पा रहे हैं उन्हें सहायता पहुँचाने के लिए, कृषि ऋणों के भुगतान की अवधि 31 दिसंबर 2009 से छह महीने बढ़ाकर 30 जून 2010 कर दी गयी है। इसके अलावा वर्ष 2010-11 के लिए कृषि ऋण के पुनर्भुगतान की सरकारी सहायता को एक फीसदी से बढ़ाकर 2 फीसदी कर दिया गया है। इस प्रकार ऐसे किसान जो अपने ऋण का भुगतान समय पर कर रहे हैं, उनके लिए प्रभावी ब्याज दर 5 फीसदी प्रति वर्ष होगा जो सामान्यतया 7 फीसदी प्रति वर्ष है।

इसके चौथे तत्व के रूप में कृषि विकास की रणनीति में खाद्य प्रसंस्करण को बढ़ावा देने की प्रक्रिया को शामिल किया गया है। बजट में 5 बड़े खाद्य पार्कों को स्थापित करने का प्रस्ताव है। इसके अतिरिक्त ऐसे 10 पार्क पहले ही बनाये जा चुके हैं जिनमें, खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र के लिए आधुनिकतम आधारभूत संरचना की सुविधा उपलब्ध होगी।

बजट में तीन मुख्य क्षेत्रों को चिह्नित किया गया है जिसपर विशेष ध्यान दिया जाएगा। ये क्षेत्र हैं – (अ) खराब होने वाले कृषि उत्पादों को खपत व प्रसंस्करण केन्द्रों पर अविलंब पहुँचाने के लिए मजबूत आपूर्ति श्रृंखला (ब) इन उत्पादों को गुणवत्ताा युक्त उत्पाद बनाने के लिए आधारभूत संरचना व तकनीक और (स) कृषि उत्पाद को बढ़ाने के लिए इसमें तकनीक का समावेश।

इन क्षेत्रों के लिए, बजट ने ‘परियोजना आयात स्थिति के अनुदान का प्रस्ताव रखा है जिसके साथ आयात शुल्क पर पांच फीसदी की रियायत मशीनी उपकरणों के लगाने एवं मंडियों में पैलेट रैकिंग उपकरण लगाने या अनाज व चीनी के लिए भंडार बनाने के लिए दी जाएगी। इसके साथ ही नये उपकरणों को स्थापित करने और शुरू करने पर सेवा कर पर पूर्ण छूट का भी प्रस्ताव है।

इसी प्रकार की रियायतें शीत भंडारणों, शीत कक्षों एवं कूलर स्थापित करने, कृषि या संबंधित उत्पादों के भंडारण करने पर दी जाएंगीे।

बजट में कई और कर रियायतें देने का भी प्रस्ताव है। पौधा रोपण क्षेत्र में, कुछ विशेष मशीनों के उपयोग पर आयात शुल्क में रियायत दी गई है। इसे वर्ष 2003 से जुलाई 2010 तक के लिए लागू किया गया। बाद में इसे मार्च 2011 तक बढ़ा दिया गया। ऐसा अनुमान है कि इससे इस क्षेत्र के मुख्य संचालनों के मशीनीकरण के उद्देश्य को पूरा करने के लिए समुचित समय मिलेगा। बजट में, वैसे कृषि उपकरण जो देश में नहीं बनाए जाते हैं उनपर आयात कर में 5 फीसदी रियायत देने का प्रस्ताव दिया गया है। कृषि में उपयोग किए जाने वाले ट्रेलर और सेमी ट्रेलर को उत्पाद शुल्क से पूर्णत: मुक्त रखा गया है। सेवा शुल्क के क्षेत्र में फसल बीज के जांच और प्रमाणीकरण के साथ ही सड़क मार्ग से तिेलहन एवं दलहन की ढुलाई पर भी पूर्णत: छूट दे दी गई है। रेल के द्वारा इन वस्तुओं की ढुलाई पर पहले से ही छूट लागू है।

उर्वरकों की पोषण आधारित सहायता नीति के बारे में, ज़िसका एक अप्रैल 2010 से प्रभाव में आना सुनिश्चित है, के बारे में वित्ता मंत्री ने कहा कि यह नए सुरक्षित उत्पादों के माध्यम से संतुलित निषेचन (फर्टीलाइजेशन) को बढ़ावा देगा और उर्वरक उद्योग की विस्तार सेवाओं पर गौर करेगा। यह बदले में, कृषि उत्पादन को बढ़ाएगा और इससे किसानों को ज्यादा फायदा मिलेगा। वित्ता मंत्री ने कहा कि ऐसा अनुमान है कि समय के साथ यह नीति राजसहायता विधेयक को नियंत्रित करने के अतिरिक्त उर्वरक राजसहायता की मांग के उतार चढ़ाव में कमी लाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि ” नई व्यवस्था, राजसहायता को सीधा किसानों तक पहुंचाने का काम करेगी।”

वित्ता मंत्री ने आश्वस्त किया कि सरकार यह देखेगी कि उर्वरकों की खुदरा कीमतें संक्रमण वर्ष यानी कि 2010-11 के वर्तमान स्तर के आस-पास रहें और राज सहायता प्रणाली को उत्पाद आधारित से हटाकर पोषण-आधारित बनाया जाये ।

इस प्रकार के पहले प्रयास में महिला किसानों के सशक्तिकरण के उद्देश्य के लिए जिनकी संख्या लगातार बढ़ रही है, बजट में ‘महिला किसान सशक्तिकरण परियोजना की शुरुआत की गई है। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के एक उपघटक के रूप में इस पहल के लिए 100 करोड़ रुपये का परिव्यय अलग रखा गया है।

૨૨.
उपभोक्ता अधिकार एवं शिकायत निवारण प्रणाली

वैश्वीकरण एवं भारतीय बाजार को विदेशी कंपनियों के लिए खोले जाने के कारण आज भारतीय उपभोक्ताओं की कई ब्रांडों तक पहुंच कायम हो गयी है। हर उद्योग में, चाहे वह त्वरित इस्तेमाल होने वाली उपभोक्ता वस्तु (एफएमसीजी) हो या अधिक दिनों तक चलने वाले सामान हों या फिर सेवा क्षेत्र हो, उपभोक्ताओं की जरूरतों को पूरा करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर 20 से अधिक ब्रांड हैं। पर्याप्त उपलब्धता की यह स्थिति उपभोक्ता को विविध प्रकार की वस्तुओं एवं सेवाओं में से कोई एक चुनने का अवसर प्रदान करती है। लेकिन सवाल यह है कि क्या उपभोक्ता को उसकी धनराशि की कीमत मिल रही है? आज के परिदृश्य में उपभोक्ता संरक्षण क्यों जरूरी हो गया है? क्या खरीददार को जागरूक बनाएं की अवधारणा अब भी कायम है या फिर हम उपभोक्ता संप्रुभता की ओर आगे बढ रहे हैं।

उपभोक्ता कल्याण की महत्ता

उपभोक्तावाद, बाजार में उपभोक्ता का महत्व और  उपभोक्ताओं के बीच जागरूकता भारत में उपभोक्ता मामले के विकास में कुछ मील के पत्थर हैं। दरअसल किसी भी देश की अर्थव्यवस्था उसके बाजार के चारों ओर घूमती है। जब यह विक्रेता का बाजार होता है तो उपभोक्ताओं का   अधिकतम शोषण होता है। जब तक क्रेता और विक्रेता बड़ी संख्या में होते हैं तब उपभोक्ताओं के पास कई विकल्प होते हैं। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 बनने से पहले तक भारत में विक्रेता बाजार था। इस प्रकार वर्ष 1986 एक ऐतिहासिक वर्ष था क्योंकि उसके बाद से उपभोक्ता संरक्षण  भारत में गति पकड़ने लगा था।

1991 में अर्थव्यवस्था के उदारीकरण ने भारतीय उपभोक्ताओं को प्रतिस्पर्धी कीमतों पर गुणवत्तापूर्ण उत्पाद पाने का अवसर प्रदान किया। उसके पहले सरकार ने हमारे अपने उद्योग जगत को सुरक्षा प्रदान करने के लिए विदेशी प्रतिस्पर्धा पर रोक लगा दी थी।  इससे ऐसी स्थिति पैदा हुई जहां उपभोक्ता को बहुत कम विकल्प मिल रहे थे और गुणवत्ता की दृष्टि से भी हमारे उत्पाद बहुत ही घटिया थे। एक कार खरीदने के लिए बहुत पहले बुकिंग करनी पड़ती थी और केवल दो ब्रांड उपलब्ध थे। किसी को भी उपभोक्ता के हितों की परवाह नहीं थी और हमारे उद्योग को संरक्षण देने का ही रुख था।

इस प्रकार इस कानून के जरिए उपभोक्ता संतुष्टि और उपभोक्ता संरक्षण को मान्यता मिली। उपभोक्ता को सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक प्रणाली का अपरिहार्य हिस्सा समझा जाने लगा, जहां दो पक्षों यानि क्रेता और विक्रेता के बीच विनिमय का तीसरे पक्ष यानी कि समाज पर असर होता है। हालांकि बड़े पैमाने पर होने वाले उत्पादन एवं बिक्री में लाभ की स्वभाविक मंशा कई विनिर्माताओं एवं डीलरों को उपभोक्ताओं का शोषण करने का अवसर भी प्रदान करती है। खराब सामान, सेवाओं में कमी, जाली और नकली ब्रांड, गुमराह करने वाले विज्ञापन जैसी बातें आम हो गयीं हैं और  भोले-भाले उपभोक्ता अक्सर इनके शिकार बन जाते हैं।

संक्षिप्त इतिहास

9 अप्रैल, 1985 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने उपभोक्ता संरक्षण के लिए कुछ दिशानिर्देशों को अपनाते हुए एक प्रस्ताव पारित किया था और संयुक्त राष्ट्र के महासचिव को सदस्य देशों खासकर विकासशील देशों को उपभोक्ताओं के हितों के बेहतर संरक्षण के लिए नीतिंयां और कानून अपनाने के लिए राजी करने का जिम्मा सौंपा था। उपभोक्ता आज अपने पैसे की कीमत चाहता है। वह चाहता है कि उत्पाद या सेवा ऐसी हो जो तर्कसंगत उम्मीदों पर खरी उतरे और इस्तेमाल में सुरक्षित हो। वह संबंधित उत्पाद की खासियत को भी जानना चाहता है। इन आकांक्षाओं को उपभोक्ता अधिकार का नाम दिया गया। 15 मार्च को विश्व उपभोक्ता दिवस मनाया जाता है।

इस तारीख का ऐतिहासिक महत्व है क्योंकि  यह वही दिन है जब 1962 में अमेरिकी संसद कांग्रेस में उपभोक्ता अधिकार विधेयक पेश किया गया था। अपने भाषण में राष्ट्रपति जॉन एफ केनेडी ने कहा था, न्नन्न यदि उपभोक्ता को घटिया सामान दिया जाता है, यदि कीमतें बहुत अधिक है, यदि दवाएं असुरक्षित और बेकार हैं, यदि उपभोक्ता सूचना के आधार पर चुनने में असमर्थ है तो उसका डालर बर्बाद चला जाता है, उसकी सेहत और सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है और राष्ट्रीय हित का भी नुकसान होता है।  न्न

उपभोक्ता अंतर्राष्ट्रीय (सीआई),  जो पहले अंतर्राष्ट्रीय उपभोक्ता यूनियन संगठन (आईओसीयू) के नाम से जाना जाता था, ने अमेरिकी विधेयक में संलग्न उपभोक्ता अधिकार के घोषणापत्र के तत्वों को बढा क़र आठ कर दिया   जो इस प्रकार है- 1.मूल जरूरत 2.सुरक्षा, 3. सूचना, 4. विकल्पपसंद 5. अभ्यावेदन 6. निवारण 7. उपभोक्ता शिक्षण और 8. अच्छा माहौल। सीआई एक बहुत बड़ा संगठन है और इससे 100 से अधिक देशों के 240 संगठन जुड़े हुए हैं।

इस घोषणापत्र का सार्वभौमिक महत्व है क्योंकि यह गरीबों और सुविधाहीनों की आकांक्षाओं का प्रतीक है। इसके आधार पर संयुक्त राष्ट्र ने अप्रैल, 1985 को उपभोक्ता संरक्षण के लिए अपना दिशानिर्देश संबंधी एक प्रस्ताव पारित किया।

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम,1986

भारत ने इस प्रस्ताव के हस्ताक्षरकर्ता देश के तौर पर इसके दायित्व को पूरा करने के लिए उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 बनाया। संसद ने दिसंबर, 1986 को यह कानून बनाया जो 15 अप्रैल, 1987 से लागू हो गया। इस कानून का मुख्य उद्देश्य उपभोक्ताओं के हितों को बेहतर सुरक्षा प्रदान करना है। इसके तहत उपभोक्ता विवादों के निवारण के लिए उपभोक्ता परिषदों और अन्य प्राधिकरणों की स्थापना का प्रावधान है।

यह अधिनियम उपभोक्ताओं को अनुचित सौदों और शोषण के खिलाफ प्रभावी, जनोन्मुख और कुशल उपचार उपलब्ध कराता है। अधिनियम सभी सामानों और सेवाओं, चाहें वे निजी, सार्वजनिक या सहकारी क्षेत्र की हों, पर लागू होता है बशर्ते कि वह केंद्र सरकार द्वारा अधिकारिक गजट में विशेष अधिसूचना द्वारा  मुक्त न कर दिया गया हो। अधिनियम उपभोक्ताओं के लिये पहले से मौजूदा कानूनों में एक सुधार है क्योंकि यह क्षतिपूर्ति प्रकृति का है, जबकि अन्य कानून मूलत: दंडाधारित है  और उसे विशेष स्थितियों में राहत प्रदान करने लायक बनाया गया है। इस अधिनियम के तहत उपचार की सुविधा पहले से लागू अन्य कानूनों के अतिरिक्त है और वह अन्य कानूनों का उल्लंघन नहीं करता। अधिनियम उपभोक्ताओं के छह अधिकारों को कानूनी अमली जामा पहनाता है वे हैं- सुरक्षा का अधिकार, सूचना का अधिकार, चुनाव का अधिकार, अपनी बात कहने का अधिकार, शिकायत निवारण का अधिकार और उपभोक्ता शिक्षा का अधिकार। अधिनियम में उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा के लिए सलाहकार एवं न्याय निकायों के गठन का प्रावधान भी है। इसके सलाहकार स्वरूप के तहत केंद्र, राज्य और जिला स्तर पर उपभोक्ता सुरक्षा परिषद आते हैं।  परिषदों का गठन निजी-सार्वजनिक साझेदारी के आधार पर किया जाता है।  इन निकायों का उद्देश्य सरकार की उपभोक्ता संबंधी नीतियों की समीक्षा करना और उनमें सुधार के लिए उपाय सुझाना है।

अधिनियम में तीन स्तरों जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तरों पर जिला फोरम, राज्य उपभोक्ता शिकायत निवारण आयोग और राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग जैसे अर्ध्दन्यायिक निकाय मशीनरी का  भी प्रावधान है। फिलहाल देश में 621 जिला फोरम, 35 राज्य आयोग और एक राष्ट्रीय आयोग है। जिला फोरम उन मामलों में फैसले करता है जहां 20 लाख रूपए तक का दावा होता है। राज्य आयोग 20 लाख से ऊपर एक करोड़ रूपए तक के मामलों की सुनवाई करता है जबकि राष्ट्रीय आयोग एक करोड़ रूपए से अधिक की राशि के दावे वाले मामलों की सुनवाई करता है। ये निकाय अर्ध्द-न्यायिक होते हैं और प्राकृतिक न्याय के सिध्दांतों से संचालित होते हैं। उन्हें नोटिस के तीन महीनों के अंदर शिकायतों का निवारण करना होता है और इस अवधि के दौरान कोई जांच नहीं होती है जबकि यदि मामले की सुनवाई पांच महीने तक चलती है तो उसमें जांच भी की जाती है।

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 समेकित एवं प्रभावी तरीके से उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा और संवर्ध्दन से संबंधित सामाजिक-आर्थिक कानून है। अधिनियम उपभोक्ताओं के लिए विक्रेताओं, विनिर्माताओं और व्यापारियों द्वारा शोषण जैसे खराब सामान, सेवाओं में कमी, अनुचित व्यापारिक परिपाटी आदि के खिलाफ एक हथियार है। अपनी स्थापना से लेकर 01 जनवरी, 2010 तक राष्ट्रीय, राज्य और जिला स्तर की उपभोक्ता अदालतों में 33,30,237 मामले दर्ज हुए और 29,58,875 मामले निपटाए गए।

(डा कपूर उपभोक्ता क्लब की संयोजक हैं और दिल्ली विश्वविद्यालय के कमला नेहरू कालेंज में एसोसिएट प्रोफेसर हैं।)

૨૩.
वन और जैव विविधता

विश्व वानिकी दिवस एक अंतरराष्ट्रीय दिवस है और यह हर वर्ष 21 मार्च को मनाया जाता है। यह दुनियाभर में लोगों को वनों की महत्ता तथा उनसे मिलने वाले अन्य लाभों की याद दिलाने के लिए पिछले 30 वर्षों से मनाया जा रहा है।

विश्व वानिकी दिवस मनाने का विचार 1971 में यूरोपीय कृषि परिसंघ की 23 वीं महासभा में आया। वानिकी के तीन महत्वपूर्ण तत्वों- सुरक्षा, उत्पादन और वनविहार के बारे में लोगों को जानकारियां देने के लिए उसी साल बाद में 21 मार्च के दिन को यानि दक्षिणी गोलार्ध में शरद विषव और दक्षिण गोलार्ध में वसंत विषव के दिन  को चुना गया।

वन प्रागैतिहासिक काल से ही मानवजाति के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण रहा है। वन का मतलब केवल पेड़ नहीं है बल्कि यह एक संपूर्ण जटिल जीवंत समुदाय है। वन की छतरी के नीचे कई सारे पेड़ और जीवजंतु रहते हैं। वनभूमि बैक्ट्रेरिया, कवक जैसे कई प्रकार के अकशेरूकी जीवों के घर हैं। ये जीव भूमि और वन में पोषक तत्वों के पुनर्चक्रण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

वन पर्यावरण, लोगों और जंतुओं को कई प्रकार के लाभ पहुंचाते हैं। वन कई प्रकार के उत्पाद प्रदान करते हैं जैसे फर्नीचर, घरों, रेलवे स्लीपर, प्लाईवुड, ईंधन या फिर चारकोल एव कागज के लिए लकड़ी, सेलोफेन, प्लास्टिक, रेयान और नायलॉन आदि के लिए प्रस्संकृत उत्पाद, रबर के पेड़ से रबर आदि। फल, सुपारी और मसाले भी वनों से एकत्र किए जाते हैं। कर्पूर, सिनचोना जैसे कई औषधीय पौधे भी वनों में ही पाये जाते हैं।

पेड़ों की जड़ें मिट्टी को जकड़े रखती है और इस प्रकार वह भारी बारिश के दिनों में मृदा का अपरदन और बाढ भी रोकती हैं। पेड. कार्बन डाइ आक्साइड अवशोषित करते हैं और ऑक्सीजन छोड़ते हैं जिसकी मानवजाति को सांस लेने के लिए जरूरत पड़ती है। वनस्पति स्थानीय और वैश्विक जलवायु को प्रभावित करती है। पेड़ पृथ्वी के लिए सुरक्षा कवच का काम करते हैं और जंगली जंतुओं को आश्रय प्रदान करते हैं। वे सभी जीवों को सूरज की गर्मी से बचाते हैं और पृथ्वी के तापमान को नियंत्रित करते हैं। वन प्रकाश का परावर्तन घटाते हैं, ध्वनि को नियंत्रित करते हैं और हवा की दिशा को बदलने एवं गति को कम करने में मदद करते हैं। इसी प्रकार वन्यजीव भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि ये हमारी जीवनशैली के महत्वपूर्ण अंग हैं।

समय की मांग है कि वनों को बचाया जाए क्योंकि पेड़ों की अंधाधुंध कटाई से समस्याएं पैदा होती हैं। वनक्षेत्र घटकर 30 प्रतिशत रह गया है जबकि पहले 60 प्रतिशत पर ही इसके क्षरण का विरोध किया गया था। इस वर्ष विश्व वानिकी दिवस का ध्येय वाक्य वन एवं जैवविविधता रखा गया है। इस दिवस का उद्देश्य लोगों को यह सूचना देने का अवसर उपलब्ध कराना है कि कैसे वनों का रखरखाव और संपोषणीय रूप से उनका इस्तेमाल किया जाए।

वन जैव विविधता एक व्यापक शब्दावली है जो वन्यक्षेत्र में पाए जाने वाले सभी सजीवों और उनकी पारिस्थतिकीय भूमिका से संबध्द है। इसके तहत न केवल पेड़ आते हैं बल्कि विविध प्रकार के जंतु और सूक्ष्मजीव, जो वन्यक्षेत्र में रहते हैं और उनकी गुणसूत्रीय विविधता भी आती है। इसे पारिस्थितिकी तंत्र, भूदृश्य, प्रजाति, संख्या, आनुवांशिकी समेत विभिन्न स्तरों पर समझा जा सकता है। इन स्तरों के अंदर और इनके बीच जटिल अंत:क्रिया हो सकती है। जैव विविध वनों में यह जटिलता जीवों को लगातार बदलते पर्यावरणीय स्थितियों में अपने आप को ढालने में मदद करती है और पारिस्थितिकी तंत्र को सुचारू बनाती है।

पिछले 8000 वर्षों में पृथ्वी के मूल वनक्षेत्र का 45 प्रतिशत हिस्सा गायब हो गया। इस 45 प्रतिशत हिस्से में ज्यादातर हिस्सा पिछली शताब्दी में ही साफ किया गया। खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) ने हाल ही में अनुमान लगाया है कि हर वर्ष 1.3 करोड़ हेक्टेयर वन क्षेत्र कटाई की वजह से खत्म होता जाता है।  वर्ष 2000-2005 के बीच वनक्षेत्र की वार्षिक कुल क्षति 73 लाख हेक्टेयर रही है (जो विश्व के वन क्षेत्र के 0.18 फीसदी के बराबर है)।

पिछले वर्षों में शहतीर लगाना वनों के लिए महत्त्वपूर्ण कामकाज माना जाता था। हालांकि हाल के वर्षों में यह अवधारणा ज्यादा बहुप्रयोजन एवं संतुलित दृष्टकोण की ओर बदली है। अन्य वन्य प्रयोजनों और सेवाओं  जैसे वनविहार, स्वास्थ्य, कुशलता, जैवविविधता, पारिस्थतिकी तंत्र सेवाओं का प्रबंधन, जलवायु परिवर्तन का उपशमन अब वनों की महत्ता के अंग समझे जाने लगे हैं। इसे लगातार जटिल एवं अनोखे तत्व के रूप में मान्यता मिलती जा रही है।

जैव विविधता संधिपत्र(सीबीडी) में सीधे वन जैव विविधता के विस्तारित कार्यक्रम के जरिए वनों पर ध्यान दिया गया है। यह संधिपत्र 2002 में सीबीडी के सदस्य देशों की छठी बैठक में स्वीकार किया गया। वन कार्य कार्यक्रम में वन जैवविविधता के संरक्षण, उसके अवयवों का संपोषणी रूप से इस्तेमाल, वन आनुवांशिक संसाधन का न्यायोचित उपयोग आदि पर केंद्रित लक्ष्य और गतिविधियां शामिल हैं। जैव विविधता पर कार्यक्रम में कुछ महत्वपूर्ण तथ्य शामिल हैं, वे हैं- संरक्षण, संपोषणीय इस्तेमाल, लाभ साझेदारी, संस्थानात्मक एवं सामाजिक-आर्थिक रूप से उपयुक्त पर्यावरण और ज्ञान आकलन एवं निगरानी आदि।

उप निदेशक, पसूका, नई दिल्ली
૨૩.

भारत ने विश्व मौसम दिवस मनाया

-

शेष विश्व की तरह भारत खासकर देश के मौसमविज्ञानी भी 23 मार्च, 2010 को विश्व मौसम दिवस मना रहे हैं। सन् 1950 में आज के दिन संयुक्त राष्ट्र की एक इकाई  के रूप में विश्व मौसम संगठन (डब्ल्यूएमओ) की स्थापना हुई थी और जिनेवा में इसका मुख्यालय खोला गया था। संगठन की स्थापना का उद्देश्य मानव के दुखदर्द को कम करना और संपोषणीय विकास को बढावा देना है। इस वर्ष विश्व मौसम दिवस का ध्येयवाक्य मानवजाति की सुरक्षा और कल्याण के लिए 60 वर्षों से सेवा में है।

पहले के विपरीत आज मौसम विज्ञान में केवल मौसम संबंधी विधा शामिल नहीं है बल्कि इसमें पूरा भू-विज्ञान है। इसका इस्तेमाल बाढ, सूखा और भूकंप जैसे प्राकृतिक आपदा का अनुमान लगाने के लिए किया जा रहा है। इसका उपयोग नाविकों, समुद्री जहाजों और उन लोगों द्वारा भी किया जा रहा है जो सड़क एवं विमान यातायात का प्रबंधन संभालते हैं। ये सारी बातें मौसम पर्यवेक्षण टावरों, मौसम गुब्बारों, रडारों, कृत्रिम उपग्रहों, उच्च क्षमता वाले कंप्यूटरों और भिन्न-भिन्न अंकगणितीय मॉडलों से भी संभव हो पायी हैं।  यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि महान मौसम विज्ञानियों को पैदा करने वाला भारत वर्तमान में भी मौसम विज्ञान के विकास में अहम योगदान दे रहा है।

यह सुविदित है कि भारतीय उपग्रहों के मौसम संबंधी आंकडें कई देश इस्तेमाल कर रहे हैं। अगस्त, 1983 , जब इनसैट श्रृंखला का पहला उपग्रह इनसैट-1बी प्रक्षेपित किया गया था, के बाद अबतक भारत ने अंतरिक्ष में मौसम पर्यवेक्षण के लिए 10 इनसैट उपग्रह प्रक्षेपित किए हैं। केवल इनसैट-1ए का प्रक्षेपण विफल रहा था। बाद में  सितंबर, 2002 में इसरो ने समर्पित मौसम उपग्रह कल्पना-1 भूस्थैतिक कक्षा में भेजा। इसके अलावा भारत ने 10 सुदूर संवेदी उपग्रह भी प्रक्षेपित किए हैं जिनमें एक हाल का ओसियनसैट 2 भी है। यह उपग्रह पिछले वर्ष 23 सितंबर को बंगाल की खाड़ी में स्थित श्रीहरिकोटा में इसरो के प्रक्षेपण केंद्र से अलग अलग देशों के छह अन्य उपग्रहों के साथ प्रक्षेपित किया गया था। ओसियनसैट की अवधि पांच साल तय की गयी है। यह उपग्रह अंतरिक्ष यान पीएसएलवी के माध्यम से अंतरिक्ष में भेजा गया था। ओसियनसैट मछली की बहुलता वाले क्षेत्रों की पहचान और समुद्र की दशा के अनुमान और मौसम अनुमान के जरिए मछुआरों की मदद करता है तथा तटीय क्षेत्र के अध्ययन  और जलवायु अध्ययन में  अहम भूमिका भी निभाता है। इस उपग्रह के आंकड़े तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश और केरल में स्थानीय भाषाओं में मत्स्य केंद्रों पर उपलब्ध कराए जाते हैं। विक्रम साराभाई अंतरिक्ष  केंद्र के निदेशक डॉ. के राधाकृष्णन कहते हैं, इन तीनों राज्यों में मछली पकड़ने वाली 700 नौकाओं पर किए गए अध्ययन से पता चलता है कि ओसियनसैट के आंकडों ने मछलियों की बहुलता वाले स्थान का पता लगाकर उनके ईंधन और समय की बचत की है। उन्होंने कहा, न्न औसतन एक नौका पर सालभर में एक से छह लाख रूपए की बचत हुई। न्न

मौसम पर्यवेक्षण के लिए अंतरिक्ष में बड़ी संख्या में उपग्रह तैनात करने के अलावा भारतीय वैज्ञानिक मौसम और जलविज्ञान अध्ययन के लिए 1981 से ही अंटार्कटिका पर जाते रहे हैं। सागरीय प्रक्रियाओं को समझने के लिए और उससे प्राप्त अनुभवों का हिंद महासागर क्षेत्र के लोगों तक लाभ पहुंचाने के लिए भारत ने वैश्विक समुद्री पर्यवेक्षण तंत्र (आईओजीओओएस) के हिंद महासागर  अवयव की स्थापना में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। फिलहाल वह हिंद महासागर पर एक अंतराष्ट्रीय परियोजना के साथ भी तालमेल स्थापित कर रहा है। इस  परियोजना के तहत तापमान का नियतकालिक खांका तैयार किया जाएगा और महासागर में 2000 मीटर की गहराई तक लवणता का अध्ययन किया जाएगा ताकि यह पता चल सके कि ऊपरी समुद्र जलवायु परिवर्तन को कैसे प्रभावित करता है। इस परियोजना का महत्व इस बात में है कि हालांकि सागर जलवायु परिवर्तन में अहम भूमिका निभाता है लेकिन सागर और वायुमंडल के बीच परस्पर संबंध खासकर तापमान और भूखंड के संदर्भ में, अब भी अच्छी तरह नहीं समझा जा सका है।

आईओजीओओएस की भांति ही डब्ल्यूएमओ भी दुनिया भर में जलवायु परिवर्तन की परिघटना को बेहतर ढंग से समझने के लिए कई अन्य कार्यक्रमों को प्रायोजित कर रहा है। इसके कार्यक्रमों के तीन लक्ष्य हैं।  पहला है- व्यवस्थित मौसम एवं जलवायु पर्यवेक्षण में सुधार और पिछली जलवायु अवधियों का पुनर्निर्माण। दूसरे और तीसरे लक्ष्य क्रमश हैं- दीर्घकालीन जलवायु अनुमान में विद्यमान अनिश्चितता को घटाने के लिए जलवायु मॉडलों का पुनर्परिभाषित करना और यह सुनिश्चत करना कि जलवायु विज्ञान में प्रगति संपोषणीय विकास में योगदान करे।

डब्ल्यूएमओ ने सावधान भी किया है कि पिछले 15 सालों में  जल से पैदा होने वाली आपदाओं की संख्या बहुत बढ गयी है। दुनियाभर में बार बार पड़ने वाले सूखे और मरूद्यानीकरण के कारण 1.7 अरब लोगों की जीविका खतरे में पड़ गयी है। ये लोग अपनी अधिकांश आवश्यकताओं के लिए जमीन पर ही निर्भर हैं। संगठन के अनुसार पिछले कुछ दशकों में जलवायु में हुआ परिवर्तन  हमारे जीवन के सम्मुख स्वास्थ्य समेत कई गंभीर और अत्यावश्यक चुनौतियां खड़ा करता रहेगा। संगठन के एक दस्तावेज के अनुसार दुनियाभर के देशों ने अबतक इस बात का एहसास नहीं किया है कि जलवायु की सुरक्षा के लिए तत्काल कदम नहीं उठाये जाने से भविष्य में जो कीमत अदा करनी पड़ेगी वह अभी की कीमत से कितनी भारी होगी। हालांकि प्रशांत महासागर में अल नीनों जैसी परिघटना है और सूर्य 11 वर्षों के लिए उष्ण दौरे में प्रवेश कर रहा है लेकिन मानव भी जीवाश्म ईंधन जलाकर विश्व का तापमान काफी बढा रहा है। डब्ल्यूएमओ के पूर्व महासचिव प्रो. ओ पी ओबासी ने चेतावनी दी है कि जलवायु परिवर्तन के उपशमन के लिए जिन कदमों पर विचार किया गया है वे हमारी भावी जलवायु को बचाने के लिए नाकाफी हैं। वह इस बात पर बल देते हैं कि ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में उचित कमी लाने एवं महत्त्वपूर्ण वैज्ञानिक मुददों के समाधान के लिए अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी को संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन प्रारूप संधिपत्र और क्योटो प्रोटोकॉल के साथ मिलकर एकजुट प्रयास करना चाहिए।

इस दिवस पर देश के विभिन्न हिस्सों में बैठकें, संगोष्ठियां और अन्य कार्यक्रम हो रहे हैं जिनमें मौसमविज्ञानी आपस में विचार एवं अनुभव  बाटेंगे तथा इसपर चर्चा करेंगे कि इस उभरते विज्ञान के ज्ञान का न केवल भारतीयों बल्कि मानवजाति के कल्याण के लिए कैसे बेहतर उपयोग किया जाए। (पसूका)

૨૪.
सबकी सुरक्षा एवं कल्याण संबंधी सेवा के साठ वर्ष

एवीएम (डा.)अजित त्यागी

विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्लूएमओ) संयुक्त राष्ट्र की एक विशेषज्ञ एजेंसी है जो पृथ्वी के वायुमंडल की दशा और व्यवहार का अध्ययन करती है। इसके अलावा उसके अध्ययन के विषयों में पृथ्वी के वायुमंडल का महासागरों के साथ करीबी संबंध, उसके द्वारा उत्पन्न जलवायु और जल संसाधनों के वितरण पर उसके परिणाम भी शामिल हैं। संगठन की स्थापना 23 मार्च 1950 को हुई और इस समय उसकी सदस्य संख्या 189 है। संगठन के नेतृत्व और उसके कार्यक्रमों के दायरे के भीतर राष्ट्रीय मौसम विज्ञान एवं जल विज्ञान सेवाएं प्राकृतिक आपदाओं से जीवन और सम्पत्ति की हिफाजत करता है, पर्यावरण की रक्षा करता है और खाद्य सुरक्षा, जल संसाधन और यातायात के संदर्भ में समाज के सभी वर्गों को आर्थिक व सामाजिक सुरक्षा प्रदान करता है।

कालांतर में संगठन ने मानव सुरक्षा और कल्याण की दिशा में बहुत योगदान किया है। इसकी स्थापना के 60 वर्षों को उसकी उपलब्धियों के आधार पर निम्नांकित रूप में बांटा जा सकता है:‑

विकासात्मक वर्ष (1950 ‑ 63)

इन वर्षों के दौरान राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय जलवायु संबंधी मानचित्रों का विकास किया गया। इसके साथ ही मौसम विज्ञान में समरूपता लाने के लिए तकनीकी नियमों और दिशा निर्देशों का प्रकाशन भी किया गया। पृथ्वी विज्ञानों के 11 विषयों पर अंतर्राष्ट्रीय अनुसंधान सहयोग के लिए  अंतराष्ट्रीय भू‑भौतिकी वर्ष (1957‑58) एक प्रमुख उपलब्धि रही। सक्रिय तकनीकी सहयोग कार्यक्रम के जरिए नए सदस्यों को जोड़ने के लिए राष्ट्रीय मौसम विज्ञान एवं जल विज्ञान सेवाएं का संगठन ने समर्थन किया। इस अवधि के दौरान मौसम परक गतिविधियों और मौसम की भविष्यवाणी को अधिक सटीक बनाने की आवश्यकता ने वायुमंडल की सतह एवं ऊपरी स्तरों के पर्यवेक्षण को बढावा दिया। रेडियो‑टेलीटाइपराईटर, वास्तविक प्रतिलिपि और अन्य रेडियो प्रसारण केंद्रों ने रियल‑टाइम आंकड़ों और मौसम मानचित्रों की तैयारी एवं प्रसार को बढाया।

प्रौद्योगिकीय विकास (1964‑70)

दूर संवेदी यंत्रों, उपग्रहों, संचार और कंप्यूटरों के विकास के बल पर ग्लोबल ऑबसर्विंग सिस्टम (जीओएस), ग्लोबल डाटा प्रोसेसिंग एंड फोरकास्टिंग सिस्टम और ग्लोबल टेलीकम्यूनिकेशन सिस्टम के घटकों के साथ विश्व मौसम निगरानी कार्यक्रम तैयार किया गया।

1972 के अंत तक, 8500 मैदानी स्टेशनों, 550 व्यापारिक एवं महासागरीय मौसम जलयानों तथा व्यापारिक हवाई जहाजों एवं मौसम विज्ञान के उपग्रहों ने संगठन प्रणाली के दायरे में काम करना शुरू कर दिया था। वैश्विक मौसम परीक्षण जिसे वैश्विक वायुमंडलीय अनुसंधान कार्यक्रम भी कहा जाता है, एक उल्लेखनीय विकास था। इस कार्यक्रम को आगे आने वाले दशक में क्रियान्वित किया गया जिससे मौसम अनुमान और जलवायु की भविष्यवाणी में समुचित विकास संभव हो सका। इसी अवधि के दौरान, कई नव स्वतंत्रताप्राप्त देश संगठन के साथ जुड़े। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम के संसाधनों की पूरकता और समय पर प्रभावकारी समर्थन प्रदान करने के लिए संगठन ने खुद अपना स्वयंसेवी सहायता कार्यक्रम तैयार किया।

नई पहलों का दशक (1971‑80)

·       1960 के दशक के अंतिम चरण और 1970 के दशक के आरंभ में रेगिस्तानी सूखे के कारण विश्व मौसम विज्ञान संगठन ने खाद्य सुरक्षा बढाने के दृष्टिकोण से क्षमता संवर्धन और सूखे व रेगिस्तान के फैलाव से निपटने के लिए नाइजर के नियामे नामक स्थान पर एग्रहाईमेट केंद्र स्थापित किया।

·       बंग्लादेश में जब 1970 में चार लाख लोग मारे गए तो इस घटना ने संगठन को 1968 में बनाई जाने वाली अपनी तूफान समिति को दोबारा क्रियाशील करने पर मजबूर कर दिया।

·       1971 में विश्व मौसम संगठन ने उष्णकटिबंधीय चक्रवात परियोजना बनाई जिसे आगे चलकर कार्यक्रम का रूप दे दिया गया।

·       1972 में सम्पन्न मानव पर्यावरण पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन में संगठन ने बहुत योगदान किया जिसके परिणामस्वरूप संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम बनाया गया।

·       1977 में विश्व मौसम विज्ञान संगठन ने मरुभूमि के फैलाव पर संयुक्त राष्ट्र के सम्मेलन में सक्रिय भूमिका निभाई। संगठन ने सूखे और मरुभूमि के फैलाव पर कार्ययोजना तैयार की जिसने अन्य देशों को मूल्यवान मार्गदर्शन उपलब्ध कराया।

·       1985 और 1987 में ओजोन परत की सुरक्षा के लिए प्रस्तावों और संधिपत्रों को स्वीकार किया गया।

·       1978 से 1979 तक प्रथम वैश्विक वायुमंडलीय अनुसंधान कार्यक्रम वैश्विक परीक्षण या एफजीजीई चलाया गया जिसने  वैश्विक वायुमंडलीय परिचालन को परिभाषित करने, मध्यम व विस्तारित मौसम अनुमान और जलवायु की भविष्यवाणी के लिए ज्यादा सटीक गणितीय नमूनों को विकसित करने में मदद की।

·       एशियाई मानसून के लिए मॉनेक्स और आल्प्स पर्वतीय क्षेत्रों के लिए ऑलपेक्स क्षेत्रीय परीक्षण शुरू किए गए।

·       स्पेन में मौसम परिवर्तन परीक्षण शुरू किया गया जिसने इसकी समझ ‑ प्रक्रिया को बढावा दिया।

जलवायु और ओजोन (1981‑1990)

गत वर्षों में जो भी नई पहलें की गई थीं, इस दशक में उनके परिणाम सामने आए। इस दौरान जलवायु और ओजोन के मोर्चे, प्रभाव और योजनाओं को लागू करने संबंधी कई कार्रवाईयां भी की गईं। कार्बन डाईऑक्साइड की भूमिका और जलवायु पर पड़ने वाले ग्रीन गैस के प्रभावों के आकलन के लिए 1985 में विलाख सम्मेलन हुआ जिसने जलवायु परिवर्तन और उसके परिणामों पर  अपने तरह के पहले प्रस्ताव को सर्वसम्मति से अपनाने में मदद की।

वैश्विक मौसम विज्ञान संगठन की कार्रवाई से 1985 में ओजोन परत की सुरक्षा के लिए वियना कन्वेन्शन और ओजोन परत को नुकसान पहुंचाने वाले कारकों पर 1987 में मांट्रियल प्रोटोकॉल वजूद में आए। परिणामस्वरूप ओजोन परत को नुकसान पहुंचाने वाले कारकों को धीरे‑धीरे समाप्त करने के लिए विज्ञान आधारित नीति बनाई गई जिसमें यह आकलन किया गया था कि अगले 50 सालों में ओजोन परत सामान्य हो जाएगी।

प्राकृतिक आपदाएं और सतत विकास प्रक्रिया (1991‑2000)

1982‑1983 की एल निनो संबंधी आपदाएं जैसी आत्यांतिक मौसमी घटनाओं के बार बार होने और पर्यावरण के लगातार क्षरण की चिंताओं के फलस्वरूप इस दशक में तीन प्रमुख कार्य हुए:‑

·       1992 में जल एवं पर्यावरण पर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन

·       1992 में पर्यावरण एवं विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन

·       1990‑1999 को प्राकृतिक आपदाओं को कम करने संबंधी संयुक्त राष्ट्र दशक घोषित किया गया।

इसी अवधि में जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र का रूपरेखा सम्मेलन, 1997 में क्योटो प्रोटोकॉल,1994 में रेगिस्तान के फैलाव से लड़ने के लिए संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन और 1993 में जैव विविधता पर सम्मेलन का आयोजन भी किया गया।

जलवायु परिवर्तन (2001‑2010)

यह जलवायु विज्ञानियों का अथक परिश्रम ही था और जिसे विश्व मौसम विज्ञान संगठन व अन्य साझीदारों का समर्थन हासिल था जिसके कारण जलवायु परिवर्तन का मुद्दा विश्व के एजेंडे में सबसे ऊपर आ पाया। 2001 आईपीसीसी थर्ड असेसमेन्ट रिपोर्ट के अंत में लिखा है: न्न जलवायु परिवर्तन के लिए अब मानवीय प्रभाव के ज्यादा सबूत हैं। न्न 2007 फोर्थ असेसमेन्ट रिपोर्ट में कहा गया है कि, न्न जलवायु प्रणाली के परिवर्तित होने की घटना असंदिग्ध है न्न और यह कि, न्न20वीं सदी के मध्य में होने वाले औसत जलवायु परिवर्तन में बढोतरी का कारण मानव निर्मित ग्रीनहाउस गैस की सांद्रता ही है। न्न 1979, 1990 और 2009 में अब तक तीन जलवायु सम्मेलन हो चुके हैं।

विश्व मौसम विज्ञान संगठन में भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) की भूमिका

आईएमडी, विश्व मौसम विज्ञान संगठन का स्थापना सदस्य है। वह संगठन के अंतर्गत क्षेत्रीय संघ ‑ 2 (एशिया) के सदस्य के तौर पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। संगठन में आईएमडी की विभिन्न गतिविधियां हैं ‑

·       क्षेत्रीय दूरसंचार केंद्र (आरटीएच) नई दिल्ली, अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के साथ मौसम संबंधी आंकड़ों और सूचनाओं का आदान प्रदान करता है।

·       क्षेत्रीय विशेषज्ञता मौसम विज्ञान केंद्र (आरएसएमसी) हिंद महासागर के देशों को उष्णकटिबंधीय चक्रवात संबंधी चेतावनी प्रदान करता है।

·       पुणे स्थित क्षेत्रीय प्रशिक्षण संस्थान दक्षिण पूर्व एशिया, मध्यपूर्वी देशों और अफ्रीका के मौसम कर्मियों को मौसम विज्ञान का प्रशिक्षण देता है।

·       आईएमडी मालदीव, नेपाल, श्रीलंका, अमेरिका, रूस, चीन और फ्रांस जैसे विभिन्न देशों को मौसम विज्ञान में अंतर्राष्ट्रीय सहयोग प्रदान करता है।

इस समय भारतीय मौसम विज्ञान विभाग ने विस्तृत आधुनिकीकरण कार्यक्रम को हाथ में लिया है जिसके निम्नलिखित उद्देश्य हैं। उम्मीद की जाती है कि इसके नतीजों से मौसम संबंधी सेवाओं में इजाफा होगा और विश्व मौसम विज्ञान संगठन में आईएमडी की प्रमुखता और बढेग़ी।

उद्देश्य

·       स्वचालित मौसम केंद्र (एडब्लूएस), डॉपलर मौसम रडार (डीडब्लूआर), उन्नत उपग्रह और वायु की ऊपरी सतह का पर्यवेक्षण‑तंत्र जैसी पर्यवेक्षण प्रणाली के लिए आधुनिक तकनीक का समावेश।

·       केंद्रीय सूचना प्रसंस्करण प्रणाली को लगाना और उसका संपर्क राष्ट्रीय मौसम विज्ञान केंद्रों से स्थापित करना।

·       उपग्रह आंकड़ों और परिणामों एनडब्लूपी नमूनों से मिलान करना।

·       आंकड़ों के प्रसार को सुधारना और लोगों तक पहुंचाना।

·       पहले से अधिक वस्तुनिष्ठ मौसम अनुमान प्रणाली को शामिल करना।

·       लोक मौसम सेवाओं (पीडब्लूएस) और पूर्व चेतावनी प्रणाली में सुधार।

आधुनिकीकरण कार्यक्रम के नतीजे के तौर पर अब जिला स्तर पर मौसम अनुमान सेवाएं काम कर रही हैं जो कठोर मौसमी घटनाओं की भविष्यवाणी करती हैं। इसके अलावा मौसम का अनुमान 10‑12 दिन या महीना भर पहले किया जाता है, लघु, मध्यम और दीर्घ मौसमी अनुमानों की सटीकता बढी है, जोखिमों से भरे मौसम की पूर्व सूचना दी जाती है, वास्तविक आंकड़ा उपलब्धि, आपदा प्रबंधन तुरंत संभव हो गया है तथा स्थाई एवं अस्थाई दायरे में सुधार हुआ है। (पसूका)

‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑

महानिदेशक मौसम विज्ञान, भारतीय मौसम विज्ञान विभाग, लोधी रोड, नई दिल्ली

૨૫.
सबके लिए अनन्य पहचान की ओर एक कदम

शायद हम में से ज्यादातर ने हाल ही में समाचारपत्रों या पत्रिकाओं में राष्ट्रीय जनसंख्या पंजीयक (एनपीआर) के बारे में पढ़ा होगा। लेकिन यह सारी चहल-पहल आखिर है क्या ? एनपीआर क्या है ? इसका उद्देश्य क्या है ? और इन सबसे बढ़कर, इससे आम आदमी को क्या फायदा होने जा रहा है ?

एनपीआर के बारे में जानने के लिए, पहले जनगणना के बारे में कुछ जान लेना आवश्यक है। अब, भारत के लिए जनगणना कोई नई चीज़ नहीं है। यह अंग्रेजाें के राज से ही की जाती रही है। भारत में पहली जनगणना 1872 में हुई थी। वर्ष 1881 से, जनगणना बिना किसी रूकावट के हर दस साल में की जाती रही है। जनगणना एक प्रशासनिक अभ्यास है जो भारत सरकार करवाती है। इसमें जनांकिकी, सामाजिक -सांस्कृतिक और आर्थिक विशेषताओं जैसे अनेक कारकों के संबंध में पूरी आबादी के बारे में सूचना एकत्र की जाती है।

वर्ष 2011 में भारत की 15वीं तथा स्वतंत्रता के बाद यह सातवीं  जनगणना होगी। एनपीआर की तैयारी वर्ष 2011 की जनगणना का मील का पत्थर है। जनगणना दो चरणों में की जाएगी। पहला चरण अप्रैल से सितंबर 2010 के दौरान होगा जिसमें घरों का सूचीकरण, घरों की आबादी और एनपीआर के बारे में डाटा एकत्र किया जाएगा। इस चरण में एनपीआर कार्यक्रम के बारे में प्रचार करना भी शामिल है जो दो भाषाओं- अंग्रेजी और हर राज्य#संघीय क्षेत्र की राजभाषा में तैयार किया जाएगा। पहला चरण पहली अप्रैल, 2010 को पश्चिम बंगाल, असम, गोवा और मेघालय राज्यों तथा संघीय क्षेत्र अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह में शुरू होगा। दूसरे चरण में आबादी की प्रगणना करना शामिल है।

देश के साधारण निवासियों का राष्ट्रीय जनसंख्या पंजीयक बनाना एक महत्वाकांक्षी परियोजना है। इसमें देश में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति के बारे में विशिष्ट सूचना एकत्र की जाएगी। इसमें अनुमानित एक अरब 20 करोड़ की आबादी को शामिल किया जाएगा तथा इस स्कीम की लागत कुल 3539.24 करोड़ रुपए होगी। भारत में पहली बार एनपीआर तैयार किया जा रहा है। भारत का पंजीयक यह डाटाबेस तैयार करेगा।

इस परिस्थिति में, इस बात पर बल देना महत्वपूर्ण हो जाता है कि यद्यपि इन दोनों अभ्यासों का मक़सद सूचना का संग्रह है मगर जनगणना और एनपीआर अलग-अलग बातें हैं। जनगणना जनांकिकी, साक्षरता एवं शिक्षा, आवास एवं घरेलू सुख-सुविधाएं, आर्थिक गतिविधि, शहरीकरण, प्रजनन शक्ति, मृत्यु संख्या, भाषा, धर्म और प्रवास के बारे में डाटा का सबसे बड़ा स्रोत है। यह केंद्र एवं राज्यों की नीतियों के लिए योजना बनाने तथा उनके कार्यान्वयन के लिए प्राथमिक डाटा के रूप में काम आता है। यह संसदीय, विधानसभा और स्थानीय निकाय के चुनावों के लिए निर्वाचन क्षेत्रों के आरक्षण के लिए भी इस्तेमाल की जाती है।

दूसरी तरफ एनपीआर में, देश के लिए व्यापक पहचान का डाटाबेस बनाना शामिल है। इससे आयोजना, सरकारी स्कीमों#कार्यक्रमों का बेहतर लक्ष्य निर्धारित करना तथा देश की सुरक्षा को मजबूत करना भी सुगम होगा। एक अन्य पहलू जो एनपीआर को जनगणना से अलग करता है, वह यह है कि एनपीआर एक सतत प्रक्रिया है। जनगणना में, संबंधित अधिकारियों का कर्तव्य सीमित अवधि के लिए होता है तथा काम समाप्त होने के बाद उनकी सेवाएं अनावश्यक हो जाती हैं जबकि एनपीआर के मामले में संबंधित अधिकारियों और तहसीलदार एवं ग्रामीण अधिकारियों जैसे उनके मातहत अधिकारियों की भूमिका स्थायी होती है।

एनपीआर में व्यक्ति का नाम, पिता का नाम, मां का नाम, पति#पत्नी का नाम, लिंग, जन्म तिथि, वर्तमान वैवाहिक स्थिति, शिक्षा, राष्ट्रीयता (घोषित), व्यवसाय, साधारण निवास के वर्तमान पते और स्थायी निवास के पते जैसी सूचना की मद शामिल होंगी। इस डाटाबेस में 15 वर्ष से अधिक आयु के व्यक्तियों के फोटो और फिंगर बायोमेट्री (उंगलियों के निशान) भी शामिल होंगे। साधारण निवासियों के प्रमाणीकरण के लिए मसौदा डाटाबेस को ग्राम सभा या स्थानीय निकायों के समक्ष रखा जाएगा।

आम आवासियों के स्थानीय रजिस्टर का मसौदा ग्रामीण इलाके में गांवों में और शहरी इलाकों में वार्डों में रखे जाएंगे ताकि नाम के हिज्जों, पत्रों जन्म, तिथियों आदि गलतियों पर शिकायतें प्राप्त की जा सकें। इसके अलावा दर्ज व्यक्ति की रिहायश के मामले में भी शिकायतें प्राप्त की जा सकें। इस मसौदे को आम आवासियों की तस्दीक के लिए ग्राम सभा या स्थानीय निकायों के सामने पेश किया जाएगा।

डाटाबेस पूरा होने के बाद, अगला काम भारतीय अनन्य पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) के जरिए हर व्यक्ति को अनन्य पहचान संख्या (यूआईडी) तथा पहचान पत्र देना होगा। बाद में इस यूआईडी नंबर में एनपीआर डाटाबेस जोड़ा जाएगा। पहचान पत्र स्मार्ट कार्ड होगा जिस पर 16 अंक की अनन्य संख्या होगी तथा उसमें शैक्षिक योग्यताएं, स्थान और जन्म तिथि, फोटो और उंगलियों के निशान भी शामिल होंगे। फिलहाल, मतदाता पहचान पत्र या आय कर दाताओं के लिए स्थायी लेखा संख्या (पैन) जैसे सरकार की तरफ से जारी विभिन्न कार्ड एक दूसरे के सब-सेट्स के रूप में काम करते हैं। इन सभी को अनन्य बहुद्देश्यीय पहचान कार्ड में एकीकृत किया जा सकता है।

समूचे देश में एनपीआर का कार्यान्वयन तटीय एनपीआर परियोजना नामक प्रायोगिक परियोजना से हासिल अनुभव के आधार पर समूचे देश में एनपीआर का कार्यान्वयन किया जाएगा। यह परियोजना 9 राज्यों और 4 संघीय क्षेत्रों के 3,000 से अधिक गांवों में चलायी गयी है। मुंबई आतंकी हमलों के बाद तटीय सुरक्षा बढ़ाने के मद्देनज़र तटीय एनपीआर परियोजना कार्यान्वित करने का निर्णय लिया गया था क्योंकि आंतकवादी समुद्र के रास्ते मुंबई में घुसे थे।

एनपीआर से लोगों को क्या फायदा होगा ?

भारत में, मतदाता पहचान पत्र, ड्राइविंग लाइसेंस, पासपोर्ट, पैन कार्ड जैसे विभिन्न डाटाबेस हैं लेकिन इन सबकी सीमित पहुंच है। ऐसा कोई मानक डाटाबेस नहीं है जिसमें पूरी आबादी शामिल हो। एनपीआर मानक डाटाबेस उपलब्ध कराएगा तथा प्रत्येक व्यक्ति को अनन्य पहचान संख्या का आवंटन सुगम कराएगा। यह संख्या व्यक्ति के जन्म से लेकर मृत्यु तक स्थायी पहचान प्रदान करने जैसी ही होगी।

एनपीआर का महत्व इस तथ्य में निहित है कि देश में समग्र रूप से विश्वसनीय पहचान प्रणाली की आवश्यकता बढ़ती जा रही है। गैरकानूनी प्रवास पर लगाम कसने तथा आंतरिक सुरक्षा के मसले से निपटने के लिए भी देश के हर क्षेत्र और हर कोने के लोगों तक पहुंच बनाने की ज़रूरत जैसे विभिन्न कारकों की वजह से यह सब और भी महत्वपूर्ण हो गया है।

अनन्य पहचान संख्या से आम आदमी को कई तरह से फायदा होगा। यह संख्या उपलब्ध होने पर बैंक खाता खोलने जैसी विविध सरकारी या निजी सेवाएं हासिल करने के लिए व्यक्ति को पहचान के प्रमाण के रूप में एक से अधिक दस्तावेज़ प्रस्तुत करने की ज़रूरत नहीं होगी। यह व्यक्ति के आसान सत्यापन में भी मदद करेगी। बेहद गरीब लोगों के लिए सरकार अनेक कार्यक्रम और योजनाएं चला रही है लेकिन अनेक बार वे लक्षित आबादी तक नहीं पहुंच पाते। इस प्रकार यह पहचान डाटाबेस बनने से सरकारी और गैर सरकारी एजेंसियों की विविध लाभार्थी केंद्रित स्कीमों का लक्ष्य बढ़ाने में मदद मिलेगी।

एनपीआर देश की आंतरिक सुरक्षा बढ़ाने की ज़रूरत भी पूरा करेगा। सबको बहुउद्देश्यीय पहचान पत्र उपलब्ध होने से आतंकवादियों पर भी नज़र रखने में मदद मिलेगी जो अकसर आम आदमियों में घुलमिल जाते हैं। इसके अतिरिक्त, इससे कर संग्रह बढ़ाने तथा शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में कल्याण योजनाओं के बेहतर लक्ष्य निर्धारण के अलावा गैरकानूनी प्रवासियों की पहचान करने में भी मदद मिलेगी।

भारत अनुमानित 1 अरब 20 करोड़ की आबादी को अनन्य बायोमीट्रिक कार्ड उपलब्ध कराने के वायदे के साथ सबसे बड़ा डाटाबेस बनाने की प्रक्रिया शुरू करने के लिए पूरी तरह तैयार है। इस तरह अनन्य पहचान उपलब्ध कराने का रास्ता निर्धारित कर दिया गया है। यह अभ्यास इतना विशाल है कि इस परियोजना को सफल बनाने के लिए लोगों के उत्साहपूर्ण समर्थन एवं सहयोग की आवश्यकता है जो सबके लिए फायदेमंद होगी।

૨૬.
प्लास्टिक थैले-पर्यावरणीय मुसीबत

पर्यावरण

प्लास्टिक कचरे से पर्यावरण को पहुंचने वाले खतरों का अध्ययन अनेक समितियों ने किया है। प्लास्टिक थैलों के इस्तेमाल से होने वाली समस्यायें मुख्य रूप से कचरा प्रबंधन प्रणालियों की खामियों के कारण पैदा हुई हैं। अंधाधुंध रसायनों के इस्तेमाल के कारण खुली नालियों का प्रवाह रूकने, भूजल संदूषण आदि जैसी पर्यावरणीय समस्यायें जन्म लेती हैं। प्लास्टिक रसायनों से निर्मित पदार्थ है जिसका इस्तेमाल विश्वभर में पैकेजिंग के लिये होता है, और इसी कारण स्वास्थ्य तथा पर्यावरण के लिये खतरा बना हुआ है। यदि अनुमोदित प्रक्रियाओं और दिशा-निर्देशों के अनुसार प्लास्टिक की रिसाइक्लिंग (पुनर्चक्रण) किया जाए तो पर्यावरण अथवा स्वास्थ्य के लिये ये खतरा नहीं बनेगा।

प्लास्टिक किसे कहते हैं?

प्लास्टिक एक प्रकार का पॉलीमर यानी मोनोमर नाम की दोहराई जाने वाली इकाइयों से युक्त बड़ा अणु है। प्लास्टिक थैलों के मामले में दोहराई जाने वाली इकाइयां एथिलीन की होती हैं। जब एथिलीन के अणु को पॉली एथिलीन बनाने के लिए ‘पॉलीमराइज’ किया जाता है, वे कार्बन अणुओं की एक लम्बी शृंखला बनाती हैं, जिसमें प्रत्येक कार्बन को हाइड्रोजन के दो परमाणुओं से संयोजित किया जाता है।

प्लास्टिक थैले किससे बने होते हैं?

प्लास्टिक थैले तीन प्रकार के बुनियादी पॉली एथिलीन पॉलीमरों-उच्च घनत्व वाले पॉलीएथिलीन (एचडीपीई),अल्पघनत्व वाले पॉलीएथिलीन (एलडीपीई) अथवा लीनियर अल्प घनत्व वाले पॉलीएथिलीन (एलएलडीपीई) में से किसी एक से बना होता है। किराने वाले थैले आम तौर पर एचडीपीई के बने होते हैं जबकि ड्राई क्लीनर के थैले एलडीपीई से निर्मित होते हैं। इन पदार्थों के बीच मुख्य अंतर पॉलीमर शृंखला की मुख्य धारा से चलन होने की सीमा पर निर्भर होता है। एचडीपीई और एलएलडीपीई एक रेखीय अविचलित शृंखलाओं से बनी होती है जबकि एलडीपीई शृंखला में विघटन होता है।

क्या प्लास्टिक के थैले स्वास्थ्य के लिये हानिप्रद है?

प्लास्टिक मूल रूप से विषैला या हानिप्रद नहीं होता। परन्तु प्लास्टिक के थैले रंग और रंजक, धातुओं और अन्य तमाम प्रकार के अकार्बनिक रसायनों को मिलाकर बनाए जाते हैं। रंग और रंजक एक प्रकार के औद्योगिक उत्पाद होते हैं जिनका इस्तेमाल प्लास्टिक थैलों को चमकीला रंग देने के लिये किया जाता है। इनमें से कुछ कैंसर को जन्म देने की संभावना से युक्त हैं तो कुछ खाद्य पदार्थों को विषैला बनाने में सक्षम होते हैं। रंजक पदार्थों में कैडमियम जैसी जो भरी धातुएं होती हैं वे फैलकर स्वास्थ्य के लिये खतरा साबित हो सकती हैं।

प्लास्टिसाइजर अल्प अस्थिर प्रकृति का जैविक (कार्बनिक) एस्सटर (अम्ल और अल्कोहल से बना घोल) होता है। वे द्रवों की भांति निथार कर खाद्य पदार्थों में घुस सकते हैं। ये कैंसर पैदा करने की संभावना से युक्त होते हैं।

एंटी आक्सीडेंट और स्टैबिलाइजर अकार्बनिक और कार्बनिक रसायन होते हैं जो निर्माण प्रक्रिया के दौरान तापीय विघटन से रक्षा करते हैं।

कैडमियम और जस्ता जैसी विषैली धातुओं का इस्तेमाल जब प्लास्टिक थैलों के निर्माण में किया जाता है, वे निथार कर खाद्य पदार्थों को विषाक्त बना देती हैं। थोड़ी-थोड़ी मात्रा में कैडमियम के इस्तेमाल से उल्टियां हो सकती हैं और हृदय का आकार बढ सक़ता है। लम्बे समय तक जस्ता के इस्तेमाल से मस्तिष्क के ऊतकों का क्षरण होकर नुकसान पहुंचता है।

प्लास्टिक थैलों से उत्पन्न समस्याएं

प्लास्टिक थैलियों का निपटान यदि सही ढंग से नहीं किया जाता है तो वे जल निकास (नाली) प्रणाली में अपना स्थान बना लेती हैं, जिसके फलस्वरूप नालियों में अवरोध पैदा होकर पर्यावरण को अस्वास्थ्यकर बना देती हैं। इससे जलवाही बीमारियों भी पैदा होती हैं। रि-साइकिल किये गए अथवा रंगीन प्लास्टिक थैलों में कतिपय ऐसे रसायन होते हैं जो निथर कर जमीन में पहुंच जाते हैं और इससे मिट्टी और भूगर्भीय जल विषाक्त बन सकता है। जिन उद्योगों में पर्यावरण की दृष्टि से बेहतर तकनीक वाली रि-साइकिलिंग इकाइयां नहीं लगी होतीं, वे प्रक्रम के दौरान पैदा होने वाले विषैले धुएं से पर्यावरण के लिये समस्याएं पैदा कर सकते हैं। प्लास्टिक की कुछ थैलियों जिनमें बचा हुआ खना पड़ा होता है, अथवा जो अन्य प्रकार के कचरे में जाकर गड-मड हो जाती हैं, उन्हें प्राय: पशु अपना आहार बना लेते हैं, जिसके नतीजे नुकसान दायक हो सकते हैं। चूंकि प्लास्टिक एक ऐसा पदार्थ है जो सहज रूप से मिट्टी में घुल-मिल नहीं सकता और स्वभाव से अप्रभावनीय होता है, उसे यदि मिट्टी में छोड़ दिया जाए तो भूगर्भीय जल की रिचार्जिंग को रोक सकता है। इसके अलावा, प्लास्टिक उत्पादों के गुणों के सुधार के लिये और उनको मिट्टी से घुलनशील बनाने के इरादे से जो रासायनिक पदार्थ और रंग आदि उनमें आमतौर पर मिलाए जाते हैं, वे प्राय: स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डालते हैं।

प्लास्टिक कचरा प्रबंधन हेतु कार्य योजनायें

अनेक राज्यों ने तुलनात्मक दृष्टि से मोटे थैलों का उपाय सुझाया है। ठोस कचरे की धारा में इस प्रकार के थैलों का प्रवाह काफी हद तक कम हो सकेगा, क्योंकि कचरा बीनने वाले रिसाइकिलिंग के लिये उनको अन्य कचरे से अलग कर देंगे। पतली प्लास्टिक थैलियों की कोई खास कीमत नहीं मिलती और उनको अलग-थलग करना भी  कठिन होता है। यदि प्लास्टिक थैलियों की मोटाई बढा दी जाए, तो इससे वे थोड़े महंगे हो जाएंगे और उनके उपयोग में कुछ कमी आएगी।

प्लास्टिक की थैलियों, पानी की बोतलों और पाउचों को कचरे के तौर पर फैलाना नगरपालिकाओं की कचरा प्रबंधन प्रणाली के लिये एक चुनौती बनी हुई है। अनेक पर्वतीय राज्यों (जम्मू एवं कश्मीर, सिक्किम, पश्चिम बंगाल) ने पर्यटन केन्द्रों पर प्लास्टिक थैलियोंबोतलों के उपयोग को प्रतिबंधित कर दिया है। हिमाचल प्रदेश सरकार ने एक कानून के तहत समूचे राज्य में 15.08.2009 से प्लास्टिक के उपयोग पर पाबंदी लगा दी है।

केन्द्र सरकार ने भी प्लास्टिक कचरे से पर्यावरण को होने वाली हानि का आकलन कराया है। इसके लिये कई समितियां और कार्यबल गठित किये गए, जिनकी रिपोर्ट सरकार के पास है।

पर्यावरण और वन मंत्रालय ने रि-साइकिंल्ड प्लास्टिक मैन्यूफैक्चर ऐंड यूसेज रूल्स, 1999 जारी किया था, जिसे 2003 में, पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1968 के तहत संशोधित किया गया है ताकि प्लास्टिक की थैलियों और डिब्बों का नियमन और प्रबंधन उचित ढंग से किया जा सके। भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) ने धरती में घुलनशील प्लास्टिक के 10 मानकों के बारे में अधिसूचना जारी की है।

प्लास्टिक के विकल्प

प्लास्टिक थैलियों के विकल्प के रूप में जूट और कपड़े से बनी थैलियों और कागज की थैलियों को लोकप्रिय बनाया जाना चाहिए और इसके लिए कुछ वित्तीय प्रोत्साहन भी दिया जाना चाहिए। यहां, ध्यान देने की बात है कि कागज की थैलियों के निर्माण में पेड़ों की कटाई निहित होती है और उनका उपयोग भी सीमित है। आदर्श रूप से, केवल धरती में घुलनशील प्लास्टिक थैलियों का उपयोग ही किया जाना चाहिये। जैविक दृष्टि से घुलनशील प्लास्टिक के विकास के लिये अनुसंधान कार्य जारी है।

૨૭.
महिला सशक्तिकरण के बढते क़दम

आज की नारी में छटपटाहट है आगे बढने क़ी, जीवन और समाज के हर क्षेत्र में कुछ करिश्मा कर दिखाने की, अपने अविराम अथक परिश्रम से आधी दुनिया में नया सुनहरी सवेरा लाने की तथा ऐसी सशक्त इबारत लिखने की जिसमें महिला अबला न रहकर सबला बन जाए। यह अवधारणा मूर्त रूप ले रही है – बालिका विद्यालयों, महिला कॉलेजों और महिला विश्वविद्यालयों में, नारी सुधार केन्द्रों, नारी निकेतनों, महिला होस्टलों और आंदोलनों में। आज स्थिति यह है कि कानून और संविधान में प्रदत्त अधिकारों का सम्बल लेकर नारी, अधिकारिता के लम्बे सफर में कई मील-पत्थर पार कर चुकी है।

भारत की पराधीनता की बेड़ियां कट जाने के बाद नारी ने अपने उज्ज्वल भविष्य के लिए जोरदार अभियान चलाया। कई मोर्चों पर उसने प्रमाणित कर दिखाया है कि वह किसी से कमतर नहीं, बेहतर है। चाहे सामाजिक क्षेत्र हो या शैक्षिक, आर्थिक क्षेत्र हो या राजनैतिक, पारिवारिक क्षेत्र हो या खेल का मैदान, विज्ञान का क्षेत्र हो या वकालत का पेशा, सभी में वह अपनी धाक जमाती जा रही है। अगर घर की चारदीवारी में वह बेटी, बहन, पत्नी, माँ अथवा अभिभाविका जैसे विविध रूपों में अपने रिश्ते नाते बखूबी निभाती है और अपनी सार्थकता प्रमाणित कर दिखाती है तो घर की चौखट के बाहर कार्यालयों, कार्यस्थलों, व्यवसायों और प्रशासन जैसे विभिन्न क्षेत्रों में अपना योगदान करने में किसी से पीछे नहीं। आज देश में सर्वोच्च राष्ट्रपति पद, लोकसभा अध्यक्ष पद और लोकसभा में विपक्षी नेता – तीनों को महिलाएं सुशोभित कर रही हैं। सबसे बड़े राजनीतिक दल और संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के नेता पद को भी महिला महामंडित कर रही है।

राजनीतिक क्षेत्र से हटकर जब हम प्रशासनिक क्षेत्र पर नज़र डालते हैं तो उसमें भी महिला अधिकारी वर्तमान को संवारने -सजाने में किसी से पीछे नहीं हैं। विदेश  सचिव तथा अनेक मंत्रालयों के सचिव पद का दायित्व निभाने में महिलाएं पूरी निष्ठा और कार्यकौशल का परिचय दे रहीं हैं। इस संदर्भ में इस तथ्य की अनदेखी नहीं की जा सकती कि महिला उत्थान और अधिकारिता के नए-नए शिखरों पर विजय पाने की यह कामयाबी तब मिल रही है, जब  महिला राजनीतिक सशक्तिकरण की दृष्टि से भारत का कद निरन्तर बढता जा रहा है। विभिन्न देशों की कतार में भारत  कई पायदान चढक़र 24वें स्थान पर  जा पहुंचा है। आज संसद के विभिन्न पदों में 11 प्रतिशत पर और मंत्री पदों में 10 प्रतिशत पर महिलाएं काबिज हैं।

विभिन्न कुरीतियों और बाधाओं से निपटने के लिए जरूरी है कि न सिर्फ लड़कों बल्कि लड़कियों में भी शिक्षा का प्रसार किया जाए। माँ परिवार की धुरी होती है, अगर वह शिक्षित हो तो न केवल पूरा परिवार शिक्षित हो जाएगा, बल्कि समाज में भी नई चेतना उत्पन्न हो जायेगी। यही वजह है कि आज महिलाओं में शिक्षा का प्रसार बढता जा रहा है। वर्ष 1961 की जनगणना के अनुसार साक्षर पुरुषों का प्रतिशत 40 और साक्षर महिलाओं का प्रतिशत मात्र 15  था। लेकिन पिछले चार दशकों में महिला साक्षरता दर ने लम्बी छलांग लगाई है। आंकड़ों  की बात करें तो  1971 में महिला साक्षरता दर 22 प्रतिशत थी जो बढते-बढते 2001 में 54.16 प्रतिशत यानी ढार्ऌ गुना हो गई है। यह जबर्दस्त बदलाव इसलिए हो सका कि लड़कियों, विशेषरूप से निर्धन परिवारों की लड़कियों को समाज की मुख्यधारा में लाने के लिए विभिन्न सरकारों ने मुपऊत पुस्तकें, मुपऊत पोशाकें, छात्रवृत्तियां और दोपहर का मुपऊत भोजन देने, छात्रावास बनवाने तथा लाड़ली योजना जैसे प्रोत्साहनकारी कदम उठाए हैं।  6 से 14 वर्ष तक के आयु समूह के लड़के-लड़कियों को नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा देने के अधिकार का विधेयक संसद ने पारित कर सर्वशिक्षा के क्षेत्र में क्रान्तिकारी कदम उठाया है। मानव संसाधन मंत्री श्री कपिल सिब्बल का कहना है कि इस विधेयक के बाद केन्द्र सरकार 18 वर्ष तक के किशोर-किशोरियों के लिए माध्यमिक शिक्षा अभियान चलायेगी। केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने राष्ट्रीय साक्षरता मिशन में अब पूरा जोर महिलाओं की शिक्षा पर देने का निर्णय भी किया है। इस कार्यक्रम के अंतर्गत 1017 तक देश की 80 प्रतिशत महिलाओं को साक्षर बनाया जायेगा।

महिलाओं में शिक्षा प्रसार के सुखद परिणाम दिखाई देने भी लगे हैं। पहला यह है कि सरकारी और गैर-सरकारी कार्यालयों और स्वायत्त-संस्थाओं में महिला कर्मचारियों की संख्या और वर्चस्व बढने लगा है। वर्ष 2004 में की गई सरकारी कर्मचारियों  की जनगणना के अनुसार 1995 में पुरुषों के मुकाबले महिला कर्मचारियों का अनुपात मात्र 7.43 प्रतिशत था। वर्ष 2001 में यह बढक़र 7.53 और 2004 में 9.68 प्रतिशत हो गया।  महिला शिक्षा प्रसार का दूसरा लाभ यह हुआ है कि लड़कियों के प्रति पूर्वाग्रह की भावना और उन्हें परिवार के लिए बोझ मानने की मन:स्थिति समाप्त होते जाने से पुरुषों के मुकाबले महिलाओं का  संख्या-अनुपात बढता जा रहा है। वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार देश में महिलाओं की संख्या पुरुषों के मुकाबले 48 प्रतिशत थी लेकिन इधर अनुपात की खाई कम होते जाने के ठोस प्रमाण मिले हैं। दिल्ली में तो वर्ष 2008 में स्त्री-पुरुष के बीच संख्या अनुपात में महिलाएं आगे निकल गईं हैं।

आधी दुनिया के बहुआयामी मानव-संसाधनों की महत्ता स्वीकारते हुए संविधान में उन्हें अपनी स्थिति सुधारने के लिए न केवल पुरुषों के बराबर अवसर प्रदान किए गए हैं बल्कि प्रत्येक क्षेत्र में अपनी नियति के नियंता बनने के पूरे अधिकार भी दिए गए हैं। वैसे भी महिला सशक्तिकरण एक बहुआयामी और बहुस्तरीय अवधारणा है। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जो महिलाओं को संसाधनों पर अधिक भागीदारी और अधिक नियंत्रण प्रदान करती है। ये संसाधन नैतिक, मानवीय, बौध्दिक और वित्तीय सभी हो सकते हैं। सशक्तिकरण का मतलब है, घर समाज और राष्ट्र के निर्णय लेने के अधिकार में महिलाओं की हिस्सेदारी।  दूसरे शब्दों में सशक्तिकरण का अभिप्राय है अधिकारहीनता से अधिकार प्राप्ति की तरफ बढते क़दम।  शुरूआती कदम के रूप में  लोकतंत्र का प्रथम सौपान है–पंचायतों और नगरपालिकाओं में महिलाओं की भागीदारी।  73वां संविधान संशोधन  पारित होने के बाद अनेक पंचायतों में  कानून के अंतर्गत मिले एक तिहाई आरक्षण से भी अधिक महिला प्रतिनिधि चुने जाने लगे हैं।  अनेक पंचायतों में तो 50 प्रतिशत से भी अधिक महिलाएं चुनी जाती हैं और कहीं-कहीं तो सभी सदस्य महिलाएं होती हैं।  केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने पंचायतों और नगरपालिकाओं के सभी स्तरों पर महिलाओं का आरक्षण मौजूदा एक तिहाई से बढाक़र कम से कम 50 प्रतिशत कर देने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है।  इसके लिए संविधान में संशोधन किया जाएगा। बिहार, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ ताे पहले से ही पंचायतों में महिलाओं के लिए  50 प्रतिशत स्थान आरक्षित कर सशक्तिकरण की दिशा में क्रान्तिकारी कदम उठा चुके हैं। यह कार्यवाही जनवरी, 2006 में एक अध्यादेश के जरिए की गई। उत्तराखंड ने तो एक और कदम आगे बढाते हुए पंचायतों में महिलाओं को 55 प्रतिशत प्रतिनिधित्व दे दिया है। राज्य सभा ने 2 तिहाई से अधिक बहुमत से महिला आरक्षण विधेयक पारित कर महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक युगान्तकारी कदम उठाया है। रही बात लोकसभा और विधान सभाओं में  महिलाओं का प्रतिशत एक तिहाई कर देने का तो इसके लिए संघर्ष जारी है।

न्यूनतम साझा कार्यक्रम में दिए गए छह बुनियादी सिध्दान्तों में भी महिलाओं को शैक्षिक, आर्थिक और कानूनी रूप से सशक्त बनाने के सिध्दान्त को स्वीकारा गया है। इसके अनुसार महिला अधिकारिता को मूर्तरूप देने के लिए महिला सशक्तिकरण आयोग का गठन किया गया है।  महिला अधिकारिता को दिल्ली हाईकोर्ट के एक फैसले से बल मिला है, जिसके अंतर्गत सेना की नौकरी में महिलाओं को भी पुरुषों  की तरह स्थायी कमीशन देने का निर्देश सरकार को दिया गया है।

जब हम इस वित्त वर्ष के आम बजट पर नज़र डालते हैं तो पाते हैं कि  महिला और बाल विकास के लिए योजना व्यय लगभग 50 प्रतिशत बढा दिया  गया है।  महिला साक्षरता दर बढाने के लिए राष्ट्रीय साक्षरता मिशन का पुनर्गठन करके साक्षर भारत नाम से नया कार्यक्रम शुरू किया जा रहा है। इसके अंतर्गत सात करोड़ निरक्षर वयस्कों को साक्षर बनाने का जो लक्ष्य निर्धारित किया गया था, उसमें छह करोड़ महिलाएं शामिल हैं।  महिला कृषकों की जरूरतें पूरी करने के लिए महिला किसान सशक्तिकरण परियोजना आरंभ की जा रही है।

उधर रेल बजट में रेलमंत्री ममता बैनर्जी ने महिलाओं को अपने घर की चारदीवारी से बाहर कदम रखने के लिए प्रेरित करते हुए मातृभूमि नाम से 21 महिला स्पेशल गाड़ियां चलाने की घोषणा की। ये रेलगाड़ियां कोलकाता, चेन्नई, नई दिल्ली और मुम्बई जैसे बड़े शहरों के रेलवे नेटवर्क का हिस्सा होंगी। उन्होंने  80,000 महिला रेल कर्मचारियों की सुख-सुविधाओं की ओर भी ध्यान देते हुए इन कर्मचारियों के  बच्चों के लिए  50 शिशु सदन और 20 होस्टल बनाने का प्रस्ताव  किया।  इतना ही नहीं, महिला यात्रियों की सुरक्षा की बेहतर व्यवस्था के लिए उन्होंने एक महिला वाहिनी बनाने का भी प्रस्ताव किया, जिसमें  महिला रेल सुरक्षा बल की 12 कम्पनियां होंगी।

लेकिन आधी दुनिया के लिए तरह-तरह की सुविधाओं और अधिकारों की बारिश होने के बावजूद अभी सफर लम्बा है। भले ही आज की नारी विगत कल की नारी से कोसों आगे निकल चुकी है, लेकिन फिर भी उसके लिए अभी कई और मंजिलों को छूना बाकी है।

—————–
૩૦.
भारतीय राष्ट्रीय अभिलेखागार
राष्ट्रीय अभिलेखागार के सरकार के पुराने रिकार्डों के संग्रहकर्ता के रूप में 11 मार्च, 2010 को अपना 110 स्थापना दिवस मनाया। सन् 1891 में 11 मार्च के दिन ही इस विभाग की कोलकाता में इंपीरियल सेक्रेटेरिएट बिल्डिंग में इंपीरियल रिकार्ड ऑफिस के रूप में स्थापना हुई थी। जी डब्ल्यू फोरेस्ट इस ऑफिस के पहले प्रभारी नियुक्त किए गए थे।

सन् 1911 में राजधानी कोलकाता से दिल्ली स्थानांतरित होने के बाद यह आवश्यक हो गया कि इंपीरियल रिकार्ड ऑफिस को भी स्थानांतरित किया जाएगा। मौजूदा भवन 1926 में सरकार के रिकार्डों का स्थायी संग्रहालय बन गया। इस भवन का स्वरूप एडविन लुटियन द्वारा तैयार किया गया था। स्वतंत्रता के बाद इसका नाम बदलकर भारतीय राष्ट्रीय अभिलेखागार कर दिया गया और इस संगठन के प्रमुख का पद रिकार्ड-रक्षक से बदलकर निदेशक कर दिया गया। ए. एफ.एम. अब्दुल अली के उत्तराधिकारी डा. एस. एन. सेन 1949 तक अभिलेखागार के निदेशक रहे और उन्होंने इंपीरियल रिकार्ड््स डिपार्टमेंटभारतीय राष्ट्रीय अभिलेखागार की गतिविधियों को एक नया रूप दिया। पहली बार, 1939 में रिकार्ड प्रमाणिक शोधकर्ताओं के लिए उपलब्ध कराए गए और 1947 तक 1902 से पहले के रिकार्ड परामर्श के लिए मुहैया कराए गए। संरक्षण से जुड़ी समस्याओं पर शोध के लिए 1940 में संरक्षण शोध प्रयोगशाला की स्थापना की गयी जो डॉ. सेन की एक बहुत बड़ी दूरदृष्टि थी। सन् 1941 में अभिलेख प्रबंधन में प्रशिक्षण शुरू किया गया तथा सन् 1944 में भारतीय ऐतिहासिक रिकार्ड आयोग में अभिलेख कार्यालयों की युध्दोपरांत पुनर्गठन योजना बनाई गई। सन् 1947 में विभाग का जर्नल भी निकलने लगा जिसमें आधुनिक भारतीय इतिहास, दस्तावेजों के संरक्षण, रिकार्ड-प्रबंधन, रिप्रोग्राफिक्स, अभिलेख संरक्षण के प्रति जनजागरूकता आदि विषयों से संबंधित शोधपत्र शामिल होते हैं।

इस प्रकार भारतीय राष्ट्रीय अभिलेखागार आजादी के बाद पूरे देश में पुरालेख संबंधी क्षेत्र में ज्यादा गतिशील एवं प्रेरक भूमिका निभाने के लिए प्रगति के पथ पर बढता रहा। उसके बाद सार्वजनिक रिकार्ड एकत्रित करने, निजी पत्र एवं पुस्तकालय सामग्री के अधिग्रहण, रिकार्ड प्रबंधन, शोध एवं संदर्भ सामग्री, प्रकाशन, प्रशिक्षण, संरक्षण, रिप्रोग्राफी, बाहरी कार्यक्रम, राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तरों पर समन्वय, क्षेत्रीय इलाकों में कार्यालय का विस्तार जैसी अभिलेखागार की गतिविधियां काफी बढी हैं। विभाग को दर्जे में जून, 1990 में एक और ऊंचाई हासिल हुई जब अभिलेखागार के निदेशक का पद बदलकर महानिदेशक कर दिया गया। फिलहाल भारतीय राष्ट्रीय अभिलेखागार संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत है और भोपाल में इसके क्षेत्रीय कार्यालय हैं तथा जयपुर, पुड्डुचेरी एवं भुवनेश्वर में रिकार्ड केंद्र हैं।

भारतीय राष्ट्रीय अभिलेखागार के पास निजी पत्रों का भंडार है जो विभिन्न स्रोतों से दान एवं सौगात के रूप में मिले हैं। ये पत्र सार्वजनिक रिकार्डों से प्राप्त ज्ञान के लिए महत्त्वपूर्ण पूरक का काम करते हैं। निजी पत्रों में कुछ प्रमुख हैं- महात्मा गांधी, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, दादाभाई नौरोजी, एम आर जयकर, मौलाना आजाद, जी के गोखले, सरदार पटेल,पी डी टंडन, मीनू मसानी आदि के पत्र। अखिलेखागार में इंडियन नेशनल आर्मी की फाइलें भी शामिल हैं।

अभिलेखागार में प्राच्य रिकार्डों के अंतर्गत करीब 1.5 लाख दस्तावेज हैं जिनमें उर्दू, पारसी, अरबी आदि भाषाओं में पांडुलिपियां, परवाना, हुकुम, खैरात, फरमान आदि शामिल हैं। दस्तावेजों के दुर्लभ और मूल्यवान संग्रह में फोर्ट विलियम कॉलेज संग्रह, इनायत जंग संग्रह, मथुरा दस्तावेज, गुजरात दस्तावेज, हल्दिया पत्र आदि शामिल हैं। ये सारे पत्र सार्वजनिक रिकार्ड नियमावली, 1997 के तहत आम लोगों के लिए उपलब्ध हैं।

प्राच्य रिकार्ड संभाग में रिकार्डों का विशाल संग्रह है जिनमें पारसी, अरबी, उर्दू, अंग्रेजी, हिंदी, मोदी, राजस्थानी, मराठी, तुर्की, बंगला और कई अन्य भाषाओं एवं लिपियों में दुर्लभ पांडुलिपियां, एकल यूनिट दस्तावेज और दुर्लभ पुस्तकें शामिल हैं।

इनायत जंग संग्रह में 1,37,000 दस्तावेज हैं और यह आधिकारिक मुगल दस्तावेज हैं। इनमें रिपोर्ट, दैन्दिन लेखाजोखा, और राजस्व आंकड़े शामिल हैं। ये राजस्व आंकड़े नियमित रूप से दक्कन के छह प्रांतों के दीवानों द्वारा दक्कन के प्रमुख दीवान को भेजे जाते थे। संग्रह में निम्नलिखित शासकों के काल से संबंधित दस्तावेज हैं- औरंगजेब (अवधि 1658-1707), आजम शाह (1707), शाह आलम बहादुर शाह प्रथम (1707-12),जहांदार शाह (1712-13), फरूख सेयर(1713-19),रफीउद दाराजात(1719), रफीउद दौलाह(1719), मुहम्मद शाह(1719-48), अहमद शा(1750-52) और शाह आलम द्वितीय (अवधि 1768-74)।

हल्दिया संग्रह में पारसी और उर्दू में 1060 दस्तावेज हैं। ये दस्तावेज राजस्थान में हल्दिया वंश की राजनीतिक भूमिका पर प्रकाश डालते हैं।

अभिलेखागार में प्राच्य भाषाओं खासकर पारसी और उर्दू में 14000 अन्य दस्तावेज हैं। ये दस्तावेज विभिन्न क्षेत्रों से संबंधित हैं और राजसत्ता, समाज एवं संस्कृति के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालते हैं। उदाहरणस्वरूप

• 125 दस्तावेजों का अन्य संग्रह 18वीं-20वीं सदी के दौरान सोनीपत के जमींदार परिवार को मिले कानूनगो और अन्य पदों का विवरण उपलब्ध कराता है।

• 150 दस्तावेजों का अन्य संग्रह मुगल काल में बिहार में राजस्व अनुदान पर प्रकाश डालता है।

• सांडिला और जैस क्षेत्र से संबंधित विशाल दस्तावेज संग्रह व्यक्तियों, धार्मिक प्रमुखों आदि को दी जाने वाले मुपऊत अनुदान पर ब्यौरा प्रदान करता है। ये दस्तावेज मुगल काल में कृषि के स्वरूप एवं कृषि अर्थव्यवस्था में विभिन्न वर्गों की भूमिका पर प्रकाश डालते हैं।

• 63 दस्तावेजों का संग्रह शहरी ढांचों खासकर गुजरात के शहरी ढांचों पर प्रकाश डालता है।

• 70 दस्तावेजों का संग्रह इलाहाबाद क्षेत्र के विशेष संदर्भ में दासप्रथा पर प्रकाश डालता है।

• 133 दस्तावेजों का संग्रह गुजरात (पाकिस्तान) में अंकगणित से संबध्द है।

• एक अन्य संग्रह दक्कन राज्य के राजस्व अनुदान, जागीर प्रशासन आदि विषयों की सूचनाएं उपलब्ध कराता है।

• 25 छायाप्रति दस्तावेज कूच बिहार में मुगल प्रशासन की रूपरेखा बताते हैं।

• 125 दस्तावेजों का संग्रह मालवा क्षेत्र में जमींदारों के उद्भव की कहानी बताता है।

• 150 दस्तावेजों का अन्य संग्रह टोंक के स्थानीय प्रशासन तथा दैन्दिन कार्यों में ईस्ट इंडिया कंपनी के हस्तक्षेप के बारे में बताता है।

• 31 दस्तावेजों का संग्रह ओड़िसा में लखीराज राजस्व मुपऊत अनुदान की ब्रिटिश नीति की जानकारी देता है।

भारतीय राष्ट्रीय अभिलेखागार ने अरबी, ऊर्दू, संस्कृत, शारदा और बंगला आदि भाषाओं में धर्म, इतिहास, शब्दावली, साहित्य, जीवनी, कृषि, और चिकित्सा विज्ञान जैसे विविध विषयों पर खरीदकर या सौगात के रूप में करीब 400 दस्तावेज जुटाए हैं। ये पांडुलिपियां 10 वीं शताब्दी से लेकर 20 वीं शताब्दी के बीच की हैं।

संस्थान ने ऊर्दू, हिंदी, और अन्य प्राच्य भाषाओं में क्रय द्वारा या उपहार के रूप में करीब 300 पुस्तकें हासिल की हैं जो धर्म, इतिहास, साहित्य, जीवनी, कृषि, चिकित्सा विज्ञान एवं यात्रा वृतांत से संबंधित हैं।

ओ आर संभाग का एक महत्त्वूपर्ण संभाग पुस्तकों और पांडुलिपियों का फोर्ट विलियम कालेज संग्रह है। यह महत्त्वपूर्ण संग्रह ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी से कोलकाता के उसके प्रतिष्ठित कॉलेज आफ फोर्ट विलियम के माध्यम से मिला था। इस संग्रह का बड़ा हिस्सा तो इंडिया हाउस, लंदन ले जाया गया और शेष पांडुलिपियां और पुस्तकें तत्कालीन इंपीरियल रिकार्ड ऑफिस (यानी अभी के भारतीय राष्ट्रीय अभिलेखागार) को दे दी गयीं। इस संग्रह में करीब 200 पांडुलिपियाँ और 1000 पुस्तकें तथा कई महत्वपूर्ण कृतियां भी हैं। अरबी, पर्शियन, संस्कृत और बंगाली भाषाओं का यह महत्त्वपूर्ण संग्रह धर्म, शब्दावली, इपिस्टोलोग्राफी, साहित्य, इतिहास, पशुपालन, ज्योतिष, चिकित्सा विज्ञान आदि विषयों पर है। ये पुस्तकें 10 वीं शताब्दी से लेकर 20 वीं शताब्दी तक की हैं। उनमें से कुछ महत्त्वपूर्ण पुस्तके हैं- तफसीर फतह अल अजीज, जवाहर अल तफसीर, फतव-ए-आलमगिरी, फतव-ए-इब्राहीम शाही, फतह-अल कादिर, फतुहात-ए-मक्का, तसव्वुफ-ए-शी, रज्म नामा, भगवत गीता, जबुर, जखीरत अल -मुलक, दबिस्तान-ए- मजाहिब, शमाइल अल नबी, बहार-ए-अजम और शब्दावली की कई किताबें हैं। -फोर्ट विलियम कॉलेज पुस्तक एवं पांडुलिपि संग्रह को छोड़कर दस्तावेजों का बाकी संग्रह उनके प्राप्ति नंबर के अनुसार है। फोर्ट विलियम कॉलेज पुस्तक एवं पांडुलिपि संग्रह हाल ही में एनएआई पुस्तकालय से ओआर संभाग में स्थानांतरित किया गया है जिसे क्रम संख्या के हिसाब से रखा गया है।

एनएआई के पास रामपुर रजा पुस्तकालय की 4000 पांडुलिपियां के ओरिएंटल रिकार्ड आफ माइक्रोफिल्म रोल्स, 16000 अन्य ओरिएंटल रिकार्ड और एक मध्य एशिया पुरावशेष संग्रहालय माइक्रोफिल्म भी है।

भारतीय राष्ट्रीय अभिलेखागार पुस्तकालय में 1,70,000 प्रकाशन हैं जिनमें दुर्लभ पुस्तकें, रिपोर्ट, संसदीय पत्र और बहस, विनिबंध, गजट, गजेटियर, यात्रा वृत्तांत, स्वदेशी अखबार, जर्नल आदि शामिल हैं। यह ज्ञान का सबसे मूल्यवान स्रोत है। ये प्रकाशन आधुनिक इतिहास एवं राजनीति, संस्कृति, जनसांख्यिकी, अभिलेख, अर्थशास्र, सामाजिक विज्ञान, लिंगीय अध्ययन, जनजातीय अध्ययन आदि विषयों के हैं। सूचना प्रौद्योगिकी के मोर्चे पर तेजी से हो रहे विकास के मद्देनजर पुस्तकालय, विद्वानों का काम आसान करने एवं अपनी सेवाओं को उपयोगकर्ताओं के लिए ज्यादा अनुकूल बनाने के लिए आधुनिक प्रौद्योगिकी अपनाने के लिए अपने आप को तैयार कर रहा है। (पसूका)

૩૧.
पारिस्थितिकीय स्वच्छता – स्वच्छता की परम्परागत प्रणाली में महत्त्वूपर्ण परिवर्तन
पूर्ण स्वच्छता अभियान (टीएससी) ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छता संबंधी सुविधाएं सुनिश्चित करने संबंधी सरकार का एक व्यापक कार्यक्रम है। इसका उद्देश्य खुले में मलत्याग या शौच की आदत पर पूरी तरह रोक लगाना और स्वच्छ वातावरण बनाना है। सरकार ने ग्रामीण स्वच्छता को सर्वाधिक महत्त्व दिया है। पिछले पांच वर्षों में ग्रामीण स्वच्छता के लिए आबंटन में लगभग छ: गुना वृध्दि हुई है। मार्च 2012 ग्रामीण क्षेत्रों को खुले में मल त्याग से मुक्ति का और मार्च 2010 विद्यालय और आंगनबाड़ी शौचालय इकाइयों के निर्माण को पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।

लक्ष्य

पूर्ण स्वच्छता अभियान के लक्ष्यों के अंतर्गत ग्रामीण क्षेत्रों में जीवन के सामान्य स्तर में सुधार, स्वच्छता वातावरण में सुधार, जागृति और स्वास्थ्य शिक्षा द्वारा मांग पैदा करना, ग्रामीण क्षेत्रों के सभी स्कूलों और आंगनवाड़ियों में स्वच्छता सुविधाएं उपलब्ध कराना व छात्रों तथा शिक्षकों में स्वास्थ्य संबंधी स्वच्छता की आदतों को बढावा देना, किफायती और उचित प्रौद्योगिकी विकास तथा उनके प्रयोग में लाने को प्रोत्साहित करना एवं पानी तथा गंदगी से फैलने वाली बीमारियों को कम करने का प्रयास करना शामिल है।

पूर्ण स्वच्छता अभियान के अधीन तीस राज्यों केन्द्रशासित प्रदेशों में अब तक 593 परियोजनाएं स्वीकृत की गई हैं। दिसम्बर 2009 तक निजी शौचालय बढक़र 61 प्रतिशत, स्कूली शौचालय 79 प्रतिशत, आंगनवाड़ियों बालवाड़ियों में 60 प्रतिशत हो गए हैं और 52 प्रतिशत सामुदायिक स्वच्छ परिसरों का निर्माण किया गया है। पूर्ण स्वच्छता अभियान के अधीन शौचालयों के अलावा पानी के कम प्रयोग, देश की विभिन्न जल -भौगोलिक दशाओं संबंधी परिस्थितियों को देखते हुए स्वच्छता की टिकाऊ प्रणाली और ठोस एवं द्रव मल प्रबंधन शामिल हैं। पेयजल आपूर्ति विभाग स्वच्छता प्रणाली के लाभों के बारे में जागृति बढाने के लिए राष्ट्रीय अन्तर्राष्ट्रीय एजेंसियों तथा अन्य सरकारी विभागों के साथ मिलकर प्रयास कर रहा है।

पारिस्थितिकीय स्वच्छता

विभिन्न भौगोलिक दशाओं में शौचालय निर्माण के विभिन्न विकल्पों के दस्तावेज तैयार किए जा रहे हैं, ताकि उनके बारे में जानकारी और अनुभव को देशभर में फैलाया जा सके। पारिस्थितिकीय स्वच्छता जल भराव उच्च जल पट्टी और शुष्क क्षेत्रों में पानी के कम इस्तेमाल के विकल्पों में से एक है। पारिस्थितिकीय स्वच्छता प्रणालियां किसी व्यक्ति द्वारा एक वर्ष में उत्सर्जित पोषक तत्वों की मात्रा और उनका भोजन तैयार करने के लिए आवश्यक पोषक तत्वों के बीच स्वाभाविक संतुलन बहाल करते हैं।

मानव मल-मूत्र का उक्त स्थान पर या उसे किसी अन्य स्थान पर ले जाकर निपटान करने की परम्परागत स्वच्छता प्रणाली की विभिन्न सीमाएं हैं। जैसे जल संसाधनों के साथ संदूषण की संभावनाएं, अपशिष्ट उत्पादों का निपटान और निपटान की उच्च लागत। जबकि स्वच्छता के पारिस्थितिकीय सिध्दान्तों के अंतर्गत प्रदूषण का परिहार्य करना शामिल है न कि प्रदूषित होने के बाद उसे नियंत्रित करने का प्रयास करना तथा मल-मूत्र और विष्ठा को स्वच्छीकरण के बाद कृषि कार्यों के लिए प्रयोग में लाना शामिल है।

पारिस्थितिकीय स्वच्छता एक नया प्रतिमान है, जिसका उद्देश्य प्राकृतिक तरीके से पौष्टिक तत्वों का पुन:चक्रीकरण करना है। पारिस्थितिकीय स्वच्छता इस समग्र दृष्टिकोण पर आधारित है कि सामग्री प्रवाह पारिस्थितिकीय टिकाऊ मल-जल प्रबंधन प्रणाली का एक हिस्सा है,जिसे उपयोगकर्ताओं की आवश्यकताओं और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप ढाला जा सकता है।

इस दृष्टिकोण से जन- स्वास्थ्य की रक्षा होती है, प्रदूषण की रोकथाम होती है और इसके साथ-साथ अमूल्य पोषक तत्व तथा खाद जमीन को पुन: प्राप्त हो जाती हैं। पौष्टिक तत्वों के पुन:चक्रीकरण से अनाज की सुरक्षा सुनिश्चित करने में सहायता मिलती है। इससे घरेलू अपशिष्ट जल और जैव अपशिष्ट में व्याप्त जैव तत्वों, पोषक तत्वों और पुन: इस्तेमाल संबंधी उत्पादक ऊर्जा की बहाली होती है तथा उनका फिर से उत्पादक इस्तेमाल किया जा सकता है। हालांकि फिर से प्रयोग मुख्य रूप से कृषि के लिए केन्द्रित है, लेकिन उसके प्रयोग के विकल्प खुले हैं ।

पारिस्थितिकीय स्वच्छता में मल-मूत्र को स्रोत पर ही अलग कर दिया जाता है और उन्हें पानी के साथ मिलाया नहीं जाता। स्वच्छता की इस प्रणाली में बड़ी मात्रा में पानी का रोगजनक तत्वों के साथ संदूषण नहीं होने दिया जाता। इसके अलावा मूत्र- व मल को अलग-अलग संसाधित करने से पोषक तत्वों जैसे फास्फोरस और नाइट्रोजन को प्राप्त करने और उन्हें फिर से प्रयोग में लाना आसान हो जाता है। अवमिश्रण और या संसाधित करने की प्रक्रिया के बाद अलग किए हुए मूत्र को जमीन में साफ-सुथरे स्वास्थ्यकर उर्वरक के रूप में प्रयोग में लाया जा सकता है। इसके विपरीत, विष्ठा या तलछट का आसानी से खाद तैयार किया जा सकता है और जैव अवशिष्ट के साथ मिलाकर अनाज उत्पादन में प्रयोग में लाया जा सकता है। इससे रासायनिक खाद पर हमारी निर्भरता कम हो सकती है।

देश के कुछ भागों में जैसे जम्मू और कश्मीर में लेह- लद्दाख और हिमाचल प्रदेश में लाहौल- स्पीति में पानी के प्रयोग के बिना पारिस्थितिकीय स्वच्छता की वर्षों पुरानी परम्पराएं चली आ रही हैं। पारिस्थितिकीय स्वच्छता प्रणाली की व्यावहारिकता का जायजा लेने के लिए देश के विभिन्न भागों में कई प्रायोगिक परियोजनाएं शुरू की गई थीं। पारिस्थितिकीय स्वच्छता का पहला आधुनिक शौचालय केरल में 1995 में शुरू किया गया था और तमिलनाडु में इसका सफल प्रयोग किया जा रहा है। तमिलनाडु में सुनामी के बाद हुए पुनर्निर्माण के दौरान इसको व्यापक समर्थन प्राप्त हुआ।

समुदाय संगठन और लोक शिक्षा संबंधी सोसाइटी (स्कोप) ने तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली जिले में पारिस्थितिकीय स्वच्छता शौचालयों की 1,000 इकाइयों का निर्माण किया। इसकी विशेषता यह है कि यहां शौचालय के प्रत्येक प्रयोग के लिए प्रयोगकर्ता को 10 पैसे दिए जाते हैं और एकत्र किए गए मूत्र को केले संबंधी राष्ट्रीय अनुसंधान केन्द्र द्वारा केले के उत्पादन में अनुसंधान के प्रयोग में लाया जाता है। शौचालय इस्तेमाल करें और पैसे पाएं — ऐसे ये शौचालय पानी की बचत करते हैं और कृषि उत्पादन के लिए खाद भी तैयार करते हैं।

विभिन्न संस्थानों जैसे केला संबंधी राष्ट्रीय अनुसंधान केन्द्र (एनआरसीबी) और आईआईटी, दिल्ली ने मूत्र और मानवीय वनस्पतिक खाद का कृषि उत्पादन के लिए प्रयोग के कई अध्ययन कार्य किए हैं। वानस्पतिक खाद और मूत्र का प्रयोग रासायनिक उर्वरकों का विकल्प हो सकता है।

सरकार सम्पूर्ण स्वच्छता अभियान के जरिए वैकल्पिक स्वच्छता प्रणाली को प्रोत्साहित कर रही है। देश के विभिन्न भू-वैज्ञानिक क्षेत्रों के लिए उपयुक्त पारिस्थितिकीय स्वच्छता संबंधी मार्ग निर्देश तैयार करने के लिए नवम्बर, 2009 में एक कार्यशाला आयोजित की गई थी। इसके अलावा, सीएसओ गैर-सरकारी संगठनों के साथ भागीदारी में देश भर में पारिस्थितिकीय स्वच्छता शौचालयों के बारे में जागृति पैदा करने और उन्हें बनाने के बारे में अभियान चला रहा है। स्वच्छता संबंधी नए दृष्टिकोणों को बड़े पैमाने पर लागू करने से प्राकृतिक संसाधनों को फिर से प्रयोग में लाने के लाभों के प्रदर्शनों और उन्हें बेहतर तरीके से समझाने में सहायता मिलेगी। विभाग भी पारिस्थितिकीय स्वच्छता प्रणाली के विभिन्न पहलुओं पर अनुसंधान और विकास का समर्थन कर रहा है। समय की मांग है कि स्वच्छता और खाद्य सुरक्षा की चुनौती के बीच संबंध के बारे में सभी स्तरों पर जागृति पैदा की जाए। (पसूका)

—————————-
૩૨.
शिक्षा का अधिकार अब एक मौलिक अधिकार
भारत माता के महान सपूतों में से एक, गोपाल कृष्ण गोखले यदि आज जिंदा होते तो देश के बच्चों के लिए शिक्षा का अधिकार के अपने सपने को साकार होते देखकर सबसे अधिक प्रसन्न होते । गोखले वही व्यक्ति थे, जिन्होंने आज से एक सौ वर्ष पहले ही इम्पीरियल लेजिस्लेटिव एसेम्बली से यह मांग की थी कि भारतीय बच्चों को ऐसा अधिकार प्रदान किया जाए । इस लक्ष्य तक पहुंचने में हमें एक सदी का समय लगा है ।

सरकार ने अंतत: सभी विसंगतियों को दूर करते हुए इस वर्ष पहली अप्रैल से शिक्षा का अधिकार अधिनियम लागू किया है । शिक्षा का अधिकार अब 6 से 14 वर्ष तक के सभी बच्चों के लिए एक मौलिक अधिकार है । सरल शब्दों में इसका अर्थ यह है कि सरकार प्रत्येक बच्चे को आठवीं कक्षा तक की नि:शुल्क पढार्ऌ के लिए उत्तरदायी होगी, चाहे वह बालक हो अथवा बालिका अथवा किसी भी वर्ग का हो । इस प्रकार इस कानून देश के बच्चों को मजबूत, साक्षर और अधिकार संपन्न बनाने का मार्ग तैयार कर दिया है ।

इस अधिनियम में सभी बच्चों को गुणवत्तापूर्ण और अनिवार्य शिक्षा प्रदान का प्रावधान है, जिससे ज्ञान, कौशल और मूल्यों से लैस करके उन्हें भारत का प्रबुध्द नागरिक बनाया जा सके । यदि विचार किया जाए तो आज देशभर में स्कूलों से वंचित लगभग एक करोड़ बच्चों को शिक्षा प्रदान करना सचमुच हमारे लिए एक दुष्कर कार्य है । इसलिए इस लक्ष्य को साकार करने के लिए सभी हितधारकों — माता-पिता, शिक्षक, स्कूलों, गैर-सरकारी संगठनों और कुल मिलाकर समाज, राज्य सरकारों और केन्द्र सरकार की ओर से एकजुट प्रयास का आह्वान किया गया है । जैसा कि राष्ट्र को अपने संबोधन में प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने कहा कि सबको साथ मिलकर काम करना होगा और राष्ट्रीय अभियान के रूप में चुनौती को पूरा करना होगा ।

डॉ. सिंह ने देशवासियों के सामने अपने अंदाज में अपनी बात रखी कि वह आज जो कुछ भी हैं, केवल शिक्षा के कारण ही । उन्होंने बताया कि वह किस प्रकार लालटेन की मध्दिम रोशनी में पढार्ऌ करते थे और वाह स्थित अपने स्कूल तक पहुंचने के लिए लंबी दूरी पैदल चलकर तय करते थे, जो अब पाकिस्तान में है । उन्होंने बताया कि उस दौर में प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करने में भी काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था । वंचित वर्गों के लिए शिक्षा पाने की मांग के संदेश बेहतर रूप में पेश नहीं किए जा सके ।

इस अधिनियम में इस बात का प्रावधान किया गया है कि पहुंच के भीतर वाला कोई निकटवर्ती स्कूल किसी भी बच्चे को प्रवेश देने से इनकार नहीं करेगा । इसमें यह भी प्रावधान शामिल है कि प्रत्येक 30 छात्र के लिए एक शिक्षक के अनुपात को कायम रखते हए पर्याप्त संख्या में सुयोग्य शिक्षक स्कूलों में मौजूद होना चाहिए । स्कूलों को पांच वर्षों के भीतर अपने सभी शिक्षकों को प्रशिक्षित करना होगा । उन्हें तीन वर्षों के भीतर समुचित सुविधाएं भी सुनिश्चित करनी होगी, जिससे खेल का मैदान, पुस्तकालय, पर्याप्त संख्या में अध्ययन कक्ष, शौचालय, शारीरिक विकलांग बच्चों के लिए निर्बाध पहुंच तथा पेय जल सुविधाएं शामिल हैं । स्कूल प्रबंधन समितियों के 75 प्रतिशत सदस्य छात्रों की कार्यप्रणाली और अनुदानों के इस्तेमाल की देखरेख करेंगे । स्कूल प्रबंधन समितियां अथवा स्थानीय अधिकारी स्कूल से वंचित बच्चों की पहचान करेंगे और उन्हें समुचित प्रशिक्षण के बाद उनकी उम्र के अनुसार समुचित कक्षाओं में प्रवेश दिलाएंगे । सम्मिलित विकास को बढावा देने के उद्देश्य से अगले वर्ष से निजी स्कूल भी सबसे निचली कक्षा में समाज के गरीब और हाशिये पर रहने वाले वर्गों के लिए 25 प्रतिशत सीटें आरक्षित करेंगे ।

इन लक्ष्यों पर जोर देने की जरूरत है । किन्तु उन्हें साकार करना एक बड़ी चुनौती हे । देश में लगभग एक करोड़ बच्चे स्कूलों से वंचित हैं, जो अपने आप में एक बड़ी संख्या है । प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी, स्कूलों में सुविधाओं का अभाव, अतिरिक्त स्कूलों की आवश्यकता और धन की कमी होना अन्य बड़ी चुनौतियां हैं ।

मौजूदा स्थिति चौंकाने वाली है । लगभग 46 प्रतिशत स्कूलों में बालिकाओं के लिए शौचालय नहीं हैं, जो माता-पिता द्वारा बच्चों को स्कूल नहीं भेजने का एक प्रमुख कारण है । देशभर में 12.6 लाख शिक्षकों के पद खाली हैं । देश के 12.9 लाख मान्यता प्राप्त प्रारंभिक स्कूलों में अप्रशिक्षित शिक्षकों की संख्या 7.72 लाख है, जो कुल शिक्षकों की संख्या का 40 प्रतिशत है । लगभग 53 प्रतिशत स्कूलों में अधिनियम के प्रावधान के अनुसार निर्धारित छात्र-शिक्षक अनुपात 1: 30 से अधिक है ।

इस अधिनियम के क्रियान्वयन में प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी एक प्रमुख बाधा है । इन रिक्तियों को भरने के उद्देश्य से अगले छ: वर्षों में लगभग पांच लाख शिक्षकों को भर्ती करने की योजना है ।

जहां तक धन की कमी का प्रश्न है, इस अधिनियम में राज्यों के साथ हिस्सेदारी का प्रावधान है, जिसमें कुल व्यय मे केन्द्र सरकार का हिस्सा 55 प्रतिशत है । एक अनुमान के अनुसार इस अधिनियम के क्रियान्वयन के लिए अगले पांच वर्ष में 1.71 लाख करोड़ रुपये की जरूरत होगी और मौजूदा वर्ष में 34 हजार करोड़ रुपये की आवश्यकता होगी । इनमें से केन्द्रीय बजट में 15,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है । वहीं दूसरी ओर केन्द्र सरकार द्वारा शैक्षिक कार्यक्रमों के लिए पहले से राज्यों को दिए गए लगभग 10,000 करोड़ रुपये का व्यय नहीं हो पाया है । इस अधिनियम के क्रियान्वयन के लिए वित्त आयोग ने राज्यों को 25,000 करोड़ रुपये आबंटित किए हैं । इसके बावजूद, बिहार, उत्तर प्रदेश और ओड़िशा जैसे राज्यों ने अतिरिक्त निधि की मांग की है । प्रधानमंत्री ने यह स्पष्ट किया है कि इस अधिनियम के क्रियान्वयन में धन की कमी नहीं होने दी जाएगी । इस परियोजना की सफलता के लिए सभी हितधारकों की ओर से एक ईमानदार पहल की आवश्यकता है । इस कानून के उल्लंघन पर नजर रखने के लिए एक बाल अधिकार आयोग गठित किया जाएगा ।

हमारे सामने कई अन्य चुनौतियां भी होंगी । निम्न आय समूह वाले माता-पिता परिवार की आय बढाने के लिए अपने बच्चों को काम करने के लिए भेजते हैं । कम उम्र में विवाह होना और जीविका के लिए लोगों का प्रवास करना भी ऐसे मुद्दे हैं जिनका हल करना इस अधिनियम के सफलातापूर्वक क्रियान्वयन के लिए आवश्यक है ।

इस प्रकार भारत ने वैधानिक समर्थन के साथ एक सशक्त देश की आधारशिला रखने के लिए एक व्यापक कार्यक्रम शुरू किया है । यह उन देशों के एक छोटे समूह में शामिल हुआ हे, जिनके पास ऐसे वैधानिक प्रावधान मौजूद हैं । वास्तव में यह शिक्षा को व्यापक बनाने की दिशा में उठाया गया एक अद्वितीय कदम है । प्रधानमंत्री ने यह स्पष्ट किया है कि दलितों, अल्पसंख्यक और बालिकाओं को शिक्षा प्रदान करने के लिए मुख्य रूप से प्रयास किया जाएगा । प्रधानमंत्री ने हरेक भारतीय को सुंदर भविष्य का सपना देखने की अपनी चाहत के बारे में बताकर प्रत्येक भारतीय को साक्षर बनाने हेतु अपनी सरकार की प्रतिबध्दता के बारे मे अवगत करा दिया है । अब इस लक्ष्य की ओर देखना हम सबका दायित्व है । शिक्षा का मुद्दा भारत के संविधान की समवर्ती सूची में शामिल है, अत: इसके लिए सभी स्तरों पर बेहतर सहयोग की जरूरत है । (पसुका)

##

घोषणा इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं और यह जरूरी नहीं है कि वे पसूका के विचारों से मिलते हों । अशोक हांडू

૩૩.
शहरी भारत के स्वास्थ्य संबंधी खतरे

विश्व स्वास्थ्य दिवस -7 अप्रैल

इस वर्ष विश्व स्वास्थ्य दिवस स्वास्थ्य पर शहरीकरण के प्रभाव विषय पर केंद्रित है। इस बार विश्व स्वास्थ्य संगठन ”1000 शहर-1000 जीवन” अभियान लेकर आया है। यह अभियान स्वास्थ्य गतिविधियों के लिए सड़कों को खोलने के लिए शहरों के आह्वान के साथ दुनिया भर में आयोजित किया जाएगा। बाकी सभी की तरह यह विषय भारतीय संदर्भ में भी बहुत ज़रूरी माना जाता है जहां स्वास्थ्य मंत्री श्री गुलाम नबी आज़ाद कहते हैं, ” यद्यपि हम अपना आर्थिक सूचकांक सुधार रहे हैं, मगर फिर भी हम अब तक दुनिया में बीमारी का बोझ बढ़ाने के सबसे बड़े योगदानकर्ता बने हुए हैं। ”

अनुमान बहुत भयावह हैं। आज वयोवृध्द लोगों की आबादी बढ़ने तथा ज्यादा महत्त्वपूर्ण रूप से तेजी से हुए शहरीकरण के कारण असंक्रामक रोग (एनसीडी), विशेषरूप से कार्डियोवस्कुलर रोग (सीवीडी), डायबिटीज मेलिटस, कैंसर, आघात और जीर्ण फेफड़ा रोग प्रमुख स्वास्थ्य समस्याओं के रूप में उभरे हैं। भारत में हुए सर्वेक्षणों से पता चलता है कि करीब 10 प्रतिशत वयस्क उच्च रक्त चाप से पीड़ित हैं। हृदयवाहिका यानी कार्डियोवस्कुलर रोगों में वृध्दि जारी है। भारत में अस्थानिक अरक्तता हृदय रोगों के कारण मृत्यु की संख्या 1990 में 12 लाख से बढ़कर वर्ष 2000 में 16 लाख तथा 2010 में 20 लाख होने का अनुमान है। जीवन के बेहद उत्पादक दौर में अपरिपक्व मातृ अस्वस्थता दर और मृत्यु दर भारतीय समाज और उसकी अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती है। अनुमान है कि वर्ष 2005 में भारत में हुई कुल मौतों (10,362,000) में एलसीडी का योगदान 5,466,000 (53 प्रतिशत) था। इस भयावह आंकड़े से शहर बहुत अधिक त्रस्त हैं। अगर उपचारात्मक उपाय नहीं किए गए तो भविष्य में भी कोई राहत मिलने की उम्मीद नहीं है। विश्व बैंक का अनुमान है कि 2035 तक शहर दुनिया भर में गरीबी के प्रधान स्थल बन जाएंगे। शहरी गरीबों की स्वास्थ्य समस्याओं में हिंसा, जीर्ण रोग, और टीबी एवं एचआईवी#एड्स जैसे संक्रामक रोगों के लिए जोखिम में वृध्दि शामिल है।

संकट से निपटना

भारत ने इस स्थिति पर ध्यान दिया है तथा स्थिति से निपटने के लिए ठोस शुरूआत की है। दस राज्यों के दस जिलों में (प्रत्येक में एक) मधुमेह, कार्डियो-वस्कुलर रोगों और आघात से बचाव एवं नियंत्रण के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम (एनपीसीडीएस) की प्रायोगिक परियोजना शुरू की गई है। ग्यारहवीं योजना में इसके लिए कुल योजना आबंटन 1620.5 करोड़ रुपए है। अन्य बातों के अलावा एनपीसीडीएस इस रोग के बारे में जल्दी पता लगाने की सुविधा उपलब्ध कराने के लिए है। इस योजना के तहत पूरे देश को लाया जाएगा। स्वास्थ्य को प्रोत्साहन एनसीडी से बचाव और नियंत्रण का प्रमुख घटक है। इसमें समर्थक माहौल उपलब्ध कराने के लिए नीतिगत हस्तक्षेप के साथ शैक्षिक गतिविधियां शामिल होनी चाहिए। यह उल्लेख करना प्रासंगिक है कि एनसीडी नियंत्रण के लिए स्वास्थ्य प्रोत्साहन सरल संदेश के साथ दिया जा सकता है अर्थात नमक एवं चीनी का कम इस्तेमाल, व्यायाम, तनाव से बचना, तंबाकू एवं अल्कोहल के सेवन से बचना तथा सब्जियों एवं फलों का इस्तेमाल बढ़ाना। इन आसान से उपायों से एनसीडी से बचाव किया जा सकता है या इसे ज्यादा देर तक टाला जा सकता है।

असंक्रामक रोगों के क्षेत्र में अनेक पहल की गई हैं अर्थात राष्ट्र्र्रीय बधिरता नियंत्रण कार्यक्रम, राष्ट्रीय वयोवृध्द स्वास्थ्य देखरेख कार्यक्रम, राष्ट्रीय मौखिक स्वास्थ्य कार्यक्रम। अनुमान है कि हमारी सड़कों पर रोजाना 275 व्यक्ति मरते हैं तथा 4,100 घायल होते हैं। इस तथ्य के मद्देनज़र, स्वास्थ्य मंत्रालय ने राष्ट्रीय राजमार्ग सुश्रुत देखरेख परियोजना शुरू की जो अपनी तरह की महत्त्वाकांक्षी परियोजना है तथा इसके तहत सम्पूर्ण स्वर्णिम चतुर्भुज तथा उत्तर-दक्षिण-पूर्व-पश्चिम गलियारों को शामिल करने का इरादा है तथा इन्हें 200 अस्पताल, अस्पताल-पूर्व देखरेख इकाई तथा एकीकृत संचार प्रणाली के साथ उन्नत किया जा रहा है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना बड़े पैमाने पर अछूती आबादी को स्वास्थ्य सेवाओं के दायरे में लाने की एक अन्य पहल है।

योजना ही कुंजी है

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, शहरीकरण सहज रूप में सकारात्मक या नकारात्मक नहीं होता है। निम्न घटक भी सामाजिक निर्धारकों के रूप में संदर्भित हैं- शहरी ठिकानों का अभिसरित होना जो स्वास्थ्य दशा और अन्य निष्कर्षों को बहुत ज्यादा प्रभावित करता है। इन निर्धारकों में भौतिक बुनियादी ढांचा, सामाजिक एवं स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच, स्थानीय शासन, और आमदनी एवं शैक्षिक अवसरों का वितरण शामिल हैं। एचआईवी#एड्स और टीबी जैसे संक्रामक रोग, हृदय रोग एवं मधुमेह, मानसिक विकार जैसे जीर्ण रोगों तथा हिंसा एवं सड़क यातायात दुर्घटनाओं के कारण हुई मृत्यु – सभी इन सामाजिक निर्धारकों से निर्देशित हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने शहरी केंद्रों में स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच के संबंध में बढ़ती असमानता पर चिंता प्रकट की है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का दृढ़ विश्वास है कि सक्रिय परिवहन, शारीरिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए निर्धारित क्षेत्रों में निवेश और तंबाकू पर नियंत्रण एवं खाद्य सुरक्षा के लिए कानून पारित करने के जरिए शहरी आयोजना स्वस्थ व्यवहारों एवं सुरक्षा को बढ़ावा दे सकती है। आवास, पानी एवं स्वच्छता के क्षेत्रों में शहरी जीवन दशाओं में सुधार करना स्वास्थ्य जोखिमों के उन्मूलन में बहुत मददगार होगा। ऐसे कार्यो के लिए अनिवार्य रूप से अतिरिक्त वित्त की ज़रूरत नहीं होगी लेकिन प्राथमिकता वाले कार्यक्रमों के लिए संसाधनों को पुननिर्देशित करने की प्रतिबध्दता की ज़रूरत होगी, इस प्रकार ज्यादा कार्यदक्षता हासिल की जा सकेगी।

शहरीकरण हमारे समय की वास्तविकता है, हम इसे सकारात्मक मानकर अनुक्रिया करें या नकारात्मक मानकर यह पूरी तरह हमारे ऊपर निर्भर है। इस संदर्भ में शहरीकरण नीति संबंधी चुनौती भी है और महत्त्वपूर्ण व्यक्तिगत विकल्प भी। स्वस्थ आदतों को आत्मसात करके तथा तत्काल खपत के बजाय संसाधनों को लंबे समय तक कायम रखने के प्रति चिंतित होकर ही समाज इस वास्तविकता का सामना ज्यादा सार्थक ढंग से कर सकता है। (पसूका)

* स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय तथा विश्व स्वास्थ्य संगठन से प्राप्त सामग्री पर आधारित

૩૪.
नदियों में प्रदूषण

पिछले कुछ वर्षों में औद्योगिकीकरण एवं शहरीकरण के कारण प्रमुख नदियों में प्रदूषण का बोझ बढ गया है। सिंचाई, पीने के लिए, बिजली तथा अन्य उद्देश्यों के लिए पानी के अंधाधुंध इस्तेमाल से चुनौती काफी बढ गयी है।

प्रदूषण का स्रोत

नदियां नगर निगमों के शोधित एवं अशोधित अपशिष्ट एवं औद्योगिक कचरे से प्रदूषित होती हैं। सभी बड़े एवं मझौले उद्योगों ने तरल अपशिष्ट शोधन संयंत्र लगा रखे हैं और वे सामान्यत: जैव रसायन ऑक्सीजन मांग (बीओडी) के निर्धारित मानकों का पालन करते हैं। हालांकि कई औद्योगिक क्षेत्र देश के कई हिस्सों में प्रदूषण को काफी बढा देते हैं। नगर निगम अपशिष्ट के मामले में ऐसा अनुमान है कि प्रथम श्रेणी शहर (423) और द्वितीय श्रेणी शहर (449) प्रति दिन 330000 लाख लीटर तरल अपशिष्ट उत्सर्जित करते हैं जबकि देश में प्रति दिन तरल अपशिष्ट शोधन की क्षमता महज 70000 लाख लीटर है। अपशिष्ट पदार्थों के शोधन का काम संबंधित नगर निगमों का होता है। जबतक ये निगम प्रशासन पूर्ण क्षमता तक अपशिष्टों का शोधन नहीं कर लेते तबतक डीओबी की समस्या का समाधान नहीं हो सकता है।

नदी संरक्षण केंद्र और राज्य सरकारों के सामूहिक प्रयास से लगातार चल रहा है। राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना (एनआरसीपी) के तहत नदियों के पानी की गुणवत्ता में सुधार के लिए प्रदूषण घटाने संबंधी कार्य चलाए जा रहे हैं। एनआरसीपी के तहत 20 राज्यों में  गंगा, यमुना, दामोदर, और स्वर्णरेखा समेत 37 नदियों के प्रदूषित खंडों पर ध्यान दिया जा रहा है। जवाहर लाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी नवीकरण मिशन जैसी अन्य केंद्रीय योजनाओं तथा राज्यों की शहरी अवसरंचना विकास योजना जैसी योजनाओं के तहत भी नदी संरक्षण गतिविधियां चल रही हैं।

नदी संरक्षण कार्यक्रम के क्रियान्वयन पर भूमि अधिग्रहण की समस्या, सृजित परिसंपत्तियों के सही प्रबंधन नहीं हो पाने, अनियमित बिजली आपूर्ति, सीवरेज शोधन संयंत्रों के कम इस्तेमाल आदि का प्रतिकूल असर पड़ता है।

प्रदूषित खंड

फिलहाल, 282 नदियों पर 1365 प्रदूषित खंड केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एसपीसीबी) के नजर में हैं।

सीपीसीबी ने वर्ष 2000 में पानी की गुणवत्ता संबंधी आंकड़े के आधार पर प्रदूषित खंड की सूची को अद्यतन किया था। 86 प्रदूषित जलाशयों खंडों की पहचान की गयी। उनमें से 71 नदियों, 15 झीलों और तालाबों से संबंधित हैं। बाद में सन् 2000 से 2006 तक के सात वर्षों के दौरान  पानी की गुणवत्ता संबंधी आकंड़ों के आधार पर 178 प्रदूषित जलाशयों खंडों की पहचान की गयी जिनमें से 139 नदियों से , 33 झीलों, तालाबों आदि से तथा तीन छोटी नदियों एवं तीन नहरों से संबंधित हैं।

प्रदूषित खंड की पहचान के मापदंड

प्रदूषित खंड वह क्षेत्र है जहां पानी की गुणवत्ता का वांछित स्तर बीओडी के अनुकूल नहीं होता। फिलहाल , जिन जलाशयों का बीओडी 6 मिलीग्राम1 से ज्यादा होता है उन्हें प्रदूषित जलाशय कहा जाता है। नदी के किसी भी हिस्से में पानी की उच्च गुणवत्ता संबंधी मांग को उसका निर्धारित सर्वश्रेष्ठ उपयोग समझा जाता है।  हर निर्धारित सर्वश्रेष्ठ उपयोग के लिए गुणवत्ता संबंधी शर्त सीपीसीबी द्वारा तय किया गया है।

श्रेणी ए के तहत जल की गुणवत्ता बताती है कि बिना किसी शोधन के वह पेयजल स्रोत है जिसमें कीटाणुशोधन के बाद, घुल्य ऑक्सीजन छह मिलीग्राम1,  बीओडी 2 मिलीग्राम1, या कुल कॉलिफॉर्म 50एमपीएन100 एमएल होना चाहिए।

श्रेणी बी का पानी केवल नहाने योग्य होता है। इस पानी में घुल्य ऑक्सीजन 5 मिलीग्राम1 या उससे अधिक होना चाहिए और बीओडी -3एमजी1 होना चाहिए। कॉलीफार्म 500 एमपीएन100(वांछनीय) होना चाहिए लेकिन यदि यह 2500एमपीएन100एमएल हो तो यह अधिकतम मान्य सीमा है।

श्रेणी सी का पानी पारंपरिक शोधन और कीटाणुशोधन के बाद पेयजल स्रोत है। घुल्य ऑक्सीजन 4 मिलीग्राम1 या उससे अधिक होना चाहिए तथा बीओडी 3 मिलीग्राम1 या उससे कम  होना चाहिए तथा कॉलीफार्म 5000एमपीएन100 एमएल होना चाहिए।

श्रेणी डी और ई का पानीद्ग वन्यजीवों के लिए तथा सिंचाई के लिए होता है। घुल्य ऑक्सीजन 4 मिली ग्राम1 उससे अधिक होना चाहिए तथा 1.2एमजी1 पर मुक्त अमोनिया जंगली जीवों के प्रजनन एवं मात्स्यिकी के लिए अच्छा माना जाता है। 2250 एमएचओएससीयू बिजली संचालकता, सोडियम अवशोषण अनुपात 26 और उससे कम तथा बोरोन 2 एमजी1 वाले पानी का इस्तेमाल  सिंचाई, औद्योगिक प्रशीतन और नियंत्रित अपशिष्ट निवारण के लिए किया जा सकता है।

एनआरसीपी एवं इसका कवरेज

केंद्र प्रायोजित राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना (एनआरसीपी) की  केंद्र सरकार राज्य सरकारें  मिलकर चलाती हैं और दोनों मिलकर इसका खर्च वहन करते हैं। देश में एनआरसीपी के तहत 20 राज्यों के 166 शहरों में 37 प्रमुख नदियों के चिह्नित प्रदूषित खंडों में प्रदूषण कम करने का कार्य चल रहा है।  एनआरसीपी के तहत इन परियोजनाओं के लिए 4391.83 करोड़ रूपए अनुमोदित किए गए हैं जबकि अबतक 3868.49 करोड़ रूपए व्यय किए जा चुके हैं।  फिलहाल 1064 अनुमोदित परियोजनाओं में से 783 पूरी हो चुकी हैं तथा 4212.81 एमएलडी अनुमोदित क्षमता में से 3057.29 एमएलडी तक की सीवरेज क्षमता तैयार कर ली गयी है। इन आंकड़ों में गंगा कार्य योजना के  तहत किए जा रहे कार्य शामिल हैं और नदी कार्य योजनाओं के तहत तैयार की गयी जीएपी-।.ए सीवरेज शोधन क्षमता इसमें शामिल नहीं हैं।

एनआरसीपी के उद्देश्य

एनआरसीपी के तहत नदियों में पानी की गुणवत्ता में सुधार के लिए प्रदूषण निम्नीकरण कार्य किए जाते हैं ताकि पानी स्नान के लायक हो। इनमें अपशिष्टों को नदी में बहने से रोकना और उसे शोधन के लिए भेजना,  नदीतट पर खुले में शौच पर रोक लगाने के लिए सस्ते शौचालय की व्यवस्था करना, शवों की अंत्येष्टि के लिए बिजली शवदाह गृह या उन्नत किस्म के जलावन वाले शवदाह गृह की व्यवस्था करना, स्नान के लिए घाटों में सुधार जैसे सौंदर्यीकरण कार्य करना तथा लोगों के बीच प्रदूषण के प्रति जागरूकता फैलाना शामिल है।

एनआरसीपी के तहत धन की व्यवस्था

नदी स्वच्छता कार्यक्रम के लिए धन जुटाने की व्यवस्था में पिछले कई वर्षों  के दौरान कई बदलाव हुए हैं। गंगा कार्य योजना (जीएपी), जो 1985 में शुरू हुई थी, शत प्रतिशत केंद्र पोषित योजना थी। जीएपी के दूसरे चरण में 1993 में आधी राशि केद्र सरकार और आधी राशि संबंधित राज्य सरकारों द्वारा जुटाए जाने की व्यवस्था की गई। एक अप्रैल, 1997 में यह व्यवस्था फिर बदल दी गयी और शत प्रतिशत धन केंद्र की मुहैया कराने लगा। एक अप्रैल, 2001 से केंद्र द्वारा 70 प्रतिशत राशि और राज्य द्वारा 30 प्रतिशत राशि जुटाने की व्यवस्था लागू हो गयी। इस 30 प्रतिशत राशि का एक तिहाई पब्लिक या स्थानीय निकाय के शेयर से जुटाया जाना था।

ग्यारहवीं योजना में एनआरसीपी के तहत  कार्यों के लिए 2100 करोड़ रूपए दिए गए जबकि अनुमानित आवश्यकता 8303 करोड़ रूपए की थी और यह अनुमान योजना आयोग द्वारा नदियों के मुद्दे पर गठित कार्यबल की रिपोर्ट में जारी किया गया था। एनआरसीपी के तहत वित्तीय वर्ष 2007-08 के दौरान 251.83 करोड़ रूपए तथा 2008-09 के दौरान 276 करोड़ रूपए व्यय किए गए।

कार्यान्वयन में समस्याएं

यह देखा गया कि सीवरेज शोधन संयंत्रों जैसी परिसंपत्तियों के निर्माण के बाद राज्य सरकारों स्थानीय शहरी निकायों ने उनके प्रबंधन एवं रखरखाव पर ध्यान नहीं दिया। प्रबंधन एवं रखरखाव के लिए बिजली की आपूर्ति नहीं करने, इन परिसंपत्तियों के प्रबंधन एवं रखरखाव के लिए उपयुक्त कौशल एवं क्षमता के अभाव जैसे कई मामले सामने आए हैं। नदी तटों पर लगातार बढती ज़नसंख्या और औद्योगिकीकरण तथा फिर उस जनसंख्या के हिसाब से प्रदूषण निम्नीकरण कार्य शुरू करने के लिए वित्तीय संसाधनों की कमी के चलते हमेशा ही प्रदूषण निम्नीकरण कार्यों में पिछला कुछ कार्य बच जाता है।

नदी कार्य योजना की आंशिक सफलताएं

एसटीपी के माध्यम से नदियों के प्रदूषण रोकने की सीमित पहल की गयी है। राज्य सरकारें अपनी क्रियान्वयन एजेंसियों के माध्यम से प्रदूषण निम्नीकरण कार्य करती है। लेकिन इस कार्य को उचित प्राथमिकता नहीं दी जाती है। परिसंपत्तियों के प्रबंधन एवं रखरखाव पक्ष की अक्सर उपेक्षा होती है। दूसरा कारण यह है कि कई एसटीपी में बीओडी और एसएस के अलावा कॉलीफार्म के नियंत्रण के लिए सीवरेज प्रबंधन नहीं किया जाता है। सिंचाई, पीने के लिए, तथा बिजली के लिए भी राज्यों द्वारा पानी का दोहन नियंत्रित ढंग से नहीं किया जाता है। पानी के दोहन जैसे मुद्दों पर अंतर-मंत्रालीय समन्वय का भी अभाव है। अबतक नदियों का संरक्षण कार्य घरेलू तरल अपशिष्ट की वजह से होने वाले प्रदूषण के रोकथाम तक ही सीमित है।  जलीय जीवन की देखभाल, मृदा अपरदन के रोकथाम आदि के माध्यम से नदियों की पारिस्थितिकी में सुधार आदि कार्यों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। (पसूका)

૩૫.
समेकित तटीय क्षेत्र प्रबंधन परियोजना

समेकित तटीय क्षेत्र प्रबंधन परियोजना (आईसीजेडएम) 7,500 कि.मी. लंबी तटरेखा, तटरेखा बदलाव का प्रभाव और देश में समुद्र स्तर में वृध्दि के अध्ययन का पहला प्रयास है। परियोजना के तहत छह करोड़ लोग आएंगे जो तटीय क्षेत्रों में रहते हैं। विश्व बैंक से सहायता प्राप्त 1156 करोड़ रूपए की यह परियोजना पर्यावरण एवं वन मंत्रालय द्वारा अगले पांच सालों में क्रियान्वित की जाएगी। विश्व बैंक इस परियोजना के लिए बतौर आसान त्रऽणआईडीए त्रऽण 897 करोड़ रूपए यानी 78 फीसदी का योगदान कर रहा है। इस  आईसीजेडएम परियोजना का जलवायु परिवर्तन की दृष्टि से विशेष महत्व है क्योंकि आईपीसीसी के निष्कर्षों में एक के अनुसार वैश्विक तापमान में वृध्दि की वजह से औसत समुद्री स्तर बढ गया है। परियोजना के तहत चार तत्वों- तटरेखा बदलाव, ज्वार-भाटा, लहरें और समुद्र स्तर में वृध्दि पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।

इस परियोजना से प्रत्यक्ष रूप से करीब 15 लाख लोग लाभान्वित होंगे जबकि अप्रत्यक्ष रूप से करीब 6करोड़ लोगों को इसका लाभ पहुंचेगा। प्रारंभ में, तट पर दबाव, गंभीर पारिस्थितिकी तंत्रों की मौजूदगी, प्राकृतिक खतरों के जोखिम आदि के आधार पर तीन राज्यों को इस परियोजना के लिए चुना गया है।  एशियाई विकास बैंक कर्नाटक, महाराष्ट्र और गोवा को कम चौड़ी तटरेखा प्रबंधन में सहयोग कर रहा है । ऐसा प्रस्ताव है कि परियोजना का दूसरा चरण शेष तटवर्ती राज्यों में शुरू किया जाएगा और इस संदर्भ में परियोजना की तैयारी भी चल रही है।

समेकित तटीय क्षेत्र प्रबंधन परियोजना के चार प्रमुख तत्व हैं जिसमें कच्छ की खाड़ी और जामनगर के साथ-साथ सुंदरबन, हल्दिया और दिघाशंकरपुर में राष्ट्रीय आईसीजेडएम क्षमता निर्माण और ओड़िसा में आर्दभूमि प्रबंधन शामिल हैं।

राष्ट्रीय आईसीजेडएम क्षमता निर्माण

इसके तहत 356 करोड़ रूपए व्यय किए जाएंगे। इसमें चार प्रमुख गतिविधियां शामिल हैं-

भारत की मुख्य भूमि से लगे तट जोखिम रेखा निर्धारण या मानचित्रण तथा तटीय तलछट क्षेत्र का निर्धारण ।

देश की 7500 किलोमीटर लंबी तटरेखा की सुरक्षा के लिए नियमों के निर्धारण के दो दशक बाद सरकार ने अंतत: पूरी तटरेखा के लिए भारत की पहली जोखिम रेखा खींचने को मंजूरी दे दी है। जोखिम रेखा समुद्र से वह दूरी है है  जहां तक लहरें   पहुंच सकती हैं। यह रेखा, तटरेखा बदलाव, ज्वार-भाटा द्वारा तय की गयी दूरी और नियमित लहरों तथा समुद्र स्तर में वृध्दि को ध्यान में रखकर खींची जाएगी। एक बार जब यह रेखा खींच ली जाएगी , इसके बाद इस रेखा के पार रहने वाले लोगों को असली समस्या और उससे जुड़े जोखिम के बारे में बताया जाएगा। कुछ ऐसे लोग जो इस खतरनाक रेखा के समीप रहते हैं और जिनपर समुद्री प्राकृतिक आपदा का खतरा बना रहता है,  उन्हें  इस परियोजना के पूरे होने के बाद वहां से स्थानांतरित कर दिया जाएगा। केंद्र ने पहले बगैर खतरनाक रेखा खींचे ही तट के समीप वाणिज्यिक और विकास गतिविधियों का प्रस्ताव रखा था। पर्यावरण कार्यकर्ता काफी समय से यह  रेखा खींचे जाने की मांग कर रहे हैं।

सर्वे ऑफ इंडिया हवाई सर्वेक्षण और सेटेलाइट छायाचित्रण प्रणाली के माध्यम से इस व्यापक और सघन अभियान को चलाएगा। इस दो वर्षीय परियोजना पर 125 करोड़ रूपए का खर्च आएगा। विशेषज्ञ हवाई फोटोग्राफी और सेटेलाइट आंकड़ों के सघन इस्तेमाल के माध्यम से इस रेखा को खींचने और पर्यावरण की दृष्टि से संवदेनशील क्षेत्रों, जिनका संरक्षण जरूरी है, की पहचान करने की योजना बना रहे हैं।

मानचित्रण से जोखिम रेखा निर्धारण या तट के आसपास रहने वाले समुदायों और अवसंरचना की सुरक्षा में मदद मिलेगी। जोखिम रेखा निर्धारण परियोजना का पहला चरण गुजरात, ओड़िसा और पश्चिम बंगाल में शुरू किया जाएगा। इन राज्यों का चयन समुद्र से उन्हें खतरे की संभाव्यता और तट पर चल रहे विकास कार्यों के आधार पर किया गया है।

पर्यावरण की दृष्टि से संवदेनशील क्षेत्रों , जिनका संरक्षण  जरूरी है, का मानचित्रण एवं रेखांकन

परियोजना के अंग के रूप में सरकार पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्रों को चिह्नित करेगी। पश्चिम बंगाल की न्यू मूर आइसलैंड घटना जैसी पुनरावृत्ति  को रोकने के लिए, जहां समुद्र के स्तर में वृध्दि के कारण यह द्वीप डूब गया था, पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान करने का फैसला किया है । पश्चिम बंगाल में सुंदरबन पर्यावरण की दृष्टि से बहुत ही संवेदनशील क्षेत्र है और इसपर जलवायु परिवर्तन का बहुत असर पड़ने की संभावना है। इसे गंभीर रूप से खतरा संभावित क्षेत्रों के रूप में वगीकृत किया जाएगा। सुंदरबन, जो 50 लाख लोगों, 70 बाघों और मैंग्रोव की 50 प्रजातियों का घर है, की पारिस्थितिकी के  संरक्षण के लिए भारत और बंगलादेश संयुक्त कार्य योजना तैयार करेंगे क्योंकि यह क्षेत्र दोनों देशों में फैला हुआ है।

इस परियोजना के तहत मैंग्रोव, खारा पानी, आर्द्रभूमि, प्रवाल भित्ति जैसे संरक्षण वांछित तटीय क्षेत्रों की पहचान और निर्धारण किया जाएगा और इसके आधार पर गंभीर रूप से खतरा संभावित तटीय क्षेत्र नामक नई श्रेणी बनाई जाएगी । उस श्रेणी के संरक्षण एवं पुनर्जीवन के लिए उपयुक्त प्रबंधन योजना तैयार कर उसे लागू किया जाएगा। इसके तहत लक्षदीप, अंडमान निकोबार द्वीप समूह, गुजरात में खंभात की खाड़ी और कच्छ की खाड़ी, महाराष्ट्र में वसाई-मनोरी, अर्करत्नागिरि, कर्नाटक में कारावार और कुन्दापुर, केरल में वेम्बानंद, ओड़िसा में भैतरकणिका और चिलिका, आंध्रप्रदेश में कोरिंगा, पूर्वी गोदावरी और कृष्णा, पश्चिम बंगाल में सुंदरबन, तथा तमिनाडु में पीचावरम और मन्नार की खाड़ी आदि शामिल हैं।

अन्ना विश्वविद्यालय, चेन्नई में  राष्ट्रीय संपोषणीण तटीय प्रबंधन केंद्र की स्थापना

अन्ना विश्वविद्यालय में शीघ्र ही राष्ट्रीय संपोषीणय तटीय प्रबंधन केंद्र खुलेंगे। इस केंद्र में तटीय प्रबंधन के विभिन्न पहलुओं पर शोध कार्य होंगे तथा केंद्र तटीय समुदायों के साथ मिलकर काम करेगा तथा यह मंत्रालय को नीतिगत मामलों पर सलाह मशविरा देगा। अकादमिक शोधकार्य से सामाजिक प्रभाव की ओर दृष्टगत बदलाव को परिलक्षित करने के लिए इसे केंद्र नाम दिया गया है न कि संस्थान। इस केंद्र में विज्ञान पर नहीं, बल्कि लोगों, खासकर मछुआरों पर  विशेष ध्यान दिया जाएगा। यह तटीय क्षेत्र  प्रबंधन के लिए मुख्य विस्तार केंद्र होगा और तटीय क्षेत्र में आर्थिक गतिविधियों पर विशेष ध्यान देगा।

इस परियोजना के पहले चरण में निवेश भवन निर्माण पर नहीं किया जाएगा बल्कि विशेषज्ञों का दल तैयार करने पर केंद्रित होगा। 10 करोड़ रूपए की प्रारंभिक निधि से 50 वैज्ञानिक जो अभियांत्रिकी और समाज विज्ञान दोनों क्षेत्रों के विशेषज्ञ होंगे, एकत्र किए जाएंगे। इन विज्ञानियों के लिए औसत उम्र 35 वर्ष रखी गयी है और दल में आधी सदस्य महिलाएं होंगी। दल के 60 प्रतिशत सदस्य तमिलनाडु से बाहर के होंगे।

विश्वविद्यालय ने 10 एकड़ क्षेत्र में इस केंद्र के निर्माण का प्रस्ताव रखा था। इस केंद्र के निर्माण  के लिए 166 करोड़ निर्धारित किए गए हैं।

जाने माने वैज्ञानिक एम एस स्वामीनाथन, जिन्होंने जुलाई, 2009 में अपनी रिपोर्ट में इस संस्थान की स्थापना की सिफारिश की थी, इस केंद्र के लिए सलाहकार के रूप में काम करेंगे। इस केंद्र को विश्व बैंक द्वारा वित्त पोषित आईसीजेडएम परियोजना से धन उपलब्ध कराया जाएगा। परियोजना के लिए अगले पांच सालों के लिए 800 करोड़ रूपए कुल बजट है।

तटीय प्रबंधन के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम:

आईसीजेडएम कार्यक्रम के तहत देशभर में तटीय क्षेत्र प्रबंधन के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम भी शुरू किया जाएगा।

गुजरात में आईसीजेडएम गतिविधियां

गुजरात  कच्छ की खाड़ी और जामनगर जिले में समेकित तटीय क्षेत्र प्रबंधन गतिविधियों पर करीब 298 करोड़ रूपए का व्यय आएगा।

ओड़िसा में आद्रभूमि संरक्षण

ओड़िसा तट के दो खंडों पर समेकित तटीय क्षेत्र प्रबंधन एवं आद्रभूमि संरक्षण गतिविधियों में गोपालपुर-चिलिका और पारादीप-धर्मा  में 201 करोड़ रूपए के संरक्षण कार्य होंगे।

पश्चिम बंगाल में आईसीजेडएम गतिविधि

पश्चिम बंगाल में सुंदरबन, हल्दिया और दीघाशंकरपुर में समेकित तटीय क्षेत्र प्रबंधन गतिविधि पर कुल 300 करोड़ रूपए का निवेश किया जाएगा।

इस परियोजना के तहत तटीय जल में  प्रदूषण के नियंत्रण एवं तटीय समुदायों के लिए जीविका के विकल्प बढाने के वास्ते सीआरजेड अधिसूचना 1991 को प्रभावी तरीके से लागू करने के लिए क्षमता और संस्थानों का निर्माण किया जाएगा।

૩૬.
पृथ्वी दिवस

प्रथम पृथ्वी दिवस के 40 वर्ष बाद दुनिया अबतक की सबसे अधिक खतरनाक स्थिति में पहुंच गयी है। जलवायु परिवर्तन हमारे समय की एक बहुत बड़ी चुनौती है लेकिन यह हमारे सम्मुख बहुत बड़ा अवसर अर्थात वर्तमान और भविष्य के लिए स्वस्थ, समृध्दशाली  और स्वच्छ ऊर्जा आधारित अर्थव्यवस्था के निर्माण का अप्रत्याशित अवसर लेकर आया है।  पृथ्वी दिवस 2010 एक ऐसा अहम मोड़ है जहां से हम जलवायु नीति, ऊर्जा कार्यकुशलता, नवीकरणीय ऊर्जा और पर्यावरण हितैषी रोजगार की ओर तरफ बढ सकते हैं। पृथ्वी दिवस व्यक्तियों, निगमों और सरकारों को वैश्विक हरित अर्थव्यवस्था के निर्माण के लिए आपस में हाथ मिलाने का एक महत्वपूर्ण अवसर है। हम एक अरब से अधिक लोगो के साथ हाथ मिला सकते हैं जो 190 देशों में पृथ्वी दिवस मना रहे हैं।

यह हमारे सम्मुख उत्पन्न पर्यावरण संबंधी चुनौतियों को याद करने का समय है। यह हमारे लिए बेहतर जीवन जीने, पृथ्वी ग्रह की मदद करने और एक मजबूत अर्थव्यवस्था बनाने का अवसर है। किसी को भी स्वस्थ पर्यावरण या मजबूत अर्थवयवस्था में से एक को चुनने की जरूरत नहीं है, बल्कि उसे तो दोनों ही साथ मिल सकते हैं। हालांकि कई लोग कहते  हैं कि पर्यावरण की चुनौती के समाधान के उपाय काफी मंहगे हैं लेकिन इन समस्याओं के समाधान से हमारे सम्मुख स्वच्छ ऊर्जा, हरित भवन, कार्यकुशल परिवहन, और निम्नतम अपशिष्ट वाली जीवनचर्या से संबंधित कारोबार का बहुत बड़ा अवसर भी उत्पन्न होता है। पर्यावरण के भविष्य पर हमारा भविष्य भी निर्भर है।

पृथ्वी दिवस दुनिया में व्यपाक रूप से मनाया जाने वाला अंतर्राष्ट्रीय समारोह है और यह हमें इस बात की याद दिलाता है  कि हम एक अनोखे ग्रह के वासी हैं। पृथ्वी सौरमंडल का ऐसा एक मात्र ग्रह है जहां अतुल्य जैवविविधता है। पृथ्वी दिवस क्या है- यह हमारी पृथ्वी, जिसमें सागर, जैवविविधता, वायुमंडल आदि है, को जानने का अवसर है। दुनियाभर में लोग इसे मनाते हैं और पेड़-पौधों तथा जीव-जंतुओं की रक्षा का प्रयास करते हैं एवं पृथ्वी को स्वच्छ बनाते हैं।

22 अप्रैल, 1970 को आधुनिक पर्यावरण आंदोलन के साथ पृथ्वी दिवस की शुरूआत हुई और इसलिए हम हर वर्ष इस दिन को पृथ्वी दिवस मनाते हैं। विभिन्न देश अलग-अलग तरीके से जैसे शहरों की सफाई कर, डाकटिकट जारीकर, बच्चों के बीच विभिन्न प्रकार की प्रतियोगिताओं का आयोजन कर, पृथ्वी के संसाधनों और उसके संपोषणीय इस्तेमाल के बारे में पोस्टरों के माध्यम से लोगों में जागरूकता लाकर,  इसे मनाते हैं।

भू-विज्ञान मंत्रालय ने धरती (भूमि, सागर और वायुमंडल) को बचाओ ध्येयवाक्य पर आधारित विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से यह दिवस मनाने का प्रस्ताव रखा है। मंत्रालय ने ग्रीनहाउस प्रभाव, ओजोन परत में छेद, उसके कारण और प्रभाव, ग्लोबल वार्मिंग, प्राकृतिक संसाधनों का संपोषणीय इस्तेमाल, जलवायु परिवर्तन का भारतीय मानसून पर प्रभाव, वनोन्मूलन और वनारोपण और उसका महत्व, सागरीय संसाधन (सजीव और निर्जीव संसाधन), ऊर्जा संसाधन (पारंपरिक और गैर पारंपरिक संसाधन), विलवणीकरण, सुनामी पूर्व चेतावनी प्रणाली, सागरीय प्रौद्योगिकी, समुद्री उपकरण, ध्रुवीय विज्ञान , भूकंप अध्ययन आदि अन्य विषयों पर इस दिन कार्यक्रम और संगोष्ठियों का भी प्रस्ताव रखा है।

विद्यालयों को अपने छात्रों के लिए निबंध प्रतियोगिता, चित्रकारी प्रतियोगिता, पोस्टर निर्माण, पौधरोपण, प्रकृति संरक्षण से संबंधित नारे लिखने, प्रश्नोत्तरी आदि कार्यक्रमों का आयोजन करने के लिए कहा गया है।

पृथ्वी दिवस हम सभी को निम्नलिखित बिंदुओं के प्रति कटिबध्दता प्रदर्शित करते हुए पर्यावरण संरक्षण में अपने हिस्से की जिम्मेदारी का एहसास दिलाता है-

·        स्नान के बजाय शॉवर के जरिए नहाना और कम पानी की खपत करना, पानी को रिसने से रोकना, ब्रश करते समय नल बंद कर देना।

·        ऊर्जा स्टार उत्पाद खरीदकर तथा सामान्य बल्ब के स्थान पर कम्पैक्ट पऊलोरेंसेंट  टयूब लगाकर बिजली बचाना।

·        उत्पादों का दोबारा इस्तेमाल और पुनर्चक्रण।

·        यात्रा के लिए सार्वजनिक वाहनों का प्रयोग करना, यदि संभव हो तो एक ही कार और बाइक से कार्यालय या ईधर-उधर आना-जाना ताकि वायु प्रदूषण घटे और ईंधन पर खपत बचे।

·        कीटनाशकों, पेंट, और क्लीनरों को बच्चों की पहुंच से दूर रखना।

·        स्थानीय वायु गुणवत्ता का परीक्षण करना।

·        कंप्यूटर, डीवीडी प्लेयर और अन्य इलेक्ट्रोनिक उत्पादों का ई-पुनर्चक्रण। इससे धरती पर खतरनाक पदार्थों का जमावड़ा नहीं होगा।

——————————–
૩૭.
बजट और आम आदमी

बजट सरकार की आमदनी और खर्चों का बहीखाता ही नहीं होता, वह सरकार की आर्थिक नीतियों, सुधारों और राहों के कांटों-कठिनाइयों को हटाकर सुखद समाधान प्रस्तुत करने की दूर दृष्टि और भावी नीतियां तथा कार्यक्रम भी अपने दामन में लिए रहता है। कह सकते हैं कि वह विगत कल की उपलब्धियों, कमियों, वर्तमान की चुनौतियों और आगत कल के सुनहरी सपनों-संकल्पनाओं को आकार देने के प्रयासों का दर्पण भी होता है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि 2009-2010 का वित्तीय वर्ष भारत की तेज उभरती अर्थव्यवस्था के लिए विकट चुनौतियों का वर्ष रहा। ये चुनौतियां इसलिए अधिक गंभीर थी क्योंकि सारा विश्व भयंकर वित्तीय संकट के भंवर में फंसा हुआ था। लगभग सभी महाद्वीप अमरीका से पसरी घोरमंदी और कच्चे तेल की ऊंची कीमतों से उत्पन्न महंगाई की मार झेल रहे थे। ई।

विश्वव्यापी मंदी के नकारात्मक परिणामों से उभरने के लिए सरकार ने तीन बड़े राहत पैकेज दिए, जिनमें उत्पाद, करों और निर्यात शुल्कों में छूट पर छूट दी गई। उधर रिजर्व बैंक ने भी तंगहाली को कम करने और खपत, मांग तथा खर्चे बढ़ाने के उद्देश्य से बाजार में नकदी डालने के लिए रेपो और रिवर्स रेपो रेट यानी छोटी अवधि के कर्जों पर ब्याज दरें कम कर दीं और कैश रिजर्व रेशो यानी नकदी आरक्षी अनुपात में भी कटौती कर दी। इससे बाजार में वित्तीय गहमागहमी, नकदी का चलन और कारोबार बढ़ गया, लेकिन मंदी में भी महंगाई की मार रुकने का नाम नहीं ले रही थी। बढ़ती महंगाई के प्रकोप पर लगाम लगाने के लिए रिजर्व बैंक ने पहला काम यह किया कि उसने कैश रिजर्व रेशो 0.75 प्रतिशत बढ़ाकर 5 प्रतिशत से 5.75 प्रतिशत कर दी। इस वृध्दि से बैंकों की 360,000 करोड़ रुपए की नकदी, रिजर्व बैंक के हाथ में चली गई। बाजार में इस राशि का चलन रूकने से महंगाई पर कुछ लगाम लग सकती है। उधर बैंक अपनी नकद राशि की कमी दूर करने के लिए ब्याज दरें बढ़ा सकते हैं। कुछ बैंकों ने ये बढ़ाई भी हैं। इससे भी महंगाई पर कुछ और अंकुश लग सकता है। सरकार द्वारा फूंक-फूंक कर कदम रखने का ही परिणाम है कि अभी रेपो दर और रिवर्स रेपो दर क्रमश: 4.75 प्रतिशत और 3.25 प्रतिशत पर ही कायम रखी गई है। यानी ब्याज दरों को जहां का तहां रखकर विकास की गति को बनाए रखने का प्रयास जारी है और दूसरी तरफ कैश रिजर्व रेशो में कमी कर महंगाई पर अंकुश लगाने का प्रयत्न भी जारी है। दूसरे शब्दों में महंगाई पर अंकुश लगाकर सरकार आम लोगों की पीड़ा को कम करना चाहती है और साथ ही विकास को बढ़ाकर आय और रोजगार के अवसर बढ़ाना और खुशहाली लाना चाहती है। इसके लिए जरूरत है कि विकास का आधार व्यापक बनाया जाए और उसे अधिक समावेशी बनाया जाए। साथ ही यह भी जरूरी है कि आपूर्ति और मांग के बीच दूरियां और असंतुलन कम हो।

समावेशी विकास

वर्तमान सरकार के लिए समावेशी विकास सर्वसाधारण से जुड़ा आस्था और विश्वास का मंत्र है। पिछले पांच वर्षों में इसी सरकार ने कानूनी गारंटी के साथ व्यक्ति को सूचना का अधिकार और काम का अधिकार प्रदान किया है। इसके बाद 2009-10 में शिक्षा का अधिकार अधिनियम बना। अगले कदम के रूप में अब खाद्य-सुरक्षा का बिल तैयार है। इसके अंतर्गत गरीबी की रेखा के नीचे जिन्दगी बसर करने वाले परिवारों को 25 किलो चावल या गेहूं तीन रुपए किलो की दर से दिया जाएगा। यह न मिलने पर उन्हें मुआवजे के रूप में नकद राशि मिलेगी। इस राशि से वे खुले बाजार में अनाज खरीद सकेंगे। अगर कोई राज्य सरकार इसकी व्यवस्था नहीं कर सकी तो वह अनाज के मूल्य का भुगतान करेगी। ऐसे सभी वायदों-वचनों को पूरा करने के लिए सामाजिक-क्षेत्र पर व्यय बढ़ते-बढ़ते 137674 रुप्ए तक पहुंच गया है। यह रकम वर्ष 2010-2011 के कुल बजट व्यय का 3.7 प्रतिशत है। योजना आवंटन का अन्य 25 प्रतिशत ग्रामीण बुनियादी ढांचे के विकास के लिए रखा गया है। इससे समावेशी विकास की प्रक्रिया और मजबूत होगी। समावेशी विकास का मतलब है देश के उत्थान की राह तमें सबको साथ लेकर चला-बढ़ा जाए। जो लोग अभी तक समाज कल्याण के इस महायज्ञ में शामिल नहीं हुए हैं, उन्हें भी साथ लेकर और कदम-से-कदम मिलाकर आगे बढ़ने का अभियान जारी रखा जाए। यानी सर्वोदय और सर्वसमाज की प्रगति के लाभ से कोई वंचित न रह जाए। इसी प्रयास के अंतर्गत बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा देने का अधिकार 2009 के अधिनियम में प्रदान किया गया है। इस अधिनियम में 6 से 14 वर्ष तक के आयु-समूह के सभी बच्चों को बिना किसी भेदभाव और समता के सिध्दांतों पर आधारित गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने की रूपरेखा तैयार की गई है। हाल के वर्षों में सर्वशिक्षा अभियान ने प्राथमिक शिक्षा के लिए बच्चों के पंजीयन और बुनियादी ढांचे के सुधार में महत्वपूर्ण योगदान किया है। लगभग 98 प्रतिशत बस्तियां अब प्राथमिक स्कूलों के दायरे में आ गई हैं। स्कूली शिक्षा के लिए योजना आवंटन 26800 करोड़ रुपए से बढ़ाकर 31,636 करोड़ रुप्ए कर दिया गया है। इसके अलावा तेरहवें वित्त आयोग की सिफारिशों के अनुसार राज्यों को प्राथमिक शिक्षा के लिए 3675 करोड़ रुपये मिलेंगे। स्वास्थ्य क्षेत्र की बात करें तो बजट में इस बात पर जोर दिया गया है कि स्वास्थ्य सुविधाएं जन-जन तक पहुंचाई जाए और कहीं कोई कमी देखने में आए तो उसे दूर कर दिया जाए। इसके लिए जिलावार स्वास्थ्य रूपरेखा तैयार करने के लिए स्वास्थ्य सर्वेक्षण किया जाएगा। निस्संदेह इस सर्वेक्षण के निष्कर्षों से प्रमुख सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रम खासकर राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन को बहुत फायदा होगा। स्वास्थ्य कार्यक्रमों के सफल कार्यान्वयन के लिए स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के लिए योजना आवंटन 19534 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 22300 करोड़ रुप्ए कर दिया गया है।

भारत निर्माण

चाहे गांव हो या शहर दोनों क्षेत्रों में, आम आदमी के लिए कल्याण कार्यों की झड़ी लगाकर उनकी दशा सुधारने के लिए युगांतकारी कदम उठाए गए हैं। महात्मा गांधी कहा करते थे-जिस तरह ब्रह्मांड मनुष्य में वास करती है, उसी तरह भारत गांवों में वास करता है। ग्रामीण बुनियादी ढांचे का विकास सराकर की एक उच्च प्राथमिकता क्षेत्र है। नए वित्त वर्ष में गांवों में बुनियादी ढांचे के विकास के लिए 66100 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। जब भी ग्रामीण आधारभूत ढांचे की चर्चा चलती है तो भारत-निर्माण का बृहद कार्यक्रम, सिर चढ़कर बोलने लगता है। यह कार्यक्रम सरकार की कार्य पध्दति और प्रबंधन के प्रति दृष्टिकोण को साफ-साफ जग-जाहिर करता है। यह दृष्टिकोण है-ग्रामीण क्षेत्रों के प्रति सहृदयता, सदाशयता और संवेदनशीलता का।

·       त्वरित सिंचाई

·       त्वरित जल सप्लाई

·       ग्रामीण सड़कों से बस्तियों को जोड़ना

·       देहाती इलाकों में मकान बनाना

·       गांवों में बिजली की व्यवस्था करना और

·       टेलीफोन की सुविधा प्रदान करना।

बजट के शिल्पी वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी के अनुसार योजना खर्च में 48 प्रतिशत आवंटन भारत निर्माण के विभिन्न कार्यक्रमों के लिए है।

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना ने भारत निर्माण कार्यों में सोने पर सुहागे का काम किया है। इस योजना से भी शहरों की तरफ पलायन रोकने में बहुत मदद मिली है। योजना को शुरू हुए चार वर्ष पूरे हो चुके हैं। अब यह देश के सभी जिलों में लागू हो चुकी है। इसने साढ़े चार करोड़ से अधिक परिवारों की जिन्दगी में नया खुशनुमा रंग भर दिया है। अनेक घरों में मायूसी का स्थान मुस्कानों ने ले लिया है। नए वर्ष में इस योजना के लिए व्यय राशि बढ़ाकर 40100 करोड़ रुपए कर दी गई है।

इस सिलसिले में कमजोर वर्ग के लोगों के लिए ग्रामीण मकान निर्माण योजना का जिक्र किए बिना नहीं रहा जा सकता है। नए वित्त वर्ष में इंदिरा आवास नाम की लोकप्रिय योजना के लिए आवंटन बढ़ाकर 10,000 करोड़ रुपये कर दिया गया है। निर्माण लागत बढ़ जाने के कारण इस योजना के तहत मैदानी इलाकों में प्रति इकीाइका

देश के पिछड़े इलाकों में आधारभूत ढांचे की कमियां-कमजोरियां दूर करने के लिए पिछड़ा-क्षेत्र-अनुदान कोष कारगर साधन प्रमाणित हुआ है। इसलिए अब इस कोष की राशि 26 प्रतिशत बढ़ाकर 5800 करोड़ से 7300 करोड़ रुपए कर दी गई है।

किसान देश की जनसंख्या का लगभग 70 प्रतिशत हैं और सकल घरेलू उत्पाद के तीन घटक हैं-विनिर्माण, सेवा और कृषि। इसलिए स्वाभाविक है कि समावेशी अथवा समग्र विकास को बढ़ावा देने, ग्रामीण आमदनी और किसानों की क्रयशक्ति में वृध्दि करने और खाद्य-सुरक्षा को बनाए रखने में कृषि और किसानों की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। इस सबको देखते हुए किसानों के लिए कर्ज माफी और कर्ज राहत योजना के तहत कर्जों की वापसी की अवधि 31 दिसंबर, 2009 से 30 जून, 2010 तक, छह महीने के लिए बढ़ा दी गई है। कुछ राज्यों में सूखे और कुछ अन्य भागों में आई भीषण बाढ़ से पीड़ित किसानों को कर्जों की वापसी में यह राहत देना किसानों के प्रति सरकार के उदार दृष्टिकोण का परिचायक है। इसी उदारता का एक अन्य प्रमाण यह है कि पिछले बजट में अल्पावधि-फसल ऋणों का निर्धारित समय पर भुगतान करने वाले किसानों के लिए प्रोत्साहन के रूप में एक प्रतिशत की अतिरिक्त सहायता ब्याज के भुगतान में दी गई थी। नए वित्त वर्ष में फसल ऋणों का समय पर भुगतान करने वाले किसानों के लिए यह आर्थिक सहायता एक प्रतिशत से बढ़ाकर दो प्रतिशत कर दी गई है। मतलब यह कि अब ये किसान पांच प्रतिशत की वार्षिक दर पर ब्याज का भुगतान करेंगे।

छोटी-छोटी आय वाले लोगों में बचत की आदत डालने और बचत की राशि से अपना आर्थिक स्तर सुधारने के लिए 2000 से अधिक आबादी वाली 60 हजार बस्तियों में अगले दो वर्षों में समुचित बैकिंग सुविधाएं प्रदान की जाएगी। इससे वे साहूकारों और महाजनों के चंगुल से छुटकारा भी पा सकेंगे। बिना बैंक वाले इलाकों में बैंक खोलने में तेजी लाने के लिए नाबार्ड (राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक) में बनाए गए वित्तीय समावेश कोष और वित्तीय समावेश टेक्नॉलॉजी कोष दोनों के लिए एक-एक सौ करोड़ रुपए की राशि बढ़ा दी गई है।

शहरी कल्याण कार्यक्रम

समाज कल्याण की दिशा में आगे कदम बढ़ाते हुए गांवों की तरह शहरों में भी गरीबों की हालत सुधारने, बेरोजगारों को रोजगार दिलाने, छोटे-छोटे धंधों में तकनीकी कौशल बढ़ाने और सामुदायिक भागीदारी को गति देने के लिए स्वर्ण जयंती शहरी रोजगार योजना को सुदृढ़ बनाया गया है। शहरी विकास के लिए आवंटन में पिछले वर्ष की तुलना में 75 प्रतिशत से अधिक की वृध्दि की गई है। इसके अलावा शहरी गरीबी उन्मूलन और आवास के लिए आवंटन 850 करोड़ से बढ़ाकर 1000 करोड़ रुपये कर दिया गया है। शहरों को जल्द-से-जल्द झुग्गी-झोंपड़ियों से मुक्त कराने के उद्देश्य से पिछले वर्ष

संक्षेप में कह सकते हैं कि नए वित्त वर्ष का बजट जन-जन के कल्याण की भावना से ओत-प्रोत है। यह आर्थिकता के इस कठिन दौर में भी गरीब के चेहरे और उसके आंसुओं को केंद्र में रखकर बनाया गया है। पैट्रोल और डीजल पर प्रति लीटर एक रुपया केंद्रीय उत्पाद शुल्क लगाने के सिवा कोई नया कर नहीं लगाया गया है। पहले दी गई रियायतों और छूटों में से कुछ को वापस लिया गया है। कह सकते हैं कि यह बजट मुख्यतया किसान, मजदूर और आम आदमी को समर्पित है। इसमें चाहत है-आम आदमी को जमीन से उठाकर कुछ सम्मान दिलाने की, उसकी जिन्दगी को जीने लायक बनाने की।

૩૮.
आरबीआई का मध्यमार्ग

नीतिगत दरों में बहुत अधिक वृध्दि से बचते हुए और उसी के साथ थोड़ी सी वृध्दि कर भारतीय रिजर्व बैंक ने स्पष्ट संकेत दिया है कि वह आर्थिक वृध्दि पर बगैर कोई प्रभाव डाले मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए तत्पर है। सरकार के लिए सबसे बड़ी चिंता  हाल के महीनों में मुद्रास्फीति में बहुत अधिक वृध्दि रही है क्योंकि मुद्रास्फीति दहाई अंक तक पहुंच गयी है जो 17 महीनों में सबसे ऊंचे स्तर पर है। खाद्य मुद्रास्फीति की दर तो 17 फीसदी तक पहुंच गयी है।

समूह-20 के देशों में आस्ट्रेलिया के बाद भारत दूसरी बड़ी अर्थव्यवस्था है जिसने नीतिगत दरें बढार्ऌ हैं।

यह समस्या सभी के लिए चिंताजनक रही है क्योंकि खाद्य मुद्रास्फीति का प्रभाव विनिर्माण और सेवा जैसे अन्य क्षेत्रों पर भी पड़ रहा है। गैर खाद्य पदार्थों में मुद्रास्फीति नवंबर, 2009 के -0.4 फीसदी से बढक़र इस वर्ष मार्च में  4.7 फीसदी हो गयी।

महत्त्वपूर्ण  ब्याजदरों में 0.25 प्रतिशत मात्र की मामूली वृध्दि की गयी जो प्रदर्शित करता है कि उच्च मुद्रास्फीति दर पर काबू पाने में आरबीआई की काफी दिलचस्पी है और वह साथ ही यह सुनिश्चित करना चाहता है कि वैश्विक मंदी के दौरान वित्तीय और मौद्रिक पैकेजों से उत्पन्न वृध्दि की रपऊतार भी प्रभावित न हो। जैसा कि वित्त मंत्री श्री प्रणव मुखर्जी ने कहा, न्न यह हमारी अर्थव्यवस्था की आवश्यकताओं का परिपक्व और संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। अर्थव्यवस्था में मुद्रा आपूर्ति पर इसका अच्छा असर पड़ेगा। न्न

इसके साथ ही यह भी स्पष्ट हो गया है कि निम्न दरों का सुखद समय बीत गया है और हमें बाजार आधारित अर्थव्यवस्था के लिए तैयार होना चाहिए।

आरबीआई द्वारा निर्धारित नयी दरों, जो महीने में दूसरी बार बढायी गयी हैं, के अनुसार रेपो दर को 5.25 फीसदी तक बढा दिया गया है। रेपो दर वह दर है जिसपर रिजर्व बैंक वाणिज्यिक बैंकों को मुद्रा उधार देता है। रिजर्व रेपो दर भी 3.75 फीसदी हो गयी है। यह वह दर है जो बैंक अपने डिपोजिट के लिए चुकाता है। नकद रेपो दर भी बढाक़र 6 फीसदी कर दी गयी है। नकद रेपो दर बैंक डिपोजिट का वह प्रतिशत है जो उसे हमेशा नकद के रूप में रखना पड़ता है। इन सभी कदमों से अर्थतंत्र में मुद्रा की आपूर्ति घट जाएगी और इस प्रकार उच्च मुद्रास्फीति दरों पर दबाव बढेग़ा।

ये उपाय अर्थतंत्र से 12,500 करोड रूपए सोख लेंगे। सौभाग्य से यह फिलहाल त्रऽणदरों को बढाने नहीं जा रहा है क्योंकि इस वृध्दि के असर को निष्प्रभावी बनाने के लिए अभी र्प्याप्त तरलता है। फिलहाल त्रऽण मंहगा नहीं होने जा रहा है जो वृध्दि पर असर डाल सकता था।

आरबीआई को पूरा विश्वास है कि मौजूदा वित्तीय वर्ष में मुद्रास्फीति घटकर 5.5 फीसदी तक आ जाएगी। हालांकि श्री मुखर्जी को इसके कुछ और नीचे आने का विश्वास है। उनका अनुमान है कि इस वित्तीय वर्ष के अंततक यह सिर्फ चार फीसदी रह जाएगी। वर्तमान वित्तीय वर्ष में वृध्दिदर 8.5 फीसदी और अगले वित्तीय वर्ष में 9 फीसदी रहने का अनुमान है।

हालांकि इसमें कुछ जोखिम भी है। पहली बात यह है कि इस वर्ष मानसून कैसा रहता है। यदि वर्षा अच्छी हुई तो कोई समस्या नहीं होनी चाहिए। दूसरी बात है कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों का क्या रूख रहता है, क्योंकि इससे अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों पर प्रभाव पड़ता है। वैश्विक अर्थव्यवस्था जिस गति से वृध्दि करेगी, उसका हमारी वृध्दि पर भी प्रभाव पड़ेगा। मजबूत होते रूपए ने पहले से ही निर्यात क्षेत्र को चिंता में डालना शुरू कर दिया है।

इस बात में कोई संदेह नहीं है कि अर्थव्यवस्था के मंदी के उबरने की गति तेज है। एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था तेज गति से वृध्दि के लिए तैयार है और प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में केवल चीन हमसे अधिक तेजी वृध्दि कर रहा है। रिजर्व बैंक के गवर्नर डॉ. डी सुब्बाराव ने कहा है, न्न हमें नीतिगत दरों को सामान्य करने के लिए अंशशोधित ढंग से आगे बढने क़ी जरूरत है। ऊंची छलांगों के बजाय छोटे छोटे कदम उठाना बेहतर होगा। न्न

इस बात के संकेत हैं कि मुद्रास्फीति को थामने के लिए महत्पूर्ण ब्याज दरों की समय समय पर समीक्षा होने जा रही है क्योंकि मुद्रास्फीति सरकार की सबसे बड़ी चिंता है। मौद्रिक नीति की पहली तिमाही समीक्षा 27 जुलाई को होने वाली है।

वित्त मंत्री ने कहा है, न्न मुझे इस बात का डर है कि कुछ समय तक इससे (मुद्रास्फीति से) जूझना पड़ेगा। हालांकि खाद्य पदार्थों पर मुदास्फीति का दबाव घटने लगा है। न्न

लेकिन यह भी देखना पड़ेगा कि मौद्रिक नीति कितना कुछ कर सकती है। इसके साथ ही अन्य वित्तीय उपाय उठाने की जरूरत है। इसके अलावा अब आपूर्ति पक्ष और बेहतर वितरण ऐसे पहलू हैं  जो अर्थव्यवस्था का अधिक ख्याल रख सकते हैं।

ऐसे में हमारे सम्मुख मध्यमार्ग ही एकमात्र विकल्प है और आरबीआई ने वही अपनाया है।

देश ने मनाया पहला सार्वजनिक क्षेत्र दिवस

स्कोप की पहल और भारी उद्योग एवं सार्वजनिक उद्यम मंत्रालय के सहयोग से पहली बार दस अप्रैल को सार्वजनिक क्षेत्र दिवस के रूप में मनाया गया।

सार्वजनिक क्षेत्र दिवस हर साल औद्योगिक क्षेत्र के महत्व को रेखांकित करने के लिए मनाया जाएगा और भारत के सार्वजनिक क्षेत्र उद्यमों की उपलब्धियों को देश के समक्ष पेश किया जाएगा।  सार्वजनिक क्षेत्र के महत्व को रेखांकित करने के लिए एक

छोटी शुरूआत के बाद सार्वजनिक क्षेत्र ने लगभग छह दशकों में वैश्विक आर्थिक शक्ति बनने की दिशा में भारत के प्रयासों में योगदान का सम्मान हासिल किया है।

देश में सार्वजनिक क्षेत्र के हित को संरक्षित करने में स्कोप के उल्लेखनीय योगदान को सदैव याद किया जाएगा । 1990 में आर्थिक सुधार के बाद सार्वजनिक क्षेत्र के घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा का सामना करने में नई चुनौतियों से रूबरू होना पड़ा । इसका प्रक्षेत्र 17 से घटकर 3 रह गया, फिर भी इसने उन क्षेत्रों में टिके रहना पसंद किया, जो निजी क्षेत्र के लिए खुला था । सार्वजनिक क्षेत्र ने भारतीय कोरपोरेट क्षेत्र को वैश्विक मंच पर अग्रणीय स्थान दिलाने में अहम भूमिका निभाई है । आज ही के दिन 37 साल पहले स्कोप की स्थापना हुई थी तथा इसके बाद इसने अच्छी तरह कार्यनि­ष्पादन किया है । यह सराहनीय है कि भारत व्यापक रूप से वर्ष, 2008 के मध्य से आई वैश्विक आर्थिक मंदी के असर से सार्वजनिक क्षेत्र की तेजी के कारण ही उबर सका ।

वर्ष 1991-2009 के दौरान इक्विटी पूंजी तीन गुणा से अधिक बढ गर्ऌ, जबकि सकल कारोबार साढे दस गुणा बढ गया । जो लोग निवेश की व्यवहार्यता पर सवाल उठाते थे उनके जवाब के रूप में, वर्ष 1990-91 के आधार वर्ष पर शुध्द लाभ 37 गुणा बढ गया । इसके साथ ही, आरक्षित और शेष निधि में संसाधन कार्यदक्षता देखी गई तथा यह साढे सोलह गुणा बढ गया जबकि शुध्द मूल्य 2008-09 में करीब 10 गुणा बढ गया ।

वित्तीय कार्यनि­ष्पादन में उछाल के फलस्वरूप, निर्माण क्षेत्र में केन्द्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों का योगदान भारत में कुल निर्माण निष्पादन का करीब पांचवा हिस्सा था ।

यह क्षेत्र अपने उत्पादन के जरिए अपने विकास हेतु वित्त जुटा रहा है । संसाधनों का आंतरिक उत्पादन 1990-91 की तुलना में  2008-09 में लगभग दस गुणा बढ गया।

बाजार पूंजी के मामले में चोटी की दस मूल्यांकन कंपनियों में छह सार्वजनिक क्षेत्र के केन्द्रीय उपक्रम हैं, जिनमें से 5 दूसरे से छठे स्थान पर हैं जैसे ओएनजीसी, एनटीपीसी, एमएमटीसी, एनएमडीसी तथा एसबीआई । चोटी की दस कंपनियों में बीएचईएल भी शामिल है । मुम्बई शेयर बाजार में सूचीबध्द केन्द्रीय सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों का कुल बाजार में लगभग 25 प्रतिशत योगदान है जबकि इनकी संख्या सभी सूचीबध्द कंपनियों का करीब एक प्रतिशत है ।

सार्वजनिक क्षेत्र के कार्मिक निजी उद्यमों के लिए श्रम शक्ति का महत्त्वपूर्ण स्रोत बन चुके हैं । आधुनिक दौर की प्रबंधन तकनीकों को अपनाने और आत्मसात करने के जरिए ही यह सब संभव हो पाया है । औद्योगिक सामाजिक जिम्मेदारी में योगदान देने तथा कंधे से कंधा मिलाकर चलने में केन्द्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों का बड़ा शानदार रिकार्ड रहा है, जो प्रारंभ से ही सार्वजनिक क्षेत्र की बुनियादी घोषणा में शामिल है ।

वर्ष 2009 में फार्च्यून 500 नामक कंपनियों की सूची में शामिल सात भारतीय कंपनियों में से पांच केन्द्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम थीं । वर्ष 2009 में 2000 कंपनियों की फोर्ब्स वैश्विक सूची में शामिल की गईं 47 भारतीय कंपनियों में 25 सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम थे । केन्द्रीय सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों के अगुआ स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के अलावा इस सूची में ओएनजीसी, इंडियन ऑयल और एनटीपीसी चोटी की 350 वैश्विक कंपनियों में शामिल हैं । सूची में शामिल अन्य कंपनियों में सेल,बीपीसीएल, बीएचईएल, एचपीसीएल, गेल और एनएमडीसी शामिल थी ।

इन उपलब्धियों के साथ, सार्वजनिक क्षेत्र के केन्द्रीय उपक्रमों ने दुनिया के सभी महाद्वीपों में अपना कारोबार का विस्तार किया है । यह क्षेत्र अगले दो दशकों में वैश्विक आर्थिक शक्ति बनने की दिशा में भारत के अभियान को सफलतापूर्वक सुनिश्चित कर रहा है । #
૦૦.
थिम्पू सार्क शिखर सम्मेलन

दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन-सार्क की रजत जयंती के अवसर पर भूटान की राजधानी थिम्पू में सम्पन्न 16वां शिखर सम्मेलन कई अर्थों में महत्त्वपूर्ण रहा। सम्मेलन में भाग लेने वाले सभी आठ सदस्य देशों – भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल, भूटान, मालदीव और अफगानिस्तान में इस बात की उत्कंठा दिखाई दे रही थी कि इस क्षेत्र को समूचे विश्व में एक जीवंत क्षेत्र बनाने के लिये एकजुट होकर कार्य करने की अतीव आवश्यकता है। सभी सदस्य देश क्षेत्रीय सहयोग को तीव्र गति देने को इच्छुक दिखायी दिये। जैसा कि भारतीय प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने अपने प्रारंभिक भाषण में कहा, जब इस क्षेत्र में लोगों, वस्तुओं, सेवाओं और विचारों का आदान-प्रदान मुक्त रूप से होने लगेगा, तभी इस क्षेत्रीय सहयोग संगठन को गति मिलेगी और यह क्षेत्र विश्व में अपना प्रभाव छोड़ सकेगा। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह इस तथ्य को लेकर चिंतित थे कि क्षमता और संभावना के बावजूद सार्क आसियान और पूर्वी तथा दक्षिण पूर्वी एशिया के अन्य क्षेत्रीय संगठनों के मानिंद अपना अस्तित्व स्थापित नहीं कर सका है। थिम्पू सम्मेलन में आए अन्य देशों के नेताओं की भी यही पीड़ा थी।

वास्तव में, इस क्षेत्रीय संगठन पर भारत-पाकिस्तान के बीच अमधुर सम्बंधों की छाया पड़ती रही है। दोनों देशों के बीच सामान्य और मैत्रीपूर्ण सम्बंधों के अभाव के कारण सार्क देशों के सम्बंधों में सामूहिक रूप से वह रवानी नहीं आ पाई है, जिसको ध्यान में रखकर इस संगठन की बुनियाद 1985 में रखी गई थी। परन्तु थिम्पू सम्मेलन की यह महत्त्वपूर्ण उपलब्धि कही जा सकती है कि उसके सुरम्य और शांत वातावरण में भारत और पाकिस्तान के सम्बंधों में भी शांति बहाली की संभावना उपजी है। कुछ विध्न संतोषियों को भले ही यह संभावना अभी धूमिल दिखाई दे रही हो, परन्तु यदि पाकिस्तान की ओर से वही संजीदगी दिखाई गई, जिसकी विश्व नेताओं और भारत के लोगों को अपेक्षा है, तो सम्बंधों में आए इस मोड़ से क्षेत्रीय सहयोग भी परवान चढेग़ा, यह कहा जा सकता है।

जैसी कि अटकलें लगाई जा रही थीं, थिम्पू में सार्क सम्मेलन से इतर प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की मुलाकात पाकिस्तान के प्रधानमंत्री सैयद युसुफ रजा गिलानी से हुई। करीब 90 मिनट की बातचीत के दौरान दोनों नेताओं के बीच परस्पर वार्ता को जारी रखने का संकल्प व्यक्त किया गया। दोनों पक्षों ने स्वीकार किया कि आपसी मतभेदों को हल करने के लिये बातचीत होनी जरूरी है। नवम्बर 2008 में मुम्बई में हुए आतंकी हमले के बाद दोनों देशों के बीच सम्बंधों में जो तनाव आ गया था, उसके कारण पहले चल रही समग्र वार्ता प्रक्रिया में भी ठहराव आ गया था। पाकिस्तान के इस आश्वासन के बाद कि 2611 के दोषी लोगों को सजा दिलाने के लिये प्रयास तेज किये जाएंगे, भारत को उम्मीद है कि दोनों देशों के बीच बातचीत, विभिन्न स्तरों पर जारी रहेगी, जिससे शांति भले ही बहाल न हो, दोनों पक्षों में आक्रमकता में कमी जरूर आएगी। पाकिस्तान के संविधान में 18वें संशोधन के बाद प्रधानमंत्री को जो अधिकार मिले हैं, उससे यह उम्मीद जगी है कि श्री गिलानी अपनी बात को ज्यादा वजनदार तरीके से वहां के सत्ता प्रतिष्ठान से मनवा सकेंगे और दोनों देशों के सम्बंधों के सुधार में बाधा पहुंचा रहे आतंकवादी तत्वों को अपनी जमीन का इस्तेमाल नहीं करने देंगे।

दर असल, 16वें शिखर सम्मेलन की मूल विषय वस्तु ही आतंकवाद और जलवायु परिवर्तन के दोहरे खतरों से दक्षिण एशिया को मुक्त करने की थी। भूटान के प्रधानमंत्री श्री एल जिग्मी थिनले ने अपने उद्धाटन भाषण में ही क्षेत्रीय सहयोग को बढावा देने के लिये सदस्य देशों के एकजुट प्रयास पर जोर दिया था। उन्होंने कहा कि आतंकवाद के जरिये किसी भी उद्देश्य अथवा लक्ष्य को हासिल नहीं किया जा सकता। इसके साथ ही जलवायु परिवर्तन के कारण बढ रहे खतरे के प्रति भी न केवल भूटान ने, बल्कि अन्य सदस्यों ने भी चिंता जताते हुए इस दिशा में मिलकर काम करने का आह्वान किया। बांग्लादेश और मालदीव के प्रधानमंत्रियों ने जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से बचाव के लिये और अधिक दृढ संक़ल्प की आवश्यकता पर जोर दिया।

आठ देशों के संगठन सार्क ने वृहस्पतिवार को शिखर सम्मेलन की समाप्ति से पहले जिस घोषणा पत्र पर सहमति जतायी, ‘हरित और खुशहाल’ दक्षिण अफ्रीका का निर्माण उसमें सर्वोपरि था। जलवायु परिवर्तन के अलावा परस्पर व्यापार को बढावा देने का मुद्दा भी प्रमुखता से छाया रहा। प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण भूटान की राजधानी थिम्पू में एकत्र आठ देशों के नेताओं ने अगले पांच वर्षों में एक करोड़ वृक्ष लगाने का संकल्प व्यक्त किया। इसके अलावा डेढ अरब जनसंख्या वाले इस क्षेत्र से गरीबी उन्मूलन के लिये भी मिलकर काम करने की प्रतिबध्दता व्यक्त की गयी। सम्मेलन के अंत में जारी वक्तव्य में कहा गया है कि 2010-15 के बीच क्षेत्र के सभी सदस्य देशों में एक करोड़ वृक्ष लगाए जाएंगे। जलवायु परिवर्तन के विषय पर मेक्सिको के कानकुन शहर में पक्षों की समिति (कमिटी ऑफ पार्टीज) की बैठक के पहले सार्क की एक बैठक बुलाने का  फैसला किया। मेक्सिको सम्मेलन में सार्क को एक क्षेत्रीय समूह के रूप में पर्यवेक्षक के तौर पर शामिल किये जाने की मांग भी की गई। बांग्लादेश और मालदीव ने उत्सर्जन की सीमा निश्चित किये जाने पर किसी तरह की वचनबध्दता पर विशेष जोर दिया। कोपनहेगन में सितम्बर 2009 में हुए जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में भारत और चीन ने इस पर असहमति जतायी थी। अत: इस सम्बंध में स्पष्ट नीति निर्धारण और दिशा-निर्देश के लिये जलवायु परिवर्तन पर अन्तर सरकारी विशेषज्ञ समूह के गठन का निर्णय लिया गया। जलवायु परिवर्तन पर सार्क की कार्य योजना में इसी तरह से क्षेत्रीय सहयोग का प्रावधान किया गया है। दक्षिण एशिया पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव की जबर्दस्त आशंका के मद्देनजर सदस्य देशों के संयुक्त वक्तव्य में इस चुनौती से निपटने के लिये सर्वोच्च प्राथमिकता देने पर विशेष जोर दिया गया।

प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने सार्क पर्यावरण सहयोग समझौते का स्वागत करते हुए दक्षिण एशिया में जलवायु परिवर्तन पर भारत निधि के गठन की घोषणा की। यह निधि सदस्य देशों को जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से बचाव के लिये क्षमता विकास और अनुकूलन तकनीक मुहैया कराने में मदद करेगी। इसके अलावा उन्होंने स्थानीय संसाधनों पर आधारित संपोषणीय ऊर्जा प्रौद्योगिकियों के विकास के लिये दक्षिण एशिया में जलवायु नवाचार केन्द्रों की स्थापना की भी पेशकश की। प्रधानमंत्री ने बताया कि हिमालयीन पारिस्थितिकी को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिये भारत में हाल ही में एक राष्ट्रीय मिशन भी शुरू किया गया है। देहरादून में बन रहा राष्ट्रीय हिमनद विज्ञान संस्थान, इस महत्त्वपूर्ण क्षेत्र में क्षेत्रीय सहयोग के केन्द्र बिन्दु के रूप में काम कर सकता है।

हाल के दिनों में सार्क के प्रति दुनिया के देशों में उत्सुकता बढी है। यही कारण है कि अनेक प्रमुख देशों और अन्तरसरकारी संगठनों ने सार्क की बैठकों में पर्यवेक्षक के रूप में शामिल होने की रूचि दिखाई है। इस समय नौ पर्यवेक्षक हैं। इनके नाम हैं- आस्ट्रेलिया, यूरोपीय संघ, ईरान, दक्षिण अफ्रीका, जापान, मॉरिशस, म्यांमा, संयुक्त राज्य अमरीका एवं चीन। इन पर्यवेक्षकों की उपस्थिति से क्षेत्रीय सरोकारों से सम्बंधित उन देशों की प्रतिक्रियाओं के बारे में जानने का अवसर मिलता है और तदनुसार नीति निर्धारण अथवा कार्रवाई में आवश्यक परिवर्तन और सुधार आदि किये जाने की गुंजाइश बनी रहती है। विशेषकर व्यापार के मामले में अधिक आदान-प्रदान का अवसर मिलता है। जहां तक क्षेत्रीय व्यापार को बढावा देने का प्रश्न है, संगठन के विभिन्न देशों के बीच द्विपक्षीय आधार पर व्यापार बढ रहा है। दक्षिण एशियाई मुक्त व्यापार क्षेत्र (सापऊटा) के गठन के बावजूद (जनवरी 2004 में समझौता हुआ और जनवरी 2006 से लागू) सदस्य देशों की अपनी अपनी समस्याओं और विवशताओं के कारण सामूहिक रूप से क्षेत्रीय व्यापार में वह तेजी नहीं आ पायी है जिसकी अपेक्षा है। मुक्त व्यापार के मार्ग में अवरोधक तत्त्वों के निपटारे के लिये सापऊटा की विशेषज्ञ समिति समय-समय पर बैठक कर समस्याओं को दूर करने का प्रयास करती रही है। मूल क्षेत्र के नियम (रूल्स ऑफ ओरिजिन), सीमा शुल्क, कारारोपण, निवेश और मध्यस्थता जैसे तमाम मुद्दों पर भी समिति विचार कर रही है। इन मुद्दों पर आम सहमति से फैसला लेने के प्रयास जारी हैं।

जलवायु परिवर्तन और व्यापार के बारे में दो महत्त्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर से थिम्पू शिखर सम्मेलन का एजेंडा पूरा हो गया है। क्षेत्रीय सहयोग के संवर्धन में इन दोनों की महत्त्ववूर्ण भूमिका रहेगी। उधर भारत और पाकिस्तान के बीच बर्फ पिघलने से क्षेत्रीय शांति और सहयोग का एक नया आयाम, भविष्य में देखने को मिलेगा। दक्षिण एशिया के डेढ अरब से भी अधिक लोगों की यही कामना है। डॉ. मनमोहन सिंह के शब्दों में कहें तो ”अपने सपनों के दक्षिण एशिया को मूर्तरूप देने के लिए इसे पुन: नए विचारों, नए ज्ञान और नए अवसरों का स्रोत बनाना होगा।”

૦૦.
मौद्रिक नीति और मुद्रास्फीति

विकसित देशों में, समय-समय पर जो मौद्रिक नीति उनके केंद्रीय बैंकों द्वारा घोषित की जाती है, उसका लक्ष्य मुद्रास्फीति की दर को निम्न स्तर पर बनाए रखना होता है। भारत और अन्य अनेक विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में केंद्रीय बैंकों के दो लक्ष्य होते हैं-मुद्रास्फीति को नियंत्रित करना और विकास को गति देना।

अत: भारतीय रिजर्व बैंक को हमेशा संतुलन का काम करना होता है। तीन-तीन महीने पर होने वाली मौद्रिक नीति की समीक्षा में विकास की गति में कोई बाधा पहुंचाएं बिना मुद्रास्फीति को नियंत्रित करना होता है। यदि ऐसी कोई असामान्य स्थिति सामने आती है, जिसमें नीतिगत कार्रवाई की आवश्यकता होती है तो निश्चय ही, केंद्रीय बैंक हस्तक्षेप कर सकता है।

वर्ष 2008 में उभर कर सामने आया विश्वव्यापी मुद्रा संकट देखते-देखते ऐसी अप्रत्याशित आर्थिक मंदी में बदल गया, जिसका अनुभव 1928 की भीषण मंदी के बाद पहले कभी नहीं हुआ। इसके मद्देनजर भारत सहित पूरे विश्व के केंद्रीय बैंकों को इस भयावह संकट से उबरने के लिए तेजी से मौद्रिक कार्रवाई करनी पड़ी।

बैंकिंग प्रणाली में आई तरलता#नकदी की भीषण कमी और डूबने वाले कर्जों की बढ़ती संख्या के कारण अनेक प्रमुख अंतराष्ट्रीय बैंकों के लड़खड़ा जाने से प्रणाली में पैसा डालने के लिए नीतिगत कार्रवाई की जरूरत थी ताकि मांग में तेजी आए और अर्थव्यवस्था के स्वास्थ्य के लिए निर्णायक विकास की विपरीत गति को रोका जा सके।

मुद्रा की आपूर्ति और ब्याज दरों पर कठोर नियंत्रण करने के स्थान पर केंद्रीय बैंक ने सरल मौद्रिक नीति अपना कर बैंकिंग प्रणाली में धन लगाने और ब्याज दरों में कमी करने की नीति अपनाई। कुछ विकसित देशों में तो ब्याज दर लगभग शून्य तक पहुंच गई थी। ऐसा इसलिए किया गया ताकि नकारात्मक (ऋणात्मक) विकास की  दिशा को पलट कर उसे फिर से सकारात्मक (धनात्मक) मोड़ दिया जा सके। आरबीआई का रूढ़िवादी दृष्टिकोण

अन्य अनेक देशों के विपरीत भारतीय रिजर्व बैंक का रवैया अपनी मौद्रिक नीति के प्रति अभी भी रूढ़िवादी बना हुआ है और सरकार रुपए की पूर्ण परिवर्तनशीलता के बारे में बहुत सतर्क है। भारत के इस दृष्टिकोण से भारी संकट को टालने में मदद मिली है और अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक मंदी से हम ज्यादा तेजी से उबर सके हैं, तथा अर्थव्यवस्था वापस पटरी पर आ गई है। संकट के दौरान सरकार और रिजर्व बैंक राजकोषीय और मौद्रिक प्रोत्साहन पैकेज लेकर आए ताकि अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित किया जा सके। बढ़े हुए व्यय के कारण सरकार का राजकोषीय घाटा बढ़कर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 6.7% (2009-10) तक पहुंच गया। इसलिए अधिक ऋण लेना पड़ा।

रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति काफी उदार हो गई और प्रणाली में और अधिक नकदी डाली गई; नीतिगत दरों को नीचे लाया गया ताकि ब्याज दरों में कमी लायी जा सके और यह सुनिश्चित किया जा सके कि कर्ज लेने की लागत कम बनी रहे।

इस उद्देश्य के लिए केंद्रीय बैंक ने जो मौद्रिक साधन अपनाए, वे हैं नकद आरक्षी अनुपात (कैश रिजर्व रेशियो-सी आर आर), धनराशि का प्रतिशत, जमा राशि का वह अंश जो बैंकों को केंद्रीय बैंक के पास रखना होता है और महत्वपूर्ण लघु अवधि नीतिगत दरें-रेपो और रिवर्स रेपो दरें (रेपो वह दर होती है, जिस पर बैंक रिजर्व बैंक से रात भर के लिए अथवा लघु अवधि के लिए कर्ज लेते हैं। रिवर्स रेपो दर उस दर को कहते हैं जिस पर बैंक अपनी अति शेष राशि केंद्रीय बैंक के पास जमा करते हैं)।

विदेशों से भारी मात्रा में आने वाली पूंजी तथा निवेश के लिए देश में बढ़ती मांग के कारण, वैश्विक संकट से पूर्व, बड़ी तादाद में ऋण उठाए जा रहे थे। केंद्रीय बैंक ने नकद आरक्षी अनुपात धीरे-धीरे बढ़ाते हुए 9% तक पहुंचा दिया था ताकि बैंकिंग प्रणाली में पड़ी हुई अतिशेष नकदी को सोख लिया जाए और अर्थव्यवस्था में आवश्यकता से अधिक गर्मी न आ सके, विशेष कर रियल एस्टेट (जमीन-जायदाद) क्षेत्र में, जहां बुलबुले उठने लगे थे अर्थात् खतरा नजर आने लगा था। इसी तरह, रिजर्व बैंक ने कई चरणों में रेपो और रिवर्स रेपो दरों में वृध्दि की। रेपो दर तो बढ़ कर 6% तक पहुंच गई थी। ऐसा इसलिए कि यह सुनिश्चित किया जा सके कि उधार देना बैंकों के लिए महंगे का सौदा बन जाए।

वैश्विक संकट के दौरान सरल मौद्रिक नीति

जब वैश्विक मंदी शुरू हुई, केंद्रीय बैंक ने उदार मौद्रिक नीति अपनाना शुरू कर दिया। विभिन्न चरणों में लिए गए फैसलों से और अधिक नकदी उपलब्ध करायी गयी तथा उधार की लागत को कम कर दिया गया। सी आर आर घटकर तीन प्रतिशत तक आ गया तथा रेपो दर करीब 4 प्रतिशत पर लायी गयी। इससे बैंकिंग प्रणाली में 3 लाख करोड़ (30 खरब) रुपए से भी अधिक की राशि छोड़ी गई और विकास को बढ़ावा देने के लिए बाजार में पर्याप्त नकदी उपलब्ध हो सकी।

अर्थव्यवस्था के वापस पटरी पर आने तथा मुद्रास्फीति में तेजी से हुई वृध्दि को देखते हुए पिछले कुछ महीनों से राजकोषीय प्रोत्साहन देने के लिए फूंक-फूंक कर कदम उठाए जा रहे हैं। जनवरी में ही मौद्रिक संकुचन शुरू हो गया था ताकि बाजार में पड़ी अतिशेष नकदी को धीरे-धीरे वापस ले लिया जाए, जिससे विकास की गति को अवरुध्द किये बिना मुद्रास्फीति को काबू में रखा जा सके। ऐसा करना इसलिए जरूरी था कि अर्थव्यवस्था अभी अधिक सुदृढ़ नहीं हो सकी है।

अर्थव्यवस्था में सुधार और मुद्रास्फीति में तेजी के साथ सरल नीति से निकासी की शुरूआत

मुद्रास्फीति में आ रही तेजी की समस्या से निपटने के लिए केंद्रीय बैक ने 20 अप्रैल को घोषित 2010-11 की वार्षिक मौद्रिक नीति में कई नीतिगत दरों-रेपो और रिवर्स रेपो दरों में वृध्दि कर दी। ऐसा दो महीनों में दो बार किया गया। सी आर आर में भी बढ़ोत्तरी की गई ताकि बैंकिंग प्रणाली से अतिशेष नकदी को खींचा जा सके। रेपो और रिवर्स रेपो दरों में 0.25% और सी आर आर में भी 0.25% की वृध्दि की गई है ताकि बैंकिंग प्रणाली से एक खरब 25 अरब रुपए निकाले जा सकें। नीतिगत दरों में वृध्दि से ब्याज दरों में बढ़ोतरी का संकेत निहित है। रेपो दर अब 5.25% होगी, जबकि रिवर्स रेपो दर 3.76% रहेगी। अप्रैल 24 से प्रभावित होने वाला सीआरआर अब बढ़कर 6% हो जाएगा। इससे पूर्व जनवरी में तिमाही समीक्षा में केंद्रीय बैंक ने सी आर आर में 0.75% की वृध्दि कर 5.75% कर दिया था ताकि बैकिंग प्रणाली से 3 खरब 75 अरब रूपए की तरलता को सोखा जा सके।

नीति की घोषणा के बाद रिजर्व बैंक के गवर्नर डॉ. डी. सुब्बाराव ने उचित ही कहा कि वे छोटे-छोटे कदम उठाना अधिक पसंद करेंगे। अर्थव्यवस्था के लिए यहीं बेहतर है, क्योंकि नीतिगत दरों और सी आर आर में अधिक वृध्दि से मुद्रास्फीति में तो कमी लाई जा सकती थी, परन्तु इससे विकास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता, जबकि अब इसमें गति पकड़ने के लक्षण दिखाई दे रहे हैं।

मुद्रास्फीति अभी भी चिंता का विषय

मुद्रास्फीति निश्चय ही चिंता का विषय है, क्योंकि खाद्य पदार्थों की महंगाई अब अन्य क्षेत्रों में फैलती जा रही है। परन्तु थोड़ी मात्रा में मुद्रास्फीति अर्थव्यवस्था के लिए अच्छी होती है, क्योंकि इसका प्रभाव बहु-आयामी होता है और एक प्रकार से अर्थव्यवस्था को वापस पटरी पर लाने में मदद करती है। डॉ. सुब्बाराव ने कहा है कि ”सामान्य स्थिति की बहाली के लिए अनेक प्रकार के छोटे-छोटे कदम उठाना बेहतर होता है ताकि अर्थव्यवस्था को संकटपूर्व की स्थिति की विकास दर से तालमेल बिठाने में दिक्कत न हो।” इन छोटे-छोटे कदमों से बैंकों की ब्याज दरों (उधार देने की) पर तुरंत कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा, क्योंकि उनके पास अभी भी पर्याप्त नकदी उपलब्ध है। कर्ज के लिए मांग अब धीरे-धीरे बढ़ने लगी है। डॉ. सुब्बाराव ने कहा कि जुलाई के अंत के पूर्व वे कोई नीतिगत कार्रवाई नहीं करना चाहेंगे। उस समय तिमाही समीक्षा के दौरान स्थिति के अनुसार निर्णय लिया जाएगा। उनका अनुमान था कि वर्ष 2010-11 में मुद्रास्फीति 5.5% के आस-पास रहेगी और इस वित्त वर्ष में विकास दर बढ़कर 8% तक पहुंच जाएगी। उन्होंने कहा कि कर्ज की मांग में उठान के साथ-साथ सरकार के कर्ज लेने के व्यापक कार्यक्रम को देखते हुए सरल नीतिगत स्थिति से बाहर निकलने के लिए सोच-समझ कर धीरे-धीरे कदम बढ़ाने होंगे। उन्होंने आशा व्यक्त की कि इस वर्ष ऋण की मांग में 20% की वृध्दि होगी।

इस उपाय का समर्थन करते हुए वित्तमंत्री श्री प्रणव मुखर्जी ने इसे संतुलित और परिपक्व बताया और कहा कि ऋण पर मामूली सख्ती और इस ‘सौम्य’ नीति से मुद्रास्फीति की बढ़ती प्रवृत्ति में कमी आएगी। उन्होंने रिजर्व बैंक के इस आकलन से असहमति जताई कि मुद्रास्फीति इस वर्ष 5.5% के लगभग रहेगी और कहा कि समीक्षा से पता चलता है कि मुद्रास्फीति में और भी कमी आने के संकेत हैं और यह 4% के आस-पास रहेगी।

मुद्रास्फीति में और गिरावट की संभावना

रबी की फसल के बाजार में आने के साथ ही खाद्य पदार्थों की कीमतों में गिरावट आनी शुरू हो चुकी है। वित्तमंत्री ने कहा है कि मुद्रास्फीति अपने चरम तक जा चुकी है और अब इसके नीचे आने का सिलसिला शुरू होने के संकेत दिखाई दे रहे हैं। मौसम के मोर्चे पर इस वर्ष कुछ अप्रिय घटने की संभावना नहीं दिखाई देती कि खाद्यान्न की कीमतें फिर ऊपर चढ़ सकें। श्री मुखर्जी ने कहा कि ‘अर्थव्यवस्था में आ रहे सुधार और स्थिरता को देखते हुए मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि यह ‘सामान्य दौर’ की वापसी की ओर इशारा है। उन्होंने भरोसा दिलाते हुए कहा कि चिंता की कोई बात नहीं है और कर्ज में कसावट लाने से विकास पर कोई असर नहीं पड़ेगा। टिकाऊ वस्तुओं (डयूरेबल गुड्स) के क्षेत्र का विकास विशेष रूप से अप्रभावित रहेगा। वित्त मंत्री ने रिजर्व बैंक के मौद्रिक उपायों पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि ‘औद्योगिक विकास और ऋण की मांग (उठान) की हमारी समीक्षा से यह संकेत मिलता है कि विकास पर विपरीत प्रभाव पड़ने की कोई आशंका नहीं है। वास्तव में इन नीतियों से स्थायी विकास का मार्ग प्रशस्त होगा।’

(पीआईबी फीचर्स)

***

*आर्थिक संपादक, टिकट प्लांट न्यूज

घोषणा -इस आलेख में व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं और यह जरूरी नहीं कि वे पीआईबी के विचारों से मेल खाते हों।
૦૦.
शहरीकरण और स्वास्थ्य

तेजी से बढता हुआ शहरीकरण और शहरों की जनसंख्या में हो रही बढोत्तरी को स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के समाधान की दिशा में प्रमुख चुनौतियों के रूप में देखा जाता रहा है । अनुमान है कि 1990 और 2025 के बीच विकासशील देशों में शहरी आबादी में तीन गुनी वृध्दि हो चुकी होगी और यह कुल जनसंख्या के 61 प्रतिशत के बराबर हो गयी होगी । इस बढती हुई शहरी आबादी को देखते हुए पानी, पर्यावरण, हिंसा और चोट , गैर संचारी रोगों जैसी स्वास्थ्य संबंधी अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है । इसके अलावा, तम्बाकू के उपयोग, अस्वास्थ्यकर आहार, शारीरिक अकर्मण्यता और महामारियों के फैलने से जुड़ी आकांक्षाएं और खतरे भी कोई कम चुनौतीपूर्ण नहीं हैं ।

शहरों की चकाचौंध , आसपास के इलाकों में रहने वाले लोगों के लिये हमेशा से ही आकर्षण का विषय रही है और वे प्राय: इस आकर्षण के वशीभूत होकर शहरों की ओर पलायन कर जाते हैं, जहां पहले से ही आबादी की भरमार होती है । वहां पहुंच कर वे भी आवास, जलापूर्ति, जलमल निकासी , स्थानीय परिवहन और रोजगार के अवसरों जैसी पहले से ही गंभीर समस्याओं के शिकार हो जाते हैं । शहरी गरीब अनेक जटिल रोगों सहित अनेक प्रकार की स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के शिकार होते हैं । कई लोग तो तपेदिक और एचआईवीएड्स जैसे संचारी रोगों के शिकार होते हैं ।

शहरी क्षेत्रों में लोगों की बढती हुई संख्या से अधिकतर सरकारों की बुनियादी सेवायें प्रदान करने की क्षमता पर भारी दबाव पड़ा है । अवैध रूप से बसने वाली मलिन बस्तियां और झुग्गी-झोंपड़े एक आम बात हो गई है । इन क्षेत्रों में लोगों को आमतौर पर पेयजल और कचरे के निपटान जैसी बुनियादी सुविधायें नहीं मिल पाती । कचरे के निपटान के लिये आवश्यक संसाधन पर्याप्त नहीं होते । इन क्षेत्रों के निवासियों को वे सुविधायें नहीं मयस्सर होतीं, जिनसे उचित स्तर का जीवन बिताया जा सके और मानव विकास सही ढंग से हो सके । इन बस्तियों में धूल, दुर्गंध , रसायन और ध्वनि प्रदूषण की बहुतायत के कारण अनेक लोग इनके शिकार हो जाते हैं । उनके घरों की प्रकृति

इस प्रकार की होती है कि वे आमतौर पर इन खतरों से बच नहीं पाते । इन स्थितियों में रहने वाले लोगों और हैजा, वायरल हेपाटाइटिस, मियादीबुखार, अतिसार और लकवा जैसी अनेक बीमारियों के बीच सीधा संबंध होता है । ये बीमारियां प्राय: पीने के अयोग्य पानी, गंदगी , भीड़भाड़ और खराब आहार के कारण फैलती हैं । आधुनिक शहरों के स्वास्थ्य संबंधी खतरों जैसे यातायात, पर्यावरण आदि से भी उनके ग्रसित होने की आशंका बनी रहती है , क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों का पारम्परिक मददगार ढांचा धीरे-धीरे समाप्त होता जा रहा है । फलस्वरूप वे सामाजिक और मनावैज्ञानिक अस्थिरता के परिणामों के शिकार बन जाते हैं ।

इन शहरों के अधिकांश लोग अपने अस्तित्व की रक्षा के लिये असंगठित आर्थिक क्षेत्र की गतिविधियों में काम करने को विवश होते हैं । इन कार्यों में काम के दौरान के खतरों पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता । निर्माण क्षेत्रों में वायु प्रदूषण का उच्च स्तर श्वास संबंधी रोगों को जन्म दे सकता है, फेफड़ों की कार्यप्रणाली को नुकसान पहुंचा सकता है , कैंसर को जन्म दे सकता है और अन्य अनेक गंभीर और जटिल रोगों का कारण बन सकता है ।

हाल के दिनों में यह अहसास बढता जा रहा है कि स्वास्थ्य संबंधी अनेक समस्याओं के निराकरण के लिये चिकित्सा क्षेत्र से परे भी ध्यान देने की जरूरत है । सुनियोजित आर्थिक विकास, बेहतर आहार एवं शिक्षा, बेहतर आवास और स्वच्छ पर्यावरण के क्षेत्रों में बढ रही दिलचस्पी से बचाव चिकित्सा (प्रिवेन्टिव मेडिसिन) की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित हुआ है ।

हम सभी लोग प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाली शहरी व्यवस्था के विभिन्न पहलुओं से जूझते रहे हैं । अत: शहरों को स्वास्थ्यकर बनाने के लिये हमें शहरी स्वास्थ्य नियोजन पर ध्यान देना होगा और उसमें भागीदारी करनी होगी । परिवहन, शारीरिक सक्रियता को बढावा देने वाले क्षेत्रों की रूपरेखा तैयार करने में निवेश बढाना होगा, तम्बाकू पर नियंत्रण और खाद्य सुरक्षा के लिये कड़े कानून बनाने होंगे । इस तरह के दूरंदेशी शहरी नियोजन से ही स्वास्थ्य आहार व्यवहार को प्रोत्साहन मिलेगा । आवास, पेयजल और साफ-सफाई के क्षेत्रों में व्यापक सुधार से ही स्वास्थ्य संबंधी खतरों को दूर किया जा सकेगा । ऐसे शहरों का विकास करना होगा जिसमें सभी वर्गों और सभी आयु समूह के लोगों को जीवन की बुनियादी सुविधायें सुलभ हों ।

इन कार्यों के लिये कोई अतिरिक्त निवेश की आवश्यकता नहीं है । जरूरत है केवल उपलब्ध संसाधनों को प्राथमिकता वाले क्षेत्रों की ओर मोड़ने की । ऐसा होने पर ही शहरी क्षेत्रों की समस्याओं का निराकरण किया जा सकेगा ।

————————————————————————————

# ए एन खान

# वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं पूर्व सहायक निदेशक, राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान, ना

૦૦.
सामूहिक विकास कार्यक्रम (एमएसई-सीडीपी)

सूक्ष्म एवं लघु उद्यमों के समग्र एवं समन्वित विकास के लिए क्षमता निर्माण, विपणन विकास, निर्यात संवर्धन, कुशलता विकास, प्रौद्योगिकी को उन्नत बनाकर, प्रदर्शन यात्रा इत्यादि तथा सामान्य सुविधाओं की स्थापना के जरिए सूक्ष्म एवं लघु उद्यम मंत्रालय ने वर्ष 2003 में लघु उद्यम समूह विकास कार्यक्रम (एसआई-सीडीपी) योजना आरंभ की थी। पहले इसे समन्वित प्रौद्योगिकी उन्नयन एवं प्रबंधन कार्यक्रम (यूपीटेक)  के रूप में जाना जाता था जिसके द्वारा औद्योगिक समूह में पहली बार हस्तक्षेप 1998 में किया गया था।

इसी प्रकार, औद्योगिक एस्टेट की स्थापना तथा विद्युत वितरण नेटवर्क, जल, दूरसंचार, जल निकासी, सड़क तथा विपणन दुकान, आम सेवा सुविधाएं इत्यादि बुनियादी सुविधाओं के विकास के लिए मंत्रालय ने 1994 में आरंभ की गई एक अलग समन्वित अवसंरचनात्मक विकास योजना (आईआईडी) के कार्यान्वयन को जारी रखा। आईआईडी योजना मौजूदा औद्योगिक एस्टेट में अवसंरचनात्मक सुविवधाओं के उन्नयन अथवा उन्हें और मज़बूत करने के लिए भी आईआईडी योजना को मुहैया कराया जाता है।

सूक्ष्म एवं लघु उद्यमों के संवर्धन के लिए पैकेज मुहैया करने को मंजूरी देने समय, योजना का नाम बदल कर लघु उद्यम समूह विकास कार्यक्रम (एमएसई-सीडीपी) योजना कर दिया गया और अक्तुबर, 2007 में मौजूदा वित्ता पोषण व्यवस्था के साथ मंत्रालय की समन्वित अवसंरचनात्मक विकास योजना (आईआईडी) को एमएसई-सीडीपी में मिला दिया गया।

योजनाओं को मिलाने का मूल्यांकन करने के बाद सिफारिशों के आधार पर तथा राज्य सरकारों के उच्च अधिकरियों से विचार-विमर्श के बाद उन दिशानिर्देशों को संशोधित करना आवश्यक समझा गया जो प्रक्रियाओं मेें सुधार करने पर ध्यान देते हैं, समूहों के विकास पर समग्र दृष्टिकोण मुहैया कराते हैं और वित्ताीय सहायता के स्तर को बढ़ाते हैं।

मुख्य संशोधन इस प्रकार है :-

·        आम सुविधा केंद्र (सीएफसी) के लिए परियोजना की अधिकतम लागत को 10 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 15 करोड़ रुपये कर दिया गया। इसमें भारत सरकार का हिस्सा 70 प्रतिशत (विशेष वर्ग के राज्यों तथा ऐसे समूहों के लिए जहां महिला#सूक्ष्म#गांव#अ.जा.#अ.ज.जा. इकाइयां 50 प्रतिशत से अधिक हैं वहां 90 प्रतिशत) है।

·        अवसंरचना विकास के लिए परियोजना की अधिकतम लागत को 5 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 10 करोड़ रुपये कर दिया गया। इसमें भारत सरकार का हिस्सा 60 प्रतिशत (विशेष वर्ग के राज्यों तथा ऐसे समूहों के लिए जहां महिला#सूक्ष्म#अ.जा.#अ.ज.जा. इकाइयां 50 प्रतिशत से अधिक हैं वहां 80 प्रतिशत) है।

·        कम हस्तक्षेपों के लिए परियोजना की अधिकतम लागत को 10 लाख रुपये से बढ़ाकर 25 लाख रुपये कर दिया गया। इसमें भारत सरकार का हिस्सा 75 प्रतिशत (विशेष वर्ग के राज्यों तथा ऐसे समूहों के लिए जहां महिला#सूक्ष्म#गांव#अ.जा.#अ.ज.जा. इकाइयां 50 प्रतिशत से अधिक हैं वहां 90 प्रतिशत) है, और

·        सीएफसी और #या अवसंरचना विकास के लिए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार करने के लिए अधिकतम लागत को बढ़ाकर 5 लाख रुपये कर दिया गया।

सफलता :-

एमएसई-सीडीपी के तहत विकसित किये जा रहे अनेक समूहों में से रबड़ समूह, चंगनाचेरी स्थित आम सुविधा केंद्र (सीएफसी) की एक सूक्ष्म प्रस्तुति के रूप में सफलता की कहानी

कोट्टयम स्थित रबड़ समूह सूक्ष्म एवं लघु उद्यम मंत्रालय का एक विशिष्ट समूह है जिसमें लघु तथा सूक्ष्म रबड़ आधारित उद्यम हैं और इनमें चिपचिपे रस से गढ़ी हुई वस्तुआें का निर्माण किया जाता है। इन समूहों का प्रतिवर्ष कुल व्यापार 500 करोड़ रुपये है और इसमें प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप से 16,000 लोग रोजगार में लगे हुए हैं। अपने उत्पादों का मानकीकरण करने के लिए समूहों के लाभ के लिए 3 करोड़ 50 लाख रुपये के निवेश से केंद्र सरकार तथा राज्य सरकार गठबंधन की सहायता से केंद्रीकृत मिश्रण संयंत्र की स्थापना की गई है। यह अंत:मिश्रण, मिश्रण तथा गढ़ाई के संदर्भ में सदस्य इकाइयों के बीच असंतुलन की प्रचलित रेखा को ठीक करने के लिए है।

૦૦.स्वदेशी हल्का लड़ाकू हैलिकाप्टर: रक्षा क्षेत्र में भारत की एक और उपलब्धि

रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में भारत ने एक और कदम मजबूती से रखा है । रविवार 23 मई 2010 को बेंगलुरू में हिन्दुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड की हवाई पट्टी पर देश में बने हल्के लड़ाकू हैलिकाप्टर (एलसीएच) के हवा में पहली उड़ान भरने के साथ ही भारत दुनिया के उन गिने चुने देशों में शामिल हो गया जिनके पास इस तरह के हैलिकाप्टर बनाने की क्षमता है। इसे रक्षा उत्पादन क्षेत्र में भारत की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है । करोड़ों भारतीयों का सिर उस समय गर्व से ऊंचा हो गया जब इस हैलिकाप्टर ने बेंगलूरू के आकाश में 20 मिनट तक अपने हैरत अंगेज करतब दिखाये और अपनी अद्भुत युध्दक क्षमता का परिचय दिया ।

यह हैलिकाप्टर दुश्मन के ठिकानों पर प्रक्षेपास्त्रों, बमों और राकेटों से हमला करने में सक्षम है । पहाड़ी इलाकों में भी दुश्मन के जमीनी और हवाई लक्ष्यों को नष्ट करने में भी इसे पूर्ण रूप से महारत हासिल है । यह लड़ाकू हैलिकाप्टर आड़े-तिरछे और पीछे की ओर तेजी से उड़ान भर कर दुश्मन पर निशाना लगा सकता है । यह आतंकवादियों और उग्रवादियों के खिलाफ कार्रवाई के लिये पूर्ण रूप से उपयुक्त है। आवश्यकता पड़ने पर इसे शहरी इलाकों में भी आतंकवादियों के खिलाफ तैनात किया जा सकता है । रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार टैंकों की लड़ाई में भी इसे दुश्मन के खिलाफ इस्तेमाल किया जा सकता है ।

इस हल्के लड़ाकू हैलिकाप्टर (एलसीएच) का विकास भारत की प्रमुख विमान निर्माण कंपनी हिन्दुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड ने किया है । हैलिकाप्टर के पहली उड़ान भरने के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में मौजूदा वायुसेना के चीफ एयर वाइस मार्शल पी के बारबोरा ने इस लड़ाकू हैलिकॉप्टर की क्षमताओं और देश की रक्षा में इसकी उपयोगिता पर पूरा भरोसा जताया । इस अवसर पर बताया गया कि 5.8 टन वजन वाला यह हैलिकाप्टर साढे छ किलोमीटर की ऊंचाई से पर्वतीय क्षेत्रों में लक्ष्य पर निशाना लगाने में सक्षम है । लगभग 270 किलोमीटर प्रतिघंटे की गति से यह अधिकतम 550 किलोमीटर तक उड़ान भर सकता है । इसमें हवा से हवा और हवा से जमीन पर वार करने वाले प्रक्षेपास्त्रों से लैस अनेक प्रकार के अन्य आधुनिक हथियार और बम भी तैनात होंगे ।

हल्के लड़ाकू हैलिकाप्टर के निर्माण की योजना 2006 में बनी थी । लगभग तीन अरब 76 करोड़ रूपये की लागत से 40 महीने में बने इस हैलिकाप्टर के निर्माण में किसी तरह की विदेशी सहायता नहीं ली गई है । वायुसेना ने एचएएल को 64 हैलिकाप्टर बनाने का आदेश दिया है, जिनकी डिलीवरी 2014 में शुरू होने की संभावना है । भारतीय थलसेना भी 114 हल्के लड़ाकू हैलिकाप्टर खरीदेगी । एचएएल के ध्रुव हैलिकॉप्टर के आधारस्थल (बेस) पर निर्मित इस हल्के लड़ाकू हैलिकॉप्टर में आधुनिकतम इलेक्ट्रानिक एवं राडार प्रशालियां लगी हैं जो 6 किलोमीटर की दूरी से दुश्मन के ठिकानों को पहचानकर पायलट को आक्रमण का निर्देश देती हैं । यह दुश्मन के प्रक्षेपास्त्रों को हवा में ही नष्ट कर सकता है । दुश्मन के हमले को नाकाम करने के लिये स्वचालित प्रतिरोध प्रणालियां भी इसमें लगायी गई हैं । नाइट विजन (रात में देखने में समर्थ) उपकरणों से लैस यह हैलिकॉप्टर रात में भी दुश्मन पर कहर बरपा सकता है ।

रक्षा सूत्रों के अनुसार भारतीय सेनाओं से हल्के लड़ाकू हैलिकॉप्टरों का आर्डर मिलने से एचएएल का मनोबल और उत्साह बढा है । वायुसेना के पास फिलहाल रूस में बना एमआई-25 और एमआई -35 लड़ाकू हैलिकाप्टरों का बेड़ा है । लेकिन इन हैलिकॉप्टरों का वजन कुछ भारी है और वे ऊंचाई वाले पर्वतीय सैन्य अभियानों में अधिक कारगर नहीं होते । थलसेना की विमानन शाखा को भी ऐसे हल्के लड़ाकू हैलिकाप्टरों की जरूरत कई वर्षों से महसूस हो रही थी ।

हल्के लड़ाकू हैलिकॉप्टर की पहली उड़ान देखने के बाद एयर मार्शल बारबोरा ने कहा कि यह न सिर्फ एचएएल के लिये ऐतिहासिक दिन है बल्कि पूरे देश के लिये गौरव की बात है । उन्होंने आशा व्यक्त की कि यह हैलिकॉप्टर भारतीय वायुसेना की हर जरूरत को पूरा करने में सक्षम होगा । उन्होंने कहा कि ऐसे बहुत कम देश हैं जिनके पास अपने देश में निर्मित इस श्रेणी के हैलिकॉप्टर के निर्माण की क्षमता है । एलसीएच के स्वदेशी स्तर पर विकास के रणनीतिक और आर्थिक कारणों पर प्रकाश डालते हुए एयर मार्शल बारबोरा ने कहा कि किसी भी स्वाभिमानी देश के लिये यह जरूरी है कि वह रक्षा सामग्रियों के मामले में आत्मनिर्भर हो । उन्होंने आशा व्यक्त की कि यह हैलिकॉप्टर शीघ्र ही वायुसेना में शामिल होगा । इस अवसर पर मौजूदा रक्षा उत्पादन सचिव  आर के सिंह ने कहा कि विकसित देशों की तुलना में एचएएल ने कम समय में इस हैलिकॉप्टर का निर्माण कर दुनिया को दिखा दिया है कि भारत की रक्षा उत्पादन क्षमता को कम करके नहीं आंका जा सकता ।
૦૦.
कविगुरू रबीन्द्रनाथ ठाकुर

कविगुरु रबीन्द्रनाथ ठाकुर ने साहित्य के क्षेत्र में अपनी जन्मभूमि बंगाल में शुरूआती सफलता प्राप्त की । वह साहित्य की सभी विधाओं में सफल रहे किन्तु सर्वप्रथम वह एक महान कवि थे । अपनी कुछ कविताओं के अनुवादों के साथ वह पश्चिमी देशों में  भी प्रसिध्द हो गए । कविताओं की अपनी पचास और अत्यधिक लोकप्रिय पुस्तकों में से मानसी (1890)#(द आइडियल वन), सोनार तरी(1894) (द गोल्डेन बोट) और गीतांजलि (1910) जिस पुस्तक के लिये उन्हें वर्ष 1913 में साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

एक महान साहित्यकार होने के साथ-साथ वैसे लोगों को भी भारत के इस महान सपूत के मानव सभ्यता से जुड़े शीर्ष व्यक्तित्व की महानता के बारे में कोई शंका नहीं होगी, जिन्हें इनके जीवन और कार्यों के बारे में थोड़ी सी जानकारी है । वह देश और देशवासियों से प्यार करते थे । वह हमेशा घटनाक्रमों से जुड़ी व्यापक विचारधारा रखते थे और साम्राज्यवादी शासन के अधीन होने पर भी देश का विकास चाहते थे ।

उनकी सर्वोत्तम काव्य कृतियों, व्हेयर दि माइंड इज विदाउट फीयर, दैट फ्रीडम ऑफ हैवन और नैरो डोमेस्टिक वाल उन्हें विश्व बंधुत्व के सच्चे पुरोधा के रूप में स्थापित करती हैं जिन्हें समझने की जरूरत है । उसी प्रकार इनटू दैट फ्रीडम ऑफ हैवन लेट माई कंट्री अवेक में लिखी उनकी अमर वाणी भी समान रूप से महत्त्वपूर्ण है ।

कविगुरु जहां एक ओर एक राष्ट्रवादी और महात्मा गांधी के सच्चे मित्र और दार्शनिक मार्गदर्शक थे  वहीं दूसरी ओर वह राष्ट्रीयता पर अत्यधिक जोर देने तथा संकीर्ण राष्ट्रवाद के विरूध्द थे । इसे इस संदर्भ में देखा जा सकता है कि उन्होंने महानगरीय मानवतावाद को साकार करने के महत्त्व पर जोर दिया । बढ भेंग़े दाव (सभी बाधाओं को तोड़ो) जैसी लोकोक्तियों को हमें उन अर्थों में समझना चाहिए । यह उस व्यक्ति की सीमारहित विलक्षणता ही है कि भारत और बंगलादेश दोनों देशों के राष्ट्रगान उनके द्वारा ही लिखे गए थे ।

जहां भारत ने जनगणमन को राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार किया वहीं बांगलादेश ने भी सत्तर के दशक में अपने राष्ट्रगान के रूप में आमार शोनार बांगला (माई गोल्डेन बंगाल) को चुना ।

युध्द और साम्राज्यवाद की अपनी अवधारणाओं में रबीन्द्रनाथ ने साम्राज्यवादी उग्रता और नस्लवादी तथा राष्ट्रीयतावादी भावनाओं के बर्वर प्रदर्शन की निंदा की । उनका कहना है कि युध्द, उग्र राष्ट्रवाद, हथियारों की होड़, शक्ति के महिमामंडन और अन्य ऐसे राष्ट्रीय मिथ्याभियान का परिणाम होता है जिसका कोई अच्छा कारण नहीं होता । आज का विश्व कई हिस्सों में बंटा है और विश्व के एक कोने से दूसरे कोने तक लोगों के बीच विनाशकारी नाभिकीय युध्द का भय निरंतर कायम है, ऐसे में इसे एक वैश्विक गांव के रूप में परिणत करने की जरूरत सचमुच महसूस होती है । किसी भी अन्य लेखों की तुलना में व्यापक बंधुत्व पर कविगुरु के लेखों को समझना बेहतर होगा ।

द डाकघर जैसे उनके कार्य में उनकी मानवतावादी सोच की झांकियां मिलती हैं । उसी प्रकार उनकी प्रशंसित लघु कथा द चाइल्ड्स रिटर्न  उनके पात्रों के शरीर और आत्मा को खोज निकालने की उनकी क्षमता  को दर्शाती है । रबीन्द्रनाथ ने अपने समर्थकों के भौतिक शरीर को तलाशने में सफलता प्राप्त की और उन्हें हृदय तथा आत्मा दी । अनुवादक मैरी एम लागो ने बाद में नष्टानीर (द ब्रोकन नेस्ट) को ठाकुर का सर्वश्रेष्ठ उपन्यास बताया जिसमें कथानक अपने समय के काफी पहले पैदा हुई एक गृहिणी के जीवन और समय के इर्द-गिर्द केन्द्रित है । फिल्मजगत के उस्ताद सत्यजीत राय ने बाद में चलकर 1964 में चारूलता नामक बहु प्रशंसित फिल्म तैयार की ।

देशवासियों के लिए उनका अथाह प्यार ही था जिसके कारण उन्होंने वर्ष 1901 में शांति निकेतन में विश्व भारती विश्वविद्यालय की स्थापना की ।

वर्ष 1905 में बंगाल के बंटवारे ने उन्हें बेचैन किया था और राष्ट्रीय हितों से जुड़े मुद्दे के शीर्ष पर स्थापित किया था । इस वाकये ने उन्हें स्वतंत्रता सेनानियों के करीब पहुंचा दिया और उन्होंने हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच साम्प्रदायिक सद्भाव सुनिश्चित करने में व्यापक योगदान किया । खासकर उन्होंने राखी जैसे सांस्कृतिक त्यौहारों का इस्तेमाल किया और सभी धर्मों के लोगों से यह मांग की कि वे बंधुत्व के एक प्रतीक के रूप में एक दूसरे की बांहों में राखी बांधे ।

मानवता और समाज के लिए उनका प्यार किसी अन्य अवसर की तुलना में अधिक उभर कर सामने तब  आया जब उन्होंने विधवा पुनर्विवाह का मुद्दा उठाया । जो कुछ उन्होंने लिखा उसे व्यवहार में भी उतारा और वर्ष 1910 में तदनुकूल उदाहरण के तौर पर अपने पुत्र की शादी एक युवा विधवा प्रतिमा देवी से करायी । उसी वर्ष उनका संग्रह गीतांजलि बंगला में लिखा गया और बाद में 1912 में उसका अंग्रेजी अनुवाद प्रकाशित हुआ । वर्ष 1919 में उदाहरण देकर सिध्द किया और कुख्यात जलियांवाला बाग के बर्वरतापूर्ण नरसंहार  की जोरदार निंदा करते हुए नाइट उपाधि का परित्याग कर दिया ।

रबीन्द्रनाथ अपराध से घृणा करने में विश्वास करते थे न कि अपराधी से । स्वदेशी समाज के संदर्भ में उन्होंने अपने लोगों से केवल अंग्रेजों से ही स्वतंत्रता पाने के लिए नहीं कहा था बल्कि उदासीनता, महत्त्वहीनता और परस्पर वैमनस्यता से भी । स्वदेशी सोच का सृजन और इस कारण उनकी कविता और उनके गीत हमेशा आत्मा पर जोर देते थे । इसलिए यह ठीक ही कहा गया है कि कविगुरु की स्वतंत्रता संबंधी विधि एक बौध्दिक क्रांति थी । उनका लक्ष्य केवल साम्राज्यवादी अंग्रेजों को ही भगाना नहीं था बल्कि अंग्रेजों से भावनात्मक स्वतंत्रता के कारण आर्थिक संरचना में आई खामियों को भी दूर करके आर्थिक और राजनीतिक सुधार कायम करना था ।

विद्वानों का कहना है कि महात्मा गांधी और रबीन्द्रनाथ ठाकुर भारत को स्वतंत्र करने के तरीके पर अपनी भिन्न सोच रखते थे किंतु दोनों  के बीच काफी निकटताएं भी थीं । गांधीजी ठाकुर को अपना गुरूदेव पुकारते थे और ठाकुर ने गांधीजी को महात्मा  की उपाधि दी । भारत को आजाद करने के तरीके के बारे में विचारों की भिन्नता के बावजूद भी इस मुद्दे पर गांधीजी ने ठाकुर से यह कहकर परामर्श किया कि उन्हें मालूम है कि उनका सर्वश्रेष्ठ मित्र अध्यात्म से प्रेरित है और उन्होंने मुझे जीवन में स्थिरता कायम करने की शक्ति दी है ।

नॉबेल पुरस्कार से सम्मानित इस महान विभूति की 150वीं वर्षगांठ को मनाने हेतु सरकार द्वारा राष्ट्रव्यापी कार्यक्रम की घोषणा करना एक समुचित निर्णय है । सचमुच भारत की समृध्द सभ्यता और सांस्कृतिक विरासत को एक से अधिक तरीके से ठाकुर ने चिन्हित किया है । हाल में समाप्त बजट अधिवेशन के दौरान संसद में प्रधानमंत्री डा0 मनमोहन सिंह ने ठीक ही कहा था कि यह एक ऐसा अवसर है जिसे समुचित तरीके से मनाना होगा ताकि हम सही तरीके से  कविगुरु को सम्मानित करने में समर्थ हो सकें । ठाकुर की 150वीं वर्षगांठ को यादगार बनाने के लिए दिशानिर्देश तैयार करने हेतु प्रधानमंत्री ने 35 सदस्यों की एक समिति गठित की है । इस वर्ष कई राष्ट्रव्यापी कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं और भारतीय रेल ने अपने देश के साथ ही बांगलादेश में एक स्मारक रेलगाड़ी चलाने के बारे में निर्णय लिया है । (पसूका) ।

————————————————————————————

नीरेन्द्र देव

૦૦.
वर्षा सिंचित खेती की क्षमताओं का उपयोग करना

भारत में खेती के कुल 1403.00 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में से सिर्फ 608.60 लाख हेक्टेयर क्षेत्र ही सिंचित है तथा शेष 794.40 लाख हेक्टेयर वर्षा सिंचित है। खाद्य उत्पादन का करीब 55 प्रतिशत सिंचित भूमि में होता है जबकि वर्षा सिंचित भूमि का योगदान  करीब 45 प्रतिशत ही है। वर्षा सिंचित खेती में जोखिम की आशंका रहती है। निम्न उत्पादकता और कम आदान इस तरह की खेती की विशेषताएं हैं लेकिन यदि समुचित प्रबंधन किया जाए तो वर्षा सिंचित क्षेत्र में भी कृषि उत्पादन में व्यापक योगदान करने की क्षमता है।

वर्षा सिंचित कृषि की उच्च क्षमता के मद्देनज़र केंद्र सरकार ने वर्षा सिंचित क्षेत्रों के साकल्यवादी और टिकाउ विकास को उच्च प्राथमिकता दी है। वर्षा सिंचित शुष्क भूमि खेती को प्रोत्साहन देने के लिए, कृषि और ग्रामीण विकास मंत्रालय एकीकृत जलसंभर प्रबंधन दृष्टिकोण के जरिए जलसंभर कार्यक्रम कार्यान्वित कर रहे हैं। कृषि मंत्रालय के सभी अन्य प्रमुख कार्यक्रमों में भी वर्षा सिंचितबारानी क्षेत्रों पर पर्याप्त ध्यान दिया जा रहा है। राज्यों द्वारा प्रस्तावित वार्षिक कार्य योजना के अनुसार जलसंभर दृष्टिकोण पर आधारित वर्षा सिंचित और अवक्रम्य क्षेत्रों के विकास के लिए प्राकृतिक प्रबंधन के कार्यक्रमों के वास्ते कृषि के बृहत प्रबंधन की स्कीम के तहत हर साल 500 करोड़ रूपए आवंटित किए जाते हैं। भू संसाधन विभाग ने जलसंभर प्रबंधन के लिए 11 वीं योजना के वास्ते 15,359 करोड़ रूपए का प्रावधान किया है।

संसाधनों का संरक्षण और सर्वश्रेष्ठ इस्तेमाल

वर्षा जल का संरक्षण और मिट्टी एवं जल संसाधनों का टिकाउ एवं मितव्ययी ढंग से  सर्वश्रेष्ठ इस्तेमाल एकीकृत जलसंभर प्रबंधन दृष्टिकोण की महत्त्त्वपूर्ण बाते हैं। वर्षा सिंचित क्षेत्रों के लिए राष्ट्रीय जलसंभर विकास परियोजना 1990-91 में शुरू की गइ थी। इसे 2000-01 से कार्य योजनाओं के जरिए राज्यों के प्रयासों के कृषि अनुपूरणपूरण के बृहत प्रबंधन के साथ शामिल कर ली गई है। इसका विशेष ध्यान प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण, विकास और टिकाउ प्रबंधन, कृषि उत्पादन एवं उत्पादकता में टिकाउ ढंग से वृध्दि, इन क्षेत्रों को हरित बनाने के जरिए अवक्रमित एवं भंगुर वर्षा सिंचित क्षेत्रों में पारितंत्र संतुलन को बहाल करना, सिंचित एवं वर्षा सिंचित क्षेत्रों के बीच क्षेत्रीय विषमता में कमी तथा ग्रामीण आबादी के लिए रोजगार के टिकाउ अवसरों का सृजन करने पर है।

राष्ट्रीय वर्षा सिंचित क्षेत्र प्राधिकरण देश की बारानी भूमि एवं वर्षा सिंचित कृषि के क्रमबध्द उन्नयन एवं प्रबंधन संबधी अति आवश्यक ज्ञान आदान उपलब्ध कराता है। प्राधिकरण देश के वर्षा सिंचित क्षेत्रों में लागू किए जा रहे कृषि एवं परती भूमि विकास कार्यक्रमों में समन्वय एवं उन्हें आपस में मिलाने का कार्य करता है। इस उद्देश्य के लिए 11 वीं पंच वर्षीय योजना के लिए 123 करोड़ रूपए चिह्नित किए गए हैं।

प्राधिकरण ने संबंधित मंत्रालयोंविभागों और योजना आयोग के सहयोग से अगली पीढी क़े जलसंभर कार्यक्रमों के लिए नया ढांचा तैयार करने के साथ जलसंभर विकास परियोजनाओं के लिए आम दिशा निर्देश प्रकाशित किए हैं। पहली अप्रैल 2008 से प्रभावी इन दिशा निर्देर्शों के अनुसार नई जलसंभर परियोजनाएं तैयार की जा रही हैं। प्राधिकरण ने नूतन नीतियों, ज्ञान, प्रौद्योगिकियों और वर्षा सिंचित क्षेत्रों के साकल्यवादी एवं टिकाउ विकास के अवसरों की संभावना तलाशने के लिए दूरदृष्टि दस्तावेज़ भी तैयार किया है। प्राधिकरण ने वर्षा सिंचित क्षेत्रों के विकास के लिए यथार्थ योजनाएं तैयार करने में राज्यों की मदद करने के लिए विस्तृत प्रारूप भी तैयार किया है। इसने दिशा निर्देशों और यथार्थ योजनाओं की तैयारी को आत्मसात करने के लिए कार्यशालाएं भी आयोजित की हैं। प्राधिकरण ने उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश के बुन्देलखंड क्षेत्र के लिए राहत रणनीति के बारे में व्यापक रिपोर्ट भी तैयार की है।

कृ31षि मंत्रालय की देखरेख में उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और असम में विश्व बैंक की सहायता से समन्वित जलसंभर प्रबंधन की तीन परियोजनाएं चलाई जा रही हैं । विश्व बैंक इन परियोजनाओं के लिए राज्य सरकारों को सीधे पर धन देता है । उत्तराखंड में 11 जिलों के 468 पंचायतों में 2.34 लाख हेक्टेयर भूमि को इसके दायरे में लिया गया है । फिलहाल 467 चुनिंदा ग्राम पंचायतों में 258.93 करोड़ रुपये के निवेश के साथ कार्य प्रगति पर है । हिमाचल प्रदेश में इस परियोजना में 10 जिले के 602 ग्राम पंचायत शामिल हैं । सभी चुनिंदा जिले में कार्य प्रगति पर है । परियोजना के अधीन असम में 36.129 नलकूप और 11,674 लिपऊट पंप सेट स्थापित करने के साथ ही 1077 पावर टिलर की आपूर्ति की गई और 700 ट्रेक्टरों का प्रावधान किया गया है। इसके साथ ही 15,908 हेक्टेयर क्षेत्र में जल निकासी की व्यवस्था की गई है ।

कर्नाटक, राजस्थान और उत्तराखंड में शीर्ष  आधार पर विकेन्द्रित जलसंभर विकास के लिए परियोजना जर्मन टेक्नोलॉजी कोऑपरेशन (जीटीजेड) की सहायता से क्रियान्वित की जा रही है । इसका लक्ष्य क्षेत्रीय और राज्य स्तर पर जलसंभर प्रबंधन के लिए एक क्षमता विकास प्रणाली तेयार करना है । इस परियोजना के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए कृ31षि मंत्रालय, जीटीजेड, आईसीआरआईएसएटी और रा­ट्रीय कृ31ाि विस्तार प्रबंधन संस्थान को मिलाकर एक रा­ष्ट्रीय संघ गठित किया गया है ।

नाबार्ड के जलसंभर विकास को­ष डब्ल्यूडीएफ) का इस्तेमाल सरकारी, अर्ध्द-सरकारी और गैर-सरकारी संगठन से जुड़े क्षेत्रों में विभिन्न कार्यक्रमों के अधीन एक भिन्न किन्तु सफलतापूर्ण प्रयासों के लिए आवश्यक कार्यक्रम तैयार करने में किया जाता है । प्रारंभ में इस परियोजना के लिए 18 राज्यों का चयन किया गया किन्तु अंतत: केवल 13 राज्य इसके लिए आगे आए । व­र्ष 2006 में आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल और महारा­ट्र के 31 व्यथित  जिले को प्रधानमंत्री के पुनर्वास पैकेज के बाद इन सभी जिले में डब्ल्यूडीएफ के माध्यम से भागीदारी आधारित जलसंभर विकास कार्यक्रम लागू करने का निर्णय लिया गया था । फिलहाल, प्रधानमंत्री के पैकेज के अधीन 1196 जलसंभरों का चयन किया गया है, जिनमें से 416 जलसंभर 13 राज्यों के गैर-व्यथित जिले में और 780 जलसंभर 31 व्यथित जिले में हैं ।

अनुसंधान और प्रशिक्षण कार्यक्रम

भारतीय कृ31षि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) ने भी केन्द्रीय शु­क भूमि कृ31षि अनुसंधान संस्थान (सीआरआईडीए) और अखिल भारतीय समन्वित शु­क भूमि कृषि अनुसंधान परियोजना (एआईसीआरपीडीए) के लिए ग्यारहवीं योजनावधि में 75 करोड़ रुपये आबंटित किए थे । इसने विभिन्न कृ31षि जलवायु क्षेत्रों के लिए शु­क भूमि में खेती के लिए प्रौद्योगिकी आधारित तौर-तरीके विकसित किए हैं । देश के विभिन्न कृ31षि-पारिस्थितिकीय क्षेत्रों को शामिल करते हुए 18 प्रारूप जलसंभर परियोजनाएं केन्द्रीय मृदा और जल संरक्षण अनुसंधान और प्रशिक्षण संस्थान (सीएसडब्ल्यूसीआरटीआई) और आईसीआरआईएसएटी को सौंपी गई हैं ताकि विशे­ा प्रकार की कृषि-जलवायु संबंधी परिस्थितियों में जैव-भौतिक तथा सामाजिक-आर्थिक आयामों का हल निकल सके और जलसंभर कार्यक्रमों के अधीन विकास प्रक्रिया को अधिकतम स्तर पर लाने के लिए समुचित प्रौद्योगिकी विकसित हो सके । ये परियोजनाएं एनडब्ल्यूडीपीआरए और अन्य रा­ष्ट्रीय तथा राज्यस्तरीय वित्तपो31ाित परियोजनाओं के माध्यम से विस्तृत प्रसार के लिए सफल प्रौद्योगिकियों के प्रत्युत्तर हेतु नमूना परियोजनाओं के रूप में  काम करेंगी ।

केवीवाई, एनएफएसएम, रा­ट्रीय बागवानी मिशन और कृ31ाि का वृहद प्रबंधन जैसी अधिकांश योजनाओं के अधीन इन प्रौद्योगिकियों को अपनाने के लिए किसानों को सहायता दी जाती है । इसके अलावा आईसीएआर के 25 शु­क भूमि केन्द्रों ने बहुत से किसानों को खेती के प्रयोगों अथवा संसाधनों के रूप मे प्रत्यक्ष तौर पर तथा प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से अप्रत्यक्ष तौर पर लाभान्वित किया है । शु­क भूमि से जुड़े किसानों सहित देश के सभी किसान भारतीय रिजर्व बैंक तथा नाबार्ड की नीतियों के अनुसार बैंकों से त्रऽण प्राप्त करने के लिए पात्र हैं । जलसंभर कार्यक्रमों में प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन सेसंबंधित गतिविधियों के लिए सहायता दी जाती है । इसके अलावा अन्य अधिकांश कृ31ाि विकास कार्यक्रमों में वभिन्न कृषिगत संसाधनोंसंचालनों के लिए राज सहायता के रूप में किसानों को प्रोत्साहन दिया जाता हे ।

सतही तौर पर कराए गए प्रभाव मूल्यांकन अध्ययनों और दूरसंवेदी प्रौद्योगिकियों ने इस बात का खुलासा किया है कि जलसंभर-आधारित कार्यक्रमों के कारण भूजल संभरण से कुओं और जल निकायों में जलस्तर बढा है तथा फसल की सघनता में वृध्दि हुई है । इसके कारण फसल प्रणाली मे बदलाव होने के चलते अधिक पैदावार तथा मृदा क्षरण में कमी आई है। ग्यारहवीं योजनावधि में लगभग 3,878 लघु जलसंभरों को शामिल करते हुए लगभग 23.4 लाख हेक्टेयर मि को विकसित करने का प्रस्ताव किया गया है । इसमें से दिसम्बर, 2009 तक 638.40 करोड़ रुपये की लागत से 7.96 लाख हेक्टेयर भूमि विकसित की गई है  (पसूका)।

૦૦.
भारतीय अर्थव्यवस्था और संप्रग रिपोर्ट कार्ड

भारतीय मौसम विभाग के पूर्वानुमान के अनुरूप मानसून ने 31 मई 2010 को केरल के तट पर दस्तक दी। वैश्विक आर्थिक संकट और सूखे के कठिन दौर से निकलने के बाद इस साल का मानसून देश की अर्थव्यवस्था के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है। अच्छी शुरुआत होने के कारण यह उम्मीद की जा सकती है कि इस बार फसल अच्छी होगी और खाद्यान्न पर कीमतों का जो इस समय दबाव है, वह कम होगा। मानसून धान, अनाज, गन्ने, सोयाबीन, तिलहन आदि के लिए जरूरी है। संयोग से भारत तिलहन का बड़ा आयातक है और दुनिया में चीनी की सबसे ज्यादा खपत यहीं होती है।

संप्रग सरकार के दूसरे कार्यकाल में प्रथम वर्ष का रिपोर्ट कार्ड पेश करते हुए प्रधानमंत्री  डॉ. मनमोहन सिंह और संप्रग अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी ने देश को बताया कि केंद्रीय सांख्यिकीय संगठन द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2009‑10 के दौरान अर्थव्यवस्था की विकास दर 7.4 प्रतिशत है। यह दर पहले आकलन की गई 7.2 प्रतिशत से कहीं ज्यादा है। इससे इस बात को बल मिलता है कि इस साल विकास दर 8.5 प्रतिशत के आसपास होगी और आने वाले साल में इसके दो अंकों में हो जाने की पूरी संभावना है। जैसा कि प्रधानमंत्री ने कहा है कि यह लोगों को गरीबी और कुपोषण से निकालने के लिए जरूरी है।

वास्तव में पिछले छह माह में देश में उत्तरोत्तर सुधार दर्ज किया गया। पिछली तिमाही खासतौर से अच्छी रही क्योंकि इस दौरान निर्माण क्षेत्र में 16.3 प्रतिशत विकास दर्ज किया गया जबकि पिछले साल की इसी अवधि के दौरान यह मात्र 0.6 प्रतिशत थी। पिछले छह माह में निर्यात में लगातार बढोत्तरी हो रही है, और इस क्षेत्र ने अप्रैल में 36 प्रतिशत की शानदार वृध्दि दर्ज की। ऐसा उस दौरान हुआ जब 13 माह तक लगातार निर्यात में गिरावट के कारण अर्थव्यवस्था को बुरे दिन देखने पड़े। अप्रैल में आयात में भी 43 प्रतिशत की बढोतरी हुई जिसके कारण व्यापार घाटा 10 अरब डॉलर के ऊपर रहा, 27.3 अरब डॉलर के आयात बिल और निर्यात आय 16.9 अरब डॉलर। वर्ष 2009‑10 में भारतीय निर्यात 4.7 प्रतिशत गिरा। मौजूदा साल में हमारा निर्यात में 15 प्रतिशत वृध्दि का लक्ष्य है।

सबसे ज्यादा अचरज तो कृषि क्षेत्र में हुआ जहां हम .02 प्रतिशत की त्रऽणात्मक वृध्दि की संभावना व्यक्त कर रहे थे। इस क्षेत्र में .02 प्रतिशत की सकारात्मक वृध्दि दर्ज की गई।

इसी पृष्ठभूमि में यह रिपोर्ट कार्ड समीक्षा वर्ष में भारत को दुनिया में सर्वश्रेष्ठ कार्यनिष्पादन वाले देशों में से एक बताता है, खासतौर से अपवाद स्वरूप ऐसे मुश्किल और चुनौतीपूर्ण समय में संभव हुआ है जिसका हमने सामना किया है। लेकिन प्रधानमंत्री  ‘आगे आने वाली जबरदस्त चुनौतियों’ तथा ‘क्षितिज में मौजूद अनिश्चितताओं’ के मद्देनज़र सावधानी के साथ इस बारे में आशावादी थे।

मुद्रास्फीति, मूल्य वृध्दि और वित्तीय घाटा निरंतर चिंताजनक बने हुए हैं। हालांकि मई में मुद्रास्फीति मामूली कम हुई है जो फरवरी में 10.1 प्रतिशत थी लेकिन यह अब भी चिंता का कारण है। शुक्र है कि सरकार को विश्वास है कि यह वर्ष के आखिर तक घटकर 5.5 प्रतिशत रह जाएगी। इसलिए रिपोर्ट कार्ड अंशशोधित ढंग से वित्तीय समझदारी के पथ पर लौटने की आवश्यकता की बात करता है। यह उस उच्च वित्तीय घाटे को भी कम करेगा जिसका सामना हम वित्तीय और मौद्रिक प्रोत्साहन उपायों के जरिए अर्थव्यवस्था में भारी मात्रा में नकदी जारी करने के कारण कर रहे हैं। यह कब और कैसे होना है इसका निर्णय रिजर्व बैंक को करना है।

यूरोपीय क्षेत्र में त्रऽण की समस्या भारत को ज्यादा प्रभावित नहीं कर सकती है मगर यदि संकट गहराता है तो इससे यूरोपीय मांग में गिरावट आएगी और हमारे निर्यात पर इससे फिर दबाव बनेगा। आरबीआई के गवर्नर को विश्वास है कि यदि यूनान संकट से कोई असाधारण दबाव बना तो हमारा अच्छा विदेशी मुद्रा भंडार हालात से निपटने में समर्थ होगा।

मूल्य वृध्दि के मामले में प्रधानमंत्री ने खुशी प्रकट की कि हाल के सप्ताहों में कीमतें कम होनी शुरू हुई हैं तथा उम्मीद प्रकट की कि यह रूझान जारी रहेगा। लेकिन वे शीघ्र ही यह भी जोड़ते हैं कि इसके लिए करीबी और सावधानीपूर्वक निगरानी की ज़रूरत होगी जो की जाएगी तथा मुद्रास्फीति पर लगाम कसने के लिए जो भी आवश्यक होगा सही कदम उठाए जाएंगे। मुद्रास्फीति और बढी क़ीमतें अर्थव्यवस्था की वृध्दि के लिए संकट बनी हुई हैं।

लेकिन यदि आर्थिक वृध्दि समावेशी नहीं है तो भारत जैसी ट्रिलियन डालर की अर्थव्यवस्था के लिए ऐसी वृध्दि का कोई मतलब नहीं है। इसीलिए रिपोर्ट कार्ड समाज और अल्पसंख्यकों के वंचित वर्गों की प्रगति पर विशेष बल देता है। यह हमारे समाज के इस वर्ग के कल्याण के लिए कार्य जारी रखने की सरकार की प्रतिबध्दता दोहराता है। महिलाओं का सशक्तीकरण और शिक्षा सरकार के ऐसे वरीय क्षेत्र हैं जिनसे यह हासिल किया जाएगा।

रिपोर्ट कार्ड कहता है कि भारत निर्माण, मनरेगा, और राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन जैसे सरकार के प्रमुख कार्यक्रम अच्छी प्रगति कर रहे हैं तथा वास्तव में अपना प्रभाव डाल रहे हैं। उनका आशावाद संभवत: हालात की सही अभिव्यक्ति है।

अशोक हांडू

।* स्वतंत्र पत्रकार

इस लेख में प्रकट विचार पूरी तरह लेखक के निजी विचार हैं तथा यह ज़रूरी नहीं कि वे पसूका के विचारों से मेल खाते हों।

૦૦.
टिकाऊ वृध्दि की रणनीति

एक जाने माने आर्थिक विचार-मंडल भारतीय अर्थव्यवस्था निगरानी केंद्र (सीएमआईई) ने अनुमान लगाया है कि मौजूदा वित्त वर्ष में भारतीय अर्थव्यवस्था 9.2 फीसदी की दर से वृध्दि करेगी। यह अनुमान सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक के अनुमानों से कहीं बहुत ज्यादा है। सीएमआईई का कहना है कि उसका यह अनुमान औद्योगिक तथा उससे संबध्द क्षेत्रों के साथ साथ कृषि क्षेत्र के बेहतर निष्पादन की आशा पर आधारित है। हालांकि उसने साथ ही यह भी कहा है कि बहुत कुछ इस वर्ष मानसून अच्छा रहने पर निर्भर करेगा।

यह आकलन सरकार द्वारा जारी प्राथमिक आंकड़ों के अनुरूप ही है। वित्त मंत्रालय ने मौजूद वित्त वर्ष की पहली तिमाही में 8.9 फीसदी की वृध्दि की आशा व्यक्त की थी। यह मार्च 2010 में समाप्त हुए पिछले वित्त वर्ष की पहली तिमाही की तुलना में 0.3 फीसदी अधिक है। उद्योग जगत ने अप्रैल में 17.6 फीसदी वृध्दि दर्ज की जो पिछले 20 वर्ष में दिसंबर, 2009 में दर्ज 17.7 फीसदी की रिकार्ड वृध्दिदर के लगभग बराबर है। यह सशक्त वृध्दि पूंजीगत और उपभोक्ता दोनों तरह के जींसों में देखी गयी है।

मई में निर्यात 35 फीसदी बढक़र 16.1 अरब डालर तक पहुंच गया। हालांकि आयात में भी 19.8 फीसदी की वृध्दि हुई और वह 27.4 अरब डालर हो गया है।  आयात और निर्यात में 11.3 अरब डालर का अंतर है। अप्रैल में भी निर्यात में करीब 35 फीसदी की बढोत्तरी हुई थी। इन सभी बातों से उम्मीद की किरण दिखती है। कुछ अर्थशास्त्रियों ने भारतीय अर्थव्यवस्था की मौजूदा स्थिति को सुहाना बताया है। उन्होंने इसे कम अस्थिरता के साथ ठोस वित्तीय क्षेत्र की संज्ञा दी है।

हालांकि मुद्रास्फीति और वित्तीय घाटे के मोर्चे पर चिंता भी है। मई के आंकड़े बताते हैं कि मुद्रास्फीति दर 10.2 फीसदी  थी। इसका हल किया जाना बहुत जरूरी है लेकिन यह रातोंरात नहीं हो सकता। सरकार आपूर्ति और मांग दोनों पक्षों पर ध्यान देते हुए सुव्यवस्थित ढंग से स्थिति से निबट रही है। रिजर्व बैंक ने खाद्य मुद्रास्फीति को थामने एवं उसे विनिर्मित वस्तुओं तक फैलने से रोकने के लिए इस वर्ष दो बार महत्त्वपूर्ण दरों में वृध्दि की है। सौभाग्य से, खाद्य मुद्रास्फीति दिसंबर की 20 फीसदी से घटकर अब 16 फीसदी हो गयी है। रिजर्व बैंक 27 जुलाई को स्थिति की समीक्षा करेगा।

आपूर्ति पक्ष के लिए राष्ट्र ने इस वर्ष अच्छे मानसून पर अपनी उम्मीदें टिका रखी हैं। मौसम विभाग ने भी इस वर्ष सामान्य मानसून का अनुमान व्यक्त किया है। अबतक के मानसून की स्थिति पर गौर करने से यह अनुमान सही जान पड़ता दिख रहा है।

सरकार ने बाजार में अपनी आपूर्ति बढाने के लिए कुछ जींसों के शुल्कमुक्त आयात की भी अनुमति दी है।

लेकिन अंतत: कृषि क्षेत्र ही वृध्दि लक्ष्यों को साकार करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की हाल की कृषि उत्पाद वृध्दि दो फीसदी से बढाक़र चार फीसदी करने की अपील को इसी पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिए। योजना आयोग ने वर्ष 2012 से शुरू होने वाली 12 वीं पंचवर्षीय योजना पर काम करना शुरू कर दिया है और वह 12 फीसदी की वृध्दि लक्ष्यों पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। यह ग्यारहवीं योजना में 8.1 फीसदी की लक्षित वृध्दि की पृष्ठभूमि में ही होगा। पहले ग्यारहवीं योजना के लिए वृध्दि दर 9 फीसदी तय की गयी थी लेकिन वैश्विक आर्थिक संकट के मद्देनजर इसे नीचे लाना पड़ा।

कृषि क्षेत्र में मंद वृध्दि के कारणों में एक उसकी वर्षों तक सतत उपेक्षा भी है। पिछले दो योजनाएं कृषि क्षेत्र में वांछित वृध्दि हासिल करने में विफल रहीं। योजना आयोग के उपाध्यक्ष डॉ. मोंटेक सिंह अहलूवालिया भी इस बात से सहमत हैं कि हमें इस क्षेत्र में अभी काफी कुछ करना है। सरकार ने भी इस बात को समझा है। इसकी पुष्टि हाल ही में कृषि उत्पादों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में भारी वृध्दि से होती है। सरकार ने यह फैसला किसानों के हित में लिया है। हालांकि कुछ लोगों की यह दलील है कि इससे पहले से मंहगे कृषि जींसों के दाम और बढेंग़े। लेकिन ऐसा कुछ समय तक ही होगा। दीर्घकाल में जैसे ही कृषि कार्य लाभकारी बन जाएगा, आपूर्ति पक्ष सुधरेगा और कीमतें नीचे आएंगी।

आपको यह स्वीकारना होगा कि उच्च मुद्रास्फीति भारत के लिए कोई अजीब बात नहीं है। चीन में 19 महीनों में मई में सर्वाधिक मुद्रास्फीति रही। लेकिन यह हमारे लिए तसल्ली वाली बात नहीं है। मुद्रास्फीति पांच फीसदी के अंदर लाया जाना है तथा वित्तीय घाटा भी काफी कम किया जाना है।

यह संतोष की बात है कि सरकार को विश्वास है कि वह इस साल के अंत तक उच्च वृध्दि और निम्न मुद्रास्फीति दोनों मोर्चे पर सफल रहेगी और नया वित्त वर्ष की शुरूआत काफी अच्छी होगी। यदि ऐसा होता है तो देश और उसकी जनता के लिए आर्थिक विकास का नया परिदृश्य सामने आ जाएगा।

૦૦.
भारत-दक्षिण अफ्रीका व्यापार

दक्षिण अफ्रीका 1946 के पहले भारत का प्रमुख व्यापार सहयोगी थी और तब भारत के कुल निर्यात का 5 प्रतिशत भाग इसी देश को होता था । परन्तु दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद की नीति अपनाए जाने के बाद भारत पहला देश था जिसने 1949 में उसके साथ व्यापार संबंध समाप्त कर दिये । बाद में उस पर राजनयिक व्यापारिक, सांस्कृतिक और खेलकूद के सभी तरह के संबंधों पर रोक लगा दी । भारत दक्षिण अफ्रीका में सरकार के रंगभेद युग का सबसे मुखर आलोचक बना रहा । अपनी इसी नीति के कारण दक्षिण अफ्रीका और अन्य अफ्रीकी देशों में भारत के प्रति भारी सद्भावना देखी जाती रही।

दक्षिण अफ्रीका के साथ भारत के संबंध चार दशकों से भी अधिक समय के अंतराल के बाद मई 1993 में जोहान्सबर्ग में एक सांस्कृतिक केन्द्र के उद्धाटन के साथ बहाल हुए । दक्षिण अफ्रीका के साथ राजनयिक और वाणिज्यिक संबंध औपचारिक रूप से नवम्बर 1993 में बहाल हुए । मई 1994 में प्रीटोरिया में भारतीय उच्चायोग का उद्धाटन हुआ, जिसके बाद उसी माह डरबन में महावाणिज्य दूतावास खोला गया । दक्षिण अफ्रीका  का नई दिल्ली में उच्चायोग के अलावा मुंबई में महावाणिज्य दूतावास भी है ।

दक्षिण-अफ्रीका-अफ्रीकी महाद्वीप का प्रवेश द्वार

दक्षिण अफ्रीका, 2 खरब 77 अरब डॉलर के जीडीपी के साथ अफ्रीका की आर्थिक महाशक्ति है जोकि समस्त अफ्रीका के जीडीपी का 30 प्रतिशत है । औद्योगिक उत्पादन, और खनिज उत्पादन में यह पूरे महाद्वीप में अग्रणी स्थान रखता है । पूरे महाद्वीप में खपत होने वाली बिजली का 50 प्रतिशत का उत्पादन दक्षिण अफ्रीका में होता है ।

दक्षिण अफ्रीका की अर्थव्यवस्था पिछले पांच वर्षों से प्रतिवर्ष 4 प्रतिशत से भी अधिक दर से प्रगति कर रही थी परन्तु व्यापार और उपभोक्ता मांग में आई कमी के कारण 2009 में इसमें तेजी से गिरावट आई । वास्तविक जीडीपी में 2010 में सुधार के संकेत हैं । जूनजुलाई में होने वाले फुटबाल विश्व कप की मेजबानी के कारण अर्थव्यवस्था में सुधार आने की संभावना हे । खेल के इस महाकुंभ से पर्यटन और सेवा क्षेत्रों को काफी बढावा मिलेगा ।

दक्षिण अफ्रीका के अग्रणी व्यापारिक भागीदार ओईसीडी के सदस्य देश और चीन हैं । अमेरिका, जापान और चीन दक्षिण अफ्रीका के प्रमुख व्यापार सहयोगी हैंदक्षिण अफ्रीका के कुल निर्यात का 30 प्रतिशत इन्हीं तीन देशों को होता है ।

भारत- दक्षिण अफ्रीका द्विपक्षीय व्यापार

दक्षिण अफ्रीका के साथ भारत के संबंधों की बहाली के बाद से ही द्विपक्षीय व्यापार तेजी से बढा है । वर्ष 2008-09 के दौरान द्विपक्षीय व्यापार 3 अरब डालर से बढक़र 7 अरब डालर तक पहुंच गया है । दोनों देशों ने 2012 तक आपसी व्यापार को बढाक़र 10 अरब डालर तक ले जाने का निश्चय व्यक्त किया है ।

2003-04

2004-05

2005-06

2006-07

2007-08

2008-09

भारत का निर्यात

539.35

984.04

1526.87

2244.74

2658.67

1980.28

भारत में आयात

1899.19

2197.67

2471.80

2469.73

3614.86

5513.58

कुल व्यापार

2438.54

3181.70

3998.67

4714.47

6273.53

7493.87

आंकड़े मिलियन अमेरिकी डालर में

स्रोत – वाणिज्य विभाग, भारत सरकार

भारत से दक्षिण अफ्रीका को मुख्य रूप से खनिज ईंधन, वाहन एवं परिवहन उपकरणहिस्से पुर्जे, अरंडी का तेल, प्रसाधन, सूती धागा, कपड़े, मेडअप्स पर्दे आदि प्राकृतिक रेशम, औषधि, शुध्द रसायन , अजैविक, जैविककृषि रसायन, जैविक रंग, तारकोल रसायन, इलेक्ट्रानिक सामग्री,तैयार चमड़ा चमड़े का सामान , हीरे और जवाहरात का निर्यात होता है ।

वहां से जो वस्तुएं भारत में आयात होती हैं वे हैं – कोयला कोक और कोयले के चूरे की टिकिया, हीरा , नग-नगीने ,चांदी, सोना, इलेक्ट्रानिक सामग्री, उर्वरक, कार्बनिक और अकार्बनिक रसायन , कत्रिम  गोंद, लौह इस्पात, धातु अयस्क, गैर लौह धातु, धातु भंगार और अशुध्द कच्चा खनिज । दोनों देशों के बीच व्यापार की उनन्त संभावनायें हैं । कुछ ऐसी वस्तुओं का व्यापार हो सकता है जिनके बारे में अभी तक प्रयास ही नहीं किया गया है । भारत से दक्षिण अफ्रीका को वाहन और वाहनों के कलपुर्जे, परिवहन उपकरण, औषधियां और औषधीय रसायन, कम्प्यूटर सापऊटेवयर , अभियांत्रिकीय सामग्री, जूते, चावल और हीरे जवाहरात आदि के निर्यात की अच्छीं संभावनायें हैं । जहां तक आयात का प्रश्न है, वहां से रॉक फास्फेट , नग नगीने, खनिज , उर्वरक , इस्पात, कोयला, परिवहन उपकरण, लुगदी और लुगदी बनाने के उपकरण के आयात की अच्छी संभावनाएं हैं ।

प्रत्यक्ष विदेशी निवेश

यद्यपि दक्षिण अफ्रीका में भारत के निवेश के बारे में सही-सही आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं, तथापि अनुमान है कि भारतीय कंपनियां दक्षिण अफ्रीका में 2 अरब अमेरिकी डालर की परियोजनाओं पर काम कर रही हैं । प्रमुख निवेशकों में टाटा (वाहन, आईटी फेरोक्रोम संयंत्र), अपोलो (टायर्स) शामिल हैं । इनके अलावा रनबक्शी और सिपला जैसी दवा निर्माता कंपनियां भी हैं ।

जिस प्रकार दक्षिण अफ्रीका में भारत का निवेश बढ रहा है, उसी प्रकार भारत में भी दक्षिण अफ्रीका के निवेश में वृध्दि हो रही है । भारत में जो दक्षिण अफ्रीकी कंपनियां पांव फैला रही हैं, उनमें एसएवी मिलर (मदिरा निर्माण), एसीएसए (मुंबई विमान तल का उन्नयन), एसएएनएलएएम और ओल्ड म्युचुअल (बीमा), आल्टेक (सेटटॉप बाक्स), ऐडकॉक इनग्राम (औषधि निर्माण) रैंड मर्चेंट बैंक और स्टैन्डर्ड बैंक प्रमुख हैं ।

द्विपक्षीय आर्थिक संबंधों के विस्तार से दोनों देशों को ही लाभ होगा । भारत दक्षिण अफ्रीका का एक उपयोगी निवेश और व्यापार का उपयोगी भागीदार हो सकता है, क्यों कि भारत सापऊटवेयर , वित्तीय सेवाओं और सापऊटेवयर इंजीनियरिंग में अत्यधिक कुशल और दक्ष कार्मिकों का प्रमुख निर्यातक देश है । कौशल और हुनर के अंतरण से दक्षिण अफ्रीका को निर्धनता उन्मूलन और आर्थिक विकास के अपने लक्ष्य को हासिल करने में मदद मिल सकती है ।

भारत में अगले सात वर्षों में सड़कों और अन्य बुनियादी ढांचे के निर्माण पर 50 अरब अमेरिकी डालर के व्यय का अनुमान हे, जबकि उर्जा के क्षेत्र में रख रखाव 40 अरब डालर के व्यय की संभावना है । विमान तलों और विद्युत उत्पादन जैसे क्षेत्रों में अपनी विशेषज्ञता के कारण दक्षिण अफ्रीका इनमें भारत की काफी मदद कर सकता है ।

व्यापार संवर्धन के प्रयास

भारत एसएसीयू वरीय व्यापार समझौता

भारत और दक्षिण अफ्रीका के बीच व्यापार को बढावा देने के लिए भारत एसएसीयू वरीय व्यापार समझौता पर बातचीत चल रही है । आगे चलकर भारत एसएसीयू और एमईआरसीओएसयूआर (मर्कोसुर – दक्षिण का एक वृहद मुक्त व्यापार क्षेत्र) के बीच एक व्यापक मुक्त व्यापार क्षेत्र के बारे में समझोता हो सकता हे । एसएसीयू और भारत के बीच अब तक चार दौर बातचीत हो चुकी है । पारस्परिक निवेश संवर्धन और संरक्षण समझौते पर भी वार्ता प्रक्रिया पूरी होने को है । इन समझौतों  के अस्तित्व में आने के बाद दोनों देशों में व्यापार और निवेश को पर्याप्त बढावा मिलेगा ।

पुनर्गठित सीईओज फोरम

व्यापार और वाणिज्यिक गतिविधियों को प्रोत्साहन देने के लिये भारत दक्षिण अफ्रीका के प्रमुख उद्योगपतियों का एक साझा मंच-भारत दक्षिण अफ्रीका सीईओज फोरम का गठन किया गया है । हाल ही में भारत के दौरे पर आए दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति जेउाएब ज़ुमा और भारत के वाणिज्य और उद्योग मंत्री आनन्द शर्मा ने 3 जून, 2010 को मुंबई में इसका पुनर्गठन किया । भारत की ओर से इस मंच के अध्यक्ष प्रसिध्द उद्योगपति श्री रतन टाटा हैं, जबकि दक्षिण अफ्रीका की ओर से श्री पैट्रिस मोर सेपे, इसके अध्यक्ष बनाए गए हैं ।

भारत व्यापार मंच

भारत व्यापार मंच (आईबीएफ) की शुरूआत 2007 में की गई थी । इसका मुख्यालय जोहान्सबर्ग में है । यह संस्था दक्षिण अफ्रीका स्थित भारतीय कंपनियों को भारत को ब्रांड के रूप में पेश करने और साझे सरोकारों से जुड़े मुद्दों को उठाने का मंच प्रदान करती है । आईबीएफ में इस समय 30 कंपनियां शामिल हैं । भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) इसका प्रबंध देखता हैं ।

भारतीय बैंकों (भारतीय स्टेट बेंक, बैंक ऑफ बड़ौदा, बैंक आफ इंडिया और आईसीआईसीआई बैंक) की मौजूदगी ने आर्थिक गतिविधियों को बढावा दिया है । भारत सरकार के पर्यटन विभाग और राष्ट्रीय लघु उद्योग निगम के स्थानीय कार्यालय भी द्विपक्षीय सहयोग को प्रोत्साहित करने में सक्रिय हैं ।

चुनौतियां

भारत और दक्षिण अफ्रीका के बीच व्यापार के जहां व्यापक अवसर हैं वहीं अनेक चुनौतियां भी हैं, जिन पर तुरंत ध्यान दिये जाने की आवश्यकता है । भारत के अनेक व्यापारियों को दक्षिण अफ्रीका की वीजा देने की धीमी प्रक्रिया के बारे में काफी शिकायतें हैं । इससे व्यापार वृध्दि की संभावनाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है । दक्षिण अफ्रीका सरकार ने इसमें सुधार का वचन दिया है परन्तु इसमें समय लगेगा । दक्षिण अफ्रीका ने वाहन और उनके कल पुर्जों के आयात में दिलचस्पी दिखाई है, परन्तु 36 प्रतिशत का आयात शुल्क इसमें प्रमुख बाधक है । कुछ भारतीय व्यापारियों ने बढते अपराधों पर भी चिंता जताई है । इससे व्यापारिक गतिविधियां असुरक्षित हो जाती हैं ।

भारत और दक्षिण अफ्रीका का अनेक वैश्विक मुद्दों पर साझा नजरिया है । ऐतिहासिक रूप से दोनों देशों के संबंध काफी पुराने हैं । ये संबंध प्राय: सभी क्षेत्रों में प्रगाढ रूप अपनाए हुए हैं और इन्हें क्षेत्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण माना जाता है । इन संबंधों में और अधिक सुदृढता , प्रगाढता और विविधता लाने से दोनों देशों को भारी लाभ होगा  (पीआईबी)।

# मनीष देसाई-निदेशक (मीडिया)

पत्र सूचना कार्यालय, मुंबई

(वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के निदेशक (मीडिया) श्री राजीव जैन और सीआईआई, मुंबई के श्री मोहन गावड़े से प्राप्त जानकारियों के आधार पर )

૦૦.
संस्कृति एक्सप्रेस – कविगुरु रवींद्रनाथ टैगोर को रेलवे की ओर से श्रध्दांजलि

भारतीय रेल, जो राष्ट्र की जीवन रेखा मानी जाती है और देश की साझी संस्कृति का प्रतिनिधित्व करती है, ने नोबेल पुरस्कार विजेता कविगुरु रवींद्रनाथ टैगोर की 150 वीं जयंती के अवसर पर  एक खास प्रदर्शनी ट्रेन संस्कृति एक्सप्रेस चलाई है। इस ट्रेन में गुरुदेव के जीवन और दर्शन को चित्रित किया गया है। माननीय रेल मंत्री ममता बनर्जी ने 09 मई, 2010 को इस ट्रेन को हरी झंडी दिखाकर रेल संग्रहालय, हावड़ा से विदा किया। पांच डिब्बों की प्रदर्शनी ट्रेन संस्कृति एक्सप्रेस, जो गुरुदेव को भारतीय रेल की ओर से श्रध्दांजलि है, सालभर पूरे देश का भ्रमण करेगी और अगले वर्ष 08 मई, 2011 को हावड़ा लौटेगी।

पांच वातानुकूलित डिब्बों को टैगोर की उपलब्धियों और दर्शन को चित्रित करने के लिए हावड़ा के लिलूआह रेलवे वर्कशॉप में विशेष रूप दिया गया है। पहले डिब्बे का नाम जीवन स्मृति दिया गया है और इसमें तस्वीरों के माध्यम से टैगौर के जीवन, उनके जीवनावशेषों, शांतिनिकेतन और श्रीनिकेतन को प्रदर्शित किया गया है।

कोलकाता के प्रसिध्द जोरसांको भवन में 07 मई, 1861 को जन्मे कविगुरु रवींद्रनाथ टैगोर ने महज सात वर्ष की उम्र से ही अपना लेखन कार्य शुरू कर दिया था। वह भारतीय संस्कृति के एक महानायक थे।

सन् 1884 में टैगोर ने कविता संग्रह कोरी-ओ-कमल लिखा। उन्होंने राजो-ओ- रानी और विसर्जन नामक दो नाटक भी लिखे। सन् 1890 में वह अपनी पारिवारिक संपत्ति की देखभाल के लिए शेलदाहा, जो अब बंगलादेश में है, चले गए थे। सन् 1893 और 1900 के बीच टैगोर ने काव्य के सात खंड लिखे जिसमें सोनार तारी और खनिका भी शामिल हैं।

सन, 1901 में रवींद्रनाथ टैगोर बंगदर्शन पत्रिका के संपादक बन गए। सन् 1905 में लार्ड कर्जन ने बंगाल को दो भागों में बांटने का निर्णय लिया। रवींद्रनाथ टैगोर ने इस निर्णय का जमकर विरोध किया। उन्होंने कई राष्ट्रीय गीत लिखे और विरोध सभाओं में शामिल हुए। उन्होंने अविभाजित बंगाल की एकता को प्रदर्शित करने के लिए रक्षाबंधन कार्यक्रम शुरू किया।

इस ट्रेन के दूसरे डिब्बे का नाम गीतांजलि है जो उनकी कविताओं और गीतों के प्रदर्शन के साथ ही विभिन्न कलाकारों द्वारा गुरुदेव के गीतों के गायन का प्रदर्शन करता है। सन् 1913  में उन्हें उनके काव्यसंग्रह गीतांजलि के लिए नोबेल साहित्य पुरस्कार मिला, जिसके बाद वह पहले एशियाई नोबेल पुरस्कार विजेता बन गए। रवींद्रसंगीत के दो गीत-जन गण मन और आमर सोनार बांग्ला, अब क्रमश: भारत और बंगलादेश के राष्ट्रीय गान हैं। सन् 1921 में उन्होंने विश्वभारती विश्वविद्यालय की स्थापना की। उन्होंने नोबेल पुरस्कार की पुरस्कार राशि और अपनी पुस्तकों से मिली सभी रॉयल्टी इस विश्वविद्यालय को दे दी। टैगोर न केवल श्रेष्ठ रचनाकार थे बल्कि वह पश्चिमी संस्कृति खासकर पश्चिमी काव्य एवं विज्ञान के भी अच्छे जानकार थे। सन् 1940 में ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय ने उन्हें साहित्य में डाक्टरेट की मानद उपाधि से विभूषित करने के लिए विशेष कार्यक्रम आयोजित किया।

तीसरे डिब्बे का नाम मुक्तोधारा है। इसमें रवींद्र साहित्य, काव्य, निबंध, उपन्यास, नाटक, नृत्य नाटक और अन्य विधाओं तथा गुरुदेव द्वारा गाए गए गायन को प्रदर्शित किया गया है।

चौथे डिब्बे का नाम चित्ररेखा है। इसमें टैगोर द्वारा उनके बालपन और किशोरावस्था के दौरान की बनायी गयी तस्वीरें, छायाचित्र, प्राकृतिक छटाएं, स्केच आदि हैं। इस डिब्बे में श्रीनंदलाल बोस, अवींद्रनाथ टैगोर, गगेंद्रनाथ टैगोर, बिनोद बिहारी, रामकिंकर बैज, सुनयनी देवी और सुधीर खास्तगीर जैसे जाने-माने चित्रकारों के चित्र भी दिखाए गए हैं।

पांचवें डिब्बे का नाम शेषकथा दिया गया है। इसमें टैगोर के जीवन की अंतिम यात्रा की तस्वीरें और उनके करीबियों द्वारा वर्णित उनके जीवन के अंतिम दिन,तथा अंतिम दिनों की कविताएं संग्रहीत हैं। कविगुरु रवींद्रनाथ टैगोर का 07 अगस्त, 1941 को उनके पैतृक घर में  निधन हो गया था। इस डिब्बे में स्मरणिका नामक एक खंड और है जिसमें शांतिनिकेतन के हस्तशिल्प उत्पादों, फोटो प्रिंटों, गुरुदेव की हस्तलिप, की प्रदर्शनी और उनकी बिक्री की व्यवस्था भी है। इसके अलावा अन्य कई महत्वपूर्ण चीजें हैं।

एक साल की यात्रा के दौरान संस्कृति एक्सप्रेस कविगुरु की कला और साहित्य का देशभर में प्रचार-प्रसार के लिए करीब 100 स्टेशनों का चक्कर लगाएगी।

૦૦.
भारत का सकारात्मक आर्थिक परिदृश्य

हाल ही में समाप्त हुआ वित्त वर्ष  2009-10 भारत के लिए एक ऐसा कठिन समय रहा है जब  देश को भी वैश्विक आर्थिक संकट के प्रभाव को झेलना पड़ा। ऐसे कठिन समय में जो चीज भारत के काम आयी, वह थी भारत का मजबूत आर्थिक आधार। परन्तु इसके बावजूद भी भारत पूरी तरह से इस मंदी के प्रभाव से बच नहीं सका। भारत के पक्ष में यह बात जरूर जाती है कि जहां विश्व की बड़ी-बड़ी अर्थव्यवस्थायें, नकारात्मक (त्रऽणात्मक) आर्थिक विकास की गर्त में समा गई वहीं भारत में आर्थिक विकास की दर सम्मानजनक स्तर पर बनी रही। अंतिम ऑंकड़े अभी तो उपलब्ध नहीं हैं, परन्तु इस बात के स्पष्ट संकेत हैं कि इस अवधि में हमारी विकास दर 7.2 प्रतिशत की रहेगी।

अर्थव्यवस्था के क्षेत्रवार विश्लेषण से स्थिति अधिक स्पष्ट हो जाती है। उदाहरणार्थ, औद्योगिक उत्पादन क्षेत्र को लें। सरकार द्वारा जारी ऑंकड़ों से स्पष्ट है कि फरवरी के 15.1 प्रतिशत की तुलना में मार्च में उत्पादन गिरकर 13.5 प्रतिशत पर आ गया। परन्तु हकीकत में, पूरे वित्त वर्ष के दौरान उससे पहले  वाले वित्त वर्ष की तुलना में 2.8 प्रतिशत अधिक अर्थात 10.4 प्रतिशत की वृध्दि दर्ज की गई। वास्वत में यह एक बड़ी उपलब्धि है, खासकर तब जब दुनिया भर मंदी का प्रकोप छाया था। यह सब संभव हो पाया सरकार के उन राजकोषीय और मौद्रिक उपायों के कारण, जो मांग और आपूर्ति को बढावा देने के लिए शुरू किए गए थे।

कृषि क्षेत्र में स्थिति कुछ असहज अवश्य है। इसका मुख्य कारण खराब मानसून रहा है, जिससे कृषि उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। पिछले वर्ष 22 प्रतिशत कम वर्षा हुई।

कृषि उत्पादन के अग्रिम अनुमानों के अनुसार खाद्यान्न उत्पादन में 7 प्रतिशत कमी हो सकती है। खराब मानसून के बावजूद, गेहूँ का रिकार्ड उत्पादन हुआ है, परन्तु चावल और मोटे अनाजों के उत्पादन में आई कमी से कुल कृषि उत्पादन 229 मी.टन से गिरकर 218 मी. टन पर आ सकता है। इस प्रकार करीब 11 मी.टन की कमी रहेगी।

संतोष की बात यह है कि मौसम विभाग ने इस वर्ष समय पर सामान्य वर्षा होने की भविष्यवाणी की है। मौसम विभाग का कहना है कि मानसून केरल में 30 मई तक आ जाएगा। इस अनुमान में तीन-चार दिन आगे पीछे हो सकते हैं। सौभाग्य से, पिछले 4-5 वर्षों से मौसम विभाग की भविष्यवाणियां और अनुमान सही होते रहे हैं। विभाग ने इस वर्ष सामान्य वर्षा का अनुमान लगाया है। दीर्घावधि औसत में 4-5 प्रतिशत की भूलचूक के साथ, इस वर्ष 98 प्रतिशत सामान्य  वर्षा की भविष्यवाणी की गई है। यह अनुमान समूचे देश को ध्यान में  रखकर लगाया गया है। अनुमानों के अनुसार यदि इस वर्ष समय पर अच्छी वर्षा होती है तो हम पिछले वर्ष के घाटे और अभाव को काफी हद तक पूरा कर लेंगे।

निर्यात क्षेत्र में, मामला उत्साहजनक भी है और हतोत्साहित करने वाला भी। हतोत्साहित करने वाला इसलिए कि यही वह क्षेत्र है जिस पर वैश्विक मंदी का सबसे भीषण प्रभाव पड़ा। फलस्वरूप निर्यात में भारी गिरावट आई, जिसके कारण रोजगार कम हो गए और विदेशी मुद्रा की कमाई पर असर पड़ा। उत्साहवर्धक इसलिए कि इन सब परेशानियों के बावजूद, निर्यात क्षेत्र ने वैश्विक चुनौतियों का डटकर सामना किया और हार नहीं मानी। नतीजा यह हुआ है कि पिछले 6 महीनों के दौरान निर्यात में लगातार वृध्दि हो  रही है। इस वर्ष मार्च में 54 प्रतिशत की वृध्दि दर्ज की गई है। परन्तु सरकार ने व्यापार क्षेत्र के जो वार्षिक आंकड़े जारी किए हैं उसके अनुसार 2008-09 की तुलना में 2009-10 में 4.7 प्रतिशत की कमी आई है। कुल निर्यात 17 खरब 65 अरब डॉलर (यूएस) का रहा। रुपए के मूल्य में सुधार का जो आनुषंगिक प्रभाव है, उसको लेकर भी उद्योग जगत में चिन्ता बनी हुई है, क्योंकि इससे निर्यात की प्रतिस्पर्धा पर प्रभाव पड़ता है। इस वर्ष डॉलर की तुलना में रुपए के मूल्य में 5 प्रतिशत की वृध्दि हुई है।

परन्तु एक सुखद पहलू यह है कि वर्ष 2008-09 की तुलना में वर्ष 2009-10 के दौरान आयात में भी 8.2 प्रतिशत की कमी आई। इस वर्ष कुल 27 खरब 87 अरब डॉलर का आयात हुआ। इसके कारण व्यापार घाटा भी 2008-09 के एक खरब 18 अरब डॉलर से घटकर 2009-10 में 1 खरब 2 अरब डॉलर रह गया। वाणिज्य मंत्रालय ने इस वित्त वर्ष के लिए अब 2 खरब डॉलर के निर्यात का लक्ष्य निर्धारित किया है।

परन्तु सब ज्सेयादा चुनौती वाला  क्षेत्र मुद्रास्फीति की उच्च दर है, जोकि दहाई अंकों को छूने लगा है। खाद्य पदार्थों की मुद्रास्फीति बढक़र 19 प्रतिशत तक पहुंच गई है जो सरकार के लिए काफी चिन्ता का विषय है, क्योंकि मुद्रास्फीति की उच्च दर से समाज का कमजोर और वंचित वर्ग सीधे प्रभावित होता है। जैसा कि वित्त मंत्री श्री प्रणव मुखर्जी ने हाल ही में समावेशी विकास और प्रगति के क्रियान्वयन पर केन्द्रित राष्ट्रीय सम्मेलन में कहा कि आर्थिक विकास की उच्च दर के बावजूद अर्थव्यवस्था के लाभ निचले स्तर तक नहीं पहुंचे हैं और हमारे समाज के बहुत बड़े तबके को अभी भी इस विकास यात्रा में सहयात्री बनने का सौभाग्य नहीं मिला है। हालांकि उन्होंने विश्वास जताया है कि इस वर्ष अच्छे मानसून की संभावना को देखते हुए  खाद्यान्न मुद्रास्फीति में अगले कुछ महीनों में काफी कमी आ जाएगी और यह प्रवृत्ति शुरू भी हो चुकी है। अप्रैल माह में मुद्रास्फीति में मामूली गिरावट दर्ज की गई। अप्रैल में यह दर 9.59 प्रतिशत रही, जबकि मार्च में मुद्रास्फीति की दर 9.9 प्रतिशत थी। अनुमान है कि अगले तीन महीनों के दौरान मुद्रास्फीति में उतार-चढाव होता रहेगा और इसके बाद उसमें गिरावट आने लगेगी। सरकार इस बात को लेकर आश्वस्त है कि इस वित्त वर्ष  की समाप्ति तक मुद्रास्फीति की दर को 5.5 प्रतिशत के निचले  स्तर तक लाया जा सकेगा।

बाजार में मांग को बढावा देने के लिए सरकार ने जो प्रोत्साहन पैकेज पिछले वर्ष दिए, उसने निश्चित रूप से अपना प्रभाव दिखाया है, परन्तु इससे मुद्रास्फीति में वृध्दि की प्रवृत्ति और राजकोषीय घाटे को भी बढावा मिला है। भारतीय रिजर्व बैंक ने पिछले  महीने रिपो और रिवर्स रिपो दरों में मामूली वृध्दि कर नकदी प्रवाह को नियमित करने की दिशा में कार्रवाई शुरू कर दी है। परन्तु बड़े कदम संभवत: बाद में ही उठाए जाएंगे।

विश्व आर्थिक परिदृश्य में अनुमान लगाया गया है कि भारत की सकल घरेलू उत्पाद दर 2011 तक  8.8 प्रतिशत तक पहुंच जाएगी। सरकार दरअसल, इससे अधिक हासिल करने के प्रयास में है। आने वाले वर्षों में विकास दर दहाई अंकों तक ले जाने की कोशिश हो रही है। इसे हासिल करने की  कुंजी उचित नीतियों, समय पर कार्रवाई और इन सबसे ऊपर मौसम की मेहरबानी में निहित है।

###

टिप्पणी – लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के अपने हैं। यह जरूरी नही है कि                   पसूका इनसे सहमत हो।

૦૦.
विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष

विकास के प्रति अपने मौजूदा दृष्टिकोण से हमने मूल वनों को साफ करने, आर्द्र भूमि को नष्ट करने, मत्स्य भंडार के तीन चौथाई को निगलने तथा आगामी कई शताब्दियों तक इस ग्रह को गर्म रखने वाली गैसों का उत्सर्जन किया है।

फलस्वरूप, हम अपने अस्तित्व की आधारशिला को ही नुकसान पहुंचाकर उसे खतरे में डाल रहे हैं। हमारे ग्रह पर जीवन की विविधता, जिसे जैवविविधता के नाम से जाना जाता है, से हमे भोजन, कपड़े, ईंधन, दवाइयां और उससे भी कहीं ज्यादा चीजें मिलती हैं। जीवन के इस जटिल जाल से जब एक भी प्रजाति बाहर निकाल ली जाती है तो उसका परिणाम बहुत भयावह हो सकता है। इसी वजह से संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2010 को जैव विविधता वर्ष घोषित किया है और दुनियाभर में लोग अहस्तांतरणीय प्राकृतिक संपदा की सुरक्षा एवं जैवविविधता क्षय को कम करने में जुटे हैं।

विश्व पर्यावरण दिवस 2010 की मेजबानी रवांडा करेगा और यह समारोह वहां के न्न क्विता इजिना (बेबी गोरिल्ला का नामकरण)न्न समारोह के साथ मनाया जाएगा। इसका ध्येयवाक्य न्न कई प्रजातियां, एक ग्रह, एक भविष्य न्न है और यह कार्यक्रम विरूंगा पहाड़ियों के पास मनाया जाएगा जो रवांडा, डीआरसी और उगांडा तीनों क्षेत्रों में स्थित है। रवांडा दुनिया के 750 संकटापन्न पहाड़ी गोरिल्लों के एक तिहाई हिस्से का आवास है। सन् 2005 से अबतक 103 गोरिल्लों को नाम दिया गया है और इस दिवस के अवसर पर 11 गोरिल्ला को नाम दिया जाएगा।

जैविक विविधता में पेड़ों, जीव-जंतुओं एवं सूक्ष्मजीवों की सभी प्रजातियां, पारिस्थितिकी तंत्र तथा पारिस्थितिकी प्रक्रियाएं, जिनका वे हिस्सा हैं, आती हैं। यह पृथ्वी पर जीवन का आधार प्रदान करती हैं। इन संसाधनों के मौलिक, सामाजिक, नैतिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक महत्व को धर्म, कला और अबतक के साहित्यों में स्वीकार किया गया है। जंगली प्रजातियों और इनकी जेनेटिक विविधता कृषि, औषधि एवं उद्योग के विकास में अहम योगदान देती हैं। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि इनमें से कई प्रजातियां जलवायु परिवर्तन के स्थिरीकरण, आर्द्रक्षेत्रों की सुरक्षा, नर्सरियों एवं प्रजनन आधार की सुरक्षा में काफी मायने रखती हैं। ऐसा माना जाता है कि विश्व के मौजूदा सूक्ष्मजीव संसाधनों जैसे शैवाल, बैक्टीरिया, कवक, लाइकन, विषाणु और प्रोटोजोवा के मात्र 13 प्रतिशत हिस्से ही ज्ञात हैं। सूक्ष्मजीवों की जैवविविधता का संरक्षण कल्चर संग्रहण के माध्यम से किया जाता है और यह धातुओं के खान, कोयला खानों से मिथेन निकालने, ऑयल रिसाव को दूर करने, इत्र बनाने, वायु प्रदूषण की निगरानी, कीट और पतंगों पर नियंत्रण और जमीन में कीटनाशक को नष्ट करने आदि कार्यों में काफी उपयोगी है।

इसके बाद भी, देश की तीन से पांच करोड़ प्रजातियों में 100 प्रजातियां हर दिन कृषि योजनाओं,  शहरों, औद्योगिक विकास और बांधों के निर्माण या प्रदूषण या अपरदन आदि में नष्ट हो जाती हैं। फिलहाल 17,291 प्रजातियों के बारे में कहा जा रहा है कि वे विलुप्त होने के कगार पर हैं, इनमें बहुत कम ज्ञात पेड़ों और कीटों से लेकर पक्षी और स्तनधारी शामिल हैं। कुछ ऐसी भी प्रजातियां हैं जो पता चलने से पहले ही विलुप्त हो गयीं। मानव उन गिनी चुनी प्रजातियों में से है जिनकी जनसंख्या बढती ज़ा रही है, जबकि अधिकतर जीव जंतु और पेड़ पौधे दुर्लभ और घटते जा रहे हैं।

मानव को हमेशा से जैवविविधता आकर्षित करती रही है। आदिम काल में शिकारी मानव गुफाओं में तस्वीर बनाते थे। गौतम बुध्द का जन्म पवित्र शाल वन में हुआ था और उन्हें पीपल पेड़ के नीचे ध्यान योग से ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। राजस्थान के बिश्नोई समुदाय ने हिरण को अपना भाई समझकर उनके संरक्षण की योजना चलाई और राष्ट्रपति थियोडोर रूजवेल्ट ने नेशनल पार्कों के माध्यम से अमेरिकी वन्यभूमि के संरक्षण का अभियान चलाया। इसके साथ ही लोगों ने विविध प्रकार के जीवों का बड़ी निर्दयता से सफाया भी कर दिया। अंतिम हिम युग के दौरान शिकारी मानव ने विशालकाय हाथी को समूल नष्ट कर दिया और श्वेत वासियों ने अमेरिकी प्रेयरियों से गवल का सफाया कर दिया।

लोगों ने युगों तक जैवविविधता का उपयोग और दुरूपयोग दोनों किया लेकिन विविधता पर दुनियाभर में कभी भी उपयुक्त ध्यान नहीं दिया गया। वैश्विक समुदाय में धनी और शक्तिशाली ने इसके व्यापक आर्थिक क्षमता का पूरा दोहन किया।

प्राचीन ग्रंथों में सभी जीवों के अस्तित्व के बारे में सर्वत्र कहा गया और उसे उचित ठहराया गया है। सम्राट अशोक की पर्यावरण के प्रति चेतना, राजस्थान के बिश्नोई समुदाय की परंपरा तथा चिपको आंदोलन की भावना ये सभी आम आदमी की जागरूकता प्रदर्शित करती हैं। हालांकि लोगों की पर्यावरण जागरूकता पर अक्सर गरीबी और जीवन जीने की मूल आवश्यकताओं का प्रतिकूल असर भी पड़ता है। उनकी ईंधन की दैनन्दिन आवश्यकता के कारण वनों की कटाई होती है। बाघ, हिरण, मगरमच्छ, रिनसेरा तथा अन्य वन्यजीव नष्ट होते जा रहे हैं।  संकटापन्न जीवों का व्यापार कुछ लोगों की संजने संवरने की इच्छा की वजह से लगातार जारी है।

जैवविविधता पर लगातार बढता दबाव मानव की बढती ज़नसंख्या को परिलक्षित करता है। जबतक जनसंख्या स्थिर न हो जाती , तबतक यह दबाव बढता ही रहेगा। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार सन् 2050 से सन् 2070 के बीच जनसंख्या का 10 अरब पर स्थिर हो जाने का अनुमान है। यह स्थिरीकरण तभी हासिल किया जा सकता है जब जनसंख्या वृध्दि को रोकने का मौजूदा प्रयास पूरे लगने से जारी रहे।

विश्व पर्यावरण दिवस-2010 का ध्येयवाक्य कई प्रजातियां, एक ग्रह, एक भविष्य हमारे ग्रह पर जीवन की विविधता के संरक्षण की आवश्यकता पर बल देता है। जैवविविधता के बगैर दुनिया का भविष्य  बहुत ही क्षीण है। इस ग्रह पर लाखों लोग तथा प्रजातियां रहती हैं और साथ मिलकर ही हम सुरक्षित एवं समृध्द भविष्य की आशा कर सकते हैं।

###

नोट: इस फीचर में लेखक द्वारा व्यक्त विचार उनके अपने हैं, यह जरूरी नहीं है कि पत्र सूचना कार्यालय उनसे सहमत हों।

૦૦.
सौर भारत का निर्माण

प्रधानमंत्री डा0 मनमोहन सिंह ने 11 जनवरी 2010 को जवाहर लाल नेहरू राष्ट्रीय सौर मिशन का समारंभ करते हुए सौर भारत के निर्माण की अपनी संकल्पना का भी इजहार किया । उनके स्वप्नों को साकार करने के लिये अब प्रयास शुरू हो गए हैं । इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम ऑफ ग्रिड अथवा विकेन्द्रीकृत उपयोगों के लिये दिशानिर्देशों के बारे में की गई हालिया घोषणा के रूप में उठाया गया है । राष्ट्रीय सौर मिशन का क्रियान्वयन तीन चरणों में किया जाएगा । इससे 2022 तक 20 हजार मे.वा. की ग्रिड ऊर्जा की स्थापित क्षमता, 2 हजार मे.वा. का ऑफ ग्रिड प्रयोग 2 करोड़ वर्ग मीटर का सौर तापीय संग्रहण क्षेत्र(सोलर थर्मल कलेक्टर एरिया) और 2 करोड़ घरों में सौर ऊर्जा वाली प्रकाश व्यवस्था करने का लक्ष्य है । तेरहवीं पंचवर्षीय योजना के अंत तक सौर ऊर्जा का व्यापक उपयोग करने का इरादा है ।

मिशन का तात्कालिक लक्ष्य केन्द्रीकृत और विकेन्द्रीकृत , दोनों स्तरों पर देशभर में सौर प्रौद्योगकी की पैठ बढाने के लिये अनुकूल वातावरण तैयार करना है । ग्रिड को 1000 मे वा. की सौर ऊर्जा (सौर तापीय और फोटोवोल्टिक) के संभरण के अलावा, पहले चरण में (मार्च 2013 तक) 200 मे.वा. क्षमता की ऑफ ग्रिड सौर ऊर्जा के संवर्धन पर जोर दिया जाएगा ताकि गर्म और ठंडा करने के लिये ऊर्जा की आवश्यकताओं को आंशिक रूप से पूरा किया जा सके । इसके साथ ही लघु ग्रिड से जुड़े 100 मे.वा. क्षमता के अन्य सौर ऊर्जा संयंत्रों को भी बढावा दिया जाना है ।

ऑफ ग्रिड सौर प्रयोग

ऑफ ग्रिड सौर ऊर्जा के प्रयोग की गांवों और दूर दराज के क्षेत्रों में भारी संभावना है । ग्रामीण क्षेत्रों की प्रकाश और बुनियादी ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने में सौर ऊर्जा का योगदान काफी महत्वपूर्ण हो सकता है । इनमें लघु सौर संयंत्र, छत पर लगे सौर ऊर्जा उपकरणों का प्रयोग, सौर प्रकाश एवं सौर लालटेन और आवासीय वाणिज्यिक , संस्थागत तथा औद्योगिक उपयोगों के लिये जल उष्मक जैसे सौर तापीय उपयोग शामिल हैं ।

और भी अधिक महत्वपूर्ण प्रयोग हैं । ऑफ ग्रिड उपयोग की भांति ही विकेन्द्रीकृत सौर ऊर्जा का विद्युत उत्पादन और डीजल की खपत में कमी लाने, विशेषकर दिन के समय, में भारी संभावना है । दिन के समय उपयोग के लिये छत पर लगे संयंत्रों से चलने वाले उपकरणों से सौर ऊर्जा का व्यापक उपयोग हो सकता है । इससे डीजल की खपत में कमी होगी । जिन औद्योगिक क्षेत्रों में बिजली की ज्यादा कमी रहती है, उनमें भी सौर ऊर्जा के उपयोग को बढावा दिया जा सकता है । इसी प्रकार आवासीय वाणिज्यिक, सांस्थानिक और औद्योगिक उपयोगों के लिये वाटर हीटर्स जैसे सौर ताप से गर्म करने वाले अनेक उपयोग हैं जो पहले से ही वाणिज्यिक तौर पर व्यवहारिक पाए गए हैं ।

इस प्रकार के और अन्य अनेक सौर तापीय उपयोगों से शहरी और औद्योगिक क्षेत्रों में ग्रिड पर निर्भरता को कम किया जा सकता है । इससे डीजल और गैस की खपत में भी कमी की जा सकती है ।

लाभ

·       देश में ऐसे अनेक क्षेत्र हैं, जहां अभी तक बिजली की सुविधा नहीं पहुंची है । ऐसे ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में ऑफ ग्रिड सौर ऊर्जा का उपयोग सरलता से हो सकता है ।

·       उत्पादन को लेकर वितरण के बिंदुओं के बीच पारेषण में विद्युत का काफी ह्रास होता है । उपभोग के बिंदुओं यानि जहां पर उपयोग हो रहा हो वहीं पर विद्युत के संभरण से न केवल इस ह्रास को रोका जा सकता है बल्कि इससे ग्रिड भी सुदृढ हाेता है  और विद्युत प्रवाह भी सुगम रहता है ।

·       एलटी11के.वी. की ग्रिड को विद्युत संभरण, सौर ऊर्जा का एक और ऐसा उपयोग है, जिससे गांवों में पम्प सेटों और छोटे उद्योगों में विद्युत उकरणों का प्रचालन किया जा सकता है । दिन के समय इन उपकरणों के इस्तेमाल से डीजल जनरेटर के उपयोग की आवश्यकता नहीं रहेगी ।

·       1-2 मे.वा. क्षमता के लघु सौर संयंत्र अनेक सिंचाई पम्पों को चलाने मे समर्थ  हो सकते हैं । अनेक राज्य इस प्रकार के संयंत्र लगाने के प्रति उत्सुक हैं ताकि विद्युत आपूर्ति, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में वृध्दि की जा सके । यदि पूरे देश में ऐसे संयंत्रों का जाल बिछाया जा सके तो कमाल हो सकता है।

प्रमुख विशेषताएं

केन्द्रीय नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री डा0 फारूक अब्दुल्ला ने हाल ही में नई दिल्ली में दिशा निर्देशों को जारी किया । दिशानिर्देशों की कुछ प्रमुख विशेषतायें इस प्रकार हैं -

योजना का विस्तार क्षेत्र

यह योजना देश के सभी भागों में लागू होगी । प्रारंभ में, यह जवाहर लाल नेहरू राष्ट्रीय सौर ऊर्जा मिशन के प्रथम चरण के साथ-साथ चलेगी । तदनुसार ऑफ ग्रिड और विकेन्द्रीकृत प्रणालियों के संवर्धन पर जोर दिया जाएगा । इसमें ऊर्जा की आवश्यकता को पूर्णआंशिक तौर पर पूरा करने तथा गर्म और ठंडा करने वाले उपकरणों की विद्युत आवश्यकताओं को पूरा करने वाली मिश्रित (हायब्रिड) प्रणालियां शामिल हैं ।

क्रियान्वयन

योजना पर व्यवस्थित रूप से अमल करने के लिये सभी चैनल सहभागियों का सहयोग लिया जाएगा । चैनल सहभागियों में नवीकरणीय ऊर्जा की आपूर्ति करने वाली कंपनियां, सूक्ष्म वित्त संस्थाओं सहित वित्तीय संस्थायें , वित्तीय इंटीग्रेटर्स , सिस्टम इंटीग्रेटर्स और कार्यक्रम प्रशासक भी शामिल हैं ।

वित्त पोषण

योजना के तहत वित्त पोषण परियोजना पध्दति के आधार पर होगा, अर्थात परियोजना रिपोर्ट होनी जरूरी है जिसमें ग्राहकों का विवरण, तकनीकी और वित्तीय ब्यौरा, ओ एंड एम (संगठन एवं प्रबंधन) और निगरानी व्यवस्ष्था की जानकारी शामिल होगी । परियोजना का पूरा खर्च मिले -जुले रूप में प्राप्त होगा। इसमें उधार और प्रोत्साहन राशि के साथ प्रवर्तक की कम से कम 20 प्रतिशत की अंशपूंजी सम्मिलित है ।

एमएनआरई भी 30 प्रतिशत की सब्सिडी और अथवा 5 प्रतिशत की ब्याजदर पर कर्ज के तौर पर वित्तीय सहायता प्रदान करेगा ।

पैसा जारी करना

परियोजना के लिये धनराशि कार्योंपरांत उसके सत्यापन के बाद प्रतिपूर्ति के रूप में जारी की जाएगी ।

अनुमोदन

एमएनआरई द्वारा गठित समिति परियोजना रिपोर्ट प्राप्त होने के 45 दिनों के भीतर परियोजना का अनुमोदन करेगी ।

परियोजना प्रबंधन परामर्शदाता

परियोजना प्रबंधन परामर्शदाता के तौर पर सरकार एक प्रतिष्ठित एजेंसी की सेवायें लेगी । यह एजेंसी परियोजना की औपचारिक मंजूरी से पूर्व योजना तैयार करने, उसका मूल्यांकन करने और छानबीन करने में मदद करने जैसे सभी कार्य करेगी । ये सभी कार्य एमएनआरई के तत्वाधान में होंगे । यह, यदि आवश्यकता हुई तो क्रियान्वयन के लिये विस्तृत दिशानिर्देश प्रारूप तैयार करने में मंत्रालय की सहायया भी करेगी ।

निगरानी और मूल्यांकन

योजना के तहत आई टी जनित निगरानी और सत्यापन की औपचारिक व्यवस्था की गई है जिसके लिये विभिन्न चैनल सहभागियों को परियोजना लागत की 5 प्रतिशत राशि उपलब्ध होगी ।

नवाचार का समर्थन

मंत्रालय, सौर प्रणालियों के नवीन और अभिनव अनुप्रयोगों के प्रदर्शन के लिये मार्गदर्शी और प्रयोगात्मक परियोजनाओं को हाथ में लेने हेतु 100 प्रतिशत सीएफए तक दे सकता है ।

तकनीकी आवश्यकतायें

योजना के तहत परियोजना के प्रवर्तकों को मंत्रालय द्वारा समय-समय पर निर्धारित राष्ट्रीयअंतर्राष्ट्रीय मानकों का कड़ाई से पालन करना होगा ।

दिशानिर्देशों की व्याख्या

इन दिशानिर्देशों के किसी भी प्रावधान की अस्पष्टता के मामले में मंत्रालय का निर्णय अंतिम माना जाएगा ।

समीक्षा

योजना की समीक्षा छमाहीवार्षिक अंतराल पर आंतरिक समीक्षा समिति करेगी और यदि उसमें किसी संशोधन की आवश्यकता महसूस हुई तो मंत्रालय ही उसे शामिल करेगा ।

डा0 अब्दुल्ला ने उचित ही कहा है कि ये दिशानिर्देश उन परिस्थितियों का निर्माण करेंगे जिनमें उपर्युक्त सभी को प्रोत्साहन मिलेगा । राज्य सरकारें , उद्यमी और हितग्राही सभी इस योजना का पूरा-पूरा लाभ उठायेंगे तथा सुदृढ एवं जीवंत सौर भारत के निमार्ण के स्वप्न को पूरा करेंगे । (पीआईबी)

૦૦.
भारतीय रेल की पिछले एक वर्ष की महत्त्वपूर्ण उपलब्धियां

संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन-2 के प्रथम वर्ष में भारतीय रेल ने महत्त्वपूर्ण उपलब्धियां प्राप्त की हैं। राष्ट्र की परिवहन संबंधी भावी आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए भारतीय रेल को विकास के बड़े मार्ग की ओर अग्रसर होने में सहायता मिली है। भारतीय रेल के लिए मई 2009 से मई 2010 की अवधि अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए उल्लेखनीय रही है।

राजस्व जुटाना

भारतीय रेल की वित्त वर्ष 2009-10 के दौरान मूल आधार पर कुल आमदनी लगभग 86644.43 करोड़ रुपये रही जबकि वित्त वर्ष 2008-09 के दौरान यह 80264.60 करोड़ रुपये हुई थी। इस प्रकार 7.95 प्रतिशत वृध्दि दर्ज की गई। माल भाड़े से कुल आमदनी पहली अप्रैल 2008-31 मार्च 2009 के 54132.76 करोड़ रुपये की तुलना में पहली अप्रैल 2009 -31 मार्च 2010 के दौरान 58261.05 करोड़ रुपये हुई जो कि 7.63 प्रतिशत अधिक है। यात्रियों की आवाजाही से कुल आमदनी वित्त वर्ष 2009-10 में 23751.38 करोड़ रुपये हुई जबकि वित्त वर्ष 2008-09 के दौरान  यह 21978.34 करोड़ रुपये हुई थी। इस प्रकार इस वर्ष के दौरान 8.07 प्रतिशत वृध्दि दर्ज की गई। भारतीय रेल ने वित्त वर्ष 2009-10 के दौरान राजस्व अर्जक 8879.9 लाख टन माल की ढुलाई की। यह पिछले वर्ष की इसी अवधि के दैरान ढुलाई किये गए 8333.1 लाख टन माल की तुलना में 546.8 लाख टन अधिक है। इससे इसमें 6.56 प्रतिशत वृध्दि का पता चलता है। अप्रैल 2009-मार्च 2010 के दौरान आरक्षित किये गए यात्रियों की कुल संख्या 74426.5 लाख थी जबकि पिछले वर्ष की इसी अवधि के दौरान 70,960.1 लाख यात्री आरक्षित किये गए थे। इससे इस मद में 4.88 प्रतिशत वृध्दि का पता चलता है। उपनगरीय और गैर उपनगरीय क्षेत्रों में अप्रैल 2009 -मार्च 2010 की अवधि के दौरान आरक्षित किये गए यात्रियों की संख्या क्रमश: 38608.5 लाख और 35818.0 लाख थी जबकि पिछले वर्ष की इसी अवधि के दौरान ये संख्याएं क्रमश: 37890.3 लाख और 33069.8 लाख थीं। इससे इस बारे में क्रमश: 1.90 प्रतिशत और 8.31 प्रतिशत वृध्दि का पता चलता है।

भारतीय रेल का दूरदृष्टि पत्र 2020 और श्वेत पत्र

रेल मंत्री द्वारा संसद में पेश भारतीय रेल दूरदृष्टि पत्र 2020 दस्तावेज का उद्देश्य इसके मार्ग नेटवर्क में बड़े पैमाने पर विस्तार, यात्री और माल गाड़ियों को दोहरी लाइन वाले अलग अलग गलियारों में बांटना, कुछ मार्गों पर यात्री गाड़ियों की गति मौजूदा 130 किलोमीटर प्रति घंटा से बढाक़र 160-200 किलोमीटर प्रति घंटा करना तथा दुर्घटनाओं और उपकरणों की विफलता को नगण्य करना है। दूरदृष्टि पत्र 2020 में उच्च गति की कम से कम चार रेल परियोजनाओं का कार्यान्वयन भी शामिल है। जिसके अंतर्गत 250-350 किलोमीटर प्रति घंटा की गति पर बुलेट रेल सेवाएं शुरू करना है। पिछले पांच वर्षों में रेल के कार्य निष्पादन पर आधारित वर्तमान संगठनात्मक, परिचालन और वित्तीय स्थिति का दिग्दर्शन कराने वाला एक श्वेत पत्र भी संसद में प्रस्तुत किया गया था। श्वेत पत्र से भारतीय रेल की स्थिति को बेहतर तरीके से समझने में सहायता मिलेगी ताकि भविष्य के लिए सुधारक और संरचनात्मक कार्यवाही की योजनाएं बनाई जा सके।

भारतीय रेल द्वारा नॉनस्टाप ‘दुरन्त’ रेलों की शुरुआत

भारतीय रेल ने अपने इतिहास में एक नया अध्याय उस समय जोड़ दिया जब सितम्बर 2009 में एक नई श्रेणी की ‘दुरन्त’ यात्री रेलों की शुरूआत की । देश में अब तक विभिन्न प्रमुख मार्गों पर 12 दुरन्त रेलें शुरू की जा चुकी हैं। भारतीय रेल के इतिहास में दुरन्त रूके बिना चलने वाली सुपरफास्ट यात्री गाड़ी है। यह देश में रेल यात्रा के नये युग का अग्रदूत है जो यात्रियों के लिए बेहतर गति, सुविधा और सुरक्षा सुनिश्चित करता है। दुरन्त के डिब्बों की बाहरी रंग योजना का डिजाइन भिन्न है। दुरन्त रेलों के किराये में भोजन की लागत भी शामिल है।

कश्मीर घाटी के लोगों का स्वप्न साकार

प्रधानमंत्री ने अक्टूबर 2009 में अनन्तनाग और काजीगुंड के बीच नवनिर्मित 18 किलोमीटर लम्बी रेल लाइन राष्ट्र को समर्पित की। यह कश्मीर घाटी में रेल लाइन का अंतिम छोर है। इससे पहले अक्टूबर 2008 में और फरवरी 2009  में अनन्तनाग से माझोम तक (66 किलोमीटर) और माझोम से बारामूला (35 किलोमीटर) तक की रेल लाइनों का प्रधानमंत्री ने उद्धाटन किया था। घाटी में बारामूला से काजीगुंड तक की समूची 119 किलोमीटर लम्बी रेल लाइन अब चालू हो गई है। यह रेल दोनों दिशाओं में महत्त्वपूर्ण स्टेशनों जैसे सोपोर, हामरे, पाटन, माझोम, बड़गाम, श्रीनगर, पाम्पोर, काकापोरा, अवन्तीपुरा, पंजगाम, बीजबहेड़ा, अनन्तनाग और सादुरा स्टेशनों से गुजरती है।

बेरोजगार युवकों के लिए वातानुकूलित ‘युवा’ रेलें

सर्वप्रथम ‘युवा रेल’ हावड़ा और दिल्ली के बीच 30 दिसम्बर 2009 को चलाई गई थी। यह रेल मुख्य रूप से देश के बेरोजगार युवकों के लिए चलाई गई है। ये ‘युवा’ रेलें यह सुनिश्चित करने के लिए चलाई गई हैं कि कम आय वर्गों के युवक प्रमुख शहरों के बीच कम किराये पर यात्रा कर सकें। ‘युवा रेल’ किराये 15 से 45 वर्ष के आयु समूह के बेरोजगार युवाओं पर भी लागू होंगे। शुरू में कुल डिब्बों के 60 प्रतिशत डिब्बे ‘युवा’ वर्ग के लिए होंगे। शेष डिब्बे सामान्य यात्रियों (गैर युवा) के लिए होंगे। यदि यह योजना सफल रहती है तो इन युवा रेलों को देश के अन्य क्षेत्रों में भी चलाया जाएगा। युवा यात्रियों के लिए आरक्षण फीस, सुपरफास्ट रेल शुल्क और विकास शुल्क जैसे अन्य सभी शुल्कों को मिलाकर कुल किराया 1500 किलोमीटर तक की दूरी के लिए 299 रुपये और 1500 से 2500 किलोमीटर तक की दूरी के लिए 399 रुपये से अधिक नहीं होगा।

महिला विशेष ईएमयू रेल सेवा

रेल मंत्रालय ने, जैसा कि वर्ष 2009-10 के रेल बजट में घोषणा की थी, मुम्बई उपनगरीय की तर्ज पर दिल्ली, चेन्नई और कोलकाता उपनगर में मातृभूमि ईएमयू रेल सेवाएं शुरू की हैं क्योंकि कामकाजी महिलाओं को काम पर जाने के लिए काफी कठिनाई का सामना करना पड़ता है। ये रेल सेवा कार्यालय दिनों में ही उपलब्ध होगी।

सुख-सुविधा सम्पन्न रेल गाड़ी ‘महाराजा एक्सप्रेस’

उत्तम सुख-सुविधा सम्पन्न रेलगाड़ी महाराजा एक्सप्रेस को मार्च 2010 को झंडी दिखाकर रवाना किया गया था। इस रेल यात्रा के दौरान बौध्द और हिन्दु धर्म के स्थान बौध्द गया और वाराणसी, बांधवगढ के वन, खजुराहो के  मंदिर, ग्वालियर का किला और ताज महल के दर्शन कराये जाते हैं। यह  रेल कॉक्स एंड किंग्स (इंडिया) लिमिटेड और इंडियन रेलवेज केटरिंग एंड टूरिज्म कारपोरेशन के संयुक्त उद्यम रॉयल इंडियन रेल टूर लिमिटेड द्वारा चलाई जाती है। इस सुख-सुविधा सम्पन्न रेल में कुल 23 डिब्बे हैं और इसमें 84 यात्री यात्रा कर सकते हैं। सुख-सुविधा सम्पन्न यह पहली रेल है जिस की चार भिन्न-भिन्न आकृतियां है।

संस्कृति एक्सप्रेस प्रदर्शनी रेलगाड़ी

संस्कृति एक्सप्रेस प्रदर्शनी रेलगाड़ी को नोबल पुरस्कार से सम्मानित रवीन्द्र नाथ ठाकुर की 150वीं जयंती के समारोह के हिस्से के रूप में हावड़ा स्टेशन से रवाना किया गया था और इसमें उनके जीवन और दर्शन को दर्शाया गया है। पांच डिब्बों वाली इस रेलगाड़ी में कविवर की विभिन्न साहित्यिक रचनाओं ओर रेखा चित्रों को प्रदर्शित किया गया है। अगले वर्ष 8 मई को कोलकाता लौटने से पहले यह देश के विभिन्न भागों में महत्त्वपूर्ण स्टेशनों पर रुकेगी। यह प्रदर्शनी रेल कवि गुरु रवीन्द्रनाथ को उनकी 150वीं जयंती पर श्रध्दांजलि है। यह रेल एक वर्ष तक भारत भ्रमण करेगी। रेल मंत्री ममता बनर्जी ने इस रेल को यात्रा पर रवाना करने के समय कहा कि यह ट्रेन कविगुरु की विभिन्न साहित्यिक रचनाओं और रेखाचित्रों को जन-जन तक पहुंचाएगी।

‘इज्जत’ नामक मासिक सीजन टिकट (एमएसटी) योजना

रेल मंत्री कुमारी ममता बनर्जी ने संसद में वर्ष 2009-10 का रेलबजट प्रस्तुत करते समय रेल मंत्रालय की एक नई योजना शुरू करने की घोषणा की थी। यह नई योजना एक समान मूल्यवाली मासिक सीजन टिकट (एमएसटी) है जिस की कीमत, सभी प्रभार मिला कर 25 रुपये है जो कि असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले उन व्यक्तियों को जारी की जाएगी जिनकी मासिक आय 1500 रुपये से अधिक नहीं है और वे 100 किलोमीटर तक यात्रा कर सकेंगे। इस नई योजना का नाम ‘इज्जत’ है। इज्जत नामक ये एमएसटी पहली अगस्त 2009 से यात्रा के लिए जारी किये जा रहे हैं।

सिक्किम के साथ सर्वप्रथम रेल सम्पर्क

सिक्किम के छोटे शहर रंगपो और पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती कस्बे सिवोक के बीच नई रेल लाइन की आधारशिला रखे जाने के साथ सिक्किम से सर्वप्रथम रेल सम्पर्क स्थापित होने का मार्ग प्रशस्त हो गया है। 52.7 किलोमीटर लम्बी रंगपो-सिवोक नई बड़ी लाइन के निर्माण पर 1339.48 करोड़ रुपये लागत आएगी और इसे राष्ट्रीय परियोजना घोषित किया गया है। इसके लिए रेल मंत्रालय अपने सकल बजटीय समर्थन के जरिये 25 प्रतिशत राशि देगा और शेष 75 प्रतिशत राशि वित्त मंत्रालय अतिरिक्त राशि के रूप में अदा करेगा। रंगपो से सिक्किम की राजधानी गंगतोक (69 किलोमीटर) तक इस रेल लाइन के विस्तार का सर्वेक्षण भी हाल में पूरा किया गया है। रेल मंत्रालय इस सर्वेक्षण रिपोर्ट की जांच कर रहा है।

रेल का सर्वप्रथम वातानुकूलित डबलडेकर सवारी डिब्बा

रेल कोच फैक्टरी (आरसीएफ) ने देश का सर्वप्रथम वातानुकूलित दो मंजिला सवारी डिब्बा तैयार किया है जो कि दिल्ली-मुरादाबाद सेक्शन पर परीक्षण पर है। आरसीएफ के अभियंताओं ने आरडीएसओ के साथ मिलकर मात्र 9 महीने की अल्पावधि में डिब्बे का पूरी तरह नया स्वरूप तैयार किया है, जिसको 160 किलोमीटर प्रति घंटे की गति पर चलाया जा सकेगा। नये डिजाइन वाले डिब्बे में 128 यात्री ही बैठ सकते हैं, जबकि शताब्दी की चेयर कार में 78 यात्री बैठते हैं। इस प्रकार इन डिब्बों  की क्षमता में लगभग 70 प्रतिशत की वृध्दि हो गयी।

टिकटों की बिक्री करने वाली सर्वप्रथम सचल वैन ‘मुश्किल-आसान’

जैसा कि रेल मंत्री ममता बनर्जी ने संसद में 2009-10 के रेल बजट प्रस्तुत करते समय घोषणा की थी कि आरक्षित और गैर-आरक्षित रेल टिकटों को जारी करने के लिए सर्वप्रथम सचल टिकट बिक्री वैन ‘मुश्किल-आसान’ दिल्ली और कोलकाता में प्रायोगिक तौर पर शुरू की गई। ‘मुश्किल आसान’ सचल वैन इस उद्देश्य से शुरू की गई है कि शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में आरक्षित और गैर-आरक्षित कम्प्यूटरीकृत टिकटें जारी की जाएंगी ताकि गरीब लोग जो टिकट खरीदने के लिए स्टेशन नहीं जा सकते, अब बाजार, मुहल्ले और अन्य व्यस्त स्थानों पर टिकटें खरीद सकें। ग्रामीण क्षेत्रों में टिकट बिक्री की सचल वैन ग्रामीण क्षेत्रों के लिए उपयुक्त सम्पर्क की वैकल्पिक व्यवस्था का विस्तृत अध्ययन करने के बाद शुरू की जाएंगी।

किसान दृष्टि परियोजना के अधीन खराब होने वाले वस्तु केन्द्र

सरकारी-निजी भागीदारी के आधार पर शीतागार और तापमान नियंत्रित भण्डारण स्थापना की सुविधा को प्रोत्साहित करने के लिए सम्बध्द मंत्रालयों, कन्टेनर कारपोरेशन आफ इंडिया लिमिटेड (सीओएनसीओआर), सेंट्रल वेयरहाउसिंग कारपोरेशन लिमिटेड (सीडब्ल्यूसी) और शीत शृंखला संचालकों का कार्यदल गठित किया गया है जो परियोजना को कार्यान्वित करने के लिए और खराब होने वाले माल के केन्द्रों को स्थापित करने के लिए प्रायोगिक (पायलट) परियोजना के कुछ स्थानों का पता लगाने के लिए कार्यक्रम तैयार करेगा। प्रायोगिक (पायलट) परियोजना संभार तंत्र में कार्यरत सार्वजनिक क्षेत्र प्रतिष्ठानों के जरिये कार्यान्वित की जाएगी। किसान दृष्टि परियोजना के अधीन पहली प्रायोगिक (पायलट) परियोजना की आधारशिला रेल मंत्री द्वारा सिंगूर में नवम्बर 2009 में रखी गई थी।

समर्पित माल गलियारा परियोजना का कार्यान्वयन

पश्चिमी और पूर्वी समर्पित माल गलियारा (डीएफसी) परियोजना को  कार्यान्वित करने में चालू वर्ष में प्रगति हुई है। पश्चिमी गलियारा (1515 किलोमीटर) के लिए वित्त पोषण जापान अंतर्राष्ट्रीय सहयोग एजेंसी (जेआईसीए) द्वारा जापान सरकार की आर्थिक भागीदारी के लिए विशेष शर्तें (स्टेप) योजना के अधीन सरकारी विकास सहायता (ओडीए) त्रऽण के द्वारा किया जा रहा है। जेआईसीए परियोजना लागत के लगभग 80-85 प्रतिशत का वित्त पोषण करेगी। रिवाड़ी-वडोदरा (950 किलोमीटर) नामक पहले  चरण के लिए जेआईसीए की सहायता 405 बिलियन जापानी येन (लगभग 210000 करोड़ रुपये) की पहली किस्त के लिए त्रऽण समझौते पर 31 मार्च 2010 को हस्ताक्षर किये गए। पहले चरण के लिए इंजीनियरी परामर्शदात्री सेवा अनुबंध डीएफसीसीआईएल को 12 मई 2010 को दिया गया। पहले चरण का सिविल अनुबंध देने का लक्ष्य अक्टूबर 2011 रखा गया है। दूसरे चरण के लिए वित्त पोषण की समझौता वार्ता जेआईसीए के साथ प्रगति पर है और 1.616 बिलियन जापानी येन (लगभग 800 करोड़ रुपये) का इंजीनियरी त्रऽण समझौते पर जून 2010 में हस्ताक्षर होने का कार्यक्रम है। चरण दो (लगभग 226 बिलियन जापानी येन, लगभग 11300 करोड़ रुपये) के लिए मुख्य त्रऽण समझौते पर मईजून 2011 में हस्ताक्षर होने का कार्यक्रम है। जापान सरकार द्वारा दूसरे चरण के लिए पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (ईआईए), समाज प्रभाव आकलन (एसआईए) और पुनर्वास योजना (आरआरपी) का अध्ययन पूरा करने का समय जुलाई 2010 रखा गया है।

समर्पित मालगाड़ी गलियारा-पूर्वी (1839 किमी) के मामले में 1133 किमी (लुधियाना-खुर्जा (400 किमी), खुर्जा-कानुपर (342 किमी) और कानपुर-मुगलसराय (391 किमी) सेक्शन के लिए धन विश्व बैंक से प्राप्त किया जा रहा है। विश्व बैंक इस परियोजना लागत का लगभग 67 प्रतिशत धन प्रदान करेगा और विश्व बैंक के कुल सहयोग का आकलन 2.4 अरब अमरीकी डॉलर (12 हजार करोड़ रुपये) है। खुर्जा-कानुपर सेक्शन के लिए पहले त्रऽण समझौते पर अक्टूबर, 2010 में हस्ताक्षर किए जाने का लक्ष्य रखा गया है और अनुमानित त्रऽण राशि 850 मिलियन अमरीकी डॉलर (4750 करोड़ रुपये) है। लुधियाना-खुर्जा और कानपुर-मुगलसराय के लिए त्रऽण समझौतों पर वित्तीय वर्ष 2011-12 में हस्ताक्षर के लिए बातचीत चल रही है। 5 अप्रैल 2010 को निर्माण कार्यों के लिए पूर्व-योग्यता दस्तावेज जारी करने के साथ ही खुर्जा-कानपुर सेक्शन के लिए बोली की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। मुगलसराय-सोननगर सेक्शन पर भारतीय रेल के संसाधनों से काम चल रहा है और 109 किमी सेक्शन (न्यू गंज ख्वाजा से न्यू कारवांडिया)  के लिए सिविल निर्माण का ठेका दिसंबर 2008 में दिया गया था, इस संबंध में कार्य प्रगति पर है। सोन नगर-डांकुनी सेक्शन (534 किमी) पर सार्वजनिक-निजी भागीदारी के माध्यम से कार्य होगा और परामर्शदाताओं के सहयोग से डीएफसीसीआईएल द्वारा सार्वजनिक-निजी भागीदारी का उपयुक्त मॉडल विकसित किया जा रहा है। डीएफसीसीआईएल द्वारा इस सेक्शन का अंतिम स्थल सर्वेक्षण किया जा रहा है जिसे जुलाई 2010 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।

सुरक्षा मुद्दों पर अभूतपूर्व जोर

इस वर्ष के दौरान सुरक्षा संबंधित मुद्दों पर अभूतपूर्व जोर दिया गया था, खासतौर पर लेवेल क्रॉसिंग, इंटरलॉकिंग और रखवाली, सीमित ऊंचाई वाले सबवे के प्रावधान, सामान्य ऊंचाई वाले सबवे, पुल के नीचे सड़क (आरयूबी), पुल के ऊपर सड़क (आरओबी), सड़क सुरक्षा कार्य, सिग्नलों के सुरक्षा पहलू और उनके बैक अप बिजली आपूर्ति, आग से संबंधित दुर्घटनाओं की जांच और लोको पायलटों इत्यादि के निष्पादन की निगरानी के लिए 31 मार्च, 2009 तक कुल 1337 आरयूबी और आरओबी कार्य नियोजन और क्रियान्वयन  के विभिन्न चरणों में है। वर्ष 2009-10 के दौरान, विभिन्न स्कीमों के तहत नवंबर 2009 तक आरयूबी और आरओबी का निर्माण पूरा कर लिया गया है। भारतीय रेल 34,220 लेवेल क्रॉसिंग का निर्वाह करती है जिसमें 17,244 क्रॉसिंग पर गेटकीपर होते हैं और 16,976 क्रॉसिंग पर कोई गेटकीपर नहीं है। वर्ष 2008-09 में लगभग बिना रखवाली वाले 259 लेवेल क्रॉसिंग के लिए गेटकीपर दिए गए। वर्ष 2009-10 के दौरान नवंबर 2009 तक कुल 132 बिना गेटकीपर वाले क्रॉसिंग पर गेटकीपर दिए गए। बोर्ड की मंजूरी के साथ भारतीय रेल की व्यापक आपदा प्रबंधन योजना बनाई गई है और इसे अनुमोदन के लिए राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के पास भेज दिया गया है। रेलवे उन कुछ मंत्रालयों में से एक है जिन्होंने आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के प्रावधानों के अनुरूप आपदा प्रबंधन योजना बनाई है। पिछले कुछ वर्षो के दौरान ट्रेन दुर्घटनाओं की संख्या में कमी आई है।

डीजल लोकामोटिव इंजन का उन्नयन, कोचों में और सीएनजी एवं जैव ईंधन में सुधार

अपने प्रयासों के माध्यम से ईएमडी डीजल इंजन की अश्वशक्ति को 4000 से बढाक़र 4500 कर दिया गया है जो उनको ज्यादा गति से अधिक भार ढोने में सक्षम बनाएगा। ईएमडी लोको में और सुधार लाकर 5000 से ज्यादा अश्वशक्ति प्राप्त करने की योजना बनाई गई है। अद्यतन प्रौद्योगिकी वाले ईएमडी लोकोमोटिव को 2009-10 में 150 तक बढा दिया गया है। परीक्षण पूरा कर लिया गया है और डीएमयू की एक पावर कार को सीएनजी का प्रयोग करने वाले दोहरे ईंधन पर चलने वाले स्वरूप में परिवर्तित कर दिया गया है और इस दिशा में कार्य प्रगति पर है। आरडीएसओ ने डीएमयू में शौचालय सुविधाओं के लिए डिजाइन तय कर दिया है और आईसीएफ वर्तमान वर्ष के दौरान सभी डेमू रेकों को शौचालयों में बदल देगा। रेलवे ने जैव-ईंधन की खरीद के लिए आदेश दे दिए हैं। ट्रेनों पर जैव-ईंधन के 10 प्रतिशत सम्मिश्रण का प्रयोग करते हुए सफल प्रयोगशाला परीक्षण किया गया है। इन वैकल्पिक ईंधनों की शुरूआत पर्यावरण हितकारी है और इससे जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता घटेगी। संवेदनशील क्षेत्रों में चलने वाले कर्मचारियों को संभावित खतरों से बचाने के लिए लुमडिंग -बदरपुर सेक्शन में कार्यरत डीजल इंजनों पर पहली बार बुलेट प्रूफ कैब दी गई है।

डीजल इंजनों का निर्यात

डीजल इंजनों के निर्यात को बढावा देने के लिए और अंतर्राष्ट्रीय बाजार में अपनी पहचान स्थापित करने के लिए भारतीय रेल की एक उत्पादन इकाई, डीजल लोकोमोटिव वर्क्स (डीएलडब्ल्यू), वाराणसी द्वारा निर्मित एक सबसे आधुनिक एवं नए प्रकार का 3000 अश्वशक्ति वाला केप गेज़ डीजल इंजन मोजाम्बिक भेजा गया। केप गेज़ के लिए 3000 अश्वशक्ति का डीएलडब्ल्यू द्वारा निर्मित यह पहला इंजन है।

ट्रेनों में गुणवत्ता वाले भोजन का प्रावधान

भारतीय रेल में सचल खान-पान इकाइयों में भोजन की गुणवत्ता में सुधार के लिए मई 2009 में क्षेत्रीय रेल और भारतीय रेल खान-पान व पर्यटन निगम (आईआरसीटीसी) को निर्देश जारी किए गए हैं। आम यात्रियों की खान-पान आवश्यकता को पूरा करने के लिए भारतीय रेल में 10 रुपये की कीमत पर जनता भोजन सुविधा में सुधार किया गया है। जलपान गृहों, भोजनालयों और अन्य खान-पान स्टॉलों के माध्यम से भारतीय रेल पर लगभग 1 लाख 10 हजार जनता भोजन की प्रति दिन बिक्री होती है। आम लोगों की खान-पान संबंधी आवश्यकता को पूरा करने के लिए रेलवे ने उचित दामों पर सस्ता भोजन व जनता भोजन बेचने के लिए जनाहार कैफेटेरिया खोलने की योजना बनाई है। हावड़ा, बंगलौर, सिंकदराबाद, चेन्नई, लखनऊ और गोरखपुर रेलवे स्टेशनों पर में जनाहार कैफेटेरिया शुरू किए गए हैं और सियालदाह, पटना, खड़गपुर, न्यू जलपाईगुड़ी और मैसूर में पांच जनाहार कैफेटेरिया शुरू किए जाएंगे। हाल में शुरू की गई ‘दूरन्तो’ ट्रेनों में राजधानीशताब्दी एक्सप्रेस के समारूप स्तर की जलपान सेवाएं प्रदान की जा रही हैं। इसके अतिरिक्त दूरन्तो ट्रेनों पर सभी शयनयान श्रेणी के यात्रियों को यात्रा के दौरान भोजन प्रदान किए जा रहे हैं।

राष्ट्रमंडल खेलों के अवसर पर रेलवे प्रदर्शनी ट्रेन चलाएगा

दिल्ली में आगामी राष्ट्रमंडल खेलों के अवसर पर एक प्रदर्शनी ट्रेन शुरू करने का कार्य जोर-शोर से चल रहा है। संसद में रेल बजट 2010-11 प्रस्तुत करते हुए रेल मंत्री ममता बनर्जी ने इस प्रदर्शनी ट्रेन की घोषणा की थी।

यह ट्रेन युवा, खेल एवं सूचना प्रौद्योगिकी के विषय पर समर्पित की जाएगी। इस प्रदर्शनी ट्रेन के माध्यम से रेल मंत्रालय देश के लोगों में, खास तौर पर युवाओं में खेलों के प्रति रुचि पैदा करेगा। भारतीय रेल अपनी मजबूत राष्ट्रीय उपस्थिति के कारण देश के कोने-कोने तक इस प्रकार के संदेश को प्रसारित करने के लिए सर्वश्रेष्ठ माध्यम है।

चरण – III ‘साइंस एक्सप्रेस’ व रेड रिबन एक्सप्रेस

‘साइंस एक्सप्रेस’ जिसका अक्टूबर 2009 में उद्धाटन किया गया था वह अपने तीसरे चरण में देशभर में अपनी यात्रा के सात महीनों में लगभग 18000 किलोमीटर की दूरी तय करेगी और 55 स्थानों का भ्रमण करेगी। इन स्थानों में अधिकांश ऐसे स्थान हैं जहां पिछले दो चरणों में ट्रेन नहीं गई है। रेड रिबन एक्सप्रेस को दूसरे चरण में विश्व एड्स दिवस पर रवाना किया गया था। रेड रिबन एक्सप्रेस सुदूर क्षेत्रों में एचआईवीएड्स के बारे में जागरूकता पैदा करने के लिए 10 कोचों की प्रदर्शनी ट्रेन है।

सुपरफास्ट पार्सल एक्सप्रेस ट्रेन

अधिक महत्त्वपूर्ण और शीघ्र पहुंचाए जाने वाले पार्सल यातायात को आकर्षित करने के लिए भारतीय रेलवे ने प्रायोगिक परियोजना के तौर पर दिल्ली-हावड़ा तथा दिल्ली-अहमदाबादवापी-हावड़ा मार्गों पर  तीव्र पार्सल सेवाप्रीमियम पार्सल एक्सप्रेस ट्रेन तेजश्री पार्सल सेवा शुरू की है। इसके तहत निश्चित समय-सारणी के अनुसार  निर्धारित समय पर पार्सल पहुंचाये जाने का लक्ष्य है।

निजी माल टर्मिनल का विकास

ऑटोमोबाइल यातायात में रेलवे का बाजार हिस्सा बढाने तथा ऑटोमोबाइल यातायात के वास्ते एकत्रण एवं वितरण केंद्रों की सुगमता के लिए सार्वजनिक निजी साझेदारी के माध्यम से रेल मुख्यालयों के समीप ऑटोमोबाइल केंद्र स्थापित करने की एक योजना अंतिम चरण में है। रेल मंत्री ने नवंबर, 2009 में पश्चिम बंगाल के शालीमार बाग में इस प्रकार के केंद्र की स्थापना के लिए आधारशिला रखी थी। निजी निवेश के माध्यम से माल टर्मिनलों के बीच नेटवर्क के तीव्र विकास के लिए एक नीति अंतिम चरण में है ताकि घर के द्वार तक उपभोक्ता को कुशल और प्रभावी सेवा सुनिश्चित की जा सके।

375 स्टेशन आदर्श स्टेशन के रूप में विकसित किए जाएंगे

रेल मंत्रालय ने 17 और स्टेशनों को आदर्श स्टेशनों की मौजूदा सूची में शामिल करने का फैसला किया है। इसके साथ ही आदर्श स्टेशनों के रूप में चुने गए स्टेशनों की संख्या 375 हो जाएगी। रेलवे पेयजल, पर्याप्त शौचालयों, खानपान सुविधा, प्रतीक्षा कक्ष, महिलाओं के लिए विश्रामालय जैसे मूलभूत सुविधाओं से लैस आदर्श स्टेशनों का विकास करेगा। साइनबोर्ड और अन्य सुविधाएं सार्वभौमिक रूप से विद्यमान हैं। विभिन्न स्टेशनों पर आवश्यक कार्य पहले ही शुरू हो चुके हैं।

बहु-कार्यात्मक परिसरों का विकास

देश  के विभिन्न हिस्सों में तीर्थाटन, उद्योग तथा पर्यटन को ध्यान में रखकर 50 स्टेशनों पर बहु-कार्यात्मक परिसरों का विकास किया जा रहा है। स्टेशनों पर ये  परिसर लोगों को खरीददारी, फूड स्टॉल, रेस्तरां, बुक स्टॉल, पीसीओएसटीडीआईएसडीफैक्स बूथ, दवा स्टोर, सस्ता होटल, भूमिगत पाकिर्गं आदि सुविधाएं उपलब्ध कराएंगे। इन सुविधाओं के विकास का काम इरकॉन और रेल भूमि विकास प्राधिकरण तथा विभिन्न रेल जोनों को सौंपा गया है। इस प्रकार के पहले परिसर की आधारशिला रेल मंत्री कुमारी ममता बनर्जी ने अक्टूबर 2009 में सिलीगुड़ी में रखी थी।

सिग्नलिंग प्रणाली में सुधार और उसका आधुनिकीकरण

ट्रेन परिचालन की कार्यकुशलता और सुरक्षा में सुधार लाने के लिए पुराने पड़ चुके मेकेनिकलमल्टी सिग्नलिंग प्रणाली के स्थान पर इलेक्ट्रिकलइलेक्ट्रोनिक इंटरलॉकिंग प्रणाली लगाने का काम वर्ष 2009 (जनवरी से नवंबर तक) में 339 स्टेशनों पर किया गया। सिग्नलों की विश्वसनीयता और दृश्यता में सुधार लाने के लिए 853 स्टेशनों पर पुराने पड़ चुके फिलामेंट वाले सिग्नलों के स्थान पर अधिक समय तक चलने वाले एलईडी सिग्नल लगाए गए हैं। सिग्नल प्रणाली के रखरखाव एवं सघन निरीक्षण के लिए कुल 578 स्टेशनों पर डाटा लॉगर लगाए गए हैं। लाइन क्षमता में वृध्दि के लिए 209 किलोमीटर रूट पर ऑटो ब्लॉक सिग्नलिंग की सुविधा लगायी गयी है। दक्षिण रेलवे में प्रयोग के तौर पर चेन्नई सेंट्रल गुम्मिडिपिंडी उपनगरीय खंड (50 आरकेएम) पर यात्रा के दौरान वाली ट्रेन सुरक्षा प्रणाली लगायी गयी है। यह प्रणाली सिग्नल पासिंग एट डेंजर मामलों को रोकती है और गतिसीमा नियमों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करती है। मुख्य मार्ग (उत्तरीउत्तरी मध्य रेलवे के दिल्ली-आगरा खंड) पर प्रायोगिक परियोजना के रूप में  ट्रेन सुरक्षा प्रणाली लगाये जाने का काम चल रहा है। धुरा-रोधक प्रणाली के माध्यम से ब्लॉक सेक्शनों का ऑटोमैटिक क्लीयरेंस 448 खंडों पर लगाया गया है। इससे मानव तत्वों पर निर्भरता खत्म होगी और सुरक्षा में वृध्दि होगी। सुरक्षा में सुधार हेतु 439 लेवल क्रॉसिंग गेटों को सिग्नलों के साथ संबध्द कर दिया गया है। मानव पर निर्भरता कम करने के साथ ही सुरक्षा बढाने के लिए ट्रैक सकिटिर्ंग विभिन्न स्टेशन खंडों में 1387 स्थानों पर लगायी गयी है।

रेलवे की संचार प्रणाली में सुधार

वित्त वर्ष 2009-10 के दौरान, भारतीय रेलसंचार निगम लिमिटेड के जरिए नवंबर 2009 तक करीब 2,500 रूट किलोमीटर ऑप्टिक फाइबर केबल ओएफसी केबल डाला गया। रेल संचार में सुधार के लिए अब तक रेलवे लाइन के साथ-साथ भारतीय रेल प्रणाली पर कुल 37,000 रूट किलोमीटर ओएफसी बिछाया जा चुका है। इसके अतिरिक्त 9,000 किलोमीटर मार्ग पर ओएफसी बिछाने का काम चल रहा है। रेल चालक, गार्ड, स्टेशन मास्टर, नियंत्रण कार्यालय और रेल चलाने के दौरान फील्ड मेंटीनेंस स्टाफ के बीच संचार के लिए मोबाइल  ट्रेन रेडियो संचार प्रणाली हावड़ा-धनबाद, गुवाहाटी-न्यू बोंगाइगांव और मथुरा-झांसी खंड पर करीब 700 किलोमीटर मार्ग पर चालू की गई है। अन्य 2,700 किलोमीटर मार्ग के लिए कार्य चल रहा है। गार्ड, चालक और स्टेशन के बीच संचार के लिए वॉकी-टाकी वीएचएफ संचार प्रणाली उपलब्ध कराई गई है।

डीज़ल एवं विद्युत  रेल इंजनों के लिए नई सहायक इकाइयों की स्थापना

रेल मंत्री ने डीज़ल और विद्युत  रेल इंजनों के पुर्जों के निर्माण के लिए दो फैक्ट्रियों की आधारशिला रखी तथा पश्चिम बंगाल में दानकुनी में दिसंबर 2009 में कार्बन क्रेडिट सेविंग सीएफएल के वितरण की परियोजना का भी उद्धाटन किया। इन फैक्ट्रियों में चितरंजन निर्माण इकाइयों और डीज़ल लोकोमोटिव्स वर्क्स के लिए बिजली के इंजनों के वास्ते कल पुर्जों का निर्माण किया जाएगा। भारतीय रेल की ओर से स्थापित की जाने वाली अन्य इकाइयों में रायबरेली में रेल कोच फैक्ट्री, कांचरापाड़ा में कोच फैक्ट्री, मरहोवड़ा में डीज़ल लोकोमोटिव फैक्ट्री,मधेपुरा में विद्युत रेल इंजन फैक्ट्री और छपरा में रेल व्हील फैक्ट्री शामिल है।

बिजनेस मॉडल्स और नूतन फंडिंग विकसित करने के बारे में विशेषज्ञ समिति

सार्वजनिक निजी भागीदारी के जरिए व्यापारिक प्रारूप और नूतन वित्तपोषण विकसित करने के लिए फिक्की के महासचिव डॉ. अमित मित्रा की अध्यक्षता में एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया गया है। समिति की कई बैठक हुईं और इसने जो सिफारिशें दी हैं वे कार्यान्वयन के विभिन्न चरणों में हैं। रेलवे में सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी के उपयोग के बारे में श्री सैम पित्रौदा की अध्यक्षता में पांच संदस्यों की विशेषज्ञ समिति बनाई गई है।

बाढ प्रभावित क्षेत्रों में पेयजल और चारे का निशुल्क परिवहन

देश में बाढ प्रभावित क्षेत्रों को पानी और चारे जैसी बुनियादी वस्तुओं की बेहतर उपलब्धता सुगम कराने के मद्देनज़र रेल मंत्रालय ने 12 राज्यों के बाढ प्रभावित अधिसूचित जिलों को रेल के जरिए पेय जल और चारा पहुंचाने को विशेष मामले के रूप में लेते हुए उसे निशुल्क करने का निर्णय किया है। इससे प्रभावित राज्यों को कोई खर्च नहीं देना होगा। इन राज्यों में आंध्र प्रदेश, असम, बिहार, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, कर्नाटक, मध्यप्रदेश, महारा­ष्ट्र, मणिपुर, नगालैंड, राजस्थान और उत्तर प्रदेश शामिल हैं। ये निर्देश पहली दिसंबर 2009 से प्रभावी हो गए हैं तथा 31 जनवरी 2010 तक वैध रहेंगे।

प्रत्यायित पत्रकारों के लिए रियायती रेल यात्रा की नई सुविधाजनक प्रणाली

रेलमंत्री कुमारी ममता बनर्जी ने 2009-10 के रेल बजट में प्रत्यायित पत्रकारों के लिए जो घोषणा की थी उसी के अनुरूप आगे बढते हुए रेल मंत्रालय ने प्रत्यायित पत्रकारों को रियायती रेल भाड़ा उपलब्ध कराने के लिए कूपन बुक के स्थान पर ज्यादा सुविधाजनक फोटो पहचान पत्र आधारित प्रणाली लागू करने का फैसला किया है। प्रत्यायित संवाददाताओं  को अब कूपन बुक के स्थान पर फोटो पहचान कार्ड जारी किया जाएगा। प्रत्यायित संवाददताओं को मेलएक्सप्रेस ट्रेनों की सभी श्रेणियों में 50 फीसदी रियायत मिलेगी तथा अन्य सभी शुल्कों पर कोई छूट नहीं होगी। इसके साथ ही राजधानीशताब्दीजनशताब्दी ट्रेनों की सभी श्रेणियों के सभी समग्र शुल्क में 50 फीसदी की छूट होगी। यह रियायत गरीब रथ ट्रेनों में मान्य नहीं होगी। फोटो पहचान पत्र पर आधारित यह नयी रियायत प्रणाली तथा राजधानीशताब्दीजनशताब्दी ट्रेनों में रियायत में वृध्दि 15 अक्टूबर, 2009 से प्रभावी हो गई है। पत्रकारों के आश्रित बच्चों और पत्नी को रेल यात्रा किराया में रियायत 20 अप्रैल, 2010 से प्रभावी कर दी गयी है।

छात्रों, कलाकारों और पुलिस पदक विजेताओं के लिए रियायत में वृध्दि

जैसा कि रेलमंत्री कुमारी ममता बनर्जी ने रेल बजट में घोषणा की थी, उसी पर अमल करते हुए रेल मंत्रालय ने मदरसा, उच्च मदरसा और उच्चतर मदरसा में पढने वाले छात्रों को उनके घर से इन शिक्षण संस्थानों में आने जाने के लिए द्वितीय श्रेणी के मासिक सीजन टिकट की सुविधा देने का निर्णय लिया है। यह भी निर्णय लिया गया है कि स्कूलोंमदरसों मान्यता प्राप्त व्यावसायिक शिक्षण संस्थानों में पढने वाले छात्र-छात्राओं को कक्षा ग्यारहवीं के स्तर तक मेट्रो रेल कोलकाता में 60 प्रतिशत तक की छूट दी जाएगी। इसके अलावा मंत्रालय ने कलाकारों (नाटयकर्मी, नृत्यदल और भारतीय नाटय विद्यालय के छात्र कलाकारों), जिन्हें फिलहाल मेलएक्सप्रेस की प्रथम श्रेणी में 50 प्रतिशत और द्वितीय तथा शयनयान में 75 फीसदी की रियायत थी, को अब मेलएक्सप्रेस ट्रेनों की एसी चेयर कार, एसी थ्री टायर, और एसी टू टायर श्रेणियों में 50 प्रतिशत तथा  राजधानीशताब्दीजनशताब्दी ट्रेनों के एसी चेयर, एसी थ्री टायर और एसी टू टायर श्रेणियों के सभी समग्र शुल्क में भी 50 फीसदी की छूट मिलेगी। 60 वर्ष या उससे ऊपर के पुलिकर्मियों जिन्हें विशिष्ट सेवा के लिए राष्ट्रपति का पुलिस पदक मिल चुका है, को भी मेलएक्सप्रेस ट्रेनों की सभी श्रेणियों और राजधानीशताब्दीजनशताब्दी ट्रेनों के सभी समग्र शुल्कों में अब 30 प्रतिशत के स्थान पर 50 प्रतिशत  छूट दिये जाने का निर्णय लिया गया है। ऐसी महिला पुलिसकर्मियों को 30 के बजाय 60 प्रतिशत छूट मिलेगी।

रेलवे में समेकित सुरक्षा प्रणाली का कार्यान्वयन

रेलवे ने सुरक्षा गतिविधियों में मजबूती लाने के लिए कई कदम उठाए हैं। देश के 195 संवेदनशील स्टेशनों पर निगरानी व्यवस्था को मजबूत करने के लिए समेकित सुरक्षा प्रणाली लगाने के काम के लिए 344 करोड़ रूपए मंजूर किए गए हैं। इसके अलावा, विभिन्न जोनों को आधुनिक सुरक्षा कल-पुर्जे खरीदने के लिए पहले ही उनमें 67 करोड़ रूपए वितरित किए गए हैं।  विशेष डयूटी के लिए आरपीएसएफ की 12 कमांडो कंपनियां तैयार की गयी हैं। मंत्री महोदया ने एक महिला कमांडो कंपनी तैयार करने की भी घोषणा की है। 32 आरपीएफ कर्मियों को सराहनीय सेवा के लिए इस वर्ष पुरस्कृत किया गया है। मुम्बई सीएसटी पर 26 नवंबर, 2008 को हुए आतंकवादी हमले के दौरान उत्कृष्ट बहादुरी प्रदर्शित करने के लिए आरपीएफ को पहली बार राष्ट्रपति के पुलिस पद से सम्मानित किया गया।

सुरक्षा पर उच्चस्तरीय बैठक

रेलयात्रियों की बेहतर सुरक्षा सुनिश्चित करने के वास्ते नयी प्रणाली विकसित करने के लिए जनवरी, 2010 को उच्च स्तरीय बैठक हुई थी। इस उच्चस्तरीय बैठक में रेलवे बोर्ड के सदस्य स्टाफ, भारत सरकार के पदेन सचिव, आरपीएफ के महानिदेशक, राज्यों के गृहसचिवों, राज्यों में रेल की सुरक्षा के प्रभारी पुलिस अधिकारियों, गृहमंत्रालय के अधिकारियों, खुफिया ब्यूरो (आईबी) के अधिकारियों तथा रेलवे बोर्ड के अन्य अधिकारियों ने हिस्सा लिया। इसे रेलयात्रियों की सुरक्षा के मुद्दे पर रेलमंत्रालय द्वारा उठाई गई प्रमुख पहल के रूप में देखा जा रहा है।

आईआरसीटीसी द्वारा 24 घंटों के लिए हेल्पलाइन सेवा

रेल मंत्रालय के सार्वजनिक उपक्रम भारतीय रेलवे खानपान एवं पर्यटन निगम लिमिटेड (आईआरसीटीसी) ने रेलउपभोक्ताओं को भारतीय रेलवे में खानपान संबंधी सुझाव एवं शिकायत  दर्ज कराने के लिए 24 घंटों का केंद्रीकृत हेल्पलाईन नंबर 1800-111-139 शुरू किया है। यह सुविधा सप्ताह के सातों दिन चौबीसों घंटे उपलब्ध है और रेलयात्री भोजन और खानपान सेवा के बारे में अपनी शिकायत या सुझाव दर्ज करा सकते हैं। जब भी संभव होता है, समय पर उनकी शिकायतों के निवारण के लिए कदम उठाए जाते हैं। भारतीय रेलवे की अधिकृत पूछताछ सेवा 139- रेल संपर्क  ने हाल ही में एसएमएस के माध्यम से रेलवे पूछताछ सुविधा प्रारंभ की जो प्रीमियम सेवा है। उपयोगकर्ता निर्धारित प्रारूप में इस नंबर पर एसएमएस भेजकर पीएनआर की स्थिति, किराया, सीट की उपलब्धता, ट्रेनों के आगमन, प्रस्थान आदि के बारे में जानकारी ले सकते हैं।

चलती-फिरती पुल निरीक्षण इकाइयों का शुभारंभ

भारतीय रेलवे ने ज्यादा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पुलों के निरीक्षण के लिए अपने हाईटेक संचालन के रूप में चलती-फिरती पुल निरीक्षण इकाइयां (एमबीआईयू) शुरू की  है। इन चलती-फिरती पुल इकाइयों के प्रयोग में आने वाले क्रेन जर्मनी से आयात किए गए हैं। इन एमबीआईयू को वाहन और बिजली इकाइयां रेल मंत्रालय के सार्वजनिक उपक्रम रेल कोच फैक्ट्री, कपूरथला ने उपलब्ध कराई हैं। हर एमबीआईयू पर करीब आठ करोड़ रूपए का खर्च आया है।  2 एमबीआईयू हाल ही में भारतीय रेलवे में शुरू की गयी हैं, एक उत्तरी रेलवे और दूसरी मध्य रेलवे में।

रेलवे ने ऊर्जा संरक्षण पुरस्कार हासिल किए

रेल मंत्रालय ने एक और गौरवपूर्ण उपलब्धि हासिल की, उसके तीन जोनों को वर्ष 2009 में राष्ट्रीय ऊर्जा संरक्षण पुरस्कारों में से चार पुरस्कार मिले। रेल क्षेत्र में, पश्चिमी रेलवे, जिसका मुख्यालय मुम्बई (महाराष्ट्र) है, को पहला पुरस्कार, उत्तरी पूर्वी रेलवे , जिसका मुख्यालय गोरखपुर (उत्तरप्रदेश) है, को दूसरा पुरस्कार मिला तथा पश्चिमी मध्य रेलवे जिसका मुख्यालय जबलपुर (मध्यप्रदेश) है, को मेधा प्रमाणपत्र मिला। कार्यालय भवन के क्षेत्र में, पश्चिमी मध्य रेलवे ने अपने महाप्रबंधक भवन के लिए एक बार फिर प्रथम पुरस्कार हासिल किया।

ई-खरीददारी प्रणाली का शुभारंभ

ई-खरीददारी प्रणाली का लक्ष्य भारतीय रेलवे की खरीददारी व्यवस्था में पारदर्शिता सुनिश्चित करना है। भारतीय रेलवे के लिए ई-खरीददारी आवेदन

(www.ireps.gov.in) क्रिस द्वारा 13 जोनोंउत्पादन इकाइयों के लिए सफलतापूर्वक शुरू किए गए हैं। अबतक रेलवे 44192 ई-निविदाएं अपलोड कर चुका है और 14 दिसंबर, 2009 तक 39485 ई निविदाएं खोली गयी हैं।

रेलवे भर्ती बोर्डों को नया रूप दिया जाना

रेलवे मंत्रालय ने रेलवे भर्ती बोर्डों (आरआरबी) को नया रूप देने के लिए कई कदम उठाए हैं। किसी खास पद के लिए सभी आरआरबी द्वारा एक ही तिथि को परीक्षा आयोजित किये जाने का निर्णय लिया गया है। आरआरबी परीक्षा का प्रश्नपत्र हिंदी, अंग्रेजी और ऊर्दू के अलावा संविधान की अष्टम सूची में दर्ज अन्य स्थानीय भाषाओं में छापे जाएं जो उक्त आरआरबी के अधिकार क्षेत्र में आता है।

बेहतर चिकित्सा देखभाल के लिए अभिनवकारी पहल

रेल मंत्रालय ने मौजूदा रेलवे अस्पतालों के अंतर्गत ही मिलकर रेलवे भूमि पर  सार्वजनिक निजी साझेदारी के माध्यम से मेडिकल एवं नर्सिंग कॉलेज खोलने का फैसला किया है जिसमें रेलवे कर्मचारियों के बच्चों को प्रवेश दिया जाएगा। इसके लिए पांच स्थानों-कंचनपारा, खड़गपुर, कोलकाता, चेन्नई और गुवाहाटी का चयन किया गया है। इससे डाक्टरों और नर्सों की कमी दूर होगी। चिकित्सा सेवाओं में सुधार के लिए सीनियर रेसीडेंसी और डीएनबी कार्यक्रम (स्नातकोत्तर अध्ययन) भी रेलवे अस्पतालों में शुरू किया गया है।

कैंसर रोगियों के लिए किराया रियायत में वृध्दि

जैसा कि रेलमंत्री ममता बनर्जी ने अपने बजट भाषण 2011-12 में घोषणा की थी,उसपर अमल करते हुए रेल मंत्रालय ने थ्री एसी और शयनयान श्रेणियों में कैंसर रोगियों के लिए रियायत 75 प्रतिशत से बढाक़र शत प्रतिशत करने का फैसला किया है। हालांकि कैंसर रोगी के साथ ट्रेन में सफर करने वाले दूसरे यात्री के लिए 75 फीसदी की रियायत में कोई तब्दीली नहीं की गयी है। यह 20 अप्रैल, 2010 से प्रभावी हो गया है। कैंसर रोगियों और उसके साथ जाने वाले को मान्यताप्राप्त अस्पतालों में इलाज कराने या जांच कराने के लिए आने एवं जाने पर यह रियायत प्राप्त होगी।

पीपीपी को बढावा देने के लिए रेलवे का प्रयास

रेल मंत्रालय द्वारा निजी भागीदारी को आकर्षित करने के लिए एक अभिनव पहल के रूप में एक कार्याशाला आयोजित की गयी जिसमें वाणिज्य एवं उद्योग मंडल के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। इस प्रकार रेल मंत्रालय निजी साझेदारी से जुड़ी नीतिगत पहलों के बारे में उनकी रायों से अवगत हुआ।

खेलों में उपलब्धि

खेल के क्षेत्र में भारतीय रेलवे के खिलाड़ियों ने सन् 2009 के दौरान कई कीर्तिमान रचे हैं। उत्तर रेलवे के श्री रमेश कुमार ने डेनमार्क में 2009 में हुए वरिष्ठ विश्व पहलवानी चैंपियनशिप में पदक जीता। इस चैंपियनशिप में 42 साल के बाद कोई भारतीय पहलवानी में पदक जीता है। आईसीएफ में कार्यरत चेस खिलाड़ी श्री आर आर लक्ष्मण चौंथी कोलकाता ओपेन ग्रांडमास्टर चेस टूर्नामेंट में खेलकर भारत के नवीनतम ग्रांडमास्टर बने हैं। वह भारतीय रेलवे में पहले ऐसे सख्श हैं जिन्हें यह एक नया सम्मान मिला है। गुड़गांव में दो से सात सितंबर तक हुए वर्ल्ड पावरलिपिंऊटग चैंपियनशिप में पश्चिमी रेलवे के श्री पी सुरेश और दक्षिण पूर्व रेलवे के श्री राणा श्याम सिंह ने क्रमश: रजत और कांस्य पदक जीते हैं। इसके अलावा भी रेलवे कर्मचारियों ने कई अन्य प्रतिस्पर्धाओं में अच्छा प्रदर्शन किया है।

उत्पादकता से संबध्द बोनस में वृध्दि

वित्तीय वर्ष 2008-09 के लिए रेलवे के सभी अराजपत्रित कर्मचारियों को  75 दिनों के वेतन के समतुल्य उत्पादकता संबध्द बोनस (पीएलबी) का भुगतान किया गया। इस योजना से करीब 13.05 लाख गैर राजपत्रित कर्मचारी लाभान्वित हुए। वर्ष 2008-09 के लिए भुगतान किया गया बोनस रेलवे द्वारा दिया गया अबतक का सबसे बड़ा बोनस है जो यह प्रदर्शित करता है कि उस वर्ष रेलवे का कामकाज अनोखा रहा।

00.

ध्वनि प्रदूषण : आकलन एवं नियंत्रणल

ध्वनि प्रदूषण और पर्यावरणीय शोर मानव और अन्य जीवों को कष्ट पहुंचा रहा है। अवांछित ध्वनि से मानव को शारीरिक एवं मानसिक समस्याएं होती हैं। यह उच्च रक्तचाप, उच्च मानसिक दबाव आदि कई बीमारियां पैदा करता है जिससे लोग भूलने, गंभीर अवसाद, नींद न आने और अन्य गंभीर प्रभावों की चपेट में आ जाते हैं।

शोर पशुओं के लिए भी बहुत घातक है क्योंकि इससे  उनमें भी मानसिक दबाव बढ जाता है और मृत्युदर बढ जाती है। शोर की वजह से कई बार हिंसक जीव जहां अपना शिकार नहीं ढूंढ़ पाते हैं वहीं दूसरे जीव शिकार होने से बच नहीं पाते। पशु जीवन पर शोर का असर यह भी होता है कि उनका पर्यावास घट जाता है और संकटापन्न जीव विलुप्त होने के कगार पर पहुंच जाते हैं। ध्वनि प्रदूषण के घातक प्रभावों में से सबसे उल्लेखनीय एक प्रभाव यह है कि व्हेल की कुछ प्रजातियां शोर की वजह से मर जाती हैं।

दुनियाभर में घर से बाहर ध्वनि प्रदूषण के कारणों में निर्माण एवं परिवहण प्रणाली खासकर मोटर वाहन, विमान एवं रेल यातायात प्रमुख है। घटिया शहरी नियोजन के चलते भी ध्वनि प्रदूषण होता है क्योंकि  कई शहरों में औद्योगिक और आवासीय भवन आसपास होते हैं।

घर के अंदर और बाहर के ध्वनि प्रदूषणों में कार अलार्म, आपातकालीन सेवा साइरन, मशीनी उपकरण, पटाखे, कंप्रेस्ड एयर होर्न,उपकरण, बिजली के उपकरण, मेगाफोन आदि शामिल हैं।

शोर की वजह से अनेक जीव भी ऊंचा बोलते हैं जिसे लोम्बार्ड वोकल रिस्पोंस कहा जाता है। वैज्ञानिकों और अनुसंधानकर्ताओं के प्रयोग से पता चलता है कि जब पानी में कोई खोजपरक उपकरण होता है तब व्हेल मछलियां ऊंचा बोलती हैं।

शोर को ध्वनि (प्रदूषण की रोकथाम एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1981 के तहत ध्वनि प्रदूषकों की परिभाषा में शामिल किया गया है। पर्यावरण (सुरक्षा) अधिनियम, 1986 तथा वायु अधिनियम, 1981 के तहत पारिवेशिक मानक ध्वनि अधिसूचना में भी इसे शामिल किया गया है। इससे केंद्रीय, राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों और प्रदूषण नियंत्रण समितियों को ध्वनि प्रदूषण फैलाने वाले स्रोतों के खिलाफ उपयुक्त कदम उठाने में मदद मिलती है। विशिष्ट ध्वनि मानक के लिए निम्नलिखित स्रोत बताए गए हैं-

  • Ø मोटर वाहनों के लिए ध्वनि मानक: ये मानक विनिर्माण चरण में लागू होते हैं और इन्हें भूतल परिवहन मंत्रालय लागू करवाता है।
  • Ø डीजल जेनरेटर सेट के लिए ध्वनि मानक: संशोधित अधिसूचना में जेनरेटर सेटों (1000केवीए तक के) के लिए विनिर्माण चरण में ध्वनि मानक तय किए गए हैं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड विभिन्न प्रमाणन एजेंसियों की मदद से इन्हें लागू करवाता है। संशोधित अधिसूचना में पहली जनवरी, 2005 के पहले निर्मित और या 1000केवीए से अधिक की क्षमता वाले जेनरेटर सेटों के लिए ध्वनि मानक तय किए गए हैं।
  • Ø आतिशबाजी के लिए ध्वनि मानक: ये विनिर्माण चरण में ही लागू होते हैं। विस्फोटक विभाग (जो अब पेट्रोलियम एवं विस्फोटक सुरक्षा संगठन के नाम से जाना जाता है) इन मानकों के लिए कार्यान्वयन एजेंसी है।

इन मानकों के अलावा, पारिवेशिक ध्वनि मानक तय करने एवं लाऊडस्पीकरों के कारण होने वाले शोर को विनियमित करने के लिए ध्वनि प्रदूषण (विनियमन एवं नियंत्रण) नियमावली, 2000 अधिसूचित की गयी है। इसके तहत ध्वनि को विनियमित करने के लिए जिला अधिकारी, पुलिस आयुक्त या पुलिस उपाधीक्षक स्तर का कोई भी अधिकारी कार्रवाई करने के लिए अधिकृत है।  वायु अधिनियम, 1981 तथा पर्यावरण (सुरक्षा) अधिनियम, 1986 के प्रावधानों के अलावा फैक्ट्री अधिनियम 1948 के तहत भी कार्यस्थलों पर अधिकतम मान्य शोर का प्रावधान है।

ध्वनि प्रदूषण पर एक राष्ट्रीय समिति गठित की गयी है जो केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को ध्वनि प्रदूषण से संबंधित मामलों पर उपयुक्त सलाह देती है। सीपीसीबी और दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति दिल्ली में पारिवेशिक ध्वनि स्तर पर निगरानी रखती है। चेन्नई, कोलकाता, मुम्बई, तथा अन्य शहरों में भी संबंधित राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और पीसीसी द्वारा उत्सवों के अवसरों पर ध्वनि के स्तर की निगरानी की जाती है।

00.

महिला सशक्तिकरण: समान अधिकार, समान अवसर
भारत में महिलाओं की स्थिति में एक बहुत बड़ा बदलाव आ रहा है। महिलाओं की मर्यादा और उनके लिए समान अवसर सुनिश्चित करने की संवैधानिक गारंटी के साथ ही शिक्षा, राजनीति,खेलेकूद आदि विभिन्न क्षेत्रों में उनकी सक्रिय भागीदारी लगातार बढ रही है। राष्ट्र निर्माण गतिविधियों में महिलाओं की भूमिका को ध्यान में रखते हुए सरकार ने वर्ष 2001 को महिला सशक्तिकरण वर्ष घोषित किया था और महिलाओं को स्वशक्ति प्रदान करने की राष्ट्रीय नीति अपनायी थी। महिलाओं को सामाजिक, आर्थिक, कानूनी और राजनीतिक रूप से मजबूत बनाने के लिए कई कानून बनाए गए हैं।  देश के मेरूदंड, ग्रामीण भारत की भूमिका को ध्यान में रखते हुए सरकार ने महिलाओं की सक्रिय भागीदारी के साथ पंचायती राज प्रणाली को सशक्त बनाने के लिए कई कदम उठाए हैं। इससे कई महिलाओं को लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में निर्वाचित होने का प्रोत्साहन मिला है जो उनके राजनीतिक सशक्तिकरण का संकेत है।

महिला सशिक्तकरण-2001 के लिए राष्ट्रीय नीति

महिला-पुरूष समानता के सिध्दांत को भारतीय संविधान की प्रस्तावना, मौलिक अधिकारों, राज्यों के लिए नीति निर्देशक तत्वों में ही प्रतिष्ठापित किया गया है। संविधान न केवल महिलाओं के लिए समानता की गारंटी प्रदान करता है बल्कि राज्य को महिलाओं के पक्ष में सकारात्मक कदम उठाने का हक भी प्रदान करता है। पांचवीं पंचवर्षीय योजना (1974-78) के समय से ही भारत महिलाओं के सशक्तिकरण को समाज में उनकी  स्थिति निर्धारित करने के लिए केंद्रीय मुद्दे के रूप में लेकर चल रहा   है और सरकार महिला मुद्दे को कल्याण से लेकर विकास के रूप में लाकर अपने दृष्टिकोण में एक बहुत बड़ा बदलाव लाया है। महिलाओं के अधिकारों और कानूनी हकों को सुरक्षा प्रदान करने के लिए सन् 1990 में संसद के एक अधिनियम द्वारा राष्ट्रीय महिला आयोग की स्थापना की गयी। पंचायतों और नगर निगमों में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित करने के लिए सन् 1993 में 73 वां और 74 वां संविधान संशोधन किया गया। इस प्रकार स्थानीय स्तर पर निर्णय लेने की प्रक्रिया में उनकी सक्रिय भागीदारी की आधारशिला रखी गयी। भारत ने महिलाओं को समान अधिकार प्रदान करने वाले विभिन्न अंतरराष्ट्रीय समझौतों और संधिपत्रों को भी अनुमोदित किया है। उनमें सन 1993 में महिलाओं के खिलाफ सभी प्रकार के भेदभाव के उन्मूलन संबंधी संधिपत्र का अनुमोदन सबसे प्रमुख है।

लक्ष्य एवं उद्देश्य

राष्ट्रीय नीति का लक्ष्य महिलाओं की उन्नति, विकास और सशक्तिकरण सुनिश्चित करना है। उसके उद्देश्यों में महिलाओं के विकास के लिए सकारात्मक आर्थिक एवं सामाजिक नीतियों के माध्यम से ऐसा अनुकूल माहौल तैयार करना है जिससे महिलाएं अपनी क्षमता को साकार कर सकें तथा स्वास्थ्य देखभाल, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, रोजगार, समान पारिश्रमिक एवं सामाजिक सुरक्षा का लाभ उठा सकें। उनमें महिलाओं और बालिकाओं के खिलाफ सभी प्रकार के भेदभाव एवं हिंसा का उन्मूलन तथा सामाजिक दृष्टिकोण में  बदलाव भी सुनिश्चित करना शामिल है।

महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए राष्ट्रीय मिशन

सरकार ने महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए इस वर्ष राष्ट्रीय मिशन की स्थापना की है और आठ मार्च, 2010 को इसकी अधिसूचना जारी की गयी। मिशन का लक्ष्य महिला केंद्रित कार्यक्रमों को मिशन के रूप में लागू करना है। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय गरीब और हाशिए पर रहने वाली महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के लिए महिला प्रशिक्षण एवं रोजगार कार्यक्रम को सहयोग दे रहा है। इस योजना का लक्ष्य महिलाओं का कौशल उन्नयन, उद्यमिता कौशल का विकास, संपत्ति सृजन और उन्हें छोटे व्यवहारिक समूहों में एकजुट करना है ताकि लाभार्थी महिलाएं  रोजगार सह आय सृजन गतिविधियां शुरू कर सकें। मंत्रालय ने सबसे अधिक प्रभावित महिलाओं को  समग्र और संपोषणीय तरीके से मजबूत करने के लिए प्रियदर्शिनी नामक योजना भी शुरू की है और वह  महिलाओं को स्वयं सहायता समूह बनाकर और उनके लिए कौशल उन्नयन कार्यक्रम चलाकर उनकी सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, कानूनी एवं स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के हल में जुटा हुआ है।

स्वर्णजयंती ग्राम स्वरोजगार योजना

मंत्रालय केंद्र प्रायोजित योजना भी लागू कर रहा है। स्कीम का डिजायन ग्रामीण क्षेत्र में गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले परिवारों को स्वरोजगार और आय सृजन गतिविधियां शुरू करने के वास्ते प्रोत्साहित करने के लायक बनाया गया है। सबसे अधिक प्रभावित रहने वाले वर्गों को विशेष सुरक्षा प्रदान की गयी जिसके तहत अनुसूचित जातिजनजाति को 50 फीसदी, महिलाओं को 40 फीसदी, अल्पसंख्यकों को 15 फीसदी तथा विकलांगों को तीन फीसदी का आरक्षण प्रदान किया गया है। इसे शुरू किये जाने से लेकर अबतक 37 लाख स्वयं सहायता समूह बनाए गए हैं और 134 लाख स्वरोजगारियों को लाभ पहुंचाया गया है जिसमें से करीब 70 लाख (52फीसदी) महिलाएं हैं। राष्ट्रीय महिला कोष असंगठित क्षेत्र में स्वयं सहायता समूह के तहत संगठित महिलाओं को आय सृजन के लिए लघु त्रऽण प्रदान करता है।

भारत दृष्टिकोण 2020

भारत दृष्टिकोण 2020 दस्तावेज ने श्रमबल में महिलाओं की चर्चा करते हुए इसका उल्लेख भी किया है कि कामकाजी महिलाओं के लिए सुरक्षित बाल देखभाल सेवाएं बहुत जरूरी है। योजना आयोग के ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना दस्तावेज में महिला एवं बाल विकास के लिए कई योजनाएं और कार्यक्रम शामिल किए गए हैं। इसमें कामकाजी महिलाओं के बच्चों के लिए असंगठित क्षेत्र में पालना की स्थापना करने तथा मौजूदा राजीव गांधी राष्ट्रीय पालना योजना को नया स्वरूप दिये जाने पर बल दिया गया है।

महिलाओं के लिए हेल्पलाइन

सन् 2001 की जनगणना के मुताबिक देश में करीब तीन करोड़ 43 लाख विधवाएं और 23 लाख 40 हजार तलाकशुदा और परित्यक्त महिलाएं हैं। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय आश्रय आधारित स्वधार और शोर्ट स्टे होम्स योजनाएं चला रही हैं जिनके तहत मुश्किल समय से गुजर रही महिलाओं को सहयोग प्रदान करने के लिए क्रियान्वयन एजेंसियों को वित्तीय सहायता दी जाती है। सामाजिक एवं अधिकारिता मंत्रालय द्वारा वृध्दों के लिए चलायी जा रही समेकित योजना के तहत गैर सरकारी संगठनों को वृध्द विधवाओं के लिए बहुसुविधा परक देखभाल केंद्र चलाने के लिए वित्तीय मदद दी जाती है। ग्रामीण विकास मंत्रालय इंदिरा गांधी राष्ट्रीय विधवा पेंशन योजना और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वृध्दा पेंशन योजना चला रहा है जिनके तहत गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाली 40 से 64 वर्ष की विधवाओं को 200 रूपये मासिक पेंशन दिये जाने के लिए केंद्रीय सहायता प्रदान की जाती है।

महिला नेतृत्व सम्मेलन 2010

मंत्रालय ने राष्ट्रीय महिला दिवस समारोह के अवसर पर इस वर्ष छह मार्च को नई दिल्ली में महिला नेतृत्व सम्मेलन का आयोजन किया। इसका उद्धाटन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने किया था। सम्मेलन का उद्देश्य सशक्त महिलाओं, जिन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रदर्शन किया है, को दुनिया के सम्मुख लाना था।  सम्मेलन का मुख्य ध्येयवाक्य समग्र वृध्दि और ग्रामीण भारत की महिलाओं का सशक्तिकरण था। उपलब्धि हासिल करने वाली कई महिलाओं ने कोरपोरेट, वित्तीय सेवाएं, कृषि, विज्ञान, मीडिया, पंचायती राज, खेलकूद, संस्कृति, शिक्षा और कानून जैसे विविध क्षेत्रों में चुनौतियों और अवसरों पर अपने विचार रखे।

सरकार की 100 दिनों की कार्य योजना

100 दिनों की कार्ययोजना के रूप में सरकार ने महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढाने के लिए कई उपायों का प्रस्ताव रखा था। इसमें पंचायतों और शहरी निकायों में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण प्रदान करने तथा सरकारी नौकरियों में प्रतिनिधित्व बढाने के लिए संविधान संशोधन का भी प्रस्ताव रखा है।

महिला विरोधी गतिविधियों के खिलाफ भारत का अभियान

सरकार महिलाओं के साथ हुए अन्याय के खिलाफ अभियान जारी रखकर उन्हें भारत में उचित दर्जा प्रदान करने के लिए कई कठोर कदम उठाती आ रही है। उनमें घरेलू हिंसा के खिलाफ सुरक्षा, बच्चों और महिलाओं के खिलाफ अपराध, मानव तस्करी, कार्यस्थलों पर यौन उत्पीड़न पर रोकथाम, महिलाओं और बच्चों द्वारा भिक्षावृति, दहेज मामलों में उत्पीड़न का उन्मूलन, महिलाओं और बच्चों में कुपोषण दूर करना, बलात्कार पीड़ित महिलाओं को राहत एवं पुनर्वास प्रदान करना शामिल है। केंद्र सरकार ने वित्तीय वर्ष 2010-11 के लिए महिला एवं बाल विकास मंत्रालय को 11,000 करोड़ रूपए आवंटित किए हैं जो पिछले वित्तीय वर्ष के 7350 करोड़ रूपए बजट अनुमान से करीब करीब 50 फीसदी ज्यादा है।

૦૦.
भारतीय रुपए की विकास यात्रा
भारतीय रुपए के लिए 15 जुलाई, 2010 का दिन एक ऐतिहासिक दिन कहलाएगा। इसी दिन भारतीय रुपये को भी विष्व की अन्य प्रमुख मुद्राओं की भांति अलग पहचान मिली। डॉलर, यूरो, पौंड और येन की तरह अब रुपये को भी नया प्रतीक मिल गया है। रुपये का नया प्रतीक देवनागरी लिपि के ‘र’ और रोमन लिपि के ‘आर’ को मिला कर बना है। अभी तक रुपये की अभिव्यक्ति विभिन्न भाषाओं में अलग-अलग संक्षिप्ताक्षरों में की जाती थी।

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आई आई टी), मुम्बई के पोस्ट ग्रेजुएट श्री डी. उदय कुमार द्वारा रचित रुपये के नए प्रतीक का अनुमोदन केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने 15 जुलाई को कर दिया। मंत्रिमंडल के निर्णय के बारे में पत्रकारों को जानकारी देते हुए केन्द्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री श्रीमती अंबिका सोनी ने कहा कि भारतीय मुद्रा के लिए यह एक बड़ी उपलब्धि है। यह प्रतीक भारतीय मुद्रा को एक विषिष्ट पहचान और चरित्र प्रदान करेगा। यह भारतीय अर्थव्यवस्था को एक नया वैष्विक चेहरा पेष करने के अतिरिक्त उसे सुदृढ़ता भी प्रदान करेगा।

नया प्रतीक न तो नोटों पर छापा जाएगा और न ही उसे सिक्कों में ढाला जाएगा। इसे यूनिकोड स्टैंडर्ड’ में शामिल किया जाएगा, ताकि यह सुनिष्चित किया जा सके कि इसे इलेक्ट्रानिक और प्रिंट मीडिया में आसानी से प्रदर्षित और मुद्रित किया जा सके। भारतीय मानक में रुपये के प्रतीक की इनकोडिंग (कूटांकन) में संभवत: 6 महीने का समय लगेगा, जबकि यूनिकोड और आई एस ओ#आई ई सी 10646 में इनकोडिंग के लिए डेढ़ से दो साल गने का अनुमान है। भारत में प्रयुक्त कीबोर्डों और साफ्टवेयर पैकेजों में इसे समाविष्ट किया जाएगा।

पांच मार्च 2009 को सरकार ने रुपये का प्रतीक चिह्न तैयार करने के लिए एक प्रतियोगिता की घोषणा की। भारतीय संस्कृति और स्वभाव को परिलक्षित और प्रतिबिम्बित करने वाली प्रविष्टियां देष भर से आमंत्रित की गईं। तीन हजार से अधिक प्रविष्टियां प्राप्त हुईं। जिनका मूल्यांकन भारतीय रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर की अध्यक्षता वाले एक निर्णायक मंडल ने किया। निर्णायक मंडल में कला और अभिकल्पन संस्थाओं के तीन प्रतिष्ठित विशेषज्ञ भी शामिल थे। उसने पांच प्रविष्टियों का चुनाव कर अपनी टिप्पणियों के साथ अंतिम निर्णय के लिए सरकार के पास भेज दिया।

श्री उदय कुमार की प्रविष्टि को इन पांचों में सर्वश्रेष्ठ पाया गया। उन्हें ढाई लाख रुपये का पुरस्कार तो मिलेगा ही, बल्कि उससे भी अधिक रुपये के प्रतीक चिह्न की रचना करने वाले व्यक्ति के तौर पर भारी प्रसिध्दि भी मिलेगी। अपनी प्रविष्टि के चयन से प्रसन्न उदय ने कहा कि ‘मेरी डिजाइन (रूपांकन) भारतीय (देवनागरी) लिपि के ‘र’ और रोमन लिपि के ‘आर’ का आदर्श मिश्रण है। भारतीय रुपये का प्रतिनिधित्व करने वाला यह प्रतीक भारतीय और अन्तर्राष्ट्रीय (गुण ग्राहको) सभी को अपील करेगा। यह भारतीय तिरंगे से प्रेरित है। ऊपर दो लाइनें दी गई हैं और बीच में रिक्त स्थान रखा गया है।’

रुपया शब्द की उत्पत्ति संस्कृत भाषा के शब्द ‘रौप्य’ से हुई है, जिसका अर्थ होता है, चांदी। भारतीय रुपये को हिंदी में ‘रुपया,’ गुजराती में रुपयों, तेलगू और कन्नड़ में ‘रूपई’, तमिल में ‘रुबाई’ और संस्कृत में ‘रुप्यकम’ कहा जाता है, परन्तु पूर्वी भारत में, बंगाल और असमिया में टका#टॉका और तथा ओड़िया में ‘टंका’ कहा जाता है।

भारत की गिनती उन गिने चुने देशों में होती है जिसने सबसे पहले सिक्के जारी किए। परिणामत: इसके इतिहास में अनेक मौद्रिक इकाइयों (मुद्राओं) का उल्लेख मिलता है। इस बात के कुछ ऐतिहासिक प्रमाण मिले हैं कि पहले सिक्के 2500 और 1750 ईसा पूर्व के बीच कभी जारी किए गए थे। परन्तु दस्तावेजी प्रभाव सातवीं#छठी शताब्दी ईसा पूर्व के बीच सिक्कों की ढलाई के ही मिले हैं। इन सिक्कों के निर्माण की विशिष्ट तकनीक के कारण इन्हें पंच मार्क्ड सिक्के कहा जाता है।

अगली कुछ सदियों के दौरान जैसे-जैसे साम्राज्यों का उदय और पतन हुआ तथा परम्पराओं का विकास हुआ, देश की मुद्राओं में इसका प्रगति-क्रम दिखाई देने लगा। इन मुद्राओं से प्राय: तत्कालीन राजवंश, सामाजिक-राजनीतिक घटनाओं, आराहय देवों और प्रकृति का परिचय मिलता था। इनमें इंडो-ग्रीक (भारत-यूनान) काल के यूनानी देवताओं और उसके बाद के पश्चिमी क्षत्रप वाली तांबे की मुद्रायें शामिल हैं जो पहली और चौथी शताब्दी (ईसवीं) के दौरान जारी की गई थी।

अरबों ने 712 ईसवीं में भारत के सिंघ प्रांत को जीत कर उस पर अपना प्रमुख स्थापित किया। बारहवीं शताब्दी तक दिल्ली के तुर्क सुल्तानों ने लंबे समय से चली आ रही अरबी डिजाइन को हटाकर उनके स्थान पर इस्लामी लिखावटों को मुद्रित कराया। इस मुद्रा को ‘टंका’ कहा जाता था। दिल्ली के सुल्तानों ने इस मौद्रिक प्रणाली का मानकीकरण करने का प्रयास किया और फिर बाद में सोने, चांदी और तांबे की मुद्राओं का प्रचलन शुरू हो गया।

सन् 1526 में मुगलों का शासन काल शुरू होने के बाद समूचे साम्राज्य में एकीकृत और सुगठित मौद्रिक प्रणाली की शुरूआत हुई। अफगान सुल्तान शेरशाह सूरी (1540 से 1545) ने चांदी के ‘रुपैये’ अथवा रुपये के सिक्के की शुरूआत की। पूर्व-उपनिवेशकाल के भारत के राजे-रजवाड़ों ने अपनी अलग मुद्राओं की ढलाई करवाई, जो मुख्यत: चांदी के रुपये जैसे ही दिखती थीं, केवल उन पर उनके मूल स्थान (रियासतों) की क्षेत्रीय विशेषतायें भर अंकित होती थीं।

अट्ठाहरवीं शताब्दी के उत्तरार्ध्द में, एजेंसी घरानों ने बैंको का विकास किया। बैंक ऑफ बंगाल, दि बैंक ऑफ हिन्दुस्तान, ओरियंटल बैंक कार्पोरेशन और दि बैंक ऑफ वेस्टर्न इंडिया इनमें प्रमुख थे। इन बैंकों ने अपनी अलग-अलग कागजी मुद्रायें-उर्दू, बंगला और देवनागरी लिपियों में मुद्रित करवाई।

लगभग सौ वर्षों तक निजी और प्रेसीडेंसी बैंकों द्वारा जारी बैंक नोटों का प्रचलन बना रहा, परन्तु 1961 के पेपर करेंसी कानून बनने के बाद इस पर केवल सरकार का एकाधिकार रह गया। ब्रिटिश सरकार ने बैंक नोटों के वितरण में मदद के लिए पहले तो प्रेसीडेंसी बैंकों को ही अपने एजेंट के रूप में नियुक्त किया, क्योंकि एक बड़े भू-भाग में सामान्य नोटों के इस्तेमाल को बढ़ाया देना एक दुष्कर कार्य था। महारानी विक्टोरिया के सम्मान में 1867 में पहली बार उनके चित्र की श्रृंखला वाले बैंक नोट जारी किए गए। ये नोट एक ही ओर छापे गए (यूनीफेस्ड) थे और पांच मूल्यों में जारी किए गए थे।

बैंक नोटों के मुद्रण और वितरण का दायित्व 1935 में भारतीय रिजर्व बैंक के हाथ में आ गया। जार्ज पंचम के चित्र वाले नोटों के स्थान पर 1938 में जार्ज षष्ठम के चित्र वाले नोट जारी किए गए, जो 1947 तक प्रचलन में रहे। भारत की स्वतंत्रता के बाद उनकी छपाई बंद हो गई और सारनाथ के सिंहों के स्तम्भ वाले नोटों ने इन का स्थान ले लिया।

भारतीय रुपया 1957 तक तो 16 आनों में विभाजित रहा, परन्तु उसके बाद (1957) में ही उसने मुद्रा की दशमलव प्रणाली अपना ली और एक रुपये का पुनर्गन 100 समान पैसों में किया गया। महात्मा गांधी वाले कागजी नोटों की श्रृंखला की शुरूआत 1996 में हुई, जो आज तक चलन में है।

नकली मुद्रा की चुनौती से निपटने के लिए भारतीय रुपये के नोटों में सुरक्षा संबंधी अनेक विशेषताओं को समाहित किया गया है। नोटों के एक ओर सफेद वाले भाग में महात्मा गांधी का जल चिन्ह् (वाटर मार्क) बना हुआ है। सभी नोटों में चांदी का सुरक्षा धागा लगा हुआ है जिस पर अंग्रेजी में आर बी आई और हिंदी में भारत अंकित है। प्रकाष के सामने लाने पर इनको देखा जा सकता है। पांच सौ और एक हजार रुपये के नोटों में उनका मूल्य प्रकाष में परिवर्तनीय स्याही से लिखा हुआ है। धरती के समानान्तर रखने पर ये संख्या हरी दिखाई देती हैं परन्तु तिरछे या कोण से देखने पर नीले रंग में लिखी हुई दिखाई देती हैं।

भारतीय रुपये के नोट के भाषा पटल पर भारत की 22 सरकारी भाषााओं में से 15 में उनका मूल्य मुद्रित है। ऊपर से नीचे इनका क्रम इस प्रकार है-असमिया, बंगला, गुजराती, कन्नड़, कष्मीरी, कोंकणी, मलयालम, मराठी, नेपाली, उड़िया, पंजाबी संस्कृत, तमिल, तेलुगु और उर्दू।

सरकारी मुद्रा को रुपया कहा जाता है, जो भारत, भूटान, पाकिस्तान, श्रीलंका, नेपाल, मॉरिषस, मालदीव और इंडोनेषिया सहित कई देषों में प्रचलित हैं। इन सभी देषों में भारतीय रुपया, मूल्य, स्वीकार्यता और लोकप्रियता के हिसाब से सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है।

नया प्रतीक चिन्ह पाने के साथ ही भारतीय रुपया अब विष्व की प्रमुख मुद्राओं-डॉलर, यूरो, पौंड और येन के साथ आ खड़ा हुआ है। नया प्रतीक आत्मविष्वास से परिपूर्ण नए भारत के अभ्युदय का भी प्रतीक है, जो अब वैष्विक अर्थव्यवस्था में एक विषेष जगह बना चुका है।

* मनीष देसाई

निदेशक (मीडिया) पत्र सूना कार्यालय, मुम्बई

***
धरती विज्ञान मंत्रालय का स्थापना दिवस
तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 27 जुलाई, 1981 को सागर विकास विभाग का गठन यह देखते हुए ही किया था कि भारत के लगभग 7500 कि.मी. लंबे तटवर्ती क्षेत्र की करीब 37 प्रतिशत जनसंख्या की आजीविका समुद्रों पर ही निर्भर है। शुरू में इसका गठन एक स्वतंत्र वैज्ञानिक विभाग के रूप में किया गया था। फरवरी 2006 में इसका उन्नयन कर सागर विकास मंत्रालय बना दिया गया। यह देखते हुए कि सागर, पर्यावरण, और धरती विज्ञान को एक समेकित दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है, सरकार ने धरती विज्ञान मंत्रालय (एम ओ ई एस) के गठन का विचार किया और 12 जुलाई 2007 को यह मंत्रालय विधिवत रूप से अस्तित्व में आ गया। इस मंत्रालय के अंतर्गत सागर विकास विभाग, भारतीय मौसम विज्ञान विभाग, भारतीय उष्णकटिबंघीय मौसम विज्ञान संस्थान और राष्ट्रीय मध्यम क्षेत्र मौसम पूर्वानुमान केन्द्र आते हैं।

धरती विज्ञान मंत्रालय का उद्देश्य मौसम विभाग, जलवायु, पर्यावरण और भूकंप विज्ञान के मौजूदा राष्ट्रीय कार्यक्रमों से संबध्द धरती प्रणाली के प्रमुख अवयवों के परस्पर जटिल संबंधों के अध्ययन के लिए एक अनुकूल ढांचा तैयार करना है। मंत्रालय को जो दायित्व सौंपा गया है, उसके अनुसार विश्वस्तरीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी संसाधनों का उपयोग करते हुए और मौसम की जानकारियों, सागर की स्थिति, भूकंप, सुनामी और धरती प्रणाली से संबंधित अन्य विलक्षण स्थितियों की संभव श्रेष्ठतम जानकारियां राष्ट्र को प्रदान करना है। इसके अतिरिक्त, मंत्रालय समुद्री संसाधनों (सजीव और निर्जीव) की खोज और दोहन से जुड़े विज्ञान और प्रौद्योगिकी का कार्य देखता है। इसके साथ ही अंटार्कटिक#आर्कटिक तथा दक्षिणी सागर अनुसंधान में केन्द्रीय भूमिका भी निभाता है। समुद्र में तेल के रिसाव, चक्रवात, तूफान तथा सुनामी की चेतावनी देने के मामले में भी इस मंत्रालय की केन्द्रीय भूमिका होती है।

पिछले दो दशकों के दौरान, मंत्रालय को जो कार्य सौंपें गए हैं, उनमें अनेक सफलतायें अर्जित की गई हैं। मंत्रालय भविष्य में भी और ऊँचाइयां छूने के लिए तत्पर है। प्रतिदिन दस लाख लीटर खारे पानी को पीने योग्य बनाने वाले संयंत्र का सफल प्रदर्शन, आई एन सी ओ आई एस, हैदराबाद में सुनामी की पूर्व चेतावनी देने वाले केन्द्र की स्थापना, अंटार्कटिक के 28 सफल वैज्ञानिक अभियान आर्कटिक में वैज्ञानिक अभियान की शुरूआत, समुद्र में गहरी खुदाई का विकास आदि मंत्रालय की कुछ सफल कहानियां हैं।

इस महत्वपूर्ण क्षेत्र के बारे में चेतना पैदा करने और शुरू की जा रही राष्ट्रीय महत्व की परियोजनाओं की गतिविधियों की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए यह आवश्यकता महसूस की गई कि प्रति वर्ष 27 जुलाई को मंत्रालय का स्थापना दिवस मनाया जाए। तदनुसार, 2004 से इसी दिन धरती विज्ञान मंत्रालय का स्थापना दिवस मनाया जाता है।

खारे पानी का खारापन दूर कर उसे पीने योग्य बनाना एक महत्वकांक्षी कार्यक्रम है। धरती विज्ञान मंत्रालय ने पानी का खारापन दूर करने के लिए तकनीकी और आर्थिक रूप से उपयोगी समाधान खोजने के क्षेत्र में काफी काम किया है। निम्न तापमान तापीय विलवणीकरण (एल टी टी डी) और अन्य पारंपरिक विलवणीकरण प्रक्रियाओं के जरिए समुद्री जल का खारापन दूर किया जाता है। मंत्रालय के अधीन आने वाले राष्ट्रीय सागर प्रौद्योगिकी संस्थान (एन आई ओ टी) ने 5 एम3 प्रतिदिन क्षमता वाला प्रयोगशाला स्तर का प्रादर्श (मॉडल) लक्षद्वीप के कवारत्ती द्वीप स्थित 100 एम3 प्रतिदिन क्षमता का जमीनी संयंत्र और चेन्नई तट के समुद्र में नौकरूढ़ 1000 एम3 प्रतिदिन क्षमता का संयंत्र स्थापित किया है, जिनमें खारे पानी को पीने योग्य बनाया जाता है।

भारतीय राष्ट्रीय सागर सूचना सेवा केन्द्र (आई एन सी ओ आई एस) सागर विज्ञान, पर्यावरण विज्ञान, अंतरिक्ष अनुप्रयोग, सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वाली संस्थाओं की नेटवर्किंग से प्राप्त वैज्ञानिक ज्ञान को उपयोगी उत्पादों और सेवाओं में परिवर्तित करने का काम करता है। सुनामी की पूर्व चेतावनी देने वाला केन्द्र काम करने लगा है और अब तक 186 बड़े भूकंपों की वैज्ञानिक पड़ताल कर आवश्यक परामर्श जारी कर चुका है। केन्द्र ने सुनामी प्रेक्षण प्रणाली में सुधार भी किया है। सागर की स्थिति का पूर्वानुमान लगाने के काम और तदनुसार परामर्श जारी करने के कार्य में सुधार किया गया है। यह केन्द्र (आई एन सी ओ आई एस) हिंद महासागर क्षेत्र में तो अपनी अग्रणी भूमिका बनाए हुए ही है, हिंद महासागर वैश्विक निगरानी प्रणाली, अंतर्राष्ट्रीय कृषि जनित कार्य, अंतर्राष्ट्रीय महासागरीय आंकड़ा विनिमय आदि जैसे अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों में भी उल्लेखनीय योगदान दे रहा है। नए आंकड़ों उत्पादों एवं सेवाओं का विकास कर उपभोक्ता समुदायों को दिया गया है।

अंटार्कटिका के अनन्य वातावरण के वैज्ञानिक अनुसंधान और अन्वेषण के लिए 1981 से ही नियमित रूप से वैज्ञानिक अभियान चलाये जाते रहे हैं। यह क्षेत्र एक विशाल नैसर्गिक प्रयोगशाला जैसा है। भारत ने दक्षिण गंगोत्री में 1981 में और मैत्री में 1983 में दो केन्द्र स्थापित किए थे। अब तक 28 अभियान पूरे हो चुके हैं। पिछले अभियान में घंटे घंटे के अंतर पर मौसम का सारपरक प्रेक्षण और ओजोन तथा उसके पूर्ववर्तियों को समुद्र और ध्रुवीयसीमा की परत में व्यवहार का अध्ययन किया गया था। भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के अलावा पर्यावरण तथा जीव विज्ञान से संबध्द संस्थाओं के साथ-साथ भारतीय वन्य जीव संस्थान ने भी सागर अभियान के दौरान दुर्गम क्षेत्र का मानचित्र तैयार करने के अतिरिक्त सतह के नीचे बर्फ (हिम), मिट्टी (मृदा), जल निकाय, शैवाक और शैवाल का संग्रह तथा पक्षियों और स्तनपायी जीवों का निरीक्षण किया है।

आर्कटिक अभियानों के दौरान आर्कटिक के जल और तलहटी के जल में पाए जाने वाले कीटाणुओं (वैक्टीरिया) की विविधता को दर्शाने वाले वैज्ञानिक पहलुओं का अध्ययन भी किया जाता रहा है।

भारत पहला ऐसा अन्वेषक निवेशक देश है जिसे इंटरनेशनल सी-बेड अथारिटी (सी आई ओ वी) ने सेंट्रल इंडियन ओशन बेसिन में 1,50,000 वर्ग किलो मीटर का क्षेत्र आवंटित किया है। सागरों में खनिजों, तेल, भोजन और ऊर्जा के भारी भंडार छिपे होते हैं। भारत ने अधिकतम 5256 मीटर की गहराई तक खोज करने में सफलता हासिल की है और सुदूर नियंत्रित वाहन (आर ओ वी) के जरिए मैंगनीज पिंड के नमूने इकट्ठा किए हैं। यह पहली बार है जब कोई आर ओ वी पांच हजार मीटर से अधिक की गहराई में सेंट्रल इंडियन ओशन बेसिन (मध्य हिंद महासागर के थाले) में गया हो। मंगलोर के तट के पास स्थित सागर अनुसंधान पोत सागरनिधि में पॉली मेटलिक नोडयूल (पी एम एन) का पात्रता परीक्षण पहली अप्रैल 2010 को किया गया और शुरू में आर ओ वी को 1250 मीटर की गहराई में उतार कर उसे आजमाया गया। आर ओ वी जब 5256 की अधिकतम गहराई तक पहुंचा तो कुछ विद्युतीय समस्यायें महसूस की गई, परंतु उन्हे शीघ्र ही दूर कर दिया और आर ओ वी को डेक पर ले आया गया। अल्पावधि जलवायु की भविष्यवाणी और क्लाउड एरोसॉल इंट्रेक्शन और प्रेसिपिटेशन इन्हासमेंट एक्सपेरिमेंट सी ए आई पी ई ई एक्स), भारतीय उष्ण कटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान की ऐसी दो योजनायें हैं जो सागर और पर्यावरण विज्ञान में इसे विश्व के उत्कृष्ट केन्द्र के रूप में स्थापित कर देंगी। मंत्रालय ने भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आई एम डी), राष्ट्रीय मध्यावधि मौसम पूर्वानुमान केन्द्र (एन सी एम आर डब्ल्यू एफ) और भारतीय उष्ण कटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान (आई आई टी एम) को साथ लेकर मौसम विज्ञान के विकास की दिशा में सकारात्मक कदम उठाया है।

(पसूका) ——————————————-

*उप निदेशक (एम एंड सी) पत्र सूचना कार्यालय, नई दिल्ली

**27 जुलाई धरती विज्ञान मंत्रालय का स्थापना दिवस है।

कल्पना पालखी वाला*

00.

धरती विज्ञान मंत्रालय का स्थापना दिवस तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 27 जुलाई, 1981 को सागर विकास विभाग का गठन यह देखते हुए ही किया था कि भारत के लगभग 7500 कि.मी. लंबे तटवर्ती क्षेत्र की करीब 37 प्रतिशत जनसंख्या की आजीविका समुद्रों पर ही निर्भर है। शुरू में इसका गठन एक स्वतंत्र वैज्ञानिक विभाग के रूप में किया गया था। फरवरी 2006 में इसका उन्नयन कर सागर विकास मंत्रालय बना दिया गया। यह देखते हुए कि सागर, पर्यावरण, और धरती विज्ञान को एक समेकित दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है, सरकार ने धरती विज्ञान मंत्रालय (एम ओ ई एस) के गठन का विचार किया और 12 जुलाई 2007 को यह मंत्रालय विधिवत रूप से अस्तित्व में आ गया। इस मंत्रालय के अंतर्गत सागर विकास विभाग, भारतीय मौसम विज्ञान विभाग, भारतीय उष्णकटिबंघीय मौसम विज्ञान संस्थान और राष्ट्रीय मध्यम क्षेत्र मौसम पूर्वानुमान केन्द्र आते हैं।

धरती विज्ञान मंत्रालय का उद्देश्य मौसम विभाग, जलवायु, पर्यावरण और भूकंप विज्ञान के मौजूदा राष्ट्रीय कार्यक्रमों से संबध्द धरती प्रणाली के प्रमुख अवयवों के परस्पर जटिल संबंधों के अध्ययन के लिए एक अनुकूल ढांचा तैयार करना है। मंत्रालय को जो दायित्व सौंपा गया है, उसके अनुसार विश्वस्तरीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी संसाधनों का उपयोग करते हुए और मौसम की जानकारियों, सागर की स्थिति, भूकंप, सुनामी और धरती प्रणाली से संबंधित अन्य विलक्षण स्थितियों की संभव श्रेष्ठतम जानकारियां राष्ट्र को प्रदान करना है। इसके अतिरिक्त, मंत्रालय समुद्री संसाधनों (सजीव और निर्जीव) की खोज और दोहन से जुड़े विज्ञान और प्रौद्योगिकी का कार्य देखता है। इसके साथ ही अंटार्कटिक#आर्कटिक तथा दक्षिणी सागर अनुसंधान में केन्द्रीय भूमिका भी निभाता है। समुद्र में तेल के रिसाव, चक्रवात, तूफान तथा सुनामी की चेतावनी देने के मामले में भी इस मंत्रालय की केन्द्रीय भूमिका होती है।

पिछले दो दशकों के दौरान, मंत्रालय को जो कार्य सौंपें गए हैं, उनमें अनेक सफलतायें अर्जित की गई हैं। मंत्रालय भविष्य में भी और ऊँचाइयां छूने के लिए तत्पर है। प्रतिदिन दस लाख लीटर खारे पानी को पीने योग्य बनाने वाले संयंत्र का सफल प्रदर्शन, आई एन सी ओ आई एस, हैदराबाद में सुनामी की पूर्व चेतावनी देने वाले केन्द्र की स्थापना, अंटार्कटिक के 28 सफल वैज्ञानिक अभियान आर्कटिक में वैज्ञानिक अभियान की शुरूआत, समुद्र में गहरी खुदाई का विकास आदि मंत्रालय की कुछ सफल कहानियां हैं।

इस महत्वपूर्ण क्षेत्र के बारे में चेतना पैदा करने और शुरू की जा रही राष्ट्रीय महत्व की परियोजनाओं की गतिविधियों की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए यह आवश्यकता महसूस की गई कि प्रति वर्ष 27 जुलाई को मंत्रालय का स्थापना दिवस मनाया जाए। तदनुसार, 2004 से इसी दिन धरती विज्ञान मंत्रालय का स्थापना दिवस मनाया जाता है।

खारे पानी का खारापन दूर कर उसे पीने योग्य बनाना एक महत्वकांक्षी कार्यक्रम है। धरती विज्ञान मंत्रालय ने पानी का खारापन दूर करने के लिए तकनीकी और आर्थिक रूप से उपयोगी समाधान खोजने के क्षेत्र में काफी काम किया है। निम्न तापमान तापीय विलवणीकरण (एल टी टी डी) और अन्य पारंपरिक विलवणीकरण प्रक्रियाओं के जरिए समुद्री जल का खारापन दूर किया जाता है। मंत्रालय के अधीन आने वाले राष्ट्रीय सागर प्रौद्योगिकी संस्थान (एन आई ओ टी) ने 5 एम3 प्रतिदिन क्षमता वाला प्रयोगशाला स्तर का प्रादर्श (मॉडल) लक्षद्वीप के कवारत्ती द्वीप स्थित 100 एम3 प्रतिदिन क्षमता का जमीनी संयंत्र और चेन्नई तट के समुद्र में नौकरूढ़ 1000 एम3 प्रतिदिन क्षमता का संयंत्र स्थापित किया है, जिनमें खारे पानी को पीने योग्य बनाया जाता है।

भारतीय राष्ट्रीय सागर सूचना सेवा केन्द्र (आई एन सी ओ आई एस) सागर विज्ञान, पर्यावरण विज्ञान, अंतरिक्ष अनुप्रयोग, सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वाली संस्थाओं की नेटवर्किंग से प्राप्त वैज्ञानिक ज्ञान को उपयोगी उत्पादों और सेवाओं में परिवर्तित करने का काम करता है। सुनामी की पूर्व चेतावनी देने वाला केन्द्र काम करने लगा है और अब तक 186 बड़े भूकंपों की वैज्ञानिक पड़ताल कर आवश्यक परामर्श जारी कर चुका है। केन्द्र ने सुनामी प्रेक्षण प्रणाली में सुधार भी किया है। सागर की स्थिति का पूर्वानुमान लगाने के काम और तदनुसार परामर्श जारी करने के कार्य में सुधार किया गया है। यह केन्द्र (आई एन सी ओ आई एस) हिंद महासागर क्षेत्र में तो अपनी अग्रणी भूमिका बनाए हुए ही है, हिंद महासागर वैश्विक निगरानी प्रणाली, अंतर्राष्ट्रीय कृषि जनित कार्य, अंतर्राष्ट्रीय महासागरीय आंकड़ा विनिमय आदि जैसे अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों में भी उल्लेखनीय योगदान दे रहा है। नए आंकड़ों उत्पादों एवं सेवाओं का विकास कर उपभोक्ता समुदायों को दिया गया है।

अंटार्कटिका के अनन्य वातावरण के वैज्ञानिक अनुसंधान और अन्वेषण के लिए 1981 से ही नियमित रूप से वैज्ञानिक अभियान चलाये जाते रहे हैं। यह क्षेत्र एक विशाल नैसर्गिक प्रयोगशाला जैसा है। भारत ने दक्षिण गंगोत्री में 1981 में और मैत्री में 1983 में दो केन्द्र स्थापित किए थे। अब तक 28 अभियान पूरे हो चुके हैं। पिछले अभियान में घंटे घंटे के अंतर पर मौसम का सारपरक प्रेक्षण और ओजोन तथा उसके पूर्ववर्तियों को समुद्र और ध्रुवीयसीमा की परत में व्यवहार का अध्ययन किया गया था। भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के अलावा पर्यावरण तथा जीव विज्ञान से संबध्द संस्थाओं के साथ-साथ भारतीय वन्य जीव संस्थान ने भी सागर अभियान के दौरान दुर्गम क्षेत्र का मानचित्र तैयार करने के अतिरिक्त सतह के नीचे बर्फ (हिम), मिट्टी (मृदा), जल निकाय, शैवाक और शैवाल का संग्रह तथा पक्षियों और स्तनपायी जीवों का निरीक्षण किया है।

आर्कटिक अभियानों के दौरान आर्कटिक के जल और तलहटी के जल में पाए जाने वाले कीटाणुओं (वैक्टीरिया) की विविधता को दर्शाने वाले वैज्ञानिक पहलुओं का अध्ययन भी किया जाता रहा है।

भारत पहला ऐसा अन्वेषक निवेशक देश है जिसे इंटरनेशनल सी-बेड अथारिटी (सी आई ओ वी) ने सेंट्रल इंडियन ओशन बेसिन में 1,50,000 वर्ग किलो मीटर का क्षेत्र आवंटित किया है। सागरों में खनिजों, तेल, भोजन और ऊर्जा के भारी भंडार छिपे होते हैं। भारत ने अधिकतम 5256 मीटर की गहराई तक खोज करने में सफलता हासिल की है और सुदूर नियंत्रित वाहन (आर ओ वी) के जरिए मैंगनीज पिंड के नमूने इकट्ठा किए हैं। यह पहली बार है जब कोई आर ओ वी पांच हजार मीटर से अधिक की गहराई में सेंट्रल इंडियन ओशन बेसिन (मध्य हिंद महासागर के थाले) में गया हो। मंगलोर के तट के पास स्थित सागर अनुसंधान पोत सागरनिधि में पॉली मेटलिक नोडयूल (पी एम एन) का पात्रता परीक्षण पहली अप्रैल 2010 को किया गया और शुरू में आर ओ वी को 1250 मीटर की गहराई में उतार कर उसे आजमाया गया। आर ओ वी जब 5256 की अधिकतम गहराई तक पहुंचा तो कुछ विद्युतीय समस्यायें महसूस की गई, परंतु उन्हे शीघ्र ही दूर कर दिया और आर ओ वी को डेक पर ले आया गया। अल्पावधि जलवायु की भविष्यवाणी और क्लाउड एरोसॉल इंट्रेक्शन और प्रेसिपिटेशन इन्हासमेंट एक्सपेरिमेंट सी ए आई पी ई ई एक्स), भारतीय उष्ण कटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान की ऐसी दो योजनायें हैं जो सागर और पर्यावरण विज्ञान में इसे विश्व के उत्कृष्ट केन्द्र के रूप में स्थापित कर देंगी। मंत्रालय ने भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आई एम डी), राष्ट्रीय मध्यावधि मौसम पूर्वानुमान केन्द्र (एन सी एम आर डब्ल्यू एफ) और भारतीय उष्ण कटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान (आई आई टी एम) को साथ लेकर मौसम विज्ञान के विकास की दिशा में सकारात्मक कदम उठाया है।

(पसूका) ——————————————-

*उप निदेशक (एम एंड सी) पत्र सूचना कार्यालय, नई दिल्ली

**27 जुलाई धरती विज्ञान मंत्रालय का स्थापना दिवस है।

कल्पना पालखी वाला*

00.

राष्ट्रीय परती भूमि एटलस, 2010

खाद्य सुरक्षा के लिए और भूमि कृषि के अंतर्गत लाई जाए

भारत, जिसके पास विश्व की कुल भूमि का 2.5 फीसदी हिस्सा है, दुनिया की 17 प्रतिशत जनसंख्या का भार वहन कर रहा है। देश की जनसंख्या फिलहाल करीब एक अरब 19 करोड़ 80 लाख है और सन् 2050 तक इसके करीब एक  अरब 61 करोड़ 38 लाख हो जाने की संभावना है। लगातार बढती ऌस जनसंख्या के लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अतिरिक्त भूमि कृषि के अंतर्गत लाये जाने की जरूरत है, तथा मौजूदा कृषि भूमि की उत्पादकता बढाये जाने एवं उर्वर कृषि भूमि के क्षरण को रोकने के लिए जरूरी कदम उठाये जाने की आवश्यकता है। परती भूमि जो फिलहाल या तो उपयोग में नहीं आ रही हैं या जिसका आंशिक इस्तेमाल हो रहा है, खाद्य सुरक्षा में अहम योगदान कर सकती है। अतएव, भावी पीढी क़े लिए राष्ट्रीय परती भूमि एटलस के निर्माण की आवश्यकता पड़ी ।

परती भूमि का प्रभावी उपयोग सुनिश्चित करने के लिए राष्ट्रीय दूरसंवेदी केद्र (एनआरएसएडीओएस) ने सन् 1986 में लैंडसैट टीएम, आईआरएस-एलआईएसएस द्वितीय और आईआरएस एलआईएसएस तृतीय आंकड़ों के माध्यम से 1:50000 मापक के आधार पर राष्ट्रव्यापी परती भूमि मानचित्रण का काम शुरू किया। परियोजना सन् 1986 से 2000 के बीच पांच चरणों में पूरी की गयी। परती भूमि को 13 श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया। करीब 63.85 एम हेक्टेयर भूमि परती भूमि के रूप में चिह्नित की गयी।

परती भूमि को कृषि भूमि में तब्दील करने के लिए परती भूमि के उपयोग में  प्राथमिकता तय करने के लिए वर्ष 2002-03 में रबी सीजन के आईआरएस 1सी1डी एलआईएसएस तृतीय  आकंड़ों के माध्यम से दूसरी राष्ट्र स्तरीय परियोजना शुरू की गयी जहां क्षरण की मात्रा के आधार पर परती भूमि का और वर्गीकरण किया गया। मानचित्र में परती भूमि की 28 श्रेणियों के तहत करीब 55.64 एम हेक्टेयर भूमि आयी।

मौजूदा परियोजना में तीन सीजन (खरीफ, रबी और जायद) रिसोर्ससैट-1, वर्ष 2005-06 के दौरान एलआईएसएस-॥। चित्रों के माध्यम से 1:50000 मापक के आधार पर परती भूमि की 23 श्रेणियां चिह्नित की गयीं। तीन सीजनों के सेटेलाइट आंकड़ों से परती भूमि को झाड़ी वाली भूमि, जलजमाव वाली भूमि, जंगल झाड़ वाली भूमि आदि के रूप में वर्गीकृत करने में मदद मिली है।

भू डाटाबेस प्रारूप में पूरे देश का परती मानचित्र तैयार किया गया है और स्थानीय स्तर पर विभिन्न श्रेणियों की क्षेत्रफल सीमा का अनुमान लगाया गया है। राष्ट्रीय स्तर पर कुल 47.23 एम हेक्टेयर भूमि को परती भूमि के रूप में चिह्नित किया गया जो देश की कुल भूक्षेत्र का 14.19 फीसदी हिस्सा है। घनी झाड़ी वाली करीब 9.3 एम हेक्टेयर परती भूमि मुख्य परती भूमि है जबकि खुली झाड़ी वाली 9.16 एम हेक्टेयर भूमि  का दूसरा स्थान आता है। करीब 8.58 एम हेक्टेयर भूमि कम उपयोग की गयी या क्षरित वन झाड़ी भूमि है।

मौजूदा मानचित्रण में तीन सीजन एवं प्रविधि के उन्नत संवेदी आकंड़ों, डब्ल्यूजीएस 84 आंउाएड़ों का प्रयोग किया गया है। इस प्रकार निर्मित मानचित्र और सांख्यिकी  परती भूमि की नियमित निगरानी के लिए आधार रेखा का काम करेगी। इसी तर्ज पर वर्ष 2008-09 के लिए समुन्नत मानचित्र और सांख्यिकी शीघ्र जारी करने के लिए प्रयास चल रहे हैं।

सरकार के समेकित परती भूमि विकास कार्यक्रम, मरूभूमि विकास कार्यक्रम जैसे विभिन्न विकास कार्यक्रमों के माध्यम से परती भूमि के उपयोग से देश में कृषि भूमि संसाधन में सुधार होगा और कृषि उत्पादन एवं वनस्पति क्षेत्रफल में वृध्दि आएगी । वनस्पति क्षेत्र में वृध्दि से ही धरती के बढते तापमान के प्रतिकूल प्रभावों से निपटा जा सकता है।

00.
विज्ञान एक्सप्रेस 

विज्ञान एक्सप्रेस एक चलती फिरती प्रदर्शनी है जो 30 अक्टूबर, 2007 को प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और जर्मनी की चासंलर डॉ0 एंजेला मर्केल द्वारा संयुक्त रूप से उद्धाटन के बाद से पूरे देश का भ्रमण कर रही है। 16 डिब्बों वाली एसी ट्रेन में   अत्याधुनिक कक्षा को प्रदर्शित किया गया है। इस ट्रेन को कपूरथला की रेल कोच फैक्ट्री  ने तैयार किया है।  प्रदर्शनी को मुख्यत: मैक्स प्लैंक सोसायटी जर्मनी और भारत के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग ने मिलकर विकसित किया है। प्रदर्शनी में 300 से अधिक छाया तस्वीरें, 150 वीडियो क्लिप, मल्टीमीडिया शो आदि हैं।

प्रथम चरण

विज्ञान एक्सप्रेस को भव्य कार्यक्रम के बीच दिल्ली के सफदरजंग से  विदा किया गया । विज्ञान को लोकप्रिय बनाने में जुटे अहमदाबाद के सुविख्यात संगठन विक्रम ए साराभाई समुदाय विज्ञान केंद्र (वीएएससीएससी) को इस अद्भुत परियोजना के दैनिक प्रबंधन की जिम्मेदारी सौंपी गयी। करीब 30 सुशिक्षित व्यक्तियों की एक समर्पित टीम दर्शकों को प्रदर्शनी की सामग्री के बारे में समझाने के लिए तैनात की गयी। इन लोगों का चयन राष्ट्रव्यापी प्रक्रिया के तहत किया गया। परियोजना को एक बड़ी रसायन कंपनी बीएएसएफ से भी काफी सहयोग मिला । बीएएसएफ ने ट्रेन पर विशेष बाल प्रयोगशाला लगाई है जिसमें बोर्ड पर रसायन शास्र के रोचक प्रयोगों को प्रदर्शित किया गया है। कंपनी ने  इसके अलावा कई अन्य पहलुओं में भी सहयोग प्रदान किया।

हर स्टेशन पर इस अभिनवकारी ट्रेन के पहुंचने से पहले वहां लक्षित दर्शकों के लिए विशेष जागरूकता अभियान चलाया गया और इसमें स्थानीय मीडिया, स्थानीय स्कूल और महाविद्यालयों का सहयोग लिया गया।

57 स्थानों पर यात्रा के दौरान 22 लाख 50 हजार दर्शक इस प्रदर्शनी ट्रेन को देखने आए। इस  सफल यात्रा के बाद विज्ञान एक्सप्रेस का समापन समारोह आयोजित किया गया जहां गणमान्य अतिथियों ने इस पहल की उपलब्धियों की भूरि -भूरि सराहना की। इन अतिथियों ने विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग से इसे जारी रखने की मांग करते हुए ट्रेन को उन स्थानों का परिभ्रमण कराने को कहा जहां पहले यह ट्रेन नहीं गयी थी।

द्वितीय चरण

इसकी असाधारण सफलता से उत्साहित होकर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग ने विज्ञान एक्सप्रेस को दूसरी यात्रा पर भेजने का निर्णय लिया। मैक्स प्लांक सोसायटी भी इस प्रस्ताव पर तुरंत राजी हो गयी और उसने प्रदर्शित वस्तुओं को विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के पास ही रहने देने का फैसला किया। केवल कुछ वे प्रदर्शित वस्तुएं हटा ली गयीं जो यूरोप के विभिन्न संग्रहालयों से उधार ली गईं थीं और जिन्हें लौटाया जाना था।

प्रथम चरण के सफल प्रबंधन से अभिभूत होकर विक्रम ए साराभाई समुदाय विज्ञान केंद्र को दूसरे चरण के समन्वय की भी जिम्मेदारी सौंपी गयी। उनकी जिम्मेदारियों में जर्मनी वापस ले जायी गयी प्रदर्शित वस्तुओं के स्थान पर स्वदेशी वस्तुओं का विकास और इंतजाम करना, बाल प्रयोगशाला के स्थान पर ज्वाय ऑफ साइंस लैब की व्यवस्था तथा देशभर में छह महीने की अंतरिम यात्रा के लिए प्रंबंधन शामिल है। ज्वाय ऑफ साइंस में भौतिकी, रसायन शास्र, जीवविज्ञान, गणित, इलेक्ट्रोनिक्स  आदि से संबंधित प्रयोग प्रदर्शित किए गए हैं।

30 जून, 2008 को विज्ञान एक्सप्रेस ने दूसरे चरण की यात्रा प्रारंभ की। उसने करीब 50 नये स्थानों की यात्रा की जिनमें से अधिकतर द्वितीय और तृतीय श्रेणी के शहर थे। 13 लाख 50 हजार से अधिक लोग इस विज्ञान एक्सप्रेस के माध्यम से विज्ञान के विषयों और उसकी चुनौतियों से रूबरू हुए, उन्हें दुनिया के रहस्यों और महत्वपूर्ण खोजों, विज्ञान के बारे में नित उभरते मुद्दों के बारे में जानने को मिला तथा  विज्ञान की प्रगति और भविष्य की प्रौद्योगिकियों की एक झलक भी मिली। करीब बीस हजार छात्रों ने ज्वॉय ऑफ साइंस लैब में प्रयोग किए। एक नई पहल खगोल विज्ञान वर्ष समारोह था जिसके तहत ताराघर सॉपऊटवेयर के माध्यम से एक डिब्बे में ब्रह्मांड के तत्वों को प्रदर्शित किया गया। विज्ञान एक्सप्रेस की टीम ने मार्ग में ट्रेन से बाहर स्कूलों और कॉलेजों में भी प्रेजेंटेशन दिया।

देशभर में छह माह के परिभ्रमण के बाद 30 मई, 2009 को विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा एक विदाई समारोह आयोजित किया गया। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्री पृथ्वीराज चव्हाण इस समारोह के मुख्य अतिथि थे। उन्होंने विज्ञान एक्सप्रेस की टीम को बधाइयां दीं तथा उन्हें इस अत्याधुनिक कार्यक्रम को जारी रखने को कहा।

तृतीय चरण

इस वृहत चलती फिरती अत्याधुनिक कक्षा प्रदर्शनी की सतत सफलता ने विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग को तीसरा चरण प्रारंभ करने के लिए प्रेरित किया।  तीसरा चरण 02 अक्टूबर, 2009 को गांधीनगर से शुरू किया गया। जो प्रदर्शनियां समयावधि पूरी कर चुकी थीं उनके स्थान पर स्वदेशी प्रदर्शनियां शामिल की  गयींद्ग। जलवायु परिवर्तन पर समर्पित एक नया डिब्बा जोड़ा गया जिसके लिए एचएसबीसी बैंक ने धन उपलब्ध कराया । इसके साथ ही कैरियर के बारे में परामर्श पर भी विशेष ध्यान दिया गया। पेट्रोलियम संरक्षण शोध संघ ने  ऊर्जा बचत के नुस्खे बताने वाली कई प्रदर्शनियां लगाईं तथा इनसे संबंधित पोस्टर, पुस्तिकाएं एवं पर्चे प्रदान किए। नेस्ले लिमिटेड ने खाद्य और पोषण के बारे कुछ अनोखे पोस्टर प्रदर्शित किए।

तीसरे चरण के कार्यक्रम का समापन 27 अप्रैल, 2010 को गांधीनगर में हुआ। इस चरण में करीब 16 लाख दर्शकों ने प्रदर्शनी देखी जबकि करीब 50 हजार छात्रों ने प्रयोग किए। करीब 10 हजार किशोर छात्रों को विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में कैरियर के बारे में बताया गया। इसके अलावा 50 हजार से अधिक छात्रों ने प्लेटफार्मों और उसके बाहर जलवायु परिवर्तन से संबंधित गतिविधियों में हिस्सा लिया।

अनोखी उपलब्धियां

देशभर में 150 स्थानों पर अबतक 50 लाख से अधिक लोगों ने विज्ञान एक्सप्रेस का लुत्फ उठाया है। इसने अपने नाम चार रिकार्ड कर लिम्का बुक्स ऑफ रिकार्ड में अपना स्थान बना लिया है। राज्यपालों, मुख्यमंत्रियों, केंद्रीय एवं राज्य मंत्रियों, सांसदों, विधायकों, वैज्ञानिकों, कुलपतियों, संस्थानों के प्रमुखों, जिलाधिकारियों, वरिष्ठ अधिकारियों, निगम प्रमुखों समेत कई गणमान्य व्यक्तियों ने विज्ञान एक्सप्रेस की प्रदर्शनी देखी। इसे व्यापक मीडिया कवरेज भी मिला तथा प्रमुख राष्ट्रीय एवं स्थानीय अखबारों, टीवी चैनलों , रेडियो स्टेशनों, केबल टीवी पर 1000 से अधिक खबरें प्रकाशित एवं प्रसारित हुईं। विज्ञान एक्सप्रेस जिस शहर में भी गई वहां अपने ठहरने और वहां से जाने  के बाद भी चर्चा का विषय बनी रही।

इस अभिनवकारी कार्यक्रम के खाते में कई अन्य अनोखी उपलब्धियां आईं। उधमपुर पहुंचने पर आमलोगों के दर्शनार्थ ट्रेन खोले जाने से पहले ही सेना के निरीक्षण में विकलांग बच्चों ने इस ट्रेन का अवलोकन किया। उदयपुर में विज्ञान एक्सप्रेस की टीम स्थानीय जेल गयी और वहां उन्होंने 900 से अधिक कैदियों को विज्ञान के बारे में बताया तथा उनके लिए तारामंडल कार्यक्रम का आयोजन किया। पूर्वोत्तर क्षेत्र में कूचबिहार, तिनसुकिया और रंगिया  में सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) और  केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) के जवानों को इस ट्रेन की विशेष यात्रा करायी गयी। ये जवान सीमावर्ती एवं संवेदनशील इलाकों में तैनात हैं। पश्चिम बंगाल के राजभवन में वंचित वर्ग के बच्चों के लिए चलाए जा रहे स्कूल के छात्रों ने सियालदह में एक दिन ट्रेन में गुजारा। त्रिची में छोटे बच्चों के लिए विशेष रूप से पर्यवेक्षण केंद्र में परीक्षण किए गए।

जनजागरण

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग की महत्वपूर्ण परियोजना विज्ञान एक्सप्रेस इसके सभी हितधारकों के लिए एक बहुत बड़ा शैक्षिक अनुभव था। इसे अपार उत्साहजनक प्रतिक्रिया मिली और इसने विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग को पूरे देशभर में लोगों तक पहुंचने तथा उनमें विज्ञान के प्रति दिलचस्पी पैदा करवाने में भरपूर सहयोग किया। इसके लिए स्टेशनों पर रोचक, सूचनापरक, संवादपरक प्रारूपों एवं  गतिविधियों, प्रतिस्पर्धाओं का सहारा लिया गया। दर्शकों से जो प्रतिक्रयाएं मिलीं वे यह प्रदर्शित करती हैं कि इसने न केवल लोगों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण पैदा करने में, बल्कि युवा पीढी क़ो विज्ञान को एक कैरियर के रूप में चुनने के लिए  प्रेरित करने हेतु एक अहम भूमिका निभाई है।

भावी कार्यक्रम

अबतक की सफलता के साथ ही अब इस बात की बहुत मांग उठ रही है कि जिन स्थानों,जैसे छोटे शहरों आदि में विज्ञान एक्सप्रेस नहीं गयी है, वहां पहुंचने के लिए इसकी यात्रा जारी रखी जाए। करीब 40 ऐसे स्थान हैं जहां विज्ञान एक्सप्रेस नहीं गयी लेकिन वहां ट्रेन का ठहराव व्यवहारिक है। इन स्थानों के लिए विज्ञान एक्सप्रेस को  एक अन्य यात्रा पर भेजा जा सकता है। प्रदर्शनी में जिन प्रदर्शित चीजों की अवधि पूरी हो गयी है अथवा जो पुरानी पड़ गयी हैं उनके स्थान पर ऐसी स्वदेशी चीजें लगाई जा सकती हैं जो संबंधित क्षेत्र में हमारी अपनी क्षमताओं और उपलब्धियों का प्रदर्शन करें।

27 अप्रैल, 2010 को तीसरे चरण के समापन के बाद इस ट्रेन को भारतीय रेलवे द्वारा मरम्मत और रखरखाव कार्य के लिए भेजा गया। यह कार्य पूरा होने पर इसे आगे की यात्रा के लिए फिट घोषित किये जाने के बाद इसे प्रस्तावित चौथे चरण पर भेजा जाएगा। चौथा चरण नवंबर, 2010 में शुरू किये जाने की संभावना है।

राष्ट्रीय समुद्री भू वैज्ञानिक डाटा केंद्र

भू-विज्ञान मंत्रालय और विदेश मंत्रालय ने राष्ट्रीय अंटार्कटिक एवं सागर अनुसंधान केंद्र के तत्वाधान में वर्ष 2001 में बाह्य महाद्वीपीय मिशन शुरू किया। यह मिशन नेशनल हाइड्रोग्राफिक ऑफिस (एनएचओ), राष्ट्रीय समुद्री विज्ञान संस्थान(एनआईओ), राष्ट्रीय भू-भौतिकी अनुसंधान संस्थान (एनजीआरआई), राष्ट्रीय भूगर्भ सर्वेक्षण (जीएसआई), हाइड्रोकार्बन महानिदेशालय (डीजीएच) और तेल एवं प्राकृतिक गैस निगम (ओएनजीसी) के साथ मिलकर शुरू किया गया। यह सबसे चुनौतीपूर्ण और बहुपरक कार्यों में एक है जिस पर भारत ने कभी कार्य नहीं किया। इसमें इन प्रतिष्ठित  भूवैज्ञानिक संगठनों के 40 से अधिक वैज्ञानिक हिस्सा ले रहे हैं। इसका उद्देश्य देश की महाद्वीपीय सीमा के बाहर अपनी तटीय रेखा से करीब 200 नौटिकल मील दूर के क्षेत्र के बारे में पता लगाना, और उसके बारे में जानना है ।

यह भारत द्वारा अब तक किए गए समुद्री भू-भौतिकी सर्वेक्षणों में एक है जिसके तहत जुलाई 2002 से फरवरी 2004 के दौरान 42 पूर्व निर्धारित सीमा क्षेत्रों में 31000 किलोमीटर लंबे इलाके के भूकंप प्रतिबिम्बन, गुरुत्व तथा मैग्नेटिक डाटा तैयार किए गए और उनके साथ ही गहराई संबंधी सूचनाएं भी शामिल की गईं। इसके अलावा भारत द्वारा पहली बार 100 समुद्री सतह भूकंपमापी यंत्र तैनात किए गए जिनकी सूचना ग्रहण करने की क्षमता 92 फीसदी तक थी। अंतिम परिणाम यह रहा कि हार्डकॉपी प्रिंटआउट से लेकर टेप, सीडी, वीसीडी आदि में सात टीबी डाटा संग्रहित हुआ।

बड़ी मात्रा में संग्रहित आकड़ों और उसकी पेचीदगी को ध्यान में रखकर मंत्रालय ने एनसीएओआर में अत्याधुनिक अभिलेखागार सुविधा विकसित करने की दिशा में कदम उठाया। प्रक्रियागत सभी औपचारिकताओं को पूरा करने के बाद मैसर्स टीसीएस को इस बहुसंस्थानात्मक प्रयास में सहयोगी बनाया गया है। भू-विज्ञान मंत्रालय के सचिव डॉ. शैलेश नायक ने 11 दिसंबर, 2009 को डाटासेंटर के पहले चरण का विधिवत शुभारंभ किया।

इस डाटासेंटर से हिंद महासागर की समुद्री भू-भौतिकी एवं गहराई संबंधी जानकारी के वेब आधारित डाटाबेस तैयार करने में मदद मिलती है। इस तंत्र के हिस्से हैं- नेटवर्क भंडारण डाटा अभिलेखागार तथा मेटाडीबी  एवं जीआईएसडीबी से युक्त डाटा पुन:प्राप्ति और डाटा प्रस्संकरण।

इस तंत्र की रूपरेखा ऐसी है कि वह प्रोमैक्स, जीयोग्राफिक मॉडलिंग अप्लिकेशन आर 2007 वी 9.5,जीएमएसवाईएस(जियो सॉफ््ट), जेनेरिक मैपिंग टूल्स 4, आर्क जीआईएस 9.2, जीयोकैप और कैरिस लॉट्स जैसे भू-भौतिक सॉपऊटवेयरों में सहयोग करता है।

डाटाबेस की मेटाडाटा प्रविधि डाटा की प्रकृति, उसके संग्रहण-प्रसंस्करण आदि बातों के बारे में विस्तार से बताती है। इससे अब तक किए गए विभिन्न प्रकार के समुद्री सर्वेक्षणों आदि के बारे में जानकारी मिलती है। दुनिया के प्रमुख समुद्री भू-भौतिकी डाटा केंद्रों के साथ संपर्क से इस डाटासेंटर की उपयोगिता बढ जाती है क्योंकि भारतीय उपमहाद्वीप के बाहर सागरीय क्षेत्रों में एक ही स्थल पर झांकने का अवसर मिलता है। इसका प्रारूप इतना लचीला है कि इसकी वृध्दि आसानी से हो सकती है।

इस  डाटासेंटर में तीन प्रकार के समुद्री भू-भौतिकी डाटा हैं-

  • गोपनीय प्रकार के डाटा जो भारत के सागरीय सीमा के निर्धारण के लिए इकट्ठा किए गए हैं।
  • कॉपीराइट वाले आंकड़े जो दूसरे संस्थानों द्वारा प्रदान किए गए हैं।
  • सार्वजनिक डाटा।

तंत्र संरचना को एनसीएओआर द्वारा संग्रहीत समुद्री आंकड़ों के अभिलेखन, भंडारण तथा पुन: प्राप्ति के लिए विशेष रूप से व्यवस्थित किया गया। यह विशेष आर्थिक क्षेत्र मानचित्रण परियोजना के अंग के रूप में किया गया है। साथ ही दक्षिणी सागरीय क्षेत्रों में वैज्ञानिक अभियानों के दौरान इकट्ठे किए गए आंकड़े भी यहां संग्रहीत हैं।

00.

ग्रामीण व्यवसाय केन्द्र-ग्रामीण समृध्दि के प्रोत्साहक माध्यम हमारे देश में पंचायतें सबसे निचले स्तर की संस्थायें हैं और ग्रामीण क्षेत्रों में समाजिक तथा आर्थिक विकास में प्रगति लाने के मामले में इन्हें संवैधानिक अधिकार प्राप्त है। ग्रामीण व्यवसाय केन्द्र की पहल का मुख्य उद्देश्य मात्र आजीविका सहयोग से आगे बढ़कर ग्रामीण समृध्दि को प्रोत्साहन देना, गैर-कृषि आमदनी को बढ़ाना और ग्रामीण रोजगार की वृध्दि करना है। इस स्कीम का मुख्य उद्देश्य पंचायती राज संस्थाओं के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों के लिए भारत के त्वरित आर्थिक विकास का विस्तार करना है। ग्रामीण व्यवसाय केन्द्र देश के ग्रामीण क्षेत्रों के लिए सहभागी विकास मॉडल की भूमिका निभाता है। इस प्रकार यह सार्वजनिक-निजी-पंचायत-भागीदारी के चतुष्पदी मंच का निर्माण करता है। ग्रामीण कारोबार केंद्र स्थापित करने के लिए आवश्यक संसाधनों को केंद्रीय राज्य स्कीमों के आपसी सहयोग के जरिए तथा साझीदारी संस्थाओं के माध्यम से उपयोग में लाया जा सकता है, हालांकि पंचायती राज मंत्रालय के बजट से कुछ धनराशि उपलब्ध करने की व्यवस्था है।

ग्रामीण व्यवसाय केंद्र की पहल 4-पी (पब्लिक-प्राइवेट-पंचायत-पार्टनरशिप) का मॉडल रही है जिसमें हर भागीदारी की भूमिकायें और जिम्मेदारियां स्पष्ट रूप से निर्धारित होती है और प्रत्येक भागीदारी दक्षता की पहचान, लोगों के अवदान तथा प्राकृतिक संसाधनों एवं स्थानीय निवासियों की चिन्ताओं को दूर करने और समुदाय के संपर्कों को मजबूत बनाने और सक्षम व्यवसाय पहल करने जिससे ग्रामीण लोगों को लाभ पहुंच सके तथा बाद में ग्रामीण कारोबार केंद्र से उभरते हुए आर्थिक विकास योजना को विकेन्द्रीकृत करते हुए पहल की जा सके। कारोबार के साझीदार ऐसे स्थानीय कौशलों उत्पादों की पहचान करेगें और कारोबार योजनाएं तैयार करेंगे जो स्थानीय रोजगार को टिकाऊ बनायेंगे। केंद्रीय राज्य सरकारें उपयुक्त नीति व्यवस्था के माध्यम से, सरकारी को सुनिश्चित करके तथा बुनियादी ढांचों आदि में प्रमुख अंतरालों को कम करके आवश्यक कार्रवाई करेगीं।

वर्तमान स्थिति

राज्य सरकारों के साथ विचार-विमर्श करके ऐसे 35 जिलों की पहचान कर ली गई है जिनमें ग्रामीण व्यवसाय केंद्र (आर.बी.एच.) हस्तक्षेप कर सकता है। प्रसिध्द संगठनों की सेवा है लेने के लिए उनकी सूची बना ली गई है जैसे आर.बी.एच. और उनकी गतिविधियों की पहचान के लिए गेटवे एजेंसियों की सूची तैयार कर ली गई है। छब्बीस जिलों में आर.बी.एच. कार्यशालायें आयोजित की गई और सर्वोत्ताम उत्पादों की पहचान की गई।

13 अगस्त, 2009 को संशोधित मार्ग निर्देश जारी किए गए जिसमें उप-जिलास्तर पर आर.बी.एच. कार्यशालाएं आयोजित करने की अनुमति दे दी गई। मार्ग-निर्देशों के अनुसार, पंचायती मंत्रालय के पिछड़े क्षेत्र अनुदान कोष स्कीम के अंतर्गत आने वाले सभी 250 जिलों और पूर्वोत्तार के सभी जिलों में आर.बी.एच स्थापित करने के लिए धनराशि उपलब्ध कराई जा सकती है।

आर.बी.एच. स्कीम के तहत अब तक 57 परियोजनाओं के लिए वित्ताीय सहायता दी जा चुकी है।

योजना की अनोखी विशेषताएं

1. यह बाजार साझीदारी के जरिए अपेक्षाकृत व्यापक बाजार के साथ ग्रामीण उत्पादक का सम्पर्क जोड़ती है और इसे समेकित कारोबार के रूप में विकसित करती है जिससे दोनों पक्षों को लाभ होता है, इसलिए यह टिकाऊ होता है।

2. सबसे निचले स्तर की ग्रामीण लोकतांत्रिक संस्थायें पंचायतें स्थानीय स्वायत्ता सरकारें आर्थिक विकास के लिए योजनाओं के निर्माण और कार्यान्वयन में मुख्य भूमिका निभाती है, जिसमें स्थानीय संसाधन प्रदायगियों पर आधारित हैं, लोगों की आवश्यकताएं तथा सापेक्ष खपत की क्षमता की जरूरतें महसूस करती है।

3. परियोजना ग्रामीण क्षेत्र में स्थित है और यह आर्थिक कार्य-कलाप पर आधारित है। यह ग्रामीण रोजगार तथा आजीविका के अवसर उपलब्ध कराती है।

4. यह स्कीम मांग पर आधारित है तथा राज्यवार कोई आबंटन नहीं है।

भविष्य की योजनाएं – स्कीम को लोकप्रिय बनाने तथा इसके क्षितिज को व्यापक बनाने के लिए भारतीय उद्यमशीलता विकास संस्थान, गुजरात इस समय आर.बी.एच. का मूल्यांकन एवं पुनर्सरंचना अध्ययन कर रहा है।

00.

प्रोजेक्ट चीता

*सुरेश प्रकाश अवस्थी

भारत सरकार ने हाल ही में देश में लुप्त हो चुके चीते को फिर से जंगलों में बसाने की तीन अरब रुपये की योजना को स्वीकार कर वन्य जीव प्रेमियों को एक बड़ी खुशखबरी दी है। करीब आधी सदी पूर्व देश से गायब हो चुके चीते को बसाने की परियोजना-प्रोजेक्ट चीता-के पहले चरण को स्वीकृति मिल गई है। केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण राज्य मंत्री श्री जयराम रमेश के अनुसार मध्य प्रदेश में दो और राजस्थान में एक वन क्षेत्र को इस परियोजना के लिए चुना गया है। इन वन क्षेत्रों में शुरू में छ:-छ: चीते लाए जाएंगे। आशा है कि तीन चार वर्षों में चीते भारत में फिर से छलांगे भरने लगेंगे।

मध्य प्रदेश के कूनों पालपुर वन्यजीव अभयारण्य और नौरादेही वन्यजीव अभयारण्य के अलावा राजस्थान के जैसलमेर जिले में शाहगढ़ का चयन प्रोजेक्ट चीता के तहत किया गया है। इन अभयारण्यों में अफ्रीकी प्रजाति के चीते लाए जाएंगे। इनके लिए नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका से बात चल रही है। उत्तरी अफ्रीका के चीते पश्चिम एशिया के कई देशों में पल रहे हैं और वहीं से भारत लाए जाएंगे। ईरान से भी बात हो चुकी है। ये देश बिना किसी लागत के भारत को चीते देने को तैयार हैं। विशेषज्ञों ने भी ईरानी और अफ्रीकी नस्ल के चीतों को भारत की जलवायु के अनुकूल पाया है। दोनों देशों में पाए जाने वाले चीतों में आनुवंशिक समानता भी है।  श्री रमेश के अनुसार पिछले छ: महीने से उनका मंत्रालय देश में चीता लाने की परियोजना पर काम कर रहा है। पिछले वर्ष सितंबर 2009 में चीते पर एक अन्तर्राष्ट्रीय बैठक भी देश में (गजनेर) में हुई थी। इसके बाद पर्यावरणविद् श्री रणधीर सिंह, चीता विशेषज्ञ श्री दिव्यभानु सिंह और भारतीय वन्यजीव संस्थान के श्री वी.के. झाला की सदस्यता वाली तीन सदस्यों की एक समिति बनाई गई जिसने देश के 10 वन्य क्षेत्रों (अभयारण्यों आदि) का अध्ययन कर 28 जुलाई को अपनी रिपोर्ट मंत्रालय को सौंपी। इस रिपोर्ट को स्वीकार करते हुए श्री रमेश ने प्रोजेक्ट चीता को मूर्त रूप देने के निर्देश दिये हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार चीता भारतीय जीवन से अभिन्न रूप से जुड़ा वन्यप्राणी है। यह संभवत: एकमात्र स्तनपाई जन्तु है जिसे आज भी विश्वभर में चीता कह कर ही बुलाया जाता है। चीता शब्द संस्कृत के ‘चित्राकु’ शब्द का अपभ्रंश है, जिसका अर्थ है धब्बेदार। वनक्षेत्रों से जुड़े हुए चरागाहों में रहने वाला संसार का यह सबसे तेज प्राणी मानव जाति के लालच का शिकार हुआ है। अपनी खूबसूरत और आकर्षक खाल के लिए यह शुरू से ही शिकारियों के लिए आकर्षण का केन्द्र रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार पिछली शताब्दी के पचासवें दशक तक चीता भारत के जंगलों में विचरता था। परन्तु राजे-रजवाड़ों के शिकार के शौक और तस्करों के लालच ने इसे शीघ्र ही देश से गायब कर दिया। देखने में समानता के कारण कुछ लोग अभी भी तेंदुए को चीता समझने की भूल कर बैठते हैं। परन्तु दोनों काफी अलग हैं। लगभग एक दशक पूर्व, यूरोप में जब क्लोनिंग से एक भेड़ का विकास किया गया था तब हैदराबाद स्थित सेंटर फॉर सेल्युलर ऐंड मालेकुलर बॉयलॉजी में चीते की क्लोनिंग के जरिए उसे पुनर्जीवन देने का प्रयास किया गया था और आशा जताई गई थी कि वर्ष 2005 तक उसका क्लोन तैयार हो जाएगा। परन्तु लगता है अभी तक यह प्रयास सफल नहीं हो पाया है। मैसूर के वन्यप्राणी संग्रहालय (चिड़ियाघर) ने भी 2001 में अफ्रीकी नस्ल के चीते के पालन-पोषण की बात कहीं थी पर किसी कारणवश यह विचार भी साकार नहीं हो सका।

जाने माने वन्यजीव विशेषज्ञ दिव्यभानु सिंह ने चीते के बारे में काफी कुछ लिखा-पढ़ा है। उनका कहना है कि करीब 2 हजार वर्ष पूर्व चीते भारत में पाले जाते थे और बारहवीं शताब्दी के आते-आते राजे-महाराजे उनका उपयोग हिरनों (ब्लैकबक) के शिकार के लिए करने लगे थे। इन सदियों के दौरान हजारों चीतों का शिकार किया जा चुका है। कहा जाता है कि मुगल सम्राट अकबर के पास एक हजार चीते थे। चीतों की संख्या में कमी आने का सबसे बड़ा कारण उनकी खुद की शिकार करने की आदत भी है। वह अपने शिकार को आखिर तक दौड़ाता है और इस प्रयास में वह प्राय: घास के मैदानों एवं चरागाहों में प्रवेश कर जाता है। आबादी के विस्तार के कारण धीरे-धीरे घास के मैदान कम होते गए और चीतों को अपना जीवन बचाना कठिन हो गया। चीता विशेषज्ञों के अनुसार 1947 में अंतिम तीन चीतों का शिकार किया गया और 1968 में देश में अंतिम बार चीते को देखा गया।

श्री रमेश ने प्रोजेक्ट चीता को मंजूरी देते हुए कहा था कि चीते को भारत लाने से भारत की पर्यावरण प्रणाली और पारिस्थितिकी के संरक्षण में भी बड़ी मदद मिलेगी। चूंकि बाघ जंगल में होते हैं और चीता चरागाहों में रहता है, इसलिए यदि चीता लाया गया तो इस बहाने घास के मैदानों और चरागाहों भी बचाया जा सकेगा। परन्तु इस परियोजना की सबसे बड़ी समस्या भी यही है। जिस देश में चरागाह, जनसंख्या के बोझ तले और विकास की आवश्यकताओं के कारण निरंतर समाप्त होते जा रहे हैं, वहां 5600 वर्ग किलोमीटर चरागाह क्षेत्र को चीतों के लिए विकसित करना सचमुच एक चुनौतीपूर्ण कार्य होगा। आज की परिस्थिति में गांवों को उजाड़ना और विस्थापितों का पुनर्वास एक जटिल समस्या है। परन्तु सरकार ने इसके लिए जो 80 करोड़ रुपये की योजना बनाई है, उस पर यदि ईमानदारी से और मन से अमल किया गया तो सुखद नतीजे देखने को मिल सकते हैं। चीताें को बसाने के लिए जिन तीन जगहों का चुनाव किया गया है, उनकी पर्यावरणीय स्थिति ऐसी है कि उन्हें शीघ्र ही इस परियोजना के लिए तैयार किया जा सकता है और वहां तत्काल चीते लाकर छोड़े जा सकते हैं।

मध्यप्रदेश के शिवपुरी जिले में स्थित कूनों पालपुर वन्य प्राणी अभयारण्य को चीता पालन के लिए आदर्श माना जा रहा है। वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया (डब्ल्यूटीआई) और वाइल्डलाइफ इंस्टीच्यूट ऑफ इंडिया (डब्ल्यूआईआई) (ने पांच राज्यों के उन वन्य क्षेत्रों का व्यापक सर्वेक्षण किया था, जिनमें करीब 50 वर्ष पूर्व पहले चीते रहा करते थे और इनमें कूनों-पालपुर को सर्वोत्तम माना गया है। इस क्षेत्र में गुजरात के सिंहों को भी बसाने की योजना है। डब्ल्यूटीआई के प्रमुख श्री एम. के. रणजीत सिंह का कहना है कि यदि चीतों और सिंहों को कूनो में लाकर बसाया जाता है तो यह एक अनूठी पर्यावरणीय स्थिति होगी, जिसमें चीता, सिंह और तेदुएं साथ-साथ रह सकेंगे। लेकिन इसके लिए चीते को पहले लाकर बसाना होगा। परियोजना के तहत जो दूसरा स्थान चुना गया है वह है राजस्थान का शाहगढ़। पाकिस्तान की सीमा से लगे जैसलमेर जिले के इस अभयारण्य में चीते को सुरक्षित रूप से बसाने के लिए थोड़े अतिरिक्त प्रयास करने होंगे। इसके लिए 140 कि.मी.लंबी बाड़ तैयार करनी होगी, जबकि सीमावर्ती क्षेत्र में पहले से ही बाड़ लगी हुई है। तीसरा इलाका मध्यप्रदेश का नौरादेही अभयारण्य है, जो सागर संभाग में स्थित है। यह अभयारण्य प्राकृतिक रूप से चीता-पालन के लिए आदर्शं है। ऐसे में चीतो की वापसी होती है तो चरागाहों को भी नया जीवन मिलेगा, साथ ही देश में पर्यटन को बढ़ावा भी मिलेगा, इसे एक स्वागत योग्य कदम ही कहा जाएगा।

00.

भूजल स्तर में सुधार लाना एक अरब दस करोड़ की जनसंख्या वाला भारत आबादी के लिहाज से विश्व का दूसरा सबसे बड़ा देश है। विश्व की कुल भूमि के 2.45 प्रतिशत क्षेत्र में बसे इस देश की अर्थव्यवस्था कृषि पर निर्भर है। विश्व की 16 प्रतिशत जनसंख्या वाले भारत में संसार के कुल जल संसाधनों का 4 प्रतिशत जल उपलब्ध है।

राष्ट्रीय एकीकृत जल संसाधन विकास आयोग की रिपोर्ट (1999) के अनुसार भारत के अनुमानित 1123 अरब घन मीटर (बीसीएम) उपयोग के योग्य जल में से सतही जल की मात्रा लगभग 690 बीसीएम है और भूगर्भीय जल संसाधन 433 बीसीएम का है। इसमें यह भी कहा गया है कि सभी स्रोतों में उठती मांगों के कारण 2025 में लगभग 843 बीसीएम जल की आवश्यकता होगी, जिसमें भूजल का योगदान 35.3 प्रतिशत अथवा 298 बीसीएम का होगा। जिन क्षेत्रों में भूजल का योगदान अधिक रहने की संभावना है, वे हैं-सिंचाई, घरेलू और नगरपालिका जलापूर्ति, उद्योग एवं विद्युत क्षेत्र। इस अनुमान से पता चलता है कि आने वाले समय में सीमित भू-जल संसाधनों पर दबाव और भी बढ़ जाएगा। यद्यपि वैश्विक तपन और जलवायु परिवर्तन के प्रत्याशित प्रभावों का अभी भलीभांति अंदाजा नहीं लगाया जा सका है, तब भी यह तो निश्चित है कि भविष्य में समस्या का एक नया आयाम सामने आएगा। पिछले कुछ दशकों में बढ़ती जनसंख्या की निरंतर बढ़ती मांग के कारण जल संसाधनों पर दबाव काफी बढ़ गया है।

भूजल ने भारत की अर्थव्यवस्था के विकास में उल्लेखनीय योगदान दिया है और देश के सामाजिक-आर्थिक विकास में एक प्रमुख उत्प्रेरक की भूमिका निभाई है। वित्त, बिजली और डीजल, बढ़िया किस्म के बीज, उर्वरक और सरकारी अनुदान की सहज उपलब्धता के साथ-साथ तकनीकी रूप से व्यवहारिक योजना पर क्रियान्वयन के कारण भूजल निकास संरचनाओं के विकास में जबर्दस्त वृध्दि हुई है। तीसरी लघु सिंचाई जनगणना के अनुसार 2001 में भारत में 1 करोड़ 80 लाख भूजल विकास संरचनायें थीं। अनुमान है कि यह संख्या अब बढ़कर 2 करोड़ तक पहुंच चुकी होगी। 1951 से 2001 के बीच भू-जल सिचिंत क्षेत्र में नौ गुनी वृध्दि हुई है।

केन्द्रीय भूजल बोर्ड ने राज्यों के साथ मिलकर सक्रिय भूजल संसाधनों का जो आकलन लगाया है, उसके अनुसार वार्षिक रूप से देश के पुनर्भरण योग्य भूजल संसाधनों के लगभग 50 प्रतिशत का ही वर्तमान में उपयोग हो रहा है। परन्तु, जमीन के नीचे के जल क्षेत्रों की मौजूदगी और वितरण को नियंत्रित करने वाली अनेक जटिलताओं के कारण देश के विभिन्न भागों में भूजल की उपलब्धता और उपयोग में भारी भिन्नता है। उदाहरण्ा के लिए, भारत की गांगेय क्षेत्र और ब्रह्मपुत्र के व्यापक कछारों की भूगर्भीय संरचनाओं में प्रचुर भूजल संसाधन उपलब्ध हैं जबकि प्रायद्वीपीय भारत की चट्टानी संरचनाओं में अत्यन्त सीमित मात्रा में कहीं-कहीं ही पानी मिलता है।

आकलन के अनुसार, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली, गुजरात और तमिलनाडु में भूजल का अच्छा विकास हुआ है। इन राज्यों के अधिकांश क्षेत्रों में भूगर्भीय जल स्तर काफी नीचे चला गया है और जल संसाधनों का ह्रास हो रहा है। दूसरी और ओडिशा, पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश के कुछ भागों में और असम जैसे पूर्वी और पूर्वोत्तर के राज्यों में में भू-जल का विकास अभी भी ठीक से नहीं हुआ है।

भूजल क्षेत्र की चुनौतियां

भौगोलिक संरचना, जलवायु, जलविज्ञान संबंधी और सामाजिक आर्थिक बनावटों के कारण भारत के संदर्भ में भू-जल का प्रबंधन एक चुनौती भरा कार्य है। इसे देखते हुए भू-जल संसाधनों के वैज्ञानिक प्रबंधन के लिए जल ग्राही क्षेत्रों की विशेषताओं के अध्ययन के साथ-साथ पानी की उपलब्धता, आपूर्ति और जमीन से पानी निकालने के उपायों के बारे में भी अध्ययन करना होगा। इसके साथ ही यह भी ध्यान में रखना होगा कि उपलब्धता संसाधनों का संरक्षण, नियंत्रण और सुरक्षा कैसे की जा सकती है।

चुनौती का मुकाबला :जल संसाधन मंत्रालय के प्रयास

भू-जल के गिरते स्तर से जुड़ी समस्याओं से निपटने